भाग-९६(96) श्रीराम का भरत से वन में आगमन का प्रयोजन पूछना, भरत का उनसे पुन: राज्य ग्रहण करने के लिये कहना और श्रीराम का उसे अस्वीकार कर देना

 


लक्ष्मणसहित श्रीरामचन्द्रजी ने अपने गुरुभक्त भाई भरत को अच्छी तरह समझाकर अथवा उन्हें अपने में अनुरक्त जानकर उनसे इस प्रकार पूछना आरम्भ किया - भाई! तुम राज्य छोड़कर वल्कल, कृष्णमृगचर्म और जटा धारण करके जो इस देश में आये हो, इसका क्या कारण है? जिस निमित्त से इस वन में तुम्हारा प्रवेश हुआ है, यह मैं तुम्हारे मुँह से सुनना चाहता हूँ। तुम्हें सब कुछ साफ-साफ बताना चाहिये। 

ककुत्स्थवंशी महात्मा श्रीरामचन्द्रजी के इस प्रकार पूछने पर भरत ने बलपूर्वक आन्तरिक शोक को दबा पुन: हाथ जोड़कर इस प्रकार कहा - आर्य! हमारे महाबाहु पिता अत्यन्त दुष्कर कर्म करके पुत्रशोक से पीड़ित हो हमें छोड़कर स्वर्गलोक को चले गये। शत्रुओं को संताप देनेवाले रघुनन्दन ! अपनी स्त्री एवं मेरी माता कैकेयी की प्रेरणा से ही विवश हो पिताजी ने ऐसा कठोर कार्य किया था। मेरी माँ ने अपने सुयश को नष्ट करने वाला यह बड़ा भारी पाप किया है। अत: वह राज्यरूपी फल न पाकर विधवा हो गयी। अब मेरी माता शोक से दुर्बल हो महाघोर नरक में पड़ेगी। 

‘अब आप अपने दासस्वरूप मुझ भरत पर कृपा कीजिये और इन्द्र की भाँति आज ही राज्य ग्रहण करने के लिये अपना अभिषेक कराइये। ये सारी प्रकृतियाँ (प्रजा आदि) और सभी विधवा माताएँ आपके पास आयी हैं। आप इन सबपर कृपा करें। दूसरों को मान देनेवाले रघुवीर ! आप ज्येष्ठ होने के नाते राज्य प्राप्ति के क्रमिक अधिकार से युक्त हैं, न्यायतः आपको ही राज्य मिलना उचित है; अतः आप धर्मानुसार राज्य ग्रहण करें और अपने सुहृदों को सफल-मनोरथ बनावें।' 

‘आप-जैसे पति से युक्त हो यह सारी वसुधा वैधव्यरहित हो जाय और निर्मल चन्द्रमा से सनाथ हुई शरत्काल की रात्रि के समान शोभा पाने लगे। मैं इन समस्त सचिवों के साथ आपके चरणों में मस्तक रखकर यह याचना करता हूँ कि आप राज्य ग्रहण करें। मैं आपका भाई, शिष्य और दास हूँ। आप मुझपर कृपा करें। पुरुषसिंह! यह सारा मन्त्रिमण्डल अपने यहाँ कुलपरम्परा से चला आ रहा है। ये सभी सचिव पिताजी के समय में भी थे। हम सदा से इनका सम्मान करते आये हैं, अत: आप इनकी प्रार्थना न ठुकरायें। 

ऐसा कहकर कैकेयीपुत्र महाबाहु भरत ने नेत्रों से आँसू बहाते हुए पुन: श्रीरामचन्द्रजी के चरणों से माथा टेक दिया। उस समय वे मतवाले हाथी के समान बारंबार लंबी साँस खींचने लगे, तब श्रीराम ने भाई भरत को उठाकर हृदय से लगा लिया और इस प्रकार कहा - भाई! तुम्हीं बताओ। उत्तम कुल में उत्पन्न, सत्त्वगुण सम्पन्न, तेजस्वी और श्रेष्ठ व्रतों का पालन करने वाला मेरे- जैसा मनुष्य राज्य के लिये पिता की आज्ञा का उल्लङ्घन रूप पाप कैसे कर सकता है? शत्रुसूदन ! मैं तुम्हारे अंदर थोड़ा-सा भी दोष नहीं देखता। अज्ञानवश तुम्हें अपनी माता की भी निन्दा नहीं करनी चाहिये। 

‘निष्पाप महाप्राज्ञ! गुरुजनों का अपनी अभीष्ट स्त्रियों और प्रिय पुत्रों पर सदा पूर्ण अधिकार होता है। वे उन्हें चाहे जैसी आज्ञा दे सकते हैं। सौम्य ! माताओं सहित हम भी इस लोक में श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा महाराज के स्त्री- पुत्र और शिष्य कहे गये हैं, अतः हमें भी उनको सब तरह की आज्ञा देने का अधिकार था। इस बात को तुम भी समझने योग्य हो। सौम्य! महाराज मुझे वल्कल वस्त्र और मृगचर्म धारण कराकर वन में ठहरावें अथवा राज्य पर बिठावें - इन दोनों बातों के लिये वे सर्वथा समर्थ थे। 

‘धर्मज्ञ! धर्मात्माओं में श्रेष्ठ भरत ! मनुष्य की विश्ववन्द्य पिता में जितनी गौरव बुद्धि होती है, उतनी ही माता में भी होनी चाहिये। रघुनन्दन ! इन धर्मशील माता और पिता दोनों ने जब मुझे वन में जाने की आज्ञा दे दी है, तब मैं उनकी आज्ञा के विपरीत दूसरा कोई बर्ताव कैसे कर सकता हूँ ?तुम्हें अयोध्या में रहकर समस्त जगत के लिये आदरणीय राज्य प्राप्त करना चाहिये और मुझे वल्कल वस्त्र धारण करके दण्डकारण्य में रहना चाहिये। क्योंकि महाराज दशरथ बहुत लोगों के सामने हम दोनों के लिये इस प्रकार पृथक्-पृथक् दो आज्ञाएँ देकर स्वर्ग को सिधारे हैं।' 

‘इस विषय में लोकगुरु धर्मात्मा राजा ही तुम्हारे लिये प्रमाणभूत हैं - उन्हीं की आज्ञा तुम्हें माननी चाहिये और पिता ने तुम्हारे हिस्से में जो कुछ दिया है, उसी का तुम्हें यथावत् रूप से उपभोग करना चाहिये। सौम्य! चौदह वर्षों तक दण्डकारण्य में रहने के बाद ही महात्मा पिता के दिये हुए राज्य-भाग का मैं उपभोग करूँगा। मनुष्यलोक में सम्मानित और देवराज इन्द्र के तुल्य तेजस्वी मेरे महात्मा पिता ने मुझे जो वनवास की आज्ञा दी है, उसी को मैं अपने लिये परम हितकारी समझता हूँ। उनकी आज्ञा के विरुद्ध सर्वलोकेश्वर ब्रह्मा का अविनाशी पद भी मेरे लिये श्रेयस्कर नहीं है।' 

इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-९६(96) समाप्त !

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