ऊँचे शिखर वाले लंब (त्रिकूट) पर्वत पर जो महान् मेघों की घटा के समान जान पड़ता था, बुद्धिमान् महाशक्तिशाली कपिश्रेष्ठ पवनकुमार हनुमान् ने सत्त्व - गुण का आश्रय ले रात के समय रावणपालित लंकापुरी में प्रवेश किया। वह नगरी सुरम्य वन और जलाशयों से सुशोभित थी। शरत्काल के बादलों की भाँति श्वेत कान्ति वाले सुन्दर भवन उसकी शोभा बढ़ाते थे। वहाँ समुद्र की गर्जना के समान गम्भीर शब्द होता रहता था। सागर की लहरों को छूकर बहने वाली वायु इस पुरी की सेवा करती थी।
वह अलकापुरी के समान शक्तिशालिनी सेनाओं से सुरक्षित थी। उस पुरी के सुन्दर फाटकों पर मतवाले हाथी शोभा पाते थे। उस पुरी के अन्तर्द्वार और बहिर्द्वार दोनों ही श्वेत कान्ति से सुशोभित थे। उस नगरी की रक्षा के लिये बड़े-बड़े सर्पो का संचरण (आना-जाना) होता रहता है, इसलिये वह नागों से सुरक्षित सुन्दर भोगवतीपुरी के समान जान पड़ती थी। अमरावतीपुरी के समान वहाँ आवश्यकता के अनुसार बिजलियों सहित मेघ छाये रहते थे। ग्रहों और नक्षत्रों के सदृश विद्युत्-दीपों के प्रकाश से वह पुरी प्रकाशित थी तथा प्रचण्ड वायु की ध्वनि वहाँ सदा होती रहती थी।
सोने के बने हुए विशाल परकोटे से घिरी हुई लंकापुरी क्षुद्र घंटिकाओं की झनकार से युक्त पताकाओं द्वारा अलंकृत थी। उस पुरी के समीप पहुँचकर हर्ष और उत्साह से भरे हुए हनुमानजी सहसा उछलकर उसके परकोटे पर चढ़ गये। वहाँ सब ओर से लंकापुरी का अवलोकन करके हनुमानजी का चित्त आश्चर्य से चकित हो उठा। सुवर्ण के बने हुए द्वारों से उस नगरी की अपूर्व शोभा हो रही थी। उन सभी द्वारों पर नीलम के चबूतरे बने हुए थे। वे सब द्वार हीरों, स्फटिकों और मोतियों से जड़े गये थे। मणिमयी फर्शे उनकी शोभा बढ़ा रही थीं।
उनके दोनों ओर तपाये सुवर्ण के बने हुए हाथी शोभा पाते थे। उन द्वारों का ऊपरी भाग चाँदी से निर्मित होने के कारण स्वच्छ और श्वेत था। उनकी सीढ़ियाँ नीलम की बनी हुई थीं। उन द्वारों के भीतरी भाग स्फटिक मणि के बने हुए और धूल से रहित थे। वे सभी द्वार रमणीय सभा भवनों से युक्त और सुन्दर थे तथा इतने ऊँचे थे कि आकाश में उठे हुए-से जान पड़ते थे। वहाँ क्रौञ्च और मयूरों के कलरव गूंजते रहते थे, उन द्वारों पर राजहंस नामक पक्षी भी निवास करते थे। वहाँ भाँति-भाँति के वाद्यों और आभूषणों की मधुर ध्वनि होती रहती थी, जिससे लंकापुरी सब ओर से प्रतिध्वनित हो रही थी। कुबेर की अलका के समान शोभा पाने वाली लंकानगरी त्रिकूट के शिखर पर प्रतिष्ठित होने के कारण आकाश में उठी हुई-सी प्रतीत होती थी। उसे देखकर कपिवर हनुमान् को बड़ा हर्ष हुआ।
राक्षसराज की वह सुन्दर पुरी लंका सबसे उत्तम और समृद्धिशालिनी थी। उसे देखकर पराक्रमी हनुमान् इस प्रकार सोचने लगे - रावण के सैनिक हाथों में अस्त्र-शस्त्र लिये इस पुरी की रक्षा करते हैं, अत: दूसरा कोई बलपूर्वक इसे अपने वश में नहीं कर सकता। केवल कुमुद, अंगद, महाकपि सुषेण, मैन्द, द्विविद, सूर्यपुत्र सुग्रीव, वानर कुशपर्वा और वानरसेना के प्रमुख वीर ऋक्षराज जाम्बवान् की तथा मेरी भी पहुँच इस पुरी के भीतर हो सकती है।
