उस समय राजपुरोहित वशिष्ठ ने पूर्वोक्त बातें कहकर पुन: श्रीराम से दूसरी धर्मयुक्त बातें कहीं - रघुनन्दन! ककुत्स्थकुलभूषण ! इस संसार में उत्पन्न हुए पुरुष के सदा तीन गुरु होते हैं- आचार्य, पिता और माता। पुरुषप्रवर! पिता पुरुष के शरीर को उत्पन्न करता है, इसलिये गुरु है और आचार्य उसे ज्ञान देता है, इसलिये गुरु कहलाता है। शत्रुओंको संताप देनेवाले रघुवीर ! मैं तुम्हारे पिता का और तुम्हारा भी आचार्य हूँ; अत: मेरी आज्ञा का पालन करने से तुम सत्पुरुषों के पथ का त्याग करनेवाले नहीं समझे जाओगे।
‘तात! ये तुम्हारे सभासद्, बन्धु बान्धव तथा सामन्त राजा पधारे हुए हैं, इनके प्रति धर्मानुकूल बर्ताव करने से भी तुम्हारे द्वारा सन्मार्ग का उल्लङ्घन नहीं होगा। अपनी धर्मपरायणा बूढ़ी माता की बात तो तुम्हें कभी टालनी ही नहीं चाहिये। इनकी आज्ञा का पालन करके तुम श्रेष्ठ पुरुषों के आश्रयभूत धर्म का उल्लङ्घन करनेवाले नहीं माने जाओगे। सत्य, धर्म और पराक्रम से सम्पन्न रघुनन्दन ! भरत अपने आत्मस्वरूप तुमसे राज्य ग्रहण करने और अयोध्या लौटने की प्रार्थना कर रहे हैं, उनकी बात मान लेने से भी तुम धर्म का उल्लङ्घन करने वाले नहीं कहलाओगे।'
गुरु वशिष्ठ ने सुमधुर वचनों में जब इस प्रकार कहा, तब साक्षात् पुरुषोत्तम श्रीराघवेन्द्र ने वहाँ बैठे हुए वशिष्ठजी को यों उत्तर दिया - माता और पिता पुत्र के प्रति जो सर्वदा स्नेहपूर्ण बर्ताव करते हैं, अपनी शक्ति के अनुसार उत्तम खाद्य पदार्थ देने, अच्छे बिछौने पर सुलाने, उबटन आदि लगाने, सदा मीठी बातें बोलने तथा पालन-पोषण करने आदि के द्वारा माता और पिता ने जो उपकार किया है, उसका बदला सहज ही नहीं चुकाया जा सकता। अत: मेरे जन्मदाता पिता महाराज दशरथ ने मुझे जो आज्ञा दी है, वह मिथ्या नहीं होगी।
श्रीरामचन्द्रजी के ऐसा कहने पर चौड़ी छाती वाले भरतजी का मन बहुत उदास हो गया। वे पास ही बैठे हुए सूत सुमन्त्र से बोले – सुमंत्र! आप इस वेदी पर शीघ्र ही बहुत-से कुश बिछा दीजिये। जब तक आर्य मुझ पर प्रसन्न नहीं होंगे, तब तक मैं यहीं इनके पास धरना दूंगा। जैसे साहूकार या महाजन के द्वारा निर्धन किया हुआ ब्राह्मण उसके घर के दरवाजे पर मुँह ढककर बिना खाये-पिये पड़ा रहता है, उसी प्रकार मैं भी उपवासपूर्वक मुख पर आवरण डालकर इस कुटिया के सामने लेट जाऊँगा। जब तक मेरी बात मानकर ये अयोध्या को नहीं लौटेंगे, तब तक मैं इसी तरह पड़ा रहूँगा।'
यह सुनकर सुमन्त्र श्रीरामचन्द्रजी का मुँह ताकने लगे। उन्हें इस अवस्था में देख भरत के मन में बड़ा दु:ख हुआ और वे स्वयं ही कुश की चटाई बिछाकर जमीन पर बैठ गये।
तब महातेजस्वी राजर्षिशिरोमणि श्रीराम ने उनसे कहा - तात भरत ! मैं तुम्हारी क्या बुराई करता हूँ, जो मेरे आगे धरना दोगे? ब्राह्मण एक करवट से सोकर - धरना देकर मनुष्यों को अन्याय से रोक सकता है, परंतु राजतिलक ग्रहण करने वाले क्षत्रियों के लिये इस प्रकार धरना देने का विधान नहीं है। अत: नरश्रेष्ठ रघुनन्दन! इस कठोर व्रत का परित्याग करके उठो और यहाँ से शीघ्र ही अयोध्यापुरी को जाओ।
यह सुनकर भरत वहाँ बैठे-बैठे ही सब ओर दृष्टि डालकर नगर और जनपद के लोगों से बोले – 'आपलोग भैया को क्यों नहीं समझाते हैं?
