ऐसा अर्थयुक्त वचन कहकर जब श्रीराम चुप हो गये, तब धर्मात्मा भरत ने मन्दाकिनी के तट पर प्रजावत्सल धर्मात्मा श्रीराम से यह विचित्र बात कही - शत्रुदमन रघुवीर ! इस जगत में जैसे आप हैं, वैसा दूसरा कौन हो सकता है? कोई भी दुःख आपको व्यथित नहीं कर सकता। कितनी ही प्रिय बात क्यों न हो, वह आपको हर्षोत्फुल्ल नहीं कर सकती। वृद्ध पुरुषों के सम्माननीय होकर भी आप उनसे संदेह की बातें पूछते हैं। जैसे मरे हुए जीव का अपने शरीर आदि से कोई सम्बन्ध नहीं रहता, उसी प्रकार जीते-जी भी वह उनके सम्बन्ध से रहित है। जैसे वस्तु के अभाव में उसके प्रति राग-द्वेष नहीं होता, वैसे ही उसके रहने पर भी मनुष्य को राग- द्वेष से शून्य होना चाहिये। जिसे ऐसी विवेकयुक्त बुद्धि प्राप्त हो गयी है, उसको संताप क्यों होगा?
'नरेश्वर! जिसे आपके समान आत्मा और अनात्मा का ज्ञान है, वही संकट में पड़ने पर भी विषाद नहीं कर सकता। रघुनन्दन! आप देवताओं की भाँति सत्त्वगुण से सम्पन्न, महात्मा, सत्यप्रतिज्ञ, सर्वज्ञ, सबके साक्षी और बुद्धिमान् हैं। ऐसे उत्तम गुणों से युक्त और जन्म-मरण के रहस्य को जानने वाले आपके पास असह्य दुःख नहीं आ सकता। जब मैं परदेश में था, उस समय नीच विचार रखने वाली मेरी माता ने मेरे लिये जो पाप कर डाला, वह मुझे अभीष्ट नहीं है, अतः आप उसे क्षमा करके मुझ पर प्रसन्न हों।
'मैं धर्म के बन्धन में बँधा हूँ, इसलिये इस पाप करने वाली एवं दण्डनीय माता को मैं कठोर दण्ड देकर मार नहीं डालता। जिनके कुल और कर्म दोनों ही शुभ थे, उन महाराज दशरथ से उत्पन्न होकर धर्म और अधर्म को जानता हुआ भी मैं मातृवधरूपी लोकनिन्दित कर्म कैसे करूँ ? महाराज मेरे गुरु, श्रेष्ठ यज्ञकर्म करने वाले, बड़े-बूढ़े, राजा, पिता और देवता रहे हैं और इस समय परलोक वासी हो चुके हैं, इसीलिये इस भरी सभा में मैं उनकी निन्दा नहीं करता हूँ।'
'धर्मज्ञ रघुनन्दन! कौन ऐसा मनुष्य है, जो धर्म को जानते हुए भी स्त्री का प्रिय करने की इच्छा से ऐसा धर्म और अर्थ से हीन कुत्सित कर्म कर सकता है? लोक में एक प्राचीन किंवदन्ती है कि अन्तकाल में सब प्राणी मोहित हो जाते हैं - उनकी बुद्धि नष्ट हो जाती है। राजा दशरथ ने ऐसा कठोर कर्म करके उस किंवदन्ती की सत्यता को प्रत्यक्ष कर दिखाया।'
'पिताजी ने क्रोध, मोह और साहस के कारण ठीक समझ कर जो धर्म का उल्लङ्घन किया है, उसे आप पलट दें- उसका संशोधन कर दें। जो पुत्र पिता की की हुई भूल को ठीक कर देता है, वही लोक में उत्तम संतान माना गया है। जो इसके विपरीत बर्ताव करता है, वह पिता की श्रेष्ठ संतति नहीं है। अत: आप पिता की योग्य संतान ही बने रहें। उनके अनुचित कर्म का समर्थन न करें। उन्होंने इस समय जो कुछ किया है, वह धर्म की सीमा से बाहर है। संसार में धीर पुरुष उसकी निन्दा करते हैं।'
‘कैकेयी, मैं, पिताजी, सुहृद्गुण, बन्धु बान्धव, पुरवासी तथा राष्ट्र की प्रजा – इन सबकी रक्षा के लिये आप मेरी प्रार्थना स्वीकार करें। कहाँ वनवास और कहाँ क्षात्रधर्म? कहाँ जटाधारण और कहाँ प्रजा का पालन ? ऐसे परस्परविरोधी कर्म आपको नहीं करने चाहिये। महाप्राज्ञ! क्षत्रिय के लिये पहला धर्म यही है कि उसका राज्य पर अभिषेक हो, जिससे वह प्रजा का भलीभाँति पालन कर सके। भला कौन ऐसा क्षत्रिय होगा, जो प्रत्यक्ष सुख के साधनभूत प्रजापालनरूप धर्म का परित्याग करके संशय में स्थित, सुख के लक्षण से रहित, भविष्य में फल देने वाले अनिश्चित धर्म का आचरण करेगा?'
