तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजी की दोनों चरण पादुकाओं को अपने मस्तक पर रखकर भरत शत्रुघ्न के साथ प्रसन्नतापूर्वक रथ पर बैठे। वशिष्ठ, वामदेव तथा दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रत का पालन करने वाले जाबालि आदि सब मन्त्री, जो उत्तम मन्त्रणा देने के कारण सम्मानित थे, आगे-आगे चले। वे सब लोग चित्रकूट नामक महान् पर्वत की परिक्रमा करते हुए परम रमणीय मन्दाकिनी नदी को पार करके पूर्वदिशा की ओर प्रस्थित हुए। उस समय भरत अपनी सेना के साथ सहस्रों प्रकार के रमणीय धातुओं को देखते हुए चित्रकूट के किनारे से होकर निकले।
चित्रकूट से थोड़ी ही दूर जाने पर भरत ने वह आश्रम देखा, जहाँ मुनिवर भरद्वाजजी निवास करते थे। अपने कुल को आनन्दित करनेवाले पराक्रमी भरत महर्षि भरद्वाज के उस आश्रम पर पहुँचकर रथ से उतर पड़े और उन्होंने मुनि के चरणों में प्रणाम किया। उनके आने से महर्षि भरद्वाज को बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने भरत से पूछा - तात ! क्या तुम्हारा कार्य सम्पन्न हुआ? क्या श्रीरामचन्द्रजी से भेंट हुई?
बुद्धिमान् भरद्वाजजी के इस प्रकार पूछने पर धर्मवत्सल भरत ने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया – मुने! भगवान् श्रीराम अपने पराक्रम पर दृढ रहनेवाले हैं। मैंने उनसे बहुत प्रार्थना की। गुरुजी ने भी अनुरोध किया। तब उन्होंने अत्यन्त प्रसन्न होकर गुरुदेव वशिष्ठजी से इस प्रकार कहा – 'मैं चौदह वर्षों तक वन में रहूँ, इसके लिये मेरे पिताजी ने जो प्रतिज्ञा कर ली थी, उनकी उस प्रतिज्ञा का ही मैं यथार्थ रूप से पालन करूँगा।'
‘उनके ऐसा कहने पर बात के मर्म को समझने वाले महाज्ञानी वशिष्ठजी ने बातचीत करने में कुशल श्रीरघुनाथजी से यह महत्त्वपूर्ण बात कही - महाप्राज्ञ! तुम प्रसन्नतापूर्वक ये स्वर्णभूषित पादुकाएँ अपने प्रतिनिधि के रूप में भरतको दे दो और इन्हीं के द्वारा अयोध्या के योगक्षेम का निर्वाह करो।'
'गुरु वसिष्ठजी के ऐसा कहने पर पूर्वाभिमुख खड़े हुए श्रीरघुनाथजी ने अयोध्या के राज्य का संचालन करने के लिये ये दोनों स्वर्णभूषित पादुकाएँ मुझे दे दीं। तत्पश्चात् मैं महात्मा श्रीराम की आज्ञा पाकर लौट आया हूँ और उनकी इन मङ्गलमयी चरणपादुकाओं को लेकर अयोध्या को ही जा रहा हूँ।'
महात्मा भरत का यह शुभ वचन सुनकर भरद्वाज मुनि ने यह परम मङ्गलमय बात कही - भरत! तुम मनुष्यों में सिंह के समान वीर तथा शील और सदाचार के ज्ञाताओं में श्रेष्ठ हो। जैसे जल नीची भूमिवाले जलाशय में सब ओर से बहकर चला आता है, उसी प्रकार तुममें सारे श्रेष्ठ गुण स्थित हों यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। तुम्हारे पिता महाबाहु राजा दशरथ सब प्रकार से उऋण हो गये, जिनके तुम-जैसा धर्मप्रेमी एवं धर्मात्मा पुत्र है।'
उन महाज्ञानी महर्षि के ऐसा कहने पर भरत ने हाथ जोड़कर उनके चरणों का स्पर्श किया; फिर वे उनसे जाने की आज्ञा लेने को उद्यत हुए।
तदनन्तर श्रीमान् भरत बारंबार भरद्वाज मुनि की परिक्रमा करके मन्त्रियों सहित अयोध्या की ओर चल दिये। फिर वह विस्तृत सेना रथों, छकड़ों, घोड़ों और हाथियों के साथ भरत का अनुसरण करती हुई अयोध्या को लौटी। तत्पश्चात् आगे जाकर उन सब लोगों ने तरंग - मालाओं से सुशोभित दिव्य नदी यमुना को पार करके पुनः शुभसलिला गङ्गाजी का दर्शन किया।
फिर बन्धु बान्धवों और सैनिकों के साथ मनोहर जल से भरी हुई गङ्गा के भी पार होकर वे परम रमणीय श्रृङ्गवेरपुर में जा पहुँचे। श्रृङ्गवेरपुर से प्रस्थान करने पर उन्हें पुन: अयोध्यापुरी का दर्शन हुआ, जो उस समय पिता और भाई दोनों से विहीन थी।
उसे देखकर भरत ने दुःख से संतप्त हो सारथि से इस प्रकार कहा - सुमन्त्रजी! देखिये, अयोध्या की सारी शोभा नष्ट हो गयी है; अत: यह पहले की भाँति प्रकाशित नहीं होती है। इसका वह सुन्दर रूप, वह आनन्द जाता रहा। इस समय यह अत्यन्त दीन और नीरव हो रही है।

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