भाग-९१(91) वन-जन्तुओं के भागने का कारण जानने के लिये श्रीराम की आज्ञा से लक्ष्मण का शाल वृक्ष पर चढ़कर भरत की सेना को देखना और उनके प्रति अपना रोषपूर्ण उद्द्वार प्रकट करना
भाग-९२(92) श्रीराम का लक्ष्मण के रोष को शान्त करके भरत के सद्भाव का वर्णन करना, लक्ष्मण का लज्जित हो श्रीराम के पास खड़ा होना और भरत की सेना का पर्वत के नीचे छावनी डालना
भाग-९३(93) भरत का शत्रुघ्न आदि के साथ श्रीराम के आश्रम पर जाना, उनकी पर्णशाला को देखना तथा रोते-रोते उनके चरणों में गिर जाना, श्रीराम का उन सबको हृदय से लगाना और मिलना
भाग-९४(94) श्रीराम का भरत को कुशल प्रश्न के बहाने राजनीति का उपदेश करना
भाग-९५(95) भरत का श्रीराम से राज्य ग्रहण करने का अनुरोध करके उनसे पिता की मृत्युका समाचार बताना श्रीराम आदि का विलाप, पिता के लिये जलाञ्जलि - दान, पिण्डदान और रोदन
भाग-९६(96) श्रीराम का भरत से वन में आगमन का प्रयोजन पूछना, भरत का उनसे पुन: राज्य ग्रहण करने के लिये कहना और श्रीराम का उसे अस्वीकार कर देना
भाग-९७(97) वशिष्ठजी के साथ आती हुई कौशल्या का मन्दाकिनी के तट पर सुमित्रा आदि के समक्ष दुःखपूर्ण उद्गार
भाग-९८(98) कैकयी का पश्चाताप, भरत का श्रीराम को वापस अयोध्या लौटाने के उपाय को लेकर चिंतित होना तथा वशिष्ठजी का श्रीराम को मनाने के लिए उपाय बतलाना
भाग-९९(99) भरत का श्रीराम के सम्मुख स्वयं को दोषी ठहराना, श्रीराम का भरत को समझाना तथा श्रीराम और भरत के प्रेम को देखकर देवताओं का चिंतित होना
भाग-१००(100) भरत का स्वयं वन में रहने का और श्रीराम को वापस अयोध्या लौट जाने का अनुग्रह करना तथा जनकजी के दूतों का समाचार लेकर चित्रकूट में आना
भाग-१०१(101) चित्रकूट में जनकजी का पहुँचना, कोल किरातादि की भेंट, सबका परस्पर मिलाप
भाग-१०२(102) कौशल्या सुनयना-संवाद, श्री सीताजी का शील स्वभाव
भाग-१०३(103) जनक द्वारा सुनयना को भरतजी की महिमा कहना, जनक-वशिष्ठादि संवाद, इंद्र की चिंता, सरस्वती का इंद्र को समझाना
भाग-१०४(104) भरत का श्रीराम को अयोध्या में चलकर राज्य ग्रहण करने के लिये कहना, श्रीराम का पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये ही राज्य ग्रहण न करके वन में रहने का ही दृढ़ निश्चय बताना
भाग-१०५ (105) भरत की पुन: श्रीराम से अयोध्या लौटने और राज्य ग्रहण करने की प्रार्थना
भाग-१०६(106) श्रीराम का भरत को समझाकर उन्हें अयोध्या जाने का आदेश देना, जाबालि का नास्तिकों के मत का अवलम्बन करके श्रीराम को समझाना
भाग-१०७(107) श्रीराम के द्वारा जाबालि के नास्तिक मत का खण्डन करके आस्तिक मत का स्थापन
भाग-१०८(108) वशिष्ठजी का सृष्टि परम्परा के साथ इक्ष्वाकु कुल की परम्परा बताकर ज्येष्ठ के ही राज्याभिषेक का औचित्य सिद्ध करना और श्रीराम से राज्य ग्रहण करने के लिये कहना
भाग-१०९(109) वशिष्ठजी के समझाने पर भी श्रीराम को पिता की आज्ञा के पालन से विरत होते न देख भरत का धरना देने को तैयार होना तथा श्रीराम का उन्हें समझाकर अयोध्या लौटने की आज्ञा देना
भाग-११०(110) भरत और श्रीराम के प्रेम की महिमा से सभी का मोहित होना, देवताओं द्वारा अयोध्यावासियों पर माया का उच्चाटन करना
भाग-१११(111) भरत का चित्रकूट में तीर्थ जल स्थापन तथा तीर्थ की भरत कूप नाम से प्रसिद्धि
भाग-११२(112) कैकयी का श्रीराम को मनाने का प्रयास करना, ऋषियों का भरत को श्रीराम की आज्ञा के अनुसार लौट जाने की सलाह देना, श्रीराम का उन्हें समझाकर अपनी चरणपादुका देकर उन सबको विदा करना
भाग-११३(113) भरत का भरद्वाज से मिलते हुए अयोध्या को लौट आना
भाग-११४(114) भरत के द्वारा अयोध्या की दुरवस्था का दर्शन तथा अन्त: पुर में प्रवेश करके भरत का दु:खी होना
भाग-११५(115) भरत का नन्दिग्राम में जाकर श्रीराम की चरणपादुकाओं को राज्य पर अभिषिक्त करके उन्हें निवेदनपूर्वक राज्य का सब कार्य करना
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