लंकावर्ती सर्वश्रेष्ठ महान् गृह के मध्य भाग में पवनपुत्र हनुमानजी ने देखा - एक उत्तम भवन शोभा पा रहा है। वह बहुत ही निर्मल एवं विस्तृत था। उसकी लंबाई एक योजन की और चौड़ाई आधे योजन की थी। राक्षसराज रावण का वह विशाल भवन बहुत-सी अट्टालिकाओं से व्याप्त था। विशाललोचना विदेह-नन्दिनी सीता की खोज करते हुए शत्रुसूदन हनुमानजी उस भवन में सब ओर चक्कर लगाते फिरे। बल्-वैभव से सम्पन्न हनुमान् राक्षसों के उस उत्तम आवास का अवलोकन करते हुए एक ऐसे सुन्दर गृह में जा पहुँचे, जो राक्षसराज रावण का निजी निवास स्थान था। चार दाँत तथा तीन दाँतों वाले हाथी इस विस्तृत भवन को चारों ओर से घेरकर खड़े थे और हाथों में हथियार लिये बहुत से राक्षस उसकी रक्षा करते थे।
रावण का वह महल उसकी राक्षसजातीय पत्नियों तथा पराक्रम पूर्वक हरकर लायी हुई राजकन्याओं से भरा हुआ था। इस प्रकार नर-नारियों से भरा हुआ वह कोलाहल पूर्ण भवन नाके और मगरों से व्याप्त, तिमिंगलों और मत्स्यों से पूर्ण, वायु वेग से विक्षुब्ध तथा सर्पों से आवृत महासागर के समान प्रतीत होता था। जो लक्ष्मी कुबेर, चन्द्रमा और इन्द्र के यहाँ निवास करती हैं, वे ही और भी सुरम्य रूप से रावण के घर में नित्य ही निश्चल होकर रहती थीं। जो समृद्धि महाराज कुबेर, यम और वरुण के यहाँ दृष्टिगोचर होती है, वही अथवा उससे भी बढ़कर राक्षसों के घरों मे देखी जाती थीं।
वहाँ बैठकर वे सब ओर फैली हुई नाना प्रकार के पेय, भक्ष्य और अन्न की दिव्य गन्ध सुँघने लगे। वह गन्ध मूर्तिमान् पवन-सी प्रतीत होती थी। जैसे कोई बन्धु-बान्धव अपने उत्तम बन्धु को अपने पास बुलाता है, उसी प्रकार वह सुगन्ध उन महाबली हनुमानजी को मानो यह कहकर कि 'इधर चले आओ' जहाँ रावण था, वहाँ बुला रही थी। तदनन्तर हनुमान्जी उस ओर प्रस्थित हुए। आगे बढ़ने पर उन्होंने एक बहुत बड़ी हवेली देखी, जो बहुत ही सुन्दर और सुखद थी। वह हवेली रावण को बहुत ही प्रिय थी, ठीक वैसे ही जैसे पति को कान्तिमयी सुन्दरी पत्नी अधिक प्रिय होती है। उसमें मणियों की सीढ़ियाँ बनी थीं और सोने की खिड़कियाँ उसकी शोभा बढ़ाती थीं। उसकी फर्श स्फटिक मणि से बनायी गयी थी, जहाँ बीच-बीच में हाथी के दाँत के द्वारा विभिन्न प्रकार की आकृतियाँ बनी हुई थीं। मोती, हीरे, मूँगे, चाँदी और सोने के द्वारा भी उसमें अनेक प्रकार के आकार अङ्कित किये गये थे। मणियों के बने हुए बहुत-से खम्भे, जो समान, सीधे, बहुत ही ऊँचे और सब ओर से विभूषित थे, आभूषण की भाँति उस हवेली की शोभा बढ़ा रहे थे।
अपने अत्यन्त ऊँचे स्तम्भरूपी पंखों से मानो वह आकाश को उड़ती हुई-सी जान पड़ती थी। उसके भीतर पृथ्वी के वन-पर्वत आदि चिह्नों से अङ्कित एक बहुत बड़ा कालीन बिछा हुआ था। वह दिव्य सुगन्ध से सुवासित थी। उस हवेली में बहुमूल्य बिछौने बिछे हुए थे तथा स्वयं राक्षसराज रावण उसमें निवास करता था। वह अगुरु नामक धूप के धूएँ से धूमिल दिखायी देती थी, किंतु वास्तव में हंस के समान श्वेत एवं निर्मल थी। उसे देखकर हनुमानजी यह तर्क-वितर्क करने लगे कि सम्भव है, यही स्वर्गलोक या देवलोक हो। यह इन्द्र की पुरी भी हो सकती है अथवा यह परमसिद्धि (ब्रह्मलोक की प्राप्ति) है।