फिर महाबाहु श्रीराम और लक्ष्मण के पराक्रम का विचार करके कपिवर हनुमान् को बड़ी प्रसन्नता हुई। महाकपि हनुमान् ने देखा, राक्षसराज रावण की नगरी लंका वस्त्राभूषणों से विभूषित सुन्दरी युवती के समान जान पड़ती है। रत्नमय परकोटे ही इसके वस्त्र हैं, गोष्ठ (गोशाला) तथा दूसरे-दूसरे भवन आभूषण हैं। यह सब प्रकार की समृद्धियों से सम्पन्न है। प्रकाशपूर्ण द्वीपों और महान् ग्रहों ने यहाँ का अन्धकार नष्ट कर दिया है। तदनन्तर वानरश्रेष्ठ महाकपि पवनकुमार हनुमान् उस पुरी में प्रवेश करने लगे। इतने में ही उस नगरी की अधिष्ठात्री देवी लंका ने अपने स्वाभाविक रूप में प्रकट होकर उन्हें देखा। वानरश्रेष्ठ हनुमान् को देखते ही रावणपालित लंका स्वयं ही उठ खड़ी हुई। उसका मुँह देखने में बड़ा विकट था।
वह उन वीर पवनकुमार के सामने खड़ी हो गयी और बड़े जोर से गर्जना करती हुई उनसे इस प्रकार बोली - वनचारी वानर! तू कौन है और किस कार्य से यहाँ आया है ? तुम्हारे प्राण जब तक बने हुए हैं, तब तक ही यहाँ आने का जो यथार्थ रहस्य है, उसे ठीक-ठीक बता दो। वानर! रावण की सेना सब ओर से इस पुरी की रक्षा करती है, अतः निश्चय ही तू इस लंका में प्रवेश नहीं कर सकता।
तब वीरवर हनुमान् अपने सामने खड़ी हुई लंका से बोले – 'क्रूर स्वभाव वाली नारी! तू मुझसे जो कुछ पूछ रही है, उसे मैं ठीक-ठीक बता दूंगा; किंतु पहले यह तो बता, तू है कौन? तेरी आँखें बड़ी भयंकर हैं। तू इस नगर के द्वार पर खड़ी है। क्या कारण है कि तू इस प्रकार क्रोध करके मुझे डाँट रही है।
हनुमानजी की यह बात सुनकर इच्छानुसार रूप धारण करने वाली लंका कुपित हो उन पवनकुमार से कठोर वाणी में बोली - मैं महामना राक्षसराज रावण की आज्ञा की प्रतीक्षा करने वाली उनकी सेविका हूँ। मुझ पर आक्रमण करना किसी के लिये भी अत्यन्त कठिन है। मैं इस नगरी की रक्षा करती हूँ। मेरी अवहेलना करके इस पुरी में प्रवेश करना किसी के लिये भी सम्भव नहीं है। आज मेरे हाथ से मारा जाकर तू प्राणहीन हो इस पृथ्वी पर शयन करेगा। वानर! मैं स्वयं ही लंका नगरी हूँ, अत: सब ओर से इसकी रक्षा करती हूँ। यही कारण है कि मैंने तेरे प्रति कठोर वाणी का प्रयोग किया है।
लंका की यह बात सुनकर पवनकुमार कपिश्रेष्ठ हनुमान् उसे जीतने के लिये यन्तशील हो दूसरे पर्वत के समान वहाँ खड़े हो गये।
लंका को विकराल राक्षसी के रूप में देखकर बुद्धिमान् वानरशिरोमणि शक्तिशाली कपिश्रेष्ठ हनुमान् ने उससे इस प्रकार कहा - मैं अट्टालिकाओं, परकोटों और नगर द्वारों सहित इस लंका नगरी को देखूंगा। इसी प्रयोजन से यहाँ आया हूँ। इसे देखने के लिये मेरे मन में बड़ा कौतूहल है। इस लंका के जो वन, उपवन, कानन और मुख्य-मुख्य भवन हैं, उन्हें देखने के लिये ही यहाँ मेरा आगमन हुआ है।
