भाग-६६(66) श्रीराम और लक्ष्मण के द्वारा चिता की आग में कबन्ध का दाह तथा उसका दिव्य रूप में प्रकट होकर उन्हें सुग्रीव से मित्रता करने के लिये कहना

 


कबन्ध के ऐसा कहने पर उन दोनों वीर नरेश्वर श्रीराम और लक्ष्मण ने उसके शरीर को एक पर्वत के गड्ढे में डालकर उसमें आग लगा दी। लक्ष्मण ने जलती हुई बड़ी-बड़ी लकड़ियों के द्वारा चारों ओर से उसकी चिता में आग लगायी; फिर तो वह सब ओर से प्रज्वलित हो उठी। चिता में जलते हुए कबन्ध का विशाल शरीर चर्बियों से भरा होने के कारण घी के लोदे के समान प्रतीत होता था। चिता की आग उसे धीरे-धीरे जलाने लगी। 

तदनन्तर वह महाबली कबन्ध तुरंत ही चिता को हिलाकर दो निर्मल वस्त्र और दिव्य पुष्पों का हार धारण किये धूमरहित अग्नि के समान उठ खड़ा हुआ। फिर वेगपूर्वक चिता से ऊपर को उठा और शीघ्र ही एक तेजस्वी विमान पर जा बैठा। निर्मल वस्त्रों से विभूषित हो वह बड़ा तेजस्वी दिखायी देता था। उसके मन में हर्ष भरा हुआ था तथा समस्त अङ्ग-प्रत्यङ्ग में दिव्य आभूषण शोभा दे रहे थे। 

हंसों से जुते हुए उस यशस्वी विमान पर बैठा हुआ महान् तेजस्वी कबन्ध अपनी प्रभा से दसों दिशाओं को प्रकाशित करने लगा और अन्तरिक्ष में स्थित हो श्रीराम से इस प्रकार बोला –  रघुनन्दन! आप जिस प्रकार सीता को पा सकेंगे, वह ठीक-ठीक बता रहा हूँ, सुनिये। श्रीराम ! लोक में छ: युक्तियाँ हैं, जिनसे राजाओं द्वारा सब कुछ प्राप्त किया जाता है (उन युक्तियों तथा उपायों के नाम हैं— संधि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और समाश्रय)। जो मनुष्य दुर्दशा से ग्रस्त होता है, वह दूसरे किसी दुर्दशाग्रस्त पुरुष से ही सेवा या सहायता प्राप्त करता है (यह नीति है )। 

'श्रीराम ! लक्ष्मण सहित आप बुरी दशा के शिकार हो रहे हैं; इसीलिये आपलोग राज्य से वञ्चित हैं तथा उस बुरी दशा के कारण ही आपको अपनी भार्या के अपहरण का महान् दुःख प्राप्त हुआ है। अत: सुहृदों में श्रेष्ठ रघुनन्दन ! आप अवश्य ही उस पुरुष को अपना सुहृद् बनाइये, जो आपकी ही भाँति दुर्दशा में पड़ा हुआ हो (इस प्रकार आप सुहृद का आश्रय लेकर समाश्रय नीति को अपनाइये )। मैं बहुत सोचने पर भी ऐसा किये बिना आपकी सफलता नहीं देखता हूँ।, 

‘श्रीराम! सुनिये, मैं ऐसे पुरुष का परिचय दे रहा हूँ, उनका नाम है सुग्रीव। वे जाति के वानर हैं। उन्हें उनके भाई इन्द्रकुमार वाली ने कुपित होकर घर से निकाल दिया है। वे मनस्वी वीर सुग्रीव इस समय चार वानरों के साथ उस गिरिