लक्ष्मणजी को अत्यंत क्रोध से तमतमाया हुआ देखकर और उनकी प्रामाणिक (सत्य) सौगंध सुनकर सारा जगत् भय में डूब गया। तब लक्ष्मणजी के अपार बाहुबल की प्रशंसा करती हुई आकाशवाणी हुई - हे तात! तुम्हारे प्रताप और प्रभाव को कौन कह सकता है और कौन जान सकता है? परन्तु कोई भी काम हो, उसे अनुचित-उचित खूब समझ-बूझकर किया जाए तो सब कोई अच्छा कहते हैं। वेद और विद्वान कहते हैं कि जो बिना विचारे जल्दी में किसी काम को करके पीछे पछताते हैं, वे बुद्धिमान् नहीं हैं।
लक्ष्मण भरत के प्रति रोषावेश के कारण क्रोधवश अपना विवेक खो बैठे थे, देववाणी सुनकर लक्ष्मणजी सकुचा गए। उस अवस्था में श्रीरामने उन्हें समझा- बुझाकर शान्त किया और इस प्रकार कहा – लक्ष्मण! महाबली और महान् उत्साही भरत जब स्वयं यहाँ आ गये हैं, तब इस समय यहाँ धनुष अथवा ढाल- तलवार से क्या काम है ? लक्ष्मण! पिता के सत्य की रक्षा के लिये प्रतिज्ञा करके यदि मैं युद्ध में भरत को मारकर उनका राज्य छीन लूँ तो संसार में मेरी कितनी निन्दा होगी, फिर उस कलंकित राज्य को लेकर मैं क्या करूँगा?
‘अपने बन्धु-बान्धवों या मित्रों का विनाश करके जिस धन की प्राप्ति होती हो, वह तो विषमिश्रित भोजन के समान सर्वथा त्याग देने योग्य है; उसे मैं कदापि ग्रहण नहीं करूँगा। लक्ष्मण! मैं तुमसे प्रतिज्ञापूर्वक कहता हूँ कि धर्म, अर्थ, काम और पृथ्वी का राज्य भी मैं तुम्हीं लोगों के लिये चाहता हूँ। सुमित्राकुमार! मैं भाइयों के संग्रह और सुख के लिये ही राज्य की भी इच्छा करता हूँ और इस बात की सच्चाई के लिये मैं अपना धनुष छूकर शपथ खाता हूँ।'
‘सौम्य लक्ष्मण! समुद्र से घिरी हुई यह पृथ्वी मेरे लिये दुर्लभ नहीं है, परंतु मैं अधर्म से इन्द्र का पद पाने की भी इच्छा नहीं कर सकता। मानद! भरत को, तुमको और शत्रुघ्न को छोड़कर यदि मुझे कोई सुख मिलता हो तो उसे अग्निदेव जलाकर भस्म कर डालें। वीर! पुरुषप्रवर्! भरत बड़े भ्रातृभक्त हैं। वे मुझे प्राणों से भी बढ़कर प्रिय हैं। मुझे तो ऐसा मालूम होता है, भरत ने अयोध्या में आने पर जब सुना है कि मैं तुम्हारे और जानकी के साथ जटा - वल्कल धारण करके वनमें आ गया हूँ, तब उनकी इन्द्रियाँ शोक से व्याकुल हो उठी हैं और वे कुलधर्म का विचार करके स्नेहयुक्त हृदय से हमलोगों से मिलने आये हैं। इन भरत के आगमन का इसके सिवा दूसरा कोई उद्देश्य नहीं हो सकता।'
'माता कैकेयी के प्रति कुपित हो, उन्हें कठोर वचन सुनाकर और पिताजी को प्रसन्न करके श्रीमान् भरत मुझे राज्य देने के लिये आये हैं। भरत का हम लोगों से मिलने के लिये आना सर्वथा समयोचित है। वे हमसे मिलने के योग्य हैं। हम लोगों का कोई अहित करने का विचार तो वे कभी मन में भी नहीं ला सकते।'