हनुमानजी का यह कथन सुनकर इच्छानुसार रूप धारण करने वाली लंका पुनः कठोर वाणी में बोली – खोटी बुद्धि वाले नीच वानर ! राक्षसेश्वर रावण के द्वारा मेरी रक्षा हो रही है। तू मुझे परास्त किये बिना आज इस पुरी को नहीं देख सकता।
तब उन वानरशिरोमणि ने उस निशाचरी से कहा - भद्रे ! इस पुरी को देखकर मैं फिर जैसे आया हूँ, उसी तरह लौट जाऊँगा।
यह सुनकर लंका ने बड़ी भयंकर गर्जना करके वानरश्रेष्ठ हनुमान् को बड़े जोर से एक थप्पड़ मारा। लंका द्वारा इस प्रकार जोर से पीटे जाने पर उन परम पराक्रमी पवनकुमार कपिश्रेष्ठ हनुमान् ने बड़े जोर से सिंहनाद किया। फिर उन्होंने अपने बायें हाथ की अंगुलियों को मोड़कर मुट्ठी बाँध ली और अत्यन्त कुपित हो उस लंका को एक मुक्का जमा दिया। उसे स्त्री समझकर हनुमानजी ने स्वयं ही अधिक क्रोध नहीं किया। किंतु उस लघु प्रहार से ही उस निशाचरी के सारे अंग व्याकुल हो गये। वह सहसा पृथ्वी पर गिर पड़ी। उस समय उसका मुख बड़ा विकराल दिखायी देता था। अपने ही द्वारा गिरायी गयी उस लंका की ओर देखकर और उसे स्त्री समझकर तेजस्वी वीर हनुमान् को उस पर दया आ गयी। उन्होंने उस पर बड़ी कृपा की।
उधर अत्यन्त उद्विग्न हुई लंका उन वानरवीर हनुमान् से अभिमानशून्य गद्दवाणी में इस प्रकार बोली - महाबाहो ! प्रसन्न होइये। कपिश्रेष्ठ ! मेरी रक्षा कीजिये। सौम्य ! महाबली सत्त्वगुणशाली वीर पुरुष शास्त्र की मर्यादा पर स्थिर रहते हैं (शास्त्र में स्त्री को अवध्य बताया है, इसलिये आप मेरे प्राण न लीजिये)। महाबली वीर वानर ! मैं स्वयं लंकापुरी ही हूँ, आपने अपने पराक्रम से मुझे परास्त कर दिया है। वानरेश्वर! मैं आपसे एक सच्ची बात कहती हूँ। आप इसे सुनिये। साक्षात् स्वयम्भू ब्रह्माजी ने मुझे जैसा वरदान दिया था, वह बता रही हूँ।
‘उन्होंने कहा था - "जब कोई वानर तुझे अपने पराक्रम से वश में कर ले, तब तुझे यह समझ लेना चाहिये कि अब राक्षसों पर बड़ा भारी भय आ पहुँचा है।"
'सौम्य! आपका दर्शन पाकर आज मेरे सामने वही घड़ी आ गयी है। ब्रह्माजी ने जिस सत्य का निश्चय कर दिया है, उसमें कोई उलट-फेर नहीं हो सकता। अब सीता के कारण दुरात्मा राजा रावण तथा समस्त राक्षसों के विनाश का समय आ पहुँचा है। कपिश्रेष्ठ! अत: आप इस रावण पालित पुरी में प्रवेश कीजिये और यहाँ जो-जो कार्य करना चाहते हों, उन सबको पूर्ण कर लीजिये। वानरेश्वर! राक्षसराज रावण के द्वारा पालित यह सुन्दर पुरी अभिशाप से नष्टप्राय हो चुकी है। अत: इसमें प्रवेश करके आप स्वेच्छानुसार सुखपूर्वक सर्वत्र सती-साध्वी जनकनन्दिनी सीता की खोज कीजिये।
