भाग-८(8) हनुमानजी के द्वारा पुष्पक विमान का दर्शन

 


वहाँ विचरते हुए उन वानरशिरोमणि कपिश्रेष्ठ ने रावण के निकट सोने वाली (उसके पलंग की रक्षा करने वाली) राक्षसियों को देखा, जिनकी आँखें बड़ी विकराल थीं। साथ ही, उन्होंने उस राक्षसराज के भवन में राक्षसियों के बहुत-से समुदाय देखे, जिनके हाथों में शूल, मुद्गर, शक्ति और तोमर आदि अस्त्र-शस्त्र विद्यमान थे। उनके सिवा, वहाँ बहुत-से विशालकाय राक्षस भी दिखायी दिये, जो नाना प्रकार के हथियारों से लैस थे। इतना ही नहीं, वहाँ लाल और सफेद रंग के बहुत-से अत्यन्त वेगशाली घोड़े भी बँधे हुए थे। 

साथ ही अच्छी जाति के रूपवान् हाथी भी थे, जो शत्रु सेना के हाथियों को मार भगाने वाले थे। वे सब-के-सब गजशिक्षा में सुशिक्षित, युद्ध में ऐरावत के समान पराक्रमी तथा शत्रु सेनाओं का संहार करने में समर्थ थे। वे बरसते हुए मेघों और झरने बहाते हुए पर्वतों के समान मद की धारा बहा रहे थे। उनकी गर्जना मेघ गर्जना के समान जान पड़ती थी। वे समराङ्गण में शत्रुओं के लिये दुर्जय थे। हनुमानजी ने रावण के भवन में उन सबको देखा। राक्षसराज रावण के उस महल में उन्होंने सहस्रों ऐसी सेनाएँ देखीं, जो जाम्बूनद के आभूषणों से विभूषित थीं। उनके सारे अंग सोने के गहनों से ढके हुए थे तथा वे प्रात: काल के सूर्य की भाँति उद्दीप्त हो रही थीं। 

पवनपुत्र हनुमानजी ने राक्षसराज रावण के उस भवन में अनेक प्रकार की पालकियाँ, विचित्र लता-गृह, चित्रशालाएँ, क्रीडाभवन, काष्ठमय क्रीडापर्वत, रमणीय विलास गृह और दिन में उपयोग में आने वाले विलासभवन भी देखे। उन्होंने वह महल मन्दराचल के समान ऊँचा, क्रीडा- मयूरों के रहने के स्थानों से युक्त, ध्वजाओं से व्याप्त, अनन्त रत्नों का भण्डार और सब ओर से निधियों से भरा हुआ देखा। उसमें धीर पुरुषों ने निधि रक्षा के उपयुक्त कर्माङ्गों का अनुष्ठान किया था तथा वह साक्षात् भूतनाथ (महेश्वर या कुबेर) के भवन के समान जान पड़ता था।

रत्नों की किरणों तथा रावण के तेज के कारण वह घर किरणों से युक्त सूर्य के समान जगमगा रहा था। वानरयूथपति हनुमान् ने वहाँ के पलंग, चौकी और पात्र सभी अत्यन्त उज्ज्वल तथा जाम्बूनद सुवर्ण के बने हुए ही देखे। उसमें मधु और आसव के गिरने से वहाँ की भूमि गीली हो रही थी। मणिमय पात्रों से भरा हुआ वह सुविस्तृत महल कुबेर-भवन के समान मनोरम जान पड़ता था। नूपुरों की झनकार, करधनियों की खनखनाहट, मृदङ्गों और तालियों की मधुर ध्वनि तथा अन्य गम्भीर घोष करने वाले वाद्यों से वह भवन मुखरित हो रहा था। उसमें सैकड़ों अट्टालिकाएँ थीं, सैकड़ों रमणी-रत्नों से वह व्याप्त था। उसकी ड्योढ़याँ बहुत बड़ी-बड़ी थीं। ऐसे विशाल भवन में हनुमानजी ने प्रवेश किया। 

बलवान् वीर हनुमानजी ने नीलम से जड़ी हुई सोने की खिड़कियों से सुशोभित तथा पक्षि-समूहों से युक्त भवनों का समुदाय देखा, जो वर्षाकाल में बिजली से युक्त महती मेघमाला के समान मनोहर जान पड़ता था। उसमें नाना प्रकार की बैठकें, शङ्ख, आयुध और धनुषों की मुख्य-मुख्य शालाएँ तथा पर्वतों के समान ऊँचे महलों के ऊपर मनोहर एवं विशाल चन्द्रशालाएँ (अट्टालिकाएँ) देखीं। कपिवर हनुमान् ने वहाँ नाना प्रकार के रत्नों से सुशोभित ऐसे-ऐसे घर देखे, जिनकी देवता और असुर भी प्रशंसा करते थे। वे गृह सम्पूर्ण दोषों से रहित थे तथा रावण ने उन्हें अपने पुरुषार्थ से प्राप्त किया था। 

वे भवन बड़े प्रयत्न से बनाये गये थे और ऐसे अद्भुत लगते थे, मानो साक्षात् मयदानव ने ही उनका निर्माण किया हो। हनुमानजी ने उन्हें देखा, लंकापति रावण के वे घर इस भूतल पर सभी गुणों में सबसे बढ़-चढ़कर थे। फिर उन्होंने राक्षसराज रावण का उसकी शक्ति के अनुरूप अत्यन्त उत्तम और अनुपम पुष्पक विमान देखा, जो मेघ के समान ऊँचा, सुवर्ण के समान सुन्दर कान्तिवाला तथा मनोहर था। वह इस भूतल पर बिखरे हुए स्वर्ण के समान जान पड़ता था। अपनी कान्ति से प्रज्वलित-सा हो रहा था। अनेकानेक रत्नों से व्याप्त, भाँति-भाँति के वृक्षों के फूलों से आच्छादित तथा पुष्पों के पराग से भरे हुए पर्वत शिखर के समान शोभा पाता था। 

