तदनन्तर सब माताओं को अयोध्या में रखकर दृढप्रतिज्ञ भरत ने शोक से संतप्त हो गुरुजनों से इस प्रकार कहा - अब मैं नन्दिग्राम को जाऊँगा, इसके लिये आप सब लोगों की आज्ञा चाहता हूँ। वहाँ श्रीराम के बिना प्राप्त होने वाले इस सारे दुःख को सहन करूँगा। अहो! महाराज (पूज्य पिताजी) तो स्वर्ग को सिधारे और वे मेरे गुरु (पूजनीय भ्राता) श्रीरामचन्द्रजी वन में विराज रहे हैं। मैं इस राज्य के लिये वहाँ श्रीराम की प्रतीक्षा करता रहूँगा; क्योंकि वे महायशस्वी श्रीराम ही हमारे राजा हैं।
महात्मा भरत का यह शुभ वचन सुनकर सब मन्त्री और पुरोहित वशिष्ठजी बोले – भरत! भ्रातृभक्ति से प्रेरित होकर तुमने जो बात कही है, वह बहुत ही प्रशंसनीय है। वास्तव में वह तुम्हारे ही योग्य है। तुम अपने भाई के दर्शन के लिये सदा लालायित रहते हो और भाई के ही सौहार्द ( हितसाधन) में संलग्न हो। साथ ही श्रेष्ठ मार्ग पर स्थित हो, अत: कौन पुरुष तुम्हारे विचार का अनुमोदन नहीं करेगा।
मन्त्रियों का अपनी रुचि के अनुरूप प्रिय वचन सुनकर भरत ने सारथि से कहा - मेरा रथ जोतकर तैयार किया जाय।
फिर उन्होंने प्रसन्नवदन होकर सब माताओं से बातचीत करके जाने की आज्ञा ली। इसके बाद शत्रुघ्न के सहित श्रीमान् भरत रथ पर सवार हुए। रथ पर आरूढ़ होकर परम प्रसन्न हुए भरत और शत्रुघ्न दोनों भाई मन्त्रियों तथा पुरोहितों से घिरकर शीघ्रतापूर्वक वहाँ से प्रस्थित हुए। आगे-आगे वशिष्ठ आदि सभी गुरुजन एवं ब्राह्मण चल रहे थे। उन सब लोगों ने अयोध्या से पूर्वाभिमुख होकर यात्रा की और उस मार्ग को पकड़ा, जो नन्दिग्राम की ओर जाता था।
भरत के प्रस्थित होने पर हाथी, घोड़े और रथों से भरी हुई सारी सेना भी बिना बुलाये ही उनके पीछे-पीछे चल दी और समस्त पुरवासी भी उनके साथ हो लिये। धर्मात्मा भ्रातृवत्सल भरत अपने मस्तक पर भगवान् श्रीराम की चरणपादु का लिये रथ पर बैठकर बड़ी शीघ्रता से नन्दिग्राम की ओर चले।
नन्दिग्राम में शीघ्र पहुँचकर भरत तुरंत ही रथ से उतर पड़े और गुरुजनों से इस प्रकार बोले - मेरे भाई ने यह उत्तम राज्य मुझे धरोहर के रूप में दिया है, उनकी ये सुवर्ण विभूषित चरणपादुकाएँ ही सबके योगक्षेम का निर्वाह करनेवाली हैं।
तत्पश्चात् भरत ने मस्तक झुकाकर उन चरण पादुकाओं के प्रति उस धरोहर रूप राज्य को समर्पित करके दु:ख से संतप्त हो समस्त प्रकृतिमण्डल (मन्त्री, सेनापति और प्रजा आदि) से कहा – आप सब लोग इन चरणपादुकाओं के ऊपर छत्र धारण करें। मैं इन्हें आर्य रामचन्द्रजी के साक्षात् चरण मानता हूँ। मेरे गुरु की इन चरणपादुकाओं से ही इस राज्य में धर्म की स्थापना होगी। मेरे भाई ने प्रेम के कारण ही यह धरोहर मुझे सौंपी है, अतः मैं उनके लौटने तक इसकी भलीभाँति रक्षा करूंगा। इसके बाद मैं स्वयं इन पादुकाओं को पुनः शीघ्र ही श्रीरघुनाथजी के चरणों से संयुक्त करके इन पादुकाओं से सुशोभित श्रीराम के उन युगल चरणों का दर्शन करूंगा।