‘भरत ने तुम्हारे प्रति पहले कब कौन - सा अप्रिय बर्ताव किया है, जिससे आज तुम्हें उनसे ऐसा भय लग रहा है और तुम उनके विषय में इस तरह की आशङ्का कर रहे हो ? भरत के आने पर तुम उनसे कोई कठोर या अप्रिय वचन न बोलना। यदि तुमने उनसे कोई प्रतिकूल बात कही तो वह मेरे ही प्रति कही हुई समझी जायगी।'
'सुमित्रानन्दन! कितनी ही बड़ी आपत्ति क्यों न आ जाय, पुत्र अपने पिता को कैसे मार सकते हैं? अथवा भाई अपने प्राणों के समान प्रिय भाई की हत्या कैसे कर सकता है? यदि तुम राज्य के लिये ऐसी कठोर बात कहते हो तो मैं भरत से मिलने पर उन्हें कह दूँगा कि तुम यह राज्य लक्ष्मण को दे दो। लक्ष्मण! यदि मैं भरत से यह कहूँ कि 'तुम राज्य इन्हें दे दो' तो वे 'बहुत अच्छा' कहकर अवश्य मेरी बात मान लेंगे।'
अपने धर्मपरायण भाई के ऐसा कहने पर उन्हीं के हित में तत्पर रहने वाले लक्ष्मण लज्जावश मानो अपने अङ्गों में ही समा गये - लाज से गड़ गये।
श्रीराम का पूर्वोक्त वचन सुनकर लज्जित हुए लक्ष्मण ने कहा - भैया! मैं समझता हूँ, हमारे पिता महाराज दशरथ स्वयं ही आपसे मिलने आये हैं।
लक्ष्मण को लज्जित हुआ देख श्रीराम ने उत्तर दिया - मैं भी ऐसा ही मानता हूँ कि हमारे महाबाहु पिताजी ही हम लोगों से मिलने आये हैं अथवा मैं ऐसा समझता हूँ कि हमें सुख भोगने के योग्य मानते हुए पिताजी वनवास के कष्ट का विचार करके हम दोनों को निश्चय ही घर लौटा ले जायँगे।
‘मेरे पिता रघुकुलतिलक श्रीमान् महाराज दशरथ अत्यन्त सुख का सेवन करने वाली इन विदेहराजनन्दिनी सीता को भी वन से साथ लेकर ही घर को लौटेंगे। अच्छे घोड़ों के कुल में उत्पन्न हुए ये ही वे दोनों वायु के समान वेगशाली, शीघ्रगामी, वीर एवं मनोरम अपने उत्तम घोड़े चमक रहे हैं। परम बुद्धिमान् पिताजी की सवारी में रहनेवाला यह वही विशालकाय शत्रुंजय नामक बूढ़ा गजराज है, जो सेना के मुहाने पर झूमता हुआ चल रहा है। महाभाग ! परंतु इसके ऊपर पिताजी का वह विश्वविख्यात दिव्य श्वेतछत्र मुझे नहीं दिखायी देता है - इससे मेरे मन में संशय उत्पन्न होता है।'
‘लक्ष्मण! अब मेरी बात मानो और पेड़ से नीचे उतर आओ।' धर्मात्मा श्रीराम ने सुमित्राकुमार लक्ष्मण से जब ऐसी बात कही, तब युद्ध में विजय पाने वाले लक्ष्मण उस शाल वृक्ष के अग्रभाग से उतरे और श्रीराम के पास हाथ जोड़कर खड़े हो गये।
उधर भरत ने सेना को आज्ञा दी कि 'यहाँ किसी को हम लोगों के द्वारा बाधा नहीं पहुँचनी चाहिये।' उनका यह आदेश पाकर समस्त सैनिक पर्वत के चारों ओर नीचे ही ठहर गये। उस समय हाथी, घोड़े और मनुष्यों से भरी हुई इक्ष्वाकुवंशी नरेश की वह सेना पर्वत के आस-पास की डेढ़ योजन (छ: कोस) भूमि घेरकर पड़ाव डाले हुए थी। नीतिज्ञ भरत धर्म को सामने रखते हुए गर्व को त्यागकर रघुकुलनन्दन श्रीराम को प्रसन्न करने के लिये जिसे अपने साथ ले आये थे, वह सेना चित्रकूट पर्वत के समीप बड़ी शोभा पा रही थी।

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