तदनन्तर राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण कबन्ध के बताये हुए पम्पासरोवर के मार्ग का आश्रय ले पश्चिम दिशा की ओर चल दिये। दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण पर्वतों पर फैले हुए बहुत-से वृक्षों को, जो फूल, फल और मधु से सम्पन्न थे, देखते हुए सुग्रीव से मिलने के लिये आगे बढ़े। रात में एक पर्वत-शिखर पर निवास करके रघुकुल का आनन्द बढ़ाने वाले वे दोनों रघुवंशी बन्धु पम्पासरोवर के पश्चिम तट पर जा पहुँचे। उसी के पास शबरी का आश्रम था।
शबरी का नाम 'श्रमणा' था। इनका संबंध भील समुदाय की शबर जाति से था। इनके पिता का नाम अज और मां का नाम इंदुमति था। इनके पिता भीलों के मुखिया थे। इनके पिता ने इनका विवाह एक भील कुमार से तय कर दिया। उस समय विवाह के अवसर पर जानवरों की बलि देने की प्रथा थी। इस प्रथा का भील कुमारी शबरी ने विरोध किया और इस प्रथा को समाप्त करने के उद्देश्य से उन्होंने विवाह नहीं किया। इस घटना के पश्चात वे वन में जाकर मतंग ऋषि के आश्रम में रहने लगीं। उनकी सेवा भाव से प्रसन्न होकर मतंग ऋषि ने कहा कि एक दिन भगवान राम स्वयं तुम्हारे पास आएंगे और तुम्हारा उद्धार करेंगे। बस, इस विश्वास के भरोसे शबरी प्रभु राम की प्रतीक्षा करने लगीं।
एक बार शबरी अपने आश्रम के पास ही एक तालाब पर पानी लेने गई। तभी एक ऋषि ने उसका अपमान करते हुए उसे तालाब से पानी भरने के लिए मना कर दिया। यहीं उन्होंने क्रोध में आकर शबरी को पत्थर मार दिया, जिसकी चोट से खून बहने लगा। उस खून की एक बूंद तालाब में गिर गई। इससे पूरे तालाब का पानी लाल रंग का हो गया। इसके लिए भी ऋषि ने शबरी को ही दोषी ठहराया।
इसके बाद कई बार सभी ऋषियों ने प्रयास किए कि तालाब का पानी पहले जैसा हो जाए किंतु उनके सभी प्रयास व्यर्थ हुए। इस घटना के कई वर्ष पश्चात जब राम, लक्ष्मण के साथ सीता को खोजते हुए वहां आए तो उन्हें भी इस घटना का पता चला। राम के पैर डालने पर भी तालाब का पानी साफ नहीं हुआ, तब उन्होंने ऋषियों से वहां शबरी को लाने के लिए कहा। शबरी जब तालाब के पास पहुंचती है तो उसकी ठोकर से कुछ धूल उस तालाब में गिर जाती है और देखते-ही-देखते तालाब का पानी पहले की तरह साफ हो जाता है।
पम्पा नामक पुष्करिणी के पश्चिम तट पर पहुँचकर उन दोनों भाइयों (श्रीराम और लक्ष्मण) ने वहाँ शबरी का रमणीय आश्रम देखा। उसकी शोभा निहारते हुए वे दोनों भाई बहुसंख्यक वृक्षों से घिरे हुए उस सुरम्य आश्रम पर जाकर शबरी से मिले।
शबरी सिद्ध तपस्विनी थी। उन दोनों भाइयों को आश्रम पर आया देख वह हाथ जोड़कर खड़ी हो गयी तथा उसने बुद्धिमान् श्रीराम और लक्ष्मण के चरणों में प्रणाम किया। फिर पाद्य, अर्घ्य और आचमनीय आदि सब सामग्री समर्पित की और विधिवत् उनका सत्कार किया। उन्होंने अत्यंत रसीले और स्वादिष्ट (अपने मुख से चखकर रखे हुए बेर) कन्द, मूल और फल लाकर श्री रामजी को दिए। प्रभु ने बार-बार प्रशंसा करके उन्हें प्रेम सहित खाया।