वह विमान रूप भवन विद्युन्मालाओं से पूजित मेघ के समान रमणी - रत्नों से देदीप्यमान हो रहा था और श्रेष्ठ हंसों द्वारा आकाश में ढोये जाते हुए विमान की भाँति जान पड़ता था। उस दिव्य विमान को बहुत सुन्दर ढंग से बनाया गया था। वह अद्भुत शोभा से सम्पन्न दिखायी देता था।जैसे अनेक धातुओं के कारण पर्वतशिखर, ग्रहों और चन्द्रमा के कारण आकाश तथा अनेक वर्णों से युक्त होने के कारण मनोहर मेघ विचित्र शोभा धारण करते हैं, उसी तरह नाना प्रकार के रत्नों से निर्मित होने के कारण वह विमान भी विचित्र शोभा से सम्पन्न दिखायी देता था। 

महाकपि हनुमान् ने जिस विचित्र सुन्दर विमान को वहाँ देखा, उसका नाम पुष्पक था। वह रत्नों की प्रभा से प्रकाशमान था और इधर-उधर भ्रमण करता था। देवताओं के गृहाकार उत्तम विमानों में सबसे अधिक आदर उस महाविमान पुष्पक का ही होता था। उसमें नीलम, चाँदी और मूँगों के आकाशचारी पक्षी बनाये गये थे। नाना प्रकार के रत्नों से विचित्र वर्ण के सर्पों का निर्माण किया गया था और अच्छी जाति के घोड़ों के समान ही सुन्दर अंगवाले अश्व भी बनाये गये थे। उस विमान पर सुन्दर मुख और मनोहर पंख वाले बहुत से ऐसे विहङ्गम निर्मित हुए थे, जो साक्षात् कामदेव के सहायक जान पड़ते थे। उनकी पाँखें मूँगे और सुवर्ण के बने हुए फूलों से युक्त थीं तथा उन्होंने लीला पूर्वक अपने बाँके पंखों को समेट रखा था। 

इस प्रकार सुन्दर कन्द्राओं वाले पर्वत के समान तथा वसन्त ऋतु में सुन्दर कोटरों वाले परम सुगन्धयुक्त वृक्ष के समान उस शोभायमान मनोहर भवन (विमान) में पहुँचकर हनुमानजी बड़े विस्मित हुए। उसकी रचना को सौन्दर्य आदि की दृष्टि से मापा नहीं जा सकता था। उसका निर्माण अनुपम रीति से किया गया था। स्वयं विश्वकर्मा ने ही उसे बनाया था और बहुत उत्तम कहकर उसकी प्रशंसा की थी। जब वह आकाश में उठकर वायु मार्ग में स्थित होता था, तब सौर मार्ग के चिह्न-सा सुशोभित होता था। 

उसमें कोई ऐसी वस्तु नहीं थी, जो अत्यन्त प्रयत्न से न बनायी गयी हो तथा वहाँ कोई भी ऐसा स्थान या विमान का अंग नहीं था, जो बहुमूल्य रत्नों से जटित न हो। उसमें जो विशेषताएँ थीं, वे देवताओं के विमानों में भी नहीं थीं। उसमें कोई ऐसी चीज नहीं थी, जो बड़ी भारी विशेषता से युक्त न हो। रावण ने जो निराहार रहकर तप किया था और भगवान् के चिन्तन में चित्त को एकाग्र किया था, इससे मिले हुए पराक्रम के द्वारा उसने उस विमान पर अधिकार प्राप्त किया था। मन में जहाँ भी जाने का संकल्प उठता, वहीं वह विमान पहुँच जाता था। अनेक प्रकार की विशिष्ट निर्माण कलाओं द्वारा उस विमान की रचना हुई थी तथा जहाँ-तहाँ से प्राप्त की गयी दिव्य विमान निर्माणोचित विशेषताओं से उसका निर्माण हुआ था। 

वह स्वामी के मन का अनुसरण करते हुए बड़ी शीघ्रता से चलने वाला, दूसरों के लिये दुर्लभ और वायु के समान वेग पूर्वक आगे बढ़ने वाला था तथा श्रेष्ठ आनन्द (महान् सुख) के भागी, बढ़े- चढ़े तप वाले, पुण्यकारी महात्माओं का ही वह आश्रय था। वह विमान गति विशेष का आश्रय ले व्योम रूप देश - विशेष में स्थित था। जो वसन्त-कालिक पुष्प-पुञ्ज के समान रमणीय दिखायी देता था और वसन्त मास से भी अधिक सुहावना दृष्टिगोचर होता था, उस उत्तम पुष्पक विमान को वानरशिरोमणि हनुमानजी ने वहाँ देखा। 

वह सब प्रकार के रत्नों से विभूषित पुष्पक नामक दिव्य विमान स्वर्गलोक में विश्वकर्मा ने ब्रह्माजी के लिये बनाया था। कुबेर ने बड़ी भारी तपस्या करके उसे ब्रह्माजी से प्राप्त किया और फिर कुबेर को बलपूर्वक परास्त करके राक्षसराज रावण ने उसे अपने हाथ में कर लिया। 

इति श्रीमद् राम कथा सुन्दरकाण्ड अध्याय-९ का भाग-८(8) समाप्त ! 

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