तत्पश्चात् बुद्धिमान् हनुमानजी ने देखा, जिस प्रकार गोशाला के भीतर गौओं के झुंड में मतवाला साँड़ विचरता है, उसी प्रकार पृथ्वी के ऊपर बारम्बार अपनी चाँदनी का चंदोवा तानते हुए चन्द्रदेव आकाश के मध्य भाग में तारिकाओं के बीच विचरण कर रहे हैं। वे शीतरश्मि चन्द्रमा जगत के पाप-ताप का नाश कर रहे हैं, महासागर में ज्वार उठा रहे हैं, समस्त प्राणियों को दीप्ति एवं प्रकाश दे रहे हैं और आकाश में क्रमश: ऊपर की ओर उठ रहे हैं। जैसे तीखे सींगवाला बैल खड़ा हो, जैसे ऊपर को उठे शिखर वाला महान् पर्वत श्वेत (हिमालय) शोभा पाता हो और जैसे सुवर्णजटित दाँतों से युक्त गजराज सुशोभित होता हो, उसी प्रकार हिरण के श्रृङ्गरूपी चिह्न से युक्त परिपूर्ण चन्द्रमा छवि पा रहे थे।
वीणा श्रवणसुखद शब्द झङ्कृत हो रहे थे, सदाचारिणी स्त्रियाँ पतियों के साथ सो रही थीं तथा अत्यन्त अद्भुत और भयंकर शील-स्वभाव वाले निशाचर निशीथ काल में विहार कर रहे थे। बुद्धिमान् वानर हनुमान् ने वहाँ बहुत से घर देखे। किन्हीं में ऐश्वर्य मद से मत्त निशाचर निवास करते थे, किन्हीं में मदिरापान से मतवाले राक्षस भरे हुए थे। कितने ही घर रथ, घोड़े आदि वाहनों और भद्रासनों से सम्पन्न थे तथा कितने ही वीर-लक्ष्मी से व्याप्त दिखायी देते थे। वे सभी गृह एक-दूसरे से मिले हुए थे। राक्षसलोग आपस में एक-दूसरे पर अधिक आक्षेप करते थे। अपनी मोटी-मोटी भुजाओं को भी हिलाते और चलाते थे। मतवालों की-सी बहकी-बहकी बातें करते थे और मदिरा से उन्मत्त होकर परस्पर कटु वचन बोलते थे।
हनुमानजी ने यह भी देखा कि नायिकाएँ अपने अंगों में चन्दन आदि का अनुलेपन करती हैं। दूसरी वहीं सोती हैं। तीसरी सुन्दर रूप और मनोहर मुख वाली ललनाएँ हँसती हैं तथा अन्य वनिताएँ प्रणय-कलह से कुपित हो लंबी साँसें खींच रही हैं। चिग्घाड़ते हुए महान् गजराजों, अत्यन्त सम्मानित श्रेष्ठ सभासदों तथा लंबी साँसें छोड़ने वाले वीरों के कारण वह लंकापुरी फुफकारते हुए सर्पों से युक्त सरोवरों के समान शोभा पा रही थी।
हनुमानजी ने उस पुरी में बहुत-से उत्कृष्ट बुद्धि वाले, सुन्दर बोलने वाले, सम्यक् श्रद्धा रखने वाले, अनेक प्रकार के रूप-रंग वाले और मनोहर नाम धारण करने वाले विश्वविख्यात राक्षस देखे। वे सुन्दर रूप वाले, नाना प्रकार के गुणोंसे सम्पन्न, अपने गुणों के अनुरूप व्यवहार करने वाले और तेजस्वी थे। उन्हें देखकर हनुमानजी बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने बहुतेरे राक्षसों को सुन्दर रूप से सम्पन्न देखा और कोई-कोई उन्हें बड़े कुरूप दिखायी दिये।
तदनन्तर वहाँ उन्होंने सुन्दर वस्त्राभूषण धारण करने के योग्य सुन्दरी राक्षस-रमणियों को देखा, जिनका भाव अत्यन्त विशुद्ध था। वे बड़ी प्रभावशालिनी थीं। उनका मन प्रियतम में तथा मधुपान में आसक्त था। वे तारिकाओं की भाँति कान्तिमती और सुन्दर स्वभाववाली थीं।
