दक्षिण दिशा की ओर वानरों को भेजने के पश्चात् राजा सुग्रीव ने तारा के पिता और अपने श्वशुर 'सुषेण' नामक वानर के पास जाकर उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम किया और कुछ कहना आरम्भ किया। सुषेण मेघ के समान काले और भयंकर पराक्रमी थे। उनके सिवा, महर्षि मरीचि के पुत्र महाकपि अर्चिष्मान् भी वहाँ उपस्थित थे, जो देवराज इन्द्र के समान तेजस्वी तथा शूरवीर श्रेष्ठ वानरों से घिरे हुए थे। उनकी कान्ति विनतानन्दन गरुड़ के समान थी। वे बुद्धि और पराक्रम से सम्पन्न थे। उनके अतिरिक्त मरीचि के पुत्र मारीच नाम वाले वानर भी थे, जो महाबली और 'अर्चिर्माल्य' नाम से प्रसिद्ध थे। इनके सिवा और भी बहुत से ऋषिकुमार थे, जो वानररूप में वहाँ विराजमान थे।
सुषेण के साथ उन सबको सुग्रीव ने पश्चिम दिशा की ओर जाने की आज्ञा दी और कहा – कपिवरो! आप सब लोग दो लाख वानरों को साथ ले सुषेणजी की प्राधनता में पश्चिम को जाइये और विदेहह्नन्दिनी सीता की खोज कीजिये। श्रेष्ठ वानरो! सौराष्ट्र, बाह्लीक और चन्द्रचित्र आदि देशों, अन्यान्य समृद्धिशाली एवं रमणीय जनपदों, बड़े- बड़े नगरों तथा पुन्नाग, बकुल और उद्दालक आदि वृक्षों से भरे हुए कुक्षिदेश में एवं केवड़े के वनों में सीता की खोज करो।
‘पश्चिम की ओर बहने वाली शीतल जल से सुशोभित कल्याणमयी नदियों, तपस्वी जनों के वनों तथा दुर्गम पर्वतों में भी विदेहकुमारी का पता लगाओ। पश्चिम दिशा में प्राय: मरुभूमि है। अत्यन्त ऊँची और ठंढी शिलाएँ हैं तथा पर्वतमालाओं से घिरे हुए बहुत-से दुर्गम प्रदेश हैं। उन सभी स्थानों में सीता की खोज करते हुए क्रमश: आगे बढ़कर पश्चिम समुद्र तक जाना और वहाँ के प्रत्येक स्थान का निरीक्षण करना। वानरो ! समुद्र का जल तिमि नामक मत्स्यों तथा बड़े-बड़े ग्राहों से भरा हुआ है। वहाँ सब ओर देख-भाल करना।'
‘समुद्र के तट पर केवड़ों के कुञ्जों में, तमाल के काननों में तथा नारियल के वनों में तुम्हारे सैनिक वानर भलीभाँति विचरण करेंगे। वहाँ तुम लोग सीता को खोजना और रावण के निवास स्थान का पता लगाना। समुद्रतटवर्ती पर्वतों और वनों में भी उन्हें ढूँढना चाहिये। मुरवीपत्तन (मोरवी) तथा रमणीय जटापुर में, अवन्ती - तथा अङ्गलेपापुरी में, अलक्षित वन में और बड़े-बड़े राष्ट्रों एवं नगरों में जहाँ-तहाँ घूमकर पता लगाना। सिंधु-नदी और समुद्र के संगम पर सोमगिरि नामक एक महान् पर्वत है, जिसके सौ शिखर हैं। वह पर्वत ऊँचे-ऊँचे वृक्षों से भरा है। उसकी रमणीय चोटियों पर सिंह नामक पक्षी रहते हैं। जो तिमि नाम वाले विशालकाय मत्स्यों और हाथियों को भी अपने घोंसलों में उठा लाते हैं।'
‘सिंह नामक पक्षियों के उन घोंसलों में पहुँचकर उस पर्वत शिखर पर उपस्थित हुए जो हाथी हैं, वे उस पंखधारी सिंह से सम्मानित होने के कारण गर्व का अनुभव करते और मन-ही-मन संतुष्ट होते हैं। इसीलिये मेघों की गर्जना समान शब्द करते हुए उस पर्वत के जलपूर्ण विशाल शिखर पर चारों ओर विचरते रहते हैं। सोमगिरि का गगनचुम्बी शिखर सुवर्णमय है। उसके ऊपर विचित्र वृक्ष शोभा पाते हैं। इच्छानुसार रूप धारण करने वाले वानरों को चाहिये कि वहाँ के सब स्थानों को शीघ्रतापूर्वक अच्छी तरह देख लें।'