(जब श्रीराम, भक्ति में डूबी शबरी के जूठे बेर खा रहे थे तो बीच-बीच में वे लक्ष्मण को भी बेर खाने को दे रहे थे। लेकिन लक्ष्मण ने श्रीराम द्वारा दिए गए शबरी के जूठे बेर नहीं खाए और फेंक दिए। जब राम ने यह देखा तो उन्हें यह भक्त शबरी का अपमान लगा। उन्होंने लक्ष्मण से कहा कि जिस शबरी की भक्ति का अनादर करते हुए, वह बेर फेंक रहे हैं, वही बेर एक दिन संकट के समय उनके प्राण बचाएंगे। श्रीराम-रावण युद्ध के समय जब लक्ष्मण मेघनाद की शक्ति से मूर्छित हुए थे, तब इन्हीं बेरों ने मृत संजीवनी के रूप में लक्ष्मण को पुनर्जीवन दिया था।)
तत्पश्चात् श्रीरामचन्द्रजी उस धर्मपरायणा तपस्विनी से बोले – तपोधने! क्या तुमने सारे विघ्नों पर विजय पा ली? क्या तुम्हारी तपस्या बढ़ रही है? क्या तुमने क्रोध और आहार को काबू कर लिया है? तुमने जिन नियमों को स्वीकार किया है, वे निभ तो जाते हैं न? तुम्हारे मन में सुख और शान्ति है न? चारुभाषिणि! तुमने जो गुरुजनों की सेवा की है, वह पूर्णरूप से सफल हो गयी है न?
श्रीरामचन्द्रजी के इस प्रकार पूछने पर वह सिद्ध तपस्विनी बूढ़ी शबरी, जो सिद्धों के द्वारा सम्मानित थी, उनके सामने खड़ी होकर बोली - रघुनन्दन! आज आपका दर्शन मिलने से ही मुझे अपनी तपस्या में सिद्धि प्राप्त हुई है। आज मेरा जन्म सफल हुआ और गुरुजनों की उत्तम पूजा भी सार्थक हो गयी। पुरुषप्रवर श्रीराम! आप देवेश्वर का यहाँ सत्कार हुआ, इससे मेरी तपस्या सफल हो गयी और अब मुझे आपके दिव्य धाम की प्राप्ति भी होगी ही। मैं किस प्रकार आपकी स्तुति करूँ? मैं नीच जाति की और अत्यंत मूढ़ बुद्धि हूँ। जो अधम से भी अधम हैं, स्त्रियाँ उनमें भी अत्यंत अधम हैं, और उनमें भी हे पापनाशन! मैं मंदबुद्धि हूँ।
श्री रघुनाथजी ने कहा - हे भामिनि! मेरी बात सुन! मैं तो केवल एक भक्ति ही का संबंध मानता हूँ। जाति, पाँति, कुल, धर्म, बड़ाई, धन, बल, कुटुम्ब, गुण और चतुरता- इन सबके होने पर भी भक्ति से रहित मनुष्य कैसा लगता है, जैसे जलहीन बादल (शोभाहीन) दिखाई पड़ता है।
'सौम्य! मानद! आपकी सौम्य दृष्टि पड़ने से मैं परम पवित्र हो गयी। शत्रुदमन! आपके प्रसाद से ही अब मैं अक्षय लोकों में जाऊँगी। जब आप चित्रकूट पर्वत पर पधारे थे, उसी समय मेरे गुरुजन, जिनकी मैं सदा सेवा किया करती थी, अतुल कान्तिमान् विमान पर बैठकर यहाँ से दिव्यलोक को चले गये। उन धर्मज्ञ महाभाग महर्षियों ने जाते समय मुझसे कहा था कि तेरे इस परम पवित्र आश्रम पर श्रीरामचन्द्रजी पधारेंगे और लक्ष्मण के साथ तेरे अतिथि होंगे। तुम उनका यथावत् सत्कार करना। उनका दर्शन करके तू श्रेष्ठ एवं अक्षय लोकों में जायगी।'
