भाग-११२(112) कैकयी का श्रीराम को मनाने का प्रयास करना, ऋषियों का भरत को श्रीराम की आज्ञा के अनुसार लौट जाने की सलाह देना, श्रीराम का उन्हें समझाकर अपनी चरणपादुका देकर उन सबको विदा करना

 


अगले छठे दिन सबेरे स्नान करके भरतजी, ब्राह्मण, राजा जनक और सारा समाज आ जुटा। आज सबको विदा करने के लिए अच्छा दिन है, यह मन में जानकर भी कृपालु श्री रामजी कहने में सकुचा रहे हैं। 

उसी समय उचित अवसर जानकर आत्मग्लानि में भरी कैकयी ने श्रीराम से वहां उपस्थित सभी सभासदों के सम्मुख यह बात कही - हे राम ! जिन पिता के वचनों की दुहाई देकर तुम अयोध्या जाना स्वीकार नहीं करते उन वचनों का मूल कारण तो मैं हूँ। आज मैं भरी सभा में अपने ईश्वर को साक्षी मानकर तुम्हे अपने उन वचनों से मुक्त करती हूँ। यदि इसके उपरांत भी तुम अयोध्या नहीं लौटते तो मेरे जी की जलन कभी नहीं जाएगी। मुझे अपने पुत्र भरत के द्वारा स्वयं का तिरस्कार करना इतना नहीं चुभता जितना यह की तुम न तो मुझे दंड देते हो न ही मुझे क्षमा करते। 

माता कैकयी की बातों को सुनकर अपने ही प्रण पर अटल श्रीराम ने उनसे यह युक्ति पूर्ण वचन कहा - माता! मैंने आपको कभी अपराधी माना ही नहीं। यदि ऐसा होता तो पिता के वचनों का पालन करने के लिए यहाँ वन में कभी नहीं आता। हे माता यदि पिताजी जीवित होते तो कुछ बात थी। किन्तु अब यदि उनके वचनों को तोड़कर मैं अयोध्या लौट जाऊँ तो सारे संसार में रघुकुल की कीर्ति को कलंक लगाऊं। यदि आप मेरे इस कृत्य से प्रसन्न हो तो मैं इसी क्षण वापस लौटने को तत्पर होता हूँ।    

तदनन्तर दशग्रीव रावण के वध की अभिलाषा रखनेवाले ऋषियों ने मिलकर राजसिंह भरत से तुरंत ही यह बात कही - महाप्राज्ञ! तुम उत्तम कुल में उत्पन्न हुए हो। तुम्हारा आचरण बहुत उत्तम और यश महान् है। यदि तुम अपने पिता की ओर देखो - उन्हें सुख पहुँचाना चाहो तो तुम्हें श्रीरामचन्द्रजी की बात मान लेनी चाहिये। हमलोग इन श्रीराम को पिता के ऋण से सदा उऋण देखना चाहते हैं। कैकेयी का ऋण चुका देने के कारण ही राजा दशरथ स्वर्ग में पहुँचे हैं। 

इतना कहकर वहाँ आये हुए गन्धर्व, महर्षि और राजर्षि सब अपने-अपने स्थान को चले गये। जिनके दर्शन से जगत का कल्याण हो जाता है, वे भगवान् श्रीराम महर्षियों के वचन से बहुत प्रसन्न हुए। उनका मुख हर्षोल्लास से खिल उठा, इससे उनकी बड़ी शोभा हुई और उन्होंने उन महर्षियों की सादर प्रशंसा की। 

परंतु भरत का सारा शरीर थर्रा उठा। वे लड़खड़ाती हुई जबान से हाथ जोड़कर श्रीरामचन्द्रजी से बोले – ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम ! हमारे कुलधर्म से सम्बन्ध रखनेवाला जो ज्येष्ठ पुत्र का राज्यग्रहण और प्रजापालन रूप धर्म है, उसकी ओर दृष्टि डालकर आप मेरी तथा माता की याचना सफल कीजिये। मैं अकेला ही इस विशाल राज्य की रक्षा नहीं कर सकता तथा आपके चरणों में अनुराग रखने वाले इन पुरवासी तथा जनपदवासी लोगों को भी आपके बिना प्रसन्न नहीं रख सकता। 

‘जैसे किसान मेघ की प्रतीक्षा करते रहते हैं, उसी प्रकार हमारे बन्धु बान्धव, योद्धा, मित्र और सुहृद् सब लोग आपकी ही बाट जोहते हैं। महाप्राज्ञ! आप इस राज्य को स्वीकार करके दूसरे किसी को इसके पालन का भार सौंप दीजिये। वही पुरुष आपके प्रजावर्ग अथवा लोक का पालन करने में समर्थ हो सकता है। 