हनुमानजी की दृष्टि में कुछ ऐसी स्त्रियाँ भी आयीं, जो अपने रूप-सौन्दर्य से प्रकाशित हो रही थीं। वे बड़ी लजीली थीं और आधी रात के समय अपने प्रियतम के साथ आनन्द में मग्न थीं। दूसरी बहुत-सी स्त्रियाँ महलों की छतों पर बैठी थीं। वे पति की सेवा में तत्पर रहने वाली, धर्मपरायणा, विवाहिता और कामभावना से भावित थीं।
तदनन्तर वानरों के प्रमुख वीर हनुमानजी ने विभिन्न गृहों में ऐसी परम सुन्दरी रमणियों का अवलोकन किया, जो मनोभिराम प्रियतम का संयोग पाकर अत्यन्त प्रसन्न हो रही थीं। फूलों के हार से विभूषित होने के कारण उनकी रमणीयता और भी बढ़ गयी थी और वे सब की सब हर्ष से उत्फुल्ल दिखायी देती थीं।
किंतु जो परमात्मा के मानसिक संकल्प से धर्ममार्ग पर स्थिर रहने वाले राजकुल में प्रकट हुई थीं, जिनका प्रादुर्भाव परम ऐश्वर्य की प्राप्ति कराने वाला है, जो परम सुन्दर रूप में उत्पन्न हुई प्रफुल्ल लता के समान शोभा पाती थीं, उन कृशाङ्गी सीता को उन्होंने वहाँ कहीं नहीं देखा था। जो सदा सनातन मार्ग पर स्थित रहने वाली, श्रीराम पर ही दृष्टि रखने वाली, श्रीरामविषयक प्रेम से परिपूर्ण, अपने पति के तेजस्वी मन में बसी हुई तथा दूसरी सभी स्त्रियों से सदा ही श्रेष्ठ थीं, जिन्हें विरहजनित ताप सदा पीड़ा देता रहता था, जिनके नेत्रों से निरन्तर आँसुओं की झड़ी लगी रहती थी और कण्ठ उन आँसुओं से गद्गद रहता था, जिनकी पलकें बहुत ही सुन्दर थीं और कण्ठस्वर अत्यन्त मधुर था तथा जो वन में नृत्य करने वाली मयूरी के समान मनोहर लगती थीं, जो मेघ आदि से आच्छादित होने के कारण अव्यक्त रेखा वाली चन्द्रलेखा के समान दिखायी देती थीं, धूलि - धूसर सुवर्ण रेखा-सी प्रतीत होती थीं, बाण के आघात से उत्पन्न हुई रेखा (चिह्न) - सी जान पड़ती थीं तथा वायु के द्वारा उड़ायी जाती हुई बादलों की रेखा - सी दृष्टिगोचर होती थीं। वक्ताओं में श्रेष्ठ नरेश्वर श्रीरामचन्द्रजी की पत्नी उन सीताजी को बहुत देर तक ढूँढने पर भी जब हनुमानजी न देख सके, तब वे तत्क्षण अत्यन्त दु:खी और शिथिल हो गये।
फिर इच्छानुसार रूप धारण करने वाले कपिवर हनुमानजी बड़ी शीघ्रता के साथ लंका के सतमहले मकानों में यथेच्छ विचरने लगे। अत्यन्त बल-वैभव से सम्पन्न वे पवनकुमार राक्षसराज रावण के महल में पहुँचे, जो चारों ओर से सूर्य के समान चमचमाते हुए सुवर्णमय परकोटों से घिरा हुआ था। जैसे सिंह विशाल वन की रक्षा करते हैं, उसी प्रकार बहुतेरे भयानक राक्षस रावण के उस महल की रक्षा कर रहे थे। उस भवन का निरीक्षण करते हुए कपिकुञ्जर हनुमानजी मन-ही-मन हर्ष का अनुभव करने लगे।
वह महल चाँदी से मढ़े हुए चित्रों, सोने जड़े हुए दरवाजों और बड़ी अद्भुत ड्योढ़यों तथा सुन्दर द्वारों से युक्त था। हाथी पर चढ़े हुए महावत तथा श्रमहीन शूरवीर वहाँ उपस्थित थे। जिनके वेग को कोई रोक नहीं सकता था, ऐसे रथवाहक अश्व भी वहाँ शोभा पा रहे थे। सिंहों और बाघों के चमड़ों के बने हुए कवचों से वे रथ ढके हुए थे, उनमें हाथी दाँत, सुवर्ण तथा चाँदी की प्रतिमाएँ रखी हुई थीं। उन रथों में लगी हुई छोटी-छोटी घंटिकाओं की मधुर ध्वनि वहाँ होती रहती थी; ऐसे विचित्र रथ उस रावण-भवन में सदा आ-जा रहे थे।