‘पुरुषप्रवर! उन महाभाग महात्माओं ने मुझसे उस समय ऐसी बात कही थी। अतः पुरुषसिंह! मैंने आपके लिये पम्पातट पर उत्पन्न होने वाले नाना प्रकार के जंगली फल- मूलों का संचय किया है।'
शबरी (जाति वर्णबाह्य होने पर भी) विज्ञान में बहिष्कृत नहीं थी। उसे परमात्मा के तत्त्व का नित्य ज्ञान प्राप्त था।
उसकी पूर्वोक्त बातें सुनकर धर्मात्मा श्रीराम ने उससे कहा - तपोधने! मैंने कबन्ध के मुख से तुम्हारे महात्मा गुरुजनों का यथार्थ प्रभाव सुना है। यदि तुम स्वीकार करो तो मैं उनके उस प्रभाव को प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ।
श्रीराम के मुख से निकले हुए इस वचन को सुनकर शबरी ने उन दोनों भाइयों को उस महान् वन का दर्शन कराते हुए कहा - रघुनन्दन! मेघों की घटा के समान श्याम और नाना प्रकार के पशु-पक्षियों से भरे हुए इस वन की ओर दृष्टिपात कीजिये। यह मतंग वन के नाम से ही विख्यात है। महातेजस्वी श्रीराम! यहीं वे मेरे भावितात्मा (शुद्ध अन्तःकरण वाले एवं परमात्मचिन्तन परायण) गुरुजन निवास करते थे। इसी स्थान पर उन्होंने गायत्री मन्त्र के जप से विशुद्ध हुए अपने देह रूपी पञ्जर को मन्त्रोच्चारण-पूर्वक अग्नि में होम दिया था।
‘यह प्रत्यक्स्थली नामवाली वेदी है, जहाँ मेरे द्वारा भलीभाँति पूजित हुए वे महर्षि वृद्धावस्था के कारण श्रम से काँपते हुए हाथों द्वारा देवताओं को फूलों की बलि चढ़ाया करते थे। रघुवंशशिरोमणे! देखिये, उनकी तपस्या के प्रभाव से आज भी यह वेदी अपने तेज के द्वारा सम्पूर्ण दिशाओं को प्रकाशित कर रही है। इस समय भी इसकी प्रभा अतुलनीय है। उपवास करने से दुर्बल होने के कारण जब वे चलने-फिरने में असमर्थ हो गये, तब उनके चिन्तनमात्र से वहाँ सात समुद्रों का जल प्रकट हो गया। वह सप्तसागर तीर्थ आज भी मौजूद है। उसमें सातों समुद्रों के जल मिले हुए हैं, उसे चलकर देखिये।'
‘रघुनन्दन! उसमें स्नान करके उन्होंने वृक्षों पर जो वल्कल वस्त्र फैला दिये थे, वे इस प्रदेश में अब तक सूखे नहीं हैं। देवताओं की पूजा करते हुए मेरे गुरुजनों ने कमलों के साथ अन्य फूलों की जो मालाएँ बनायी थीं, वे आज भी मुरझायी नहीं हैं। भगवन्! आपने सारा वन देख लिया और यहाँ के सम्बन्ध में जो बातें सुनने योग्य थीं, वे भी सुन लीं। अब मैं आपकी आज्ञा लेकर इस देह का परित्याग करना चाहती हूँ। जिनका यह आश्रम है और जिनके चरणों की मैं दासी रही हूँ, उन्हीं पवित्रात्मा महर्षियों के समीप अब मैं जाना चाहती हूँ।'
शबरी के धर्मयुक्त वचन सुनकर लक्ष्मण सहित श्रीराम को अनुपम प्रसन्नता प्राप्त हुई। उनके मुँह से निकल पड़ा, 'आश्चर्य है !'
