भाग-११४(114) भरत के द्वारा अयोध्या की दुरवस्था का दर्शन तथा अन्त: पुर में प्रवेश करके भरत का दु:खी होना

 


इसके बाद प्रभावशाली महायशस्वी भरत ने स्निग्ध, गम्भीर घर्घर घोष से युक्त रथ के द्वारा यात्रा करके शीघ्र ही अयोध्या में प्रवेश किया। उस समय वहाँ बिलाव और उल्लू विचर रहे थे। घरों के किवाड़ बंद थे। सारे नगर में अन्धकार छा रहा था। प्रकाश न होने के कारण वह पुरी कृष्णपक्ष की काली रात के समान जान पड़ती थी। जैसे चन्द्रमा की प्रिय पत्नी और अपनी शोभा से प्रकाशित कान्तिवाली रोहिणी उदित हुए राहु नामक ग्रह के द्वारा अपने पति ग्रस लिये जाने पर अकेली - असहाय हो जाती है, उसी प्रकार दिव्य ऐश्वर्य से प्रकाशित होने वाली अयोध्या राजा के कालकवलित हो जाने के कारण पीड़ित एवं असहाय हो रही थी। 

वह पुरी उस पर्वतीय नदी की भाँति कृशकाय दिखायी देती थी, जिसका जल सूर्य की किरणों से तपकर कुछ गरम और गेंदला हो रहा हो, जिसके पक्षी धूप से संतप्त होकर भाग गये हों तथा जिसके मीन, मत्स्य और ग्राह गहरे जल में छिप गये हों। जो अयोध्या पहले धूमरहित सुनहरी कान्तिवाली प्रज्वलित अग्निशिखा के समान प्रकाशित होती थी, वही श्रीरामवनवास के बाद हवनीय दुग्ध से सींची गयी अग्नि की ज्वाला के समान बुझकर विलीन-सी हो गयी है। 

उस समय अयोध्या महासमर में संकटग्रस्त हुई उस सेना के समान प्रतीत होती थी, जिसके कवच कटकर गिर गये हों, हाथी, घोड़े, रथ और ध्वजा छिन्न-भिन्न हो गये हों और मुख्य-मुख्य वीर मार डाले गये हों। प्रबल वायु के वेग से फेन और गर्जना के साथ उठी हुई समुद्र की उत्ताल तरंग सहसा वायु के शान्त हो जाने पर जैसे शिथिल और नीरव हो जाती है, उसी प्रकार कोलाहलपूर्ण अयोध्या अब शब्द शून्य सी जान पड़ती थी। 

यज्ञकाल समाप्त होने पर 'स्फ्य' आदि यज्ञसम्बन्धी आयुधों तथा श्रेष्ठ याजकों से सूनी हुई वेदी जैसे मन्त्रोच्चारण की ध्वनि से रहित हो जाती है, उसी प्रकार अयोध्या सुनसान दिखायी देती थी। जैसे कोई गाय साँड़ के साथ समागम के लिये उत्सुक हो, उसी अवस्था में उसे साँड़ से अलग कर दिया गया हो और वह नूतन घास चरना छोड़कर आर्त भाव से गोष्ठ में बँधी हुई खड़ी हो, उसी तरह अयोध्यापुरी भी आन्तरिक वेदना से पीड़ित थी। 

श्रीराम आदि से रहित हुई अयोध्या मोतियों की उस नूतन माला के समान श्रीहीन हो गयी थी, जिसकी अत्यन्त चिकनी चमकीली, उत्तम तथा अच्छी जाति की पद्मराग आदि मणियाँ उससे निकालकर अलग कर दी गयी हों। जो पुण्य-क्षय होने के कारण सहसा अपने स्थान से भ्रष्ट हो पृथ्वी पर आ पहुँची हो, अतएव जिसकी विस्तृत प्रभा क्षीण हो गयी हो, आकाश से गिरी हुई उस तारिका की भाँति अयोध्या शोभाहीन हो गयी थी। जो ग्रीष्म ऋतु में पहले फूलों से लदी हुई होने के कारण मतवाले भ्रमरों से सुशोभित होती रही हो और फिर सहसा दावानल के लपेट में आकर मुरझा गयी हो, वन की उस लता के समान पहले की उल्लासपूर्ण अयोध्या अब उदास हो गयी थी। 

वहाँ के व्यापारी वणिक् शोक से व्याकुल होने के कारण किंकर्तव्यविमूढ़ हो गये थे, बाजार-हाट और दुकानें बहुत कम खुली थीं। उस समय सारी पुरी उस आकाश की भाँति शोभाहीन हो गयी थी, जहाँ बादलों की घटाएँ घिर आयी हों और तारे तथा चन्द्रमा ढक गये हों। (उन दिनों अयोध्यापुरी की सड़कें झाड़ी-बुहारी नहीं गयी थीं, इसलिये यत्र-तत्र कूड़े-करकट के ढेर पड़े थे। उस अवस्था में) वह नगरी उस उजड़ी हुई पान भूमि (मधुशाला) के समान श्रीहीन दिखायी देती थी, जिसकी सफाई न की गयी हो, जहाँ मधु से खाली टूटी-फूटी प्यालियाँ पड़ी हों और जहाँ के पीने वाले भी नष्ट हो गये हों। 