'श्रीरघुनाथजी के आने पर उनसे मिलते ही मैं अपने उन गुरुदेव को यह राज्य समर्पित करके उनकी आज्ञा के अधीन हो उन्हीं की सेवा में लग जाऊँगा। राज्य का यह भार उन पर डालकर मैं हलका हो जाऊँगा। मेरे पास धरोहररूप में रखे हुए इस राज्य को, अयोध्या को तथा इन श्रेष्ठ पादुकाओं को श्रीरघुनाथजी की सेवा में समर्पित करके मैं सब प्रकार के पापताप से मुक्त हो जाऊँगा। ककुत्स्थ कुलभूषण श्रीराम का अयोध्या के राज्य पर अभिषेक हो जाने पर जब सब लोग हर्ष और आनन्द में निमग्न हो जायँगे, तब मुझे राज्य पाने की अपेक्षा चौगुनी प्रसन्नता और चौगुने यश की प्राप्ति होगी।
इस प्रकार दीनभाव से विलाप करते हुए दुःखमग्न महायशस्वी भरत मन्त्रियों के साथ नन्दिग्राम में रहकर राज्य का शासन करने लगे। सेनासहित प्रभावशाली धीर-वीर भरत ने उस समय वल्कल और जटा धारण करके मुनिवेषधारी हो नन्दिग्राम में निवास किया। भाई की आज्ञा का पालन और प्रतिज्ञा के पार जाने की इच्छा करने वाले भ्रातृवत्सल भरत श्रीरामचन्द्रजी के आगमन की आकांक्षा रखते हुए उनकी चरणपादुकाओं को राज्य पर अभिषिक्त करके उन दिनों नन्दिग्राम में रहने लगे।
भरतजी राज्य-शासन का समस्त कार्य भगवान् श्रीराम की चरणपादुकाओं को निवेदन करके करते थे तथा स्वयं ही उनके ऊपर छत्र लगाते और चँवर डुलाते थे। श्रीमान् भरत बड़े भाई की उन पादुकाओं को राज्य पर अभिषिक्त करके सदा उनके अधीन रहकर उन दिनों राज्य का सब कार्य मन्त्री आदि से कराते थे। उस समय जो कोई भी कार्य उपस्थित होता, जो भी बहुमूल्य भेंट आती, वह सब पहले उन पादुकाओं को निवेदन करके पीछे भरतजी उसका यथावत् प्रबन्ध करते थे।
इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-११५(115) समाप्त !
छन्द : (स्रोत : श्रीरामचरितमानस)
सिय राम प्रेम पियूष पूरन होत जनमु न भरत को।
मुनि मन अगम जम नियम सम दम बिषम ब्रत आचरत को॥
दुख दाह दारिद दंभ दूषन सुजस मिस अपहरत को।
कलिकाल तुलसी से सठन्हि हठि राम सनमुख करत को॥
सोरठा :
भरत चरित करि नेमु तुलसी जो सादर सुनहिं।
सीय राम पद पेमु अवसि होइ भव रस बिरति॥
भावार्थ:
छन्द : श्री सीतारामजी के प्रेमरूपी अमृत से परिपूर्ण भरतजी का जन्म यदि न होता, तो मुनियों के मन को भी अगम यम, नियम, शम, दम आदि कठिन व्रतों का आचरण कौन करता? दुःख, संताप, दरिद्रता, दम्भ आदि दोषों को अपने सुयश के बहाने कौन हरण करता? तथा कलिकाल में तुलसीदास जैसे शठों को हठपूर्वक कौन श्री रामजी के सम्मुख करता?
सोरठा : तुलसीदासजी कहते हैं- जो कोई भरतजी के चरित्र को नियम से आदरपूर्वक सुनेंगे, उनको अवश्य ही श्रीसीतारामजी के चरणों में प्रेम होगा और सांसारिक विषय रस से वैराग्य होगा।
॥ अयोध्याकाण्ड समाप्त ॥

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