'वहाँ से आगे समुद्र बीच में पारियात्र पर्वत का सुवर्णमय शिखर दिखायी देगा, जो सौ योजन विस्तृत है। वानरो! उसका दर्शन दूसरों के लिये अत्यन्त कठिन है। वहाँ जाकर तुम्हें सीता की खोज करनी चाहिये। पारियात्र पर्वत के शिख रपर इच्छानुसार रूप धारण करने वाले, भयंकर, अग्नितुल्य तेजस्वी तथा वेगशाली चौबीस करोड़ गन्धर्व निवास करते हैं। वे सब के सब अग्नि की ज्वाला के समान प्रकाशमान हैं और सब ओर से आकर उस पर्वत पर एकत्र हुए हैं। भयंकर पराक्रमी वानरों को चाहिये कि वे उन गन्धर्वो के अधिक निकट न जायँ। उनका कोई अपराध न करें
और उस पर्वत शिखर से कोई फल न लें। क्योंकि वे भयंकर बल - विक्रम से सम्पन्न धैर्यवान् महाबली वीर गन्धर्व वहाँ के फल- मूलों की रक्षा करते हैं। उन पर विजय पाना बहुत ही कठिन है।
'वहाँ भी जानकी की खोज करनी चाहिये और उनका पता लगाने के लिये पूरा प्रयत्न करना चाहिये। प्राकृत वानर के स्वभाव का अनुसरण करने वाले तुम्हारी सेना के वीरों को उन गन्धर्वों से कोई भय नहीं है। पारियात्र पर्वत के पास ही समुद्र में वज्र नाम से प्रसिद्ध एक बहुत ऊँचा पर्वत है, जो नाना प्रकार के वृक्षों और लताओं से व्याप्त दिखायी देता है। वह वज्रगिरि वैदूर्यमणि के समान नील वर्ण का है। वह कठोरता में वज्रमणि (हीरे) के समान है। वह सुन्दर पर्वत वहाँ सौ योजन के घेरे में प्रतिष्ठित है। उसकी लंबाई और चौड़ाई दोनों बराबर हैं। वानरो ! उस पर्वत पर बहुत-सी गुफाएँ हैं। उन सबमें प्रयत्नपूर्वक सीता का अनुसंधान करना चाहिये।'
‘समुद्र के चतुर्थ भाग में चक्रवान् नामक पर्वत है। वहीं विश्वकर्मा ने सहस्रार चक्र का निर्माण किया था। वहीं से पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु पञ्चजन और हयग्रीव नामक दानवों का वध करके पाञ्चजन्य शङ्ख तथा वह सहस्रार सुदर्शन चक्र लाये थे। चक्रवान् पर्वत के रमणीय शिखरों और विशाल गुफाओं में भी इधर-उधर वैदेही सहित रावण का पता लगाना चाहिये। उससे आगे समुद्र की अगाध जलराशि में सुवर्णमय शिखरों वाला वराह नामक पर्वत है, जिसका विस्तार चौंसठ योजन की दूरी में है।'
‘वहीं प्राग्ज्योतिष नामक सुवर्णमय नगर है, जिसमें दुष्टात्मा नरक नामक दानव निवास करता है। उस पर्वत के रमणीय शिखरों पर तथा वहाँ की विशाल गुफाओं में सीतासहित रावण की तलाश करनी चाहिये। जिसका भीतरी भाग सुवर्णमय दिखायी देता है, उस पर्वतराज वराह को लाँघकर आगे बढ़ने पर एक ऐसा पर्वत मिलेगा, जिसका सब कुछ सुवर्णमय है तथा जिसमें लगभग दस सहस्र झरने हैं। उसके चारों ओर हाथी, सूअर, सिंह और व्याघ्र सदा गर्जना करते हैं और अपनी ही गर्जना की प्रतिध्वनि के शब्द से दर्प में भरकर पुन: दहाड़ने लगते हैं। उस पर्वत का नाम है मेघगिरि। जिस पर देवताओं ने हरित रंग के अश्व वाले श्रीमान् पाकशासन इन्द्र को राजा के पद पर अभिषिक्त किया था।'
'देवराज इन्द्र द्वारा सुरक्षित गिरिराज मेघ को लाँघकर जब तुम आगे बढ़ोगे, तब तुम्हें सोने के साठ हजार पर्वत मिलेंगे, जो सब ओर से सूर्य के समान कान्ति से देदीप्यमान हो रहे हैं और सुन्दर फूलों से भरे हुए सुवर्णमय वृक्षों से सुशोभित हैं। उनके मध्यभाग में पर्वतों का राजा गिरिश्रेष्ठ मेरु विराजमान है, जिसे पूर्वकाल में सूर्यदेव ने प्रसन्न होकर वर दिया था। उन्होंने उस शैलराज से कहा था कि 'जो दिन-रात तुम्हारे आश्रय में रहेंगे, वे मेरी कृपा से सुवर्णमय हो जायँगे तथा देवता, दानव, गन्धर्व जो भी तुम्हारे ऊपर निवास करेंगे, वे सुवर्ण के समान कान्तिमान् और मेरे भक्त हो जायँगे।'