ऐसा कहकर भरत अपने भाई के चरणों पर गिर पड़े। उस समय उन्होंने श्रीरघुनाथजी से अत्यन्त प्रिय वचन बोलकर उनसे राज्यग्रहण करने के लिये बड़ी प्रार्थना की।

तब श्रीरामचन्द्रजी ने श्यामवर्ण कमलनयन भाई भरत को उठाकर अपने पास बिठा लिया और मदमत्त हंस के समान मधुर स्वर में स्वयं यह बात कही - तात! तुम्हें जो यह स्वाभाविक विनयशील बुद्धि प्राप्त हुई है इस बुद्धि के द्वारा तुम समस्त भूमण्डल की रक्षा करने में भी पूर्णरूप से समर्थ हो सकते हो। इसके सिवा अमात्यों, सुहृदों और बुद्धिमान् मन्त्रियों से सलाह लेकर उनके द्वारा सब कार्य, वे कितने ही बड़े क्यों न हों, करा लिया करो। चन्द्रमा से उसकी प्रभा अलग हो जाय, हिमालय हिम का परित्याग कर दे, अथवा समुद्र अपनी सीमा को लाँघकर आगे बढ़ जाय, किंतु मैं पिता की प्रतिज्ञा नहीं तोड़ सकता। 

'तात! माता कैकेयी ने कामना से अथवा लोभवश तुम्हारे लिये जो कुछ किया है, उसको मन में न लाना और उसके प्रति सदा वैसा ही बर्ताव करना जैसा अपनी पूजनीया माता के प्रति करना उचित है।' 

जो सूर्य के समान तेजस्वी हैं तथा जिनका दर्शन प्रतिपदा (द्वितीया) के चन्द्रमा की भाँति आह्लादजनक है, उन कौशल्यानन्दन श्रीराम के इस प्रकार कहने पर भरत उनसे यों बोले – आर्य! ये दो सुवर्णभूषित पादुकाएँ आपके चरणों में अर्पित हैं, आप इन पर अपने चरण रखें। ये ही सम्पूर्ण जगत के योगक्षेम का निर्वाह करेंगी। 

तब महातेजस्वी पुरुषसिंह श्रीराम ने उन पादुकाओं पर चढ़कर उन्हें फिर अलग कर दिया और महात्मा भरत को सौंप दिया। 

उन पादुकाओं को प्रणाम करके भरत ने श्रीराम से कहा - वीर रघुनन्दन ! मैं भी चौदह वर्षों तक जटा और चीर धारण करके फल-मूल का भोजन करता हुआ आपके आगमन की प्रतीक्षा में नगर से बाहर ही रहूँगा । परंतप ! इतने दिनों तक राज्य का सारा भार आपकी इन चरण पादुकाओं पर ही रखकर मैं आपकी बाट जोहता रहूँगा। रघुकुलशिरोमणे! यदि चौदहवाँ वर्ष पूर्ण होने पर नूतन वर्ष के प्रथम दिन ही मुझे आपका दर्शन नहीं मिलेगा तो मैं जलती हुई आग में प्रवेश कर जाऊँगा। 

श्रीरामचन्द्रजी ने 'बहुत अच्छा' कहकर स्वीकृति दे दी और बड़े आदर के साथ भरत को हृदयसे लगाया। तत्पश्चात् शत्रुघ्न को भी छाती से लगाकर यह बात कही -  रघुनन्दन ! मैं तुम्हें अपनी और सीता की शपथ दिलाकर कहता हूँ कि तुम माता कैकेयी की रक्षा करना, उनके प्रति कभी क्रोध न करना। 

इतना कहते कहते उनकी आँखों में आँसू उमड़ आये। उन्होंने व्यथित हृदय से भाई शत्रुघ्न को विदा किया। धर्मज्ञ भरत ने भलीभाँति अलंकृत की हुई उन परम उज्ज्वल चरणपादुकाओं को लेकर श्रीरामचन्द्रजी की परिक्रमा की तथा उन पादुकाओं को राजा की सवारी में आनेवाले सर्वश्रेष्ठ गजराज के मस्तक पर स्थापित किया। 

तदनन्तर अपने धर्म में हिमालय की भाँति अविचल भाव से स्थित रहने वाले रघुवंशवर्धन श्रीराम ने क्रमश: वहाँ आये हुए जनसमुदाय, गुरु, मन्त्री, प्रजा तथा दोनों भाइयों का यथायोग्य सत्कार करके उन्हें विदा किया। उस समय कौशल्या आदि सभी माताओं का गला आँसुओं से रुँध गया था। वे दुःख के कारण श्रीराम को सम्बोधित भी न कर सकीं। श्रीराम भी सब माताओं को प्रणाम करके रोते हुए अपनी कुटिया में चले गये। 

इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-११२(112) समाप्त !

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