रावण का वह भवन अनेक प्रकार के रत्नों से व्याप्त था, बहुमूल्य आसन उसकी शोभा बढ़ाते थे। उसमें सब ओर बड़े-बड़े रथों के ठहरने के स्थान बने थे और महारथी वीरों के लिये विशाल वासस्थान बनाये गये थे। दर्शनीय एवं परम सुन्दर नाना प्रकार के सहस्रों पशु और पक्षी वहाँ सब ओर भरे हुए थे। सीमा की रक्षा करने वाले विनयशील राक्षस उस भवन की रक्षा करते थे। वह सब ओर से मुख्य-मुख्य सुन्दरियों से भरा रहता था। वहाँ की रन्तस्वरूपा युवती रमणियाँ सदा प्रसन्न रहा करती थीं। सुन्दर आभूषणों की झनकारों से झंकृत राक्षसराज का वह महल समुद्र के कल-कल नाद की भाँति मुखरित रहता था।
वह भवन राजोचित सामग्री से पूर्ण था, श्रेष्ठ एवं सुन्दर चन्दनों से चर्चित था तथा सिंहों से भरे हुए विशाल वन की भाँति प्रधान-प्रधान पुरुषों से परिपूर्ण था। वहाँ भेरी और मृदङ्ग की ध्वनि सब ओर फैली हुई थी। वहाँ शङ्ख की ध्वनि गूँज रही थी। उसकी नित्य पूजा एवं सजावट होती थी। पर्वों के दिन वहाँ होम किया जाता था। राक्षसलोग सदा ही उस राजभवन की पूजा करते थे। वह समुद्र के समान गम्भीर और उसी के समान कोलाहलपूर्ण था। महामना रावण का वह विशाल भवन महान् रत्नमय अलंकारों से अलंकृत था। उसमें हाथी-घोड़े और रथ भरे हुए थे तथा वह महान् रत्नों से व्याप्त होने के कारण अपने स्वरूप से प्रकाशित हो रहा था। महाकपि हनुमान् ने उसे देखा। देखकर कपिवर हनुमान् ने उस भवन को लंका का आभूषण ही माना।
तदनन्तर वे उस रावण भवन के आस-पास ही विचरने लगे। इस प्रकार वे एक घर से दूसरे घर में जाकर राक्षसों के बगीचों के सभी स्थानों को देखते हुए बिना किसी भय से अट्टालिकाओं पर विचरण करने लगे। महान् वेगशाली और पराक्रमी वीर हनुमान् वहाँ से कूदकर प्रहस्त के घर में उतर गये। फिर वहाँ से उछले और महापार्श्व के महल में पहुँच गये।
तदनन्तर वे महाकपि हनुमान् मेघ के समान प्रतीत होने वाले कुम्भकर्ण के भवन में कूद गये। इसी तरह क्रमश: ये महोदर, विरूपाक्ष और विद्युन्मालि के घर में गये। इसके बाद महान् वेगशाली महाकपि हनुमान् ने फिर छलाँग मारी और वे वज्रदंष्ट्र, शुक तथा बुद्धिमान् सारण के घरों में जा पहुँचे। इसके बाद वे वानर-यूथपति कपिश्रेष्ठ इन्द्रजीत के घर में गये और वहाँ से जम्बुमालि तथा मालि के घर में पहुँच गये।
तदनन्तर वे महाकपि उछलते-कूदते हुए रश्मिकेतु, सूर्यशत्रु और वज्रकाय के महलों में जा पहुँचे। फिर क्रमश: वे कपिवर पवनकुमार धूम्राक्ष, सम्पाति, विद्युद्रूप, भीम, घन, विघन, शुकनाभ, चक्र, शठ, कपट, ह्रस्वकर्ण, द्रंष्ट्र, लोमश, युद्धोन्मत्त, मत्त, ध्वजग्रीव, विद्युज्जिह्व, द्विजिह्व, हस्तिमुख, कराल, पिशाच और शोणिताक्ष आदि के महलों में गये। इस प्रकार क्रमश: कूदते फाँदते हुए महा यशस्वी पवनपुत्र हनुमान् उन-उन बहुमूल्य भवनों में पधारे। वहाँ उन महाकपि ने उन समृद्धिशाली राक्षसों की समृद्धि देखी। तत्पश्चात् बल-वैभव से सम्पन्न हनुमान् उन सब भवनों को लाँघकर पुन: राक्षसराज रावण के महल पर आ गये।