तदनन्तर हनुमानजी ने कालीन पर बैठी हुई सहस्रों सुन्दरी स्त्रियाँ देखीं, जो रंग-बिरंगे वस्त्र और पुष्पमाला धारण किये अनेक प्रकार की वेश-भूषाओं से विभूषित थीं। आधी रात बीत जाने पर वे क्रीड़ा से उपरत हो मधुपान के मद और निद्रा के वशीभूत हो उस समय गाढ़ी नींद में सो गयी थीं। पवनकुमार हनुमानजी ने उन सुन्दरी युवतियों के मुख देखे, जिनसे कमलों की-सी सुगन्ध फैल रही थी। उनके दाँत ढँके हुए थे और आँखें मुँद गयी थीं। रात्रि के अन्त में खिले हुए कमलों के समान उन सुन्दरियों के जो मुखारविन्द हर्ष से उत्फुल्ल दिखायी देते थे, वे ही फिर रात आने पर सो जाने के कारण मुँदे हुए दल वाले कमलों के समान शोभा पा रहे थे।
उन स्त्रियों से घिरा हुआ राक्षसराज रावण ताराओं से घिरे हुए कान्तिमान् नक्षत्रपति चन्द्रमा के समान शोभा पा रहा था। उस समय हनुमानजी को ऐसा मालूम हुआ कि आकाश (स्वर्ग) से भोगावशिष्ट पुण्य के साथ जो ताराएँ नीचे गिरती हैं, वे सब की सब मानो यहाँ इन सुन्दरियों के रूप में एकत्र हो गयी हैं क्योंकि वहाँ उन युवतियों के तेज, वर्ण और प्रसाद स्पष्टत: सुन्दर प्रभा वाले महान् तारों के समान ही सुशोभित होते थे। मधुपान के अनन्तर व्यायाम (नृत्य, गान, क्रीड़ा आदि) - के समय जिनके केश खुलकर बिखर गये थे, पुष्पमालाएँ मर्दित होकर छिन्न-भिन्न हो गयी थीं और सुन्दर आभूषण भी शिथिल होकर इधर-उधर खिसक गये थे, वे सभी सुन्दरियाँ वहाँ निद्रा से अचेत - सी होकर सो रही थीं।
किन्हीं के मस्तक की (सिंदूर - कस्तूरी आदि की) वेदियाँ पूछ गयी थीं, किन्हीं के नूपुर पैरों से निकलकर दूर जा पड़े थे तथा किन्हीं सुन्दरी युवतियों के हार टूटकर उनके बगल में ही पड़े थे। कोई मोतियों के हार टूट जाने से उनके बिखरे दानों से आवृत थीं, किन्हीं के वस्त्र खिसक गये थे और किन्हीं की करधनी की लड़ें टूट गयी थीं। वे युवतियाँ बोझ ढोकर थकी हुई अश्वजाति की नयी बछेड़ियों के समान जान पड़ती थीं। किन्हीं के कानों के कुण्डल गिर गये थे, किन्हीं की पुष्पमालाएँ मसली जाकर छिन्न-भिन्न हो गयी थीं। इससे वे महान् वन में गजराज द्वारा दली मली गयी फूली लताओं के समान प्रतीत होती थीं।
वे सोयी हुई सुन्दरियाँ वहाँ सरिताओं के समान सुशोभित होती थीं। सोने के विभिन्न आभूषण ही वहाँ बहुसंख्यक स्वर्णकमलों की शोभा धारण करते थे। नाना प्रकार के सुन्दर रूप-रंगवाली उन रावणपत्नियों के मुखों पर हिलते हुए वे अञ्चल सुन्दर कान्ति वाली फहराती हुई पताकाओं के समान शोभा पा रहे थे।
