भाग-९१(91) वन-जन्तुओं के भागने का कारण जानने के लिये श्रीराम की आज्ञा से लक्ष्मण का शाल वृक्ष पर चढ़कर भरत की सेना को देखना और उनके प्रति अपना रोषपूर्ण उद्द्वार प्रकट करना

 


इस प्रकार मिथिलेशकुमारी सीता को मन्दाकिनी नदी का दर्शन कराकर उस समय श्रीरामचन्द्रजी पर्वत के समतल प्रदेश में उनके साथ बैठ गये और तपस्वी-जनों के उपभोग में आने योग्य फल - मूल के गूदे से उनकी मानसिक प्रसन्नता को बढ़ाने – उनका लालन करने लगे। 

धर्मात्मा रघुनन्दन सीताजी के साथ इस प्रकार की बातें कर रहे थे - 'प्रिये ! यह फल परम पवित्र है। यह बहुत स्वादिष्ट है तथा इस कन्द को अच्छी तरह आग पर सेका गया है। 

इस प्रकार वे उस पर्वतीय प्रदेश में बैठे हुए ही थे कि उनके पास आने वाली भरत की सेना की धूल और कोलाहल दोनों एक साथ प्रकट हुए और आकाश में फैलने लगे। इसी बीच में सेना महान् कोलाहल से भयभीत एवं पीड़ित हो हाथियों के कितने ही मतवाले यूथपति अपने यूथों के साथ सम्पूर्ण दिशाओं में भागने लगे। श्रीरामचन्द्रजी ने सेना से प्रकट हुए उस महान् कोलाहल को सुना तथा भागे जाते हुए उन समस्त यूथपतियों को भी देखा। 

उन भागे हुए हाथियों को देखकर और उस महाभयंकर शब्द को सुनकर श्रीरामचन्द्रजी उद्दीप्त तेजवाले सुमित्राकुमार लक्ष्मण से बोले – लक्ष्मण! इस जगत में तुमसे ही माता सुमित्रा श्रेष्ठ पुत्रवाली हुई हैं। देखो तो सही – यह भयंकर गर्जना के साथ कैसा गम्भीर तुमुल नाद सुनायी देता है। सुमित्रानन्दन! पता तो लगाओ, इस विशाल वन में ये जो हाथियों के झुंड अथवा भैंसे या मृग जो सहसा सम्पूर्ण दिशाओं की ओर भाग चले हैं, इसका क्या कारण है? इन्हें सिंहों ने तो नहीं डरा दिया है अथवा कोई राजा या राजकुमार इस वन में आकर शिकार तो नहीं खेल रहा है या दूसरा कोई हिंसक जन्तु तो नहीं प्रकट हो गया है? 

'लक्ष्मण! इस पर्वत पर अपरिचित पक्षियों का आना-जाना भी अत्यन्त कठिन है (फिर यहाँ किसी हिंसक जन्तु या राजा का आक्रमण कैसे सम्भव है)। अत: इन सारी बातों की ठीक-ठीक जानकारी प्राप्त करो। 

भगवान् श्रीराम की आज्ञा पाकर लक्ष्मण तुरंत ही फूलों से भरे हुए एक शाल वृक्ष पर चढ़ गये और सम्पूर्ण दिशाओं की ओर देखते हुए उन्होंने पूर्व दिशा की ओर दृष्टिपात किया। तत्पश्चात् उत्तर की ओर मुँह करके देखने पर उन्हें एक विशाल सेना दिखायी दी, जो हाथी, घोड़े और रथों से परिपूर्ण तथा प्रयत्नशील पैदल सैनिकों से संयुक्त थी। 

घोड़ों और रथों से भरी हुई तथा रथ की ध्वजा से विभूषित उस सेना की सूचना उन्होंने श्रीरामचन्द्रजी को दी और यह बात कही - आर्य! अब आप आग बुझा दें (अन्यथा धुआँ देखकर यह सेना यहीं चली आयेगी); भाभी सीता गुफा में जा बैठें। आप अपने धनुष पर प्रत्यञ्चा चढ़ा लें और बाण तथा कवच धारण कर लें। 

यह सुनकर पुरुषसिंह श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा - 'प्रिय सुमित्राकुमार ! अच्छी तरह देखो तो सही, तुम्हारी समझ में यह किसकी सेना हो सकती है? 

