भाग-३५(35) तापसी स्वयंप्रभा के प्रभाव से वानरों का गुफा के बाहर निकलकर समुद्र तट पर पहुँचना, लौटने की अवधि बीत जाने पर अङ्गद आदि वानरों का उपवास करके प्राण त्याग देने का निश्चय करना

 


तत्पश्चात् जब सब वानरयूथपति खा-पीकर विश्राम कर चुके, तब धर्म का आचरण करने वाली वह एकाग्रहृदया तपस्विनी उन सबसे इस प्रकार बोली - वानरो! यदि फल खाने से तुम्हारी थकावट दूर हो गयी हो और यदि तुम्हारा वृत्तान्त मेरे सुनने योग्य हो तो मैं उसे सुनना चाहती हूँ। 

उसकी यह बात सुनकर पवनकुमार हनुमानजी बड़ी सरलता के साथ यथार्थ बात कहने लगे - देवी! सम्पूर्ण जगत के राजा दशरथनन्दन श्रीमान् भगवान् राम, जो देवराज इन्द्र और वरुण के समान तेजस्वी हैं, दण्डकारण्य में पधारे थे। उनके साथ उनके छोटे भाई लक्ष्मण तथा उनकी धर्मपत्नी विदेहनन्दिनी सीता भी थीं। जनस्थान में आकर रावण ने उनकी स्त्री का बलपूर्वक अपहरण कर लिया। 

‘श्रेष्ठ वानरों के राजा वानरजातीय वीरवर सुग्रीव महाराज श्रीरामचन्द्रजी के मित्र हैं, जिन्होंने इन अङ्गद आदि प्रधान वीरों के साथ हम लोगों को सीता माता की खोज करने के लिये अगस्त्य सेवित और यमराज द्वारा सुरक्षित दक्षिण दिशा में भेजा है। उन्होंने आज्ञा दी थी कि तुम सब लोग एक साथ रहकर विदेहकुमारी सीता सहित उस इच्छानुसार रूप धारण करने वाले राक्षसराज रावण का पता लगाना। हमने यहाँका सारा जंगल छान डाला। अब दक्षिण दिशा में समुद्र के भीतर उनका अन्वेषण करना है। अब तक सीता माता का कुछ पता नहीं लगा और हम लोग भूख-प्यास से पीड़ित हो गये। अन्त में हम सब के सब एक वृक्ष के नीचे थककर बैठ गये।' 

'हमारे मुख की कान्ति फीकी पड़ गयी। हम सभी चिन्ता में मग्न हो गये। चिन्ता के महासागर में डूबकर हम उसका पार नहीं पा रहे थे। इसी समय चारों ओर दृष्टि दौड़ाने पर हमको यह विशाल गुफा दिखायी पड़ी, जो लता और वृक्षों से ढकी हुई तथा अन्धकार से आच्छन्न थी। थोड़ी ही देर में इस गुफा से हंस, कुरर और सारस आदि पक्षी निकले, जिनके पंख जल से भीगे थे और उनमें कीचड़ लगी हुई थी। तब मैंने वानरों से कहा, 'अच्छा होगा कि हम लोग इसके भीतर प्रवेश करें।' इन सब वानरों को भी यह अनुमान हो गया कि गुफा के भीतर पानी है। 

‘हम सब लोग अपने कार्य की सिद्धि के लिये उतावले थे ही, अत: इस गुफा में कूद पड़े। अपने हाथों से एक-दूसरे को दृढ़तापूर्वक पकड़कर हम गुफा में आगे बढ़ने लगे। इस तरह सहसा हम लोगों ने इस अँधेरी गुफा में प्रवेश किया। यही हमारा कार्य है और इसी कार्य से हम इधर आये हैं। भूख से व्याकुल एवं दुर्बल होने के कारण हम सबने तुम्हारी शरण ली। तुमने आतिथ्य धर्म के अनुसार हमें फल और मूल अर्पित किये और हमने भी भूख से पीड़ित होने के कारण उन्हें भरपेट खाया। देवी ! हम भूख से मर रहे थे। तुमने हम सब लोगों के प्राण बचा लिये। अत: बताओ ये वानर तुम्हारे उपकार का बदला चुकाने के लिये क्या सेवा करें।' 

स्वयंप्रभा सर्वज्ञ थी। उन वानरों के ऐसा कहने पर उसने उन सभी यूथपतियों को इस प्रकार उत्तर दिया - मैं तुम सभी वेगशाली वानरों पर यों ही बहुत संतुष्ट हूँ। धर्मानुष्ठान में लगी रहने के कारण मुझे किसी से कोई प्रयोजन नहीं रह गया है। 