राजर्षियों, ब्रह्मर्षियों, दैत्यों, गन्धर्वों तथा राक्षसों की कन्याएँ काम के वशीभूत होकर रावण की पत्नियाँ बन गयी थीं। उन सब स्त्रियों का रावण ने युद्ध की इच्छा से अपहरण किया था और कुछ मदमत्त रमणियाँ कामदेव से मोहित होकर स्वयं ही उसकी सेवा में उपस्थित हो गयी थीं। वहाँ ऐसी कोई स्त्रियाँ नहीं थीं, जिन्हें बल पराक्रम से सम्पन्न होने पर भी रावण उनकी इच्छा के विरुद्ध बलात् हर लाया हो। वे सब-की-सब उसे अपने अलौकिक गुण से ही उपलब्ध हुई थीं।
जो श्रेष्ठतम पुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्रजी के ही योग्य थीं, उन जनककिशोरी सीता को छोड़कर दूसरी कोई ऐसी स्त्री वहाँ नहीं थी, जो रावण के सिवा किसी दूसरे की इच्छा रखने वाली हो अथवा जिसका पहले कोई दूसरा पति रहा हो। रावण की कोई भार्या ऐसी नहीं थी, जो उत्तम कुल में उत्पन्न न हुई हो अथवा जो कुरूप, अनुदार या कौशल रहित, उत्तम वस्त्राभूषण एवं माला आदि से वञ्चित, शक्तिहीन तथा प्रियतम को अप्रिय हो।
वहाँ इधर-उधर दृष्टिपात करते हुए हनुमानजी ने एक दिव्य एवं श्रेष्ठ वेदी देखी, जिस पर पलंग बिछाया जाता था। वह वेदी स्फटिक मणि की बनी हुई थी और उसमें अनेक प्रकार के रत्न जड़े गये थे। वहाँ वैदूर्यमणि (नीलम) के बने हुए श्रेष्ठ आसन (पलंग) बिछे हुए थे, जिनकी पाटी - पाये आदि अंग हाथी - दाँत और सुवर्ण से जटित होने के कारण चितकबरे दिखायी देते थे। उन महामूल्यवान् पलंगों पर बहुमूल्य बिछौने बिछाये गये थे। उन सबके कारण उस वेदी की बड़ी शोभा हो रही थी। उस पलंग के एक भाग में उन्होंने चन्द्रमा के समान एक श्वेत छत्र देखा, जो दिव्य मालाओं से सुशोभित था। वह उत्तम पलंग सुवर्ण से जटित होने के कारण अग्नि के समान देदीप्यमान हो रहा था।
हनुमानजी ने उसे अशोक पुष्पों की मालाओं से अलंकृत देखा। उसके चारों ओर खड़ी हुई बहुत सी स्त्रियाँ हाथों में चँवर लिये उस पर हवा कर रही थीं। वह पलंग अनेक प्रकार की गन्धों से सेवित तथा उत्तम धूप से सुवासित था। उस पर उत्तमोत्तम बिछौने बिछे हुए थे। उसमें भेड़ की खाल मढ़ी हुई थी तथा वह सब ओर से उत्तम फूलों की मालाओं से सुशोभित था। उस प्रकाशमान पलंग पर महाकपि हनुमानजी ने वीर राक्षसराज रावण को सोते देखा, जो सुन्दर आभूषणों से विभूषित, इच्छानुसार रूप धारण करने वाला, दिव्य आभरणों से अलंकृत और सुरूपवान् था। वह राक्षस-कन्याओं का प्रियतम तथा राक्षसों को सुख पहुँचाने वाला था।
तदनन्तर दशमुख रावण के बाहुबल से पालित उस प्रशंसित पुरी में जाकर चारों ओर घूमने पर भी पति के गुणों के वेग से पराजित (विमुग्ध) अत्यन्त दु:खिनी और परम पूजनीया जनककिशोरी सीता को न देखकर कपिवर हनुमान् बड़ी चिन्ता में पड़ गये। महात्मा हनुमानजी अनेक प्रकार से परमार्थ - चिन्तन में तत्पर रहने वाले कृतात्मा (पवित्र अन्त: करण वाले) सन्मार्ग गामी तथा उत्तम दृष्टि रखने वाले थे। इधर-उधर बहुत घूमने पर भी जब उन महात्मा को जानकीजी का पता न लगा, तब उनका मन बहुत दुःखी हो गया।