इच्छानुसार रूप धारण करने वाली श्रेष्ठ राक्षसी लंकापुरी को अपने पराक्रम से परास्त करके महातेजस्वी महाबली महान् सत्त्वशाली वानरशिरोमणि कपिकुञ्जर हनुमान् बिना दरवाजे के ही रात में चहारदीवारी फाँद गये और लंका के भीतर घुस गये। कपिराज सुग्रीव का हित करने वाले हनुमानजी ने इस तरह लंकापुरी में प्रवेश करके मानो शत्रुओं के सिर पर अपना बायाँ पैर रख दिया। सत्त्वगुण से सम्पन्न पवनपुत्र हनुमान् उस रात में परकोटे के भीतर प्रवेश करके बिखेरे गये फूलों से सुशोभित राजमार्ग का आश्रय ले उस रमणीय लंकापुरी की ओर चले। जैसे आकाश श्वेत बादलों से सुशोभित होता है, उसी प्रकार वह रमणीय पुरी अपने श्वेत मेघसदृश गृहों से उत्तम शोभा पा रही थी।
वे गृह अट्टहासजनित उत्कृष्ट शब्दों तथा वाद्यघोषों से मुखरित थे। उनमें वज्रों तथा अंकुशों के चित्र अङ्कित थे और हीरों के बने हुए झरोखे उनकी शोभा बढ़ाते थे। उस समय लंका श्वेत बादलों के समान सुन्दर एवं विचित्र राक्षस गृहों से प्रकाशित हो रही थी। उन गृहों में से कोई तो कमल के आकार में बने हुए थे। कोई स्वस्तिक चिह्न या आकार से युक्त थे और किन्हीं का निर्माण वर्धमानसंज्ञक गृहों के रूप में हुआ था। वे सभी सब ओर से सजाये गये थे।
वानरराज सुग्रीव का हित करने वाले श्रीमान् हनुमान् श्रीरघुनाथजी की कार्यसिद्धि के लिये विचित्र पुष्पमय आभरणों से अलंकृत लंका में विचरने लगे। उन्होंने उस पुरी को अच्छी तरह देखा और देखकर प्रसन्नता का अनुभव किया। उन कपिश्रेष्ठ ने जहाँ-तहाँ एक घर से दूसरे घर पर जाते हुए विविध आकार-प्रकार के भवन देखे तथा हृदय, कण्ठ और मूर्धा – इन तीन स्थानों से निकलने वाले मन्द, मध्यम और उच्च स्वर से विभूषित मनोहर गीत सुने। उन्होंने स्वर्गीय अप्सराओं के समान सुन्दरी तथा कामवेदना से पीड़ित कामिनियों की करधनी और पायजेबों की झनकार सुनी।
इसी तरह जहाँ-तहाँ महामनस्वी राक्षसों के घरों में सीढ़ियों पर चढ़ते समय स्त्रियों की काञ्ची और मंजीर की मधुर ध्वनि तथा पुरुषों के ताल ठोकने और गर्जने की भी आवाजें उन्हें सुनायी दीं। राक्षसों के घरों में बहुतों को तो उन्होंने वहाँ मन्त्र जपते हुए सुना और कितने ही निशाचरों को स्वाध्याय में तत्पर देखा। कई राक्षसों को उन्होंने रावण की स्तुति के साथ गर्जना करते और निशाचरों की एक बड़ी भीड़ को राजमार्ग रोककर खड़ी हुई देखा।
नगर के मध्यभाग में उन्हें रावण के बहुत-से गुप्तचर दिखायी दिये। उनमें कोई योग की दीक्षा लिये हुए, कोई जटा बढ़ाये, कोई मूड़ मुँड़ाये, कोई गोचर्म या मृगचर्म धारण किये और कोई नंग-धड़ंग थे। कोई मुट्ठीभर कुशों को ही अस्त्र- रूप से धारण किये हुए थे। किन्हीं का अग्निकुण्ड ही आयुध था। किन्हीं के हाथ में कूट या मुदर था। कोई डंडे को ही हथियार रूप में लिये हुए थे। किन्हीं के एक ही आँख थी तो किन्हीं के रूप बहुरंगे थे। कितनों के पेट और स्तन बहुत बड़े थे। कोई बड़े विकराल थे। किन्हीं के मुँह टेढ़े-मेढ़े थे। कोई विकट थे तो कोई बौने।