‘विश्वेदेव, वसु, मरुद्गण तथा अन्य देवता सायंकाल में उत्तम पर्वत मेरु पर आकर सूर्यदेव का उपस्थान करते हैं। उनके द्वारा भलीभाँति पूजित होकर भगवान् सूर्य सब प्राणियों की आँखों से ओझल होकर अस्ताचल को चले जाते हैं। मेरु से अस्ताचल दस हजार योजन की दूरी पर है, किंतु सूर्यदेव आधे मुहूर्त में ही वहाँ पहुँच जाते हैं। उसके शिखर पर विश्वकर्मा का बनाया हुआ एक बहुत बड़ा दिव्य भवन है, जो सूर्य के समान दीप्तिमान् दिखायी देता है। वह अनेक प्रासादों से भरा हुआ है।'
‘नाना प्रकार के पक्षियों से व्याप्त विचित्र-विचित्र वृक्ष उसकी शोभा बढ़ाते हैं। वह पाशधारी महात्मा वरुण का निवास स्थान है। मेरु और अस्ताचल के बीच एक स्वर्णमय ताड़का वृक्ष है, जो बड़ा ही सुन्दर और बहुत ही ऊँचा है। उसके दस स्कन्ध (बड़ी शाखाएँ) हैं। उसके नीचे की वेदी बड़ी विचित्र है। इस तरह वह वृक्ष बड़ी शोभा पाता है। वहाँ के उन सभी दुर्गम स्थानों, सरोवरों और सरिताओं में इधर-उधर सीता सहित रावण का अनुसंधान करना चाहिये। मेरुगिरि पर धर्म के ज्ञाता महर्षि मेरुसावर्णि रहते हैं, जो अपनी तपस्या से ऊँची स्थिति को प्राप्त हुए हैं। वे प्रजापति के समान शक्तिशाली एवं विख्यात ऋषि हैं।'
‘सूर्यतुल्य तेजस्वी महर्षि मेरुसावर्णि के चरणों में पृथ्वी पर मस्तक टेक कर प्रणाम करने के अनन्तर तुम लोग उनसे मिथिलेशकुमारी का समाचार पूछना। रात्रि के अन्त में (प्रात:काल ) उदित हुए भगवान् सूर्य जीव जगत के इन सभी स्थानों को अन्धकाररहित ( एवं प्रकाशपूर्ण) करके अन्त में अस्ताचल को चले जाते हैं। वानरशिरोमणियो! पश्चिम दिशा में इतनी ही दूर तक वानर जा सकते हैं। उसके आगे न तो सूर्य का प्रकाश है और न किसी देश आदि की सीमा ही। अत: वहाँ से आगे की भूमि के विषय में मुझे कोई जानकारी नहीं है।'
‘अस्ताचल तक जाकर रावण के स्थान और सीता का पता लगाओ तथा एक मास पूर्ण होते ही यहाँ लौट आओ। एक महीने से अधिक न ठहरना। जो ठहरेगा, उसे मेरे हाथ से प्राणदण्ड मिलेगा। तुम लोगों के साथ मेरे पूजनीय श्वशुरजी भी जायँगे। तुम सब लोग इनकी आज्ञा के अधीन रहकर इनकी सभी बातें ध्यान से सुनना; क्योंकि ये महाबाहु महाबली सुषेणजी मेरे श्वशुर एवं गुरुजन हैं (अत: तुम्हारे लिये भी गुरु की भाँति ही आदरणीय हैं )।'
'तुम सब लोग भी बड़े पराक्रमी तथा कर्तव्याकर्तव्य के निर्णय में प्रमाणभूत (विश्वसनीय) हो, तथापि इन्हें अपना प्रधान बनाकर तुम पश्चिम दिशा की देखभाल आरम्भ करो। अमित तेजस्वी महाराज श्रीराम की पत्नी का पता लग जाने पर हम कृतकृत्य हो जायँगे; क्योंकि उन्होंने जो उपकार किया है, उसका बदला इसी तरह चुक सकेगा।अत: इस कार्य के अनुकूल और भी जो कर्तव्य देश, काल और प्रयोजन से सम्बन्ध रखता हो, उसका विचार करके आपलोग उसे भी करें।'
सुग्रीव की बातें अच्छी तरह सुनकर सुषेण आदि सब वानर उन वानरराज की अनुमति ले वरुण द्वारा सुरक्षित पश्चिम दिशा की ओर चल दिये।