श्रीरघुनाथजी ने कहा - मैं तुझसे अब अपनी नवधा भक्ति कहता हूँ। तू सावधान होकर सुन और मन में धारण कर। पहली भक्ति है संतों का सत्संग। दूसरी भक्ति है मेरे कथा प्रसंग में प्रेम। तीसरी भक्ति है अभिमानरहित होकर गुरु के चरण कमलों की सेवा और चौथी भक्ति यह है कि कपट छोड़कर मेरे गुण समूहों का गान करें।
'मेरे (राम) मंत्र का जाप और मुझमें दृढ़ विश्वास- यह पाँचवीं भक्ति है, जो वेदों में प्रसिद्ध है। छठी भक्ति है इंद्रियों का निग्रह, शील (अच्छा स्वभाव या चरित्र), बहुत कार्यों से वैराग्य और निरंतर संत पुरुषों के धर्म (आचरण) में लगे रहना। सातवीं भक्ति है जगत् भर को समभाव से मुझमें ओतप्रोत (राममय) देखना और संतों को मुझसे भी अधिक करके मानना। आठवीं भक्ति है जो कुछ मिल जाए, उसी में संतोष करना और स्वप्न में भी पराए दोषों को न देखना।'
'नवीं भक्ति है सरलता और सबके साथ कपटरहित बर्ताव करना, हृदय में मेरा भरोसा रखना और किसी भी अवस्था में हर्ष और दैन्य (विषाद) का न होना। इन नवों में से जिनके एक भी होती है, वह स्त्री-पुरुष, जड़-चेतन कोई भी हो-हे भामिनि! मुझे वही अत्यंत प्रिय है। फिर तुझ में तो सभी प्रकार की भक्ति दृढ़ है। अतएव जो गति योगियों को भी दुर्लभ है, वही आज तेरे लिए सुलभ हो गई है। मेरे दर्शन का परम अनुपम फल यह है कि जीव अपने सहज स्वरूप को प्राप्त हो जाता है। हे भामिनि! अब यदि तू गजगामिनी जानकी की कुछ खबर जानती हो तो बता।'
शबरी ने कहा - हे रघुनाथजी! आप पंपा नामक सरोवर को जाइए। वहाँ आपकी सुग्रीव से मित्रता होगी। हे देव! हे रघुवीर! वह सब हाल बतावेगा। वहीँ आपकी सहायता करेगा। उन्ही में आपका परम भक्त हनुमान भी है। यदि आप हनुमान से मिलें तो वह आपको सुग्रीव से भी मिला देगा। हे धीरबुद्धि! आप सब जानते हुए भी मुझसे पूछते हैं।
तदनन्तर श्रीराम ने कठोर व्रत का पालन करने वाली शबरी से कहा - भद्रे ! तुमने मेरा बड़ा सत्कार किया। अब तुम अपनी इच्छा के अनुसार आनन्द पूर्वक अभीष्ट लोक की यात्रा करो।
श्रीरामचन्द्रजी के इस प्रकार आज्ञा देने पर मस्तक पर जटा और शरीर पर चीर एवं काला मृगचर्म धारण करने वाली शबरी ने अपने को आग में होम कर प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी शरीर प्राप्त किया। वह दिव्य वस्त्र, दिव्य आभूषण, दिव्य फूलों की माला और दिव्य अनुलेपन धारण किये बड़ी मनोहर दिखायी देने लगी तथा सुदाम पर्वत पर प्रकट होने वाली बिजली के समान उस प्रदेश को प्रकाशित करती हुई स्वर्ग (साकेत) लोक को ही चली गयी। उसने अपने चित्त को एकाग्र करके उस पुण्यधाम की यात्रा की, जहाँ उसके वे गुरुजन पुण्यात्मा महर्षि विहार करते थे।