तब नगर और जनपद के लोग महात्मा भरत से बोले – हम जानते हैं, काकुत्स्थ श्रीरामचन्द्रजी के प्रति आप रघुकुलतिलक भरतजी ठीक ही कहते हैं। परंतु ये महाभाग श्रीरामचन्द्रजी भी पिता की आज्ञा के पालन में लगे हैं, इसलिये यह भी ठीक ही है। अतएव हम इन्हें सहसा उस ओर से लौटाने में असमर्थ हैं।
उन पुरवासियों के वचन का तात्पर्य समझकर श्रीराम ने भरत से कहा - भरत ! धर्म पर दृष्टि रखने वाले सुहृदों के इस कथन को सुनो और समझो। रघुनन्दन! मेरी और इनकी दोनों बातों को सुनकर उनपर सम्यक् रूप से विचार करो । महाबाहो ! अब शीघ्र उठो तथा मेरा और जल का स्पर्श करो।
यह सुनकर भरत उठकर खड़े हो गये और श्रीराम एवं जल का स्पर्श करके बोले - मेरे सभासद् और मन्त्री सब लोग सुनें न तो मैंने पिताजी से राज्य माँगा था और न माता से ही कभी इसके लिये कुछ कहा था। साथ ही, परम धर्मज्ञ श्रीरामचन्द्रजी के वनवास में भी मेरी कोई सम्मति नहीं है। फिर भी यदि इनके लिये पिताजी की आज्ञा का पालन करना और वन में रहना अनिवार्य है तो इनके बदले मैं ही चौदह वर्षों तक वन में निवास करूँगा।
भाई भरत की इस सत्य बात से धर्मात्मा श्रीराम को बड़ा विस्मय हुआ और उन्होंने पुरवासी तथा राज्यनिवासी लोगों की ओर देखकर कहा - पिताजी ने अपने जीवनकाल में जो वस्तु बेंच दी है, या धरोहर रख दी है, अथवा खरीदी है, उसे मैं अथवा भरत कोई भी पलट नहीं सकता। मुझे वनवास के लिये किसी को प्रतिनिधि नहीं बनाना चाहिये; क्योंकि सामर्थ्य रहते हुए प्रतिनिधि से काम लेना लोक में निन्दित है। माता कैकेयी ने उचित माँग ही प्रस्तुत की थी और मेरे पिताजी ने उसे देकर पुण्य कर्म ही किया था।
‘मैं जानता हूँ, भरत बड़े क्षमाशील और गुरुजनों का सत्कार करनेवाले हैं, इन सत्यप्रतिज्ञ महात्मा में सभी कल्याणकारी गुण मौजूद हैं। चौदह वर्षों की अवधि पूरी करके जब मैं वन से लौटूंगा, तब अपने इन धर्मशील भाई के साथ इस भूमण्डल का श्रेष्ठ राजा होऊँगा। माता कैकेयी ने राजा से वर माँगा और मैंने उसका पालन स्वीकार कर लिया, अतः भरत! अब तुम मेरा कहना मानकर उस वर के पालन द्वारा अपने पिता महाराज दशरथ को असत्य के बन्धन से मुक्त करो।
इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-१०९(109) समाप्त !

No comments:
Post a Comment