‘यदि आप क्लेशसाध्य धर्म का ही आचरण करना चाहते हैं तो धर्मानुसार चारों वर्णों का पालन करते हुए ही कष्ट उठाइये। धर्मज्ञ रघुनन्दन! धर्म के ज्ञाता पुरुष चारों आश्रमों में गार्हस्थ्य को ही श्रेष्ठ बतलाते हैं, फिर आप उसका परित्याग क्यों करना चाहते हैं? मैं शास्त्रज्ञान और जन्मजात अवस्था दोनों ही दृष्टियों से आपकी अपेक्षा बालक हूँ, फिर आपके रहते हुए मैं वसुधा का पालन कैसे करूँगा?
'मैं बुद्धि और गुण दोनों से हीन हूँ, बालक हूँ तथा मेरा स्थान आपसे बहुत छोटा है; अत: मैं आपके बिना जीवन-धारण भी नहीं कर सकता, राज्य का पालन तो दूर की बात है। धर्मज्ञ रघुनन्दन ! पिता का यह सारा राज्य श्रेष्ठ और निष्कण्टक है, अतः आप बन्धु बान्धवों के साथ स्वधर्मानुसार इसका पालन कीजिये। मन्त्रज्ञ रघुवीर ! मन्त्रों के ज्ञाता महर्षि वशिष्ठ आदि सभी ऋत्विज् तथा मन्त्री, सेनापति और प्रजा आदि सारी प्रकृतियाँ यहाँ उपस्थित हैं। ये सब लोग यहीं आपका राज्याभिषेक करें।'
‘हमलोगों के द्वारा अभिषिक्त होकर आप मरुद्गुणों से अभिषिक्त हुए इन्द्र की भाँति वेगपूर्वक सब लोकों को जीतकर प्रजा का पालन करने के लिये अयोध्या को चलें। वहाँ देवता, ऋषि और पितरों का ऋण चुकायें, दुष्ट शत्रुओं का भलीभाँति दमन करें तथा मित्रों को उनके इच्छानुसार वस्तुओं द्वारा तृप्त करते हुए आप ही अयोध्या में मुझे धर्म की शिक्षा देते रहें।
‘आर्य! आपका अभिषेक सम्पन्न होने पर सुहृद्वण प्रसन्न हों और दुःख देने वाले आपके शत्रु भयभीत होकर दसों दिशाओं में भाग जायँ। पुरुषप्रवर! आज आप मेरी माता के कलङ्क को धो-पोंछ कर पूज्य पिताजी को भी निन्दा से बचाइये। मैं आपके चरणों में माथा टेककर याचना करता हूँ। आप मुझ पर दया कीजिये। जैसे महादेवजी सब प्राणियों पर अनुग्रह करते हैं, उसी प्रकार आप भी अपने बन्धु बान्धवों पर कृपा कीजिये अथवा यदि आप मेरी प्रार्थना को ठुकराकर यहाँ से वनको ही जायँगे तो मैं भी आपके साथ जाऊँगा।'
ग्लानि में पड़े हुए भरत ने मनोभिराम राजा श्रीराम को उनके चरणों में माथा टेककर प्रसन्न करने की चेष्टा की तथापि उन सत्त्वगुण सम्पन्न रघुनाथजी ने पिता की आज्ञा में ही दृढ़तापूर्वक स्थित रहकर अयोध्या जाने का विचार नहीं किया। श्रीरामचन्द्रजी की वह अद्भुत दृढ़ता देखकर सब लोग एक ही साथ दुःखी भी हुए और हर्ष को भी प्राप्त हुए। ये अयोध्या नहीं जा रहे हैं- यह सोचकर वे दु:खी हुए और प्रतिज्ञा-पालन में उनकी दृढ़ता देखकर उन्हें हर्ष हुआ।
उस समय ऋत्विज् पुरवासी, भिन्न-भिन्न समुदाय के नेता और माताएँ अचेत - सी होकर आँसू बहाती हुई पूर्वोक्त बातें कहने वाली भरत की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगीं और सबने उनके साथ ही योग्यतानुसार श्रीरामजी के सामने विनीत होकर उनसे अयोध्या लौट चलने की याचना की।

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