श्रीराम के ऐसा कहने पर लक्ष्मण रोष से प्रज्वलित हुए अग्निदेव की भाँति उस सेना की ओर इस तरह देखने लगे, मानो उसे जलाकर भस्म कर देना चाहते हों और इस प्रकार बोले - भैया! निश्चय ही यह कैकेयी का पुत्र भरत है, जो अयोध्या में अभिषिक्त होकर अपने राज्य को निष्कण्टक

बनाने की इच्छा से हम दोनों को मार डालने के लिये यहाँ आ रहा है। सामने की ओर यह जो बहुत बड़ा शोभासम्पन्न वृक्ष दिखायी देता है, उसके समीप जो रथ है, उस पर उज्ज्वलता से युक्त कोविदार वृक्ष से चिह्नित ध्वज शोभा पा रहा है। 

'ये घुड़सवार सैनिक इच्छानुसार शीघ्रगामी घोड़ों पर आरूढ़ हो इधर ही आ रहे हैं और ये हाथी सवार भी बड़े हर्ष से हाथियों पर चढ़कर आते हुए प्रकाशित हो रहे हैं। वीर! हम दोनों को धनुष लेकर पर्वत के शिखर पर चलना चाहिये अथवा कवच बाँधकर अस्त्र-शस्त्र धारण किये यहीं डटे रहना चाहिये।' 

‘रघुनन्दन! आज यह कोविदार के चिह्न से युक्त ध्वजवाला रथ रणभूमि में हम दोनों के अधिकार में आ जायेगा और आज मैं अपनी इच्छा के अनुसार उस भरत को भी सामने देखूँगा कि जिसके कारण आपको, भाभी सीता को और मुझे भी महान् संकट का सामना करना पड़ा है तथा जिसके कारण आप अपने सनातन राज्याधिकार से वञ्चित किये गये हैं। वीर रघुनाथजी! यह भरत हमारा शत्रु है और सामने आ गया है; अतः वध के ही योग्य है। भरत का वध करने में मुझे कोई दोष नहीं दिखायी देता।' 

‘रघुनन्दन! जो पहले का अपकारी रहा हो, उसको मारकर कोई अधर्म का भागी नहीं होता है। भरत ने पहले हमलोगों का अपकार किया है, अत: उसे मारने में नहीं, जीवित छोड़ देने में ही अधर्म है। इस भरत के मारे जाने पर आप समस्त वसुधा का शासन करें। जैसे हाथी किसी वृक्ष को तोड़ डालता है, उसी प्रकार राज्य का लोभ करने वाली कैकेयी आज अत्यन्त दु:ख से आर्त हो इसे मेरे द्वारा युद्ध में मारा गया देखे। 

‘मैं कैकेयी का भी उसके सगे-सम्बन्धियों एवं बन्धु बान्धवों सहित वध कर डालूँगा। आज यह पृथ्वी कैकेयीरूप महान् पाप से मुक्त हो जाये। मानद! आज मैं अपने रोके हुए क्रोध और तिरस्कार को शत्रु की सेनाओं पर उसी प्रकार छोडूंगा, जैसे सूखे घास के ढेर में आग लगा दी जाये। अपने तीखे बाणों से शत्रुओं के शरीरों के टुकड़े-टुकड़े करके मैं अभी चित्रकूट के इस वन को रक्त से सींच दूँगा।' 

'मेरे बाणों से विदीर्ण हुए हृदय वाले हाथियों और घोड़ों को तथा मेरे हाथ से मारे गये मनुष्यों को भी गीदड़ आदि मांसभक्षी जन्तु इधर-उधर घसीट कर खाएंगे। इस महान् वन में सेना सहित भरत का वध करके मैं धनुष और बाण के ऋण से उऋण हो जाऊँगा – इसमें संशय नहीं है।' 

इति श्रीमद् राम कथा अयोध्याकाण्ड अध्याय-६ का भाग-९१(91) समाप्त !

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