किन्हीं के पास धनुष, खड्ग, शतघ्नी और मूसलरूप आयुध थे। किन्हीं के हाथों में उत्तम परिघ विद्यमान थे और कोई विचित्र कवचों से प्रकाशित हो रहे थे। कुछ निशाचर न तो अधिक मोटे थे, न अधिक दुर्बल, न बहुत लंबे थे न अधिक छोटे, न बहुत गोरे थे न अधिक काले तथा न अधिक कुबड़े थे न विशेष बौने ही। कोई बड़े कुरूप थे, कोई अनेक प्रकार के रूप धारण कर सकते थे, किन्हीं का रूप सुन्दर था, कोई बड़े तेजस्वी थे तथा किन्हीं के पास ध्वजा, पताका और अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र थे। कोई शक्ति और वृक्ष रूप आयुध धारण किये देखे जाते थे तथा किन्हीं के पास पट्टिश, वज्र, गुलेल और पाश थे। महाकपि हनुमान् ने उन सबको देखा।
किन्हीं के गले में फूलों के हार थे और ललाट आदि अंग चन्दन से चर्चित थे। कोई श्रेष्ठ आभूषणों से सजे हुए थे। कितने ही नाना प्रकार के वेशभूषा से संयुक्त थे और बहुतेरे स्वेच्छानुसार विचरने वाले जान पड़ते थे। कितने ही राक्षस तीखे शूल तथा वज्र लिये हुए थे। वे सब के सब महान् बल से सम्पन्न थे। इनके सिवा कपिवर हनुमान् ने एक लाख रक्षक सेना को राक्षसराज रावण की आज्ञा से सावधान होकर नगर के मध्यभाग की रक्षा में संलग्न देखा। वे सारे सैनिक रावण के अन्त: पुर के अग्रभाग में स्थित थे।
रक्षक सेना के लिये जो विशाल भवन बना था, उसका फाटक बहुमूल्य सुवर्ण द्वारा निर्मित हुआ था। उस आरक्षाभवन को देखकर महाकपि हनुमानजी ने राक्षसराज रावण के सुप्रसिद्ध राजमहल पर दृष्टिपात किया, जो त्रिकूट पर्वत के एक शिखर पर प्रतिष्ठित था। वह सब ओर से श्वेत कमलों द्वारा अलंकृत खाइयों से घिरा हुआ था। उसके चारों ओर बहुत ऊँचा परकोटा था, जिसने उस राजभवन को घेर रखा था। वह दिव्य भवन स्वर्गलोक के समान मनोहर था और वहाँ संगीत आदि के दिव्य शब्द गूंज रहे थे।
घोड़ों की हिनहिनाहट की आवाज भी वहाँ सब ओर फैली हुई थी। आभूषणों की रुनझुन भी कानों में पड़ती रहती थी। नाना प्रकार के रथ, पालकी आदि सवारी, विमान, सुन्दर हाथी, घोड़े, श्वेत बादलों की घटा के समान दिखायी देने वाले चार दाँतों से युक्त सजे सजाये मतवाले हाथी तथा मदमत्त पशु-पक्षियों के संचरण से उस राजमहल का द्वार बड़ा सुन्दर दिखायी देता था। सहस्रों महापराक्रमी निशाचर राक्षसराज के उस महल की रक्षा करते थे। उस गुप्त भवन में भी कपिवर हनुमानजी जा पहुँचे।
तदनन्तर जिसके चारों ओर सुवर्ण एवं जाम्बूनद का परकोटा था, जिसका ऊपरी भाग बहुमूल्य मोती और मणियों से विभूषित था तथा अत्यन्त उत्तम काले अगुरु एवं चन्दन से जिसकी अर्चना की जाती थी, रावण के उस अन्तःपुर में हनुमानजी ने प्रवेश किया। चार शालाओं से युक्त गृह को, जिसके प्रत्येक दिशा में एक-एक करके चार द्वार हों, 'सर्वतोभद्र' कहते हैं। जिसमें तीन ही द्वार हों, पश्चिम दिशा की ओर द्वार न हो, उसका नाम 'नन्द्यावर्त' है। जिसमें दक्षिण के सिवा अन्य तीन दिशाओं में द्वार हों, उसे 'वर्धमान' गृह कहते हैं। वह धन देने वाला होता है तथा जिसमें केवल पूर्व दिशा की ओर द्वार न हो, उस गृह का नाम 'स्वस्तिक' है। वह पुत्र और धन देने वाला होता है।