उस पुरी की दशा उस पौंसले की-सी हो रही थी, जो खम्भों के टूट जाने से ढह गया हो, जिसका चबूतरा छिन्न- भिन्न हो गया हो, भूमि नीची हो गयी हो, पानी चुक गया हो और जलपात्र टूट-फूटकर इधर-उधर सब ओर बिखरे पड़े हों। जो विशाल और सम्पूर्ण धनुष में फैली हुई हो, उसकी दोनों कोटियों (किनारों) में बाँधने के लिये जिसमें रस्सी जुड़ी हुई हो, किंतु वेगशाली वीरों के बाणों से कटकर धनुष से पृथ्वी पर गिर पड़ी हो, उस प्रत्यञ्चा के समान ही अयोध्यापुरी भी स्थानभ्रष्ट हुई-सी दिखायी देती थी। 

जिस पर युद्धकुशल घुड़सवार ने सवारी की हो और जिसे शत्रुपक्ष की सेना ने सहसा मार गिराया हो, युद्धभूमि में पड़ी हुई उस घोड़ी की जो दशा होती है, वही उस समय अयोध्यापुरी की भी थी (कैकेयी के कुचक्र से उसके संचालक नरेश का स्वर्गवास और युवराज का वनवास हो गया था)। 

रथ पर बैठे हुए श्रीमान् दशरथनन्दन भरत ने उस समय श्रेष्ठ रथ का संचालन करने वाले सारथि सुमन्त्र से इस प्रकार कहा - अब अयोध्या में पहले की भाँति सब ओर फैला हुआ गाने-बजाने का गम्भीर नाद नहीं सुनायी पड़ता; यह कितने कष्ट की बात है! अब चारों ओर वारुणी (मधु ) की मादक गन्ध, व्याप्त हुई फूलों की सुगन्ध तथा चन्दन और अगुरु की पवित्र गन्ध नहीं फैल रही है। अच्छी-अच्छी सवारियों की आवाज, घोड़ों के हींसने का सुस्निग्ध शब्द, मतवाले हाथियों का चिग्घाड़ना तथा रथों की घर्घराहटका महान् शब्द – ये सब नहीं सुनायी दे रहे हैं। 

‘श्रीरामचन्द्रजी के निर्वासित होने के कारण ही इस पुरी में इस समय इन सब प्रकार के शब्दों का श्रवण नहीं हो रहा है। श्रीराम के चले जाने से यहाँ के तरुण बहुत ही संतप्त हैं। वे चन्दन और अगुरु की सुगन्ध का सेवन नहीं करते तथा बहुमूल्य वनमालाएँ भी नहीं धारण करते। अब इस पुरी के लोग विचित्र फूलों के हार पहनकर बाहर घूमने के लिये नहीं निकलते हैं।' 

‘श्रीराम के शोक से पीड़ित हुए इस नगर में अब नाना प्रकार के उत्सव नहीं हो रहे हैं। निश्चय ही इस पुरी की वह सारी शोभा मेरे भाई के साथ ही चली गयी। जैसे वेगयुक्त वर्षा के कारण शुक्लपक्ष की चाँदनी रात भी शोभा नहीं पाती है, उसी प्रकार नेत्रों से आँसू बहाती हुई यह अयोध्या भी शोभित नहीं हो रही है। अब कब मेरे भाई महोत्सव की भाँति अयोध्या में पधारेंगे और ग्रीष्म- ऋतु में प्रकट हुए मेघ की भाँति सबके हृदय में हर्ष का संचार करेंगे। अब अयोध्या की बड़ी-बड़ी सड़कें हर्ष से उछलकर चलते हुए मनोहर वेषधारी तरुणों के शुभागमन से शोभा नहीं पा रही हैं।' 

इस प्रकार सारथि के साथ बातचीत करते हुए दुःखी भरत उस समय सिंह से रहित गुफा की भाँति राजा दशरथ से हीन पिता के निवासस्थान राजमहल में गये। जैसे सूर्य के छिप जाने से दिन की शोभा नष्ट हो जाती है और देवता शोक करने लगते हैं, उसी प्रकार उस समय वह अन्तःपुर शोभाहीन हो गया था और वहाँ के लोग शोकमग्न थे। उसे सब ओर से स्वच्छता और सजावट से हीन देख भरत धैर्यवान् होने पर भी अत्यन्त दुःखी हो आँसू बहाने लगे। 

इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-११४(114) समाप्त !

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