उस तपस्विनी ने जब इस प्रकार धर्मयुक्त उत्तम बात कही, तब हनुमानजी ने निर्दोष दृष्टिवाली उस देवी से यों कहा – देवी ! तुम धर्माचरण में लगी हुई हो। अत: हम सब लोग तुम्हारी शरण में आये हैं। महात्मा सुग्रीव ने हम लोगों के लौटने के लिये जो समय निश्चित किया था, वह इस गुफा के भीतर घूमने में ही बीत गया। अब तुम कृपा करके हमें इस बिल से बाहर निकाल दो। सुग्रीव के बताये हुए समय को हम लाँघ चुके हैं, इसलिये अब हमारी आयु पूरी हो चुकी है। हम सबके सब सुग्रीव के भय से डरे हुए हैं। अत: तुम हमारा उद्धार करो। धर्मचारिणि! हमें जो महान् कार्य करना है, उसे भी हम इस गुफा में रहने के कारण नहीं कर सके हैं।'  

हनुमानजी के ऐसा कहने पर तापसी बोली - मैं समझती हूँ जो एक बार इस गुफा में चला आता है, उसका जीते- जी यहाँ से लौटना बहुत कठिन हो जाता है। तथापि नियमों के पालन और तपस्या के उत्तम प्रभाव से मैं तुम सभी वानरों को इस गुफा से बाहर निकाल दूँगी। श्रेष्ठ वानरो ! तुम सब लोग अपनी-अपनी आँखें बंद कर लो। आँख बंद किये बिना यहाँ से निकलना असम्भव है। 

यह सुनकर सबने सुकुमार अङ्गुलि वाले हाथों से आँखें मूंद लीं। गुफा से बाहर निकलने की इच्छा से प्रसन्न होकर उन सबने सहसा नेत्र बंद कर लिये। इस प्रकार उस समय हाथों से मुँह ढक लेने के कारण उन महात्मा वानरों को स्वयंप्रभा ने पलक मारते-मारते बिल से बाहर निकाल दिया। 

तत्पश्चात् वहाँ उस धर्मपरायणा तापसी ने उस विषम गुफा से बाहर निकले हुए समस्त वानरों को आश्वासन देकर इस प्रकार कहा - श्रेष्ठ वानरो! यह रहा नाना प्रकार के वृक्षों और लताओं से व्याप्त शोभाशाली विन्ध्यगिरि । इधर यह प्रस्रवणगिरि है और सामने यह महासागर लहरा रहा है। तुम्हारा कल्याण हो। अब मैं अपने स्थान पर जाती हूँ।' 

ऐसा कहकर स्वयंप्रभा उस सुन्दर गुफा में चली गयी। तदनन्तर उन श्रेष्ठ वानरों ने वरुण की निवास भूमि भयंकर महासागर को देखा, जिसका कहीं पार नहीं था और जो भयानक लहरों से व्याप्त होकर निरन्तर गर्जना कर रहा था। मयासुर के अपनी माया द्वारा बनाये हुए पर्वत की दुर्गम गुफा में सीता की खोज करते हुए उन वानरों का वह एक मास बीत गया, जिसे राजा सुग्रीव ने लौटने का समय निश्चित किया था। विन्ध्यगिरि के पार्श्ववर्ती पर्वत पर, जहाँ के वृक्ष फूलों से लदे थे, बैठकर वे सभी महात्मा वानर चिन्ता करने लगे। 

जो वसन्त ऋतु में फलते हैं, उन आम आदि वृक्षों की डालियों को मञ्जरी एवं फूलों के अधिक भार से झुकी हुई तथा सैकड़ों लता - वेलों से व्याप्त देख वे सभी सुग्रीव के भय से थर्रा उठे (वे शरद् ऋतु में चले थे और शिशिर ऋतु आ गयी थी। इसीलिये उनका भय बढ़ गया था )। वे एक-दूसरे को यह बताकर कि अब वसन्त का समय आना चाहता है, राजा के आदेश के अनुसार एक मास के भीतर जो काम कर लेना चाहिये था, वह न कर सकने या उसे नष्ट कर देने के कारण भय के मारे पृथ्वी पर गिर पड़े। 

तब जिनके कंधे सिंह और बैल के समान मांसल थे, भुजाएँ बड़ी-बड़ी और मोटी थीं तथा जो बड़े बुद्धिमान् थे, वे युवराज अङ्गद उन श्रेष्ठ वानरों तथा अन्य वनवासी कपियों को यथावत् सम्मान देते हुए मधुर वाणी से सम्बोधित करके बोले - वानरो ! हम सब लोग वानरराज की आज्ञा से आश्विन मास बीतते-बीतते एक मास की निश्चित अवधि स्वीकार करके सीता की खोज के लिये निकले थे, किंतु हमारा वह एक मास उस गुफा में ही पूरा हो गया, क्या आप लोग इस बात को नहीं जानते? हम जब चले थे, तब से लौटने के लिये जो मास निर्धारित हुआ था, वह भी बीत गया; अतः अब आगे क्या करना चाहिये ?

'आप लोगों को राजा का विश्वास प्राप्त है। आप नीति मार्ग में निपुण हैं और स्वामी के हित में तत्पर रहते हैं। इसीलिये आप लोग यथा समय सब कार्यों में नियुक्त किये जाते हैं। कार्य सिद्ध करने में आप लोगों की समानता करने वाला कोई नहीं है। आप सभी अपने पुरुषार्थ के लिये सभी दिशाओं में विख्यात हैं। इस समय वानरराज सुग्रीव की आज्ञा से मुझे आगे करके आप लोग जिस कार्य के लिये निकले थे, उसमें आप और हम सफल न हो सके। ऐसी दशा में हम लोगों को अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ेगा, इसमें संशय नहीं है। भला वानरराज के आदेश का पालन न करके कौन सुखी रह सकता है ?' 

'स्वयं सुग्रीव ने जो समय निश्चित किया था, उसके बीत जाने पर हम सब वानरों के लिये उपवास करके प्राण त्याग देना ही ठीक जान पड़ता है। 'सुग्रीव स्वभाव से ही कठोर हैं। फिर इस समय तो वे हमारे राजा के पद पर स्थित हैं। जब हम अपराध करके उनके पास जायँगे, तब वे कभी हमें क्षमा नहीं करेंगे। उलटे सीता माता का समाचार न पाने पर हमारा वध ही कर डालेंगे, अतः हमें आज ही यहाँ स्त्री, पुत्र, धन-सम्पत्ति और घर-द्वार का मोह छोड़कर मरणान्त उपवास आरम्भ कर देना चाहिये। यहाँ से लौटने पर राजा सुग्रीव निश्चय ही हम सबका वध कर डालेंगे। अनुचित वध की अपेक्षा यहीं मर जाना हम लोगों के लिये श्रेयस्कर है।' 

‘सुग्रीव ने युवराज पद पर मेरा अभिषेक नहीं किया है। अनायास ही महान् कर्म करने वाले महाराज श्रीराम ने ही उस पद पर मेरा अभिषेक किया है। राजा सुग्रीव ने तो पहले से ही मेरे प्रति वैर बाँध रखा है। इस समय आज्ञा उल्लंघन रूप मेरे अपराध को देखकर पूर्वोक्त निश्चय के अनुसार तीखे दण्ड द्वारा मुझे मरवा डालेंगे। जीवन-काल में मेरा व्यसन (राजा के हाथ से मेरा मरण) देखने वाले सुहृदों से मुझे क्या काम है? यहीं समुद्र के पावन तट पर मैं मरणान्त उपवास करूँगा।' 

युवराज वालिकुमार अङ्गद की यह बात सुनकर वे सभी श्रेष्ठ वानर करुणस्वर में बोले - सचमुच सुग्रीव का स्वभाव बड़ा कठोर है। उधर श्रीरामचन्द्रजी अपनी प्रिय पत्नी सीता के प्रति अनुरक्त हैं। सीता माता को खोजकर लौटने के लिये जो अवधि निश्चित की गयी थी, वह समय व्यतीत हो जाने पर भी यदि हम कार्य किये बिना ही वहाँ उपस्थित होंगे तो उस अवस्था में हमें देखकर और विदेहकुमारी का दर्शन किये बिना ही हमें लौटा हुआ जानकर श्रीरामचन्द्रजी का प्रिय करने की इच्छा से सुग्रीव हमें मरवा डालेंगे, इसमें संशय नहीं है। 

'अत: अपराधी पुरुषों का स्वामी के पास लौटकर जाना कदापि उचित नहीं है। हम सुग्रीव के प्रधान सहयोगी या सेवक होने के कारण इधर उनके भेजने से आये थे। यदि यहीं सीता माता का दर्शन करके अथवा उनका समाचार जानकर वीर सुग्रीव के पास नहीं जायँगे तो अवश्य ही हमें यमलोक में जाना पड़ेगा। 

भय से पीड़ित हुए उन वानरों का यह वचन सुनकर तार ने कहा - यहाँ बैठकर विषाद करने से कोई लाभ नहीं है। यदि आप लोगों को ठीक जँचे तो हम सब लोग स्वयंप्रभा की उस गुफा में ही प्रवेश करके निवास करें। यह गुफा माया से निर्मित होने के कारण अत्यन्त दुर्गम है। यहाँ फल-फूल, जल और खाने-पीने की दूसरी वस्तुएँ भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। अत: उसमें हमें न तो देवराज इन्द्र से, न श्रीरामचन्द्रजी से और न वानरराज सुग्रीव से ही भय है। 

तार की कही हुई पूर्वोक्त बात, जो अङ्गद के भी अनुकूल थी, सुनकर सभी वानरों को उस पर विश्वास हो गया। वे सब-के-सब बोल उठे - बन्धुओ ! हमें वैसा कार्य आज ही अविलम्ब करना चाहिये, जिससे हम मारे न जायँ।  

इति श्रीमद् राम कथा किष्किन्धाकाण्ड अध्याय-८ का भाग-३५(35) समाप्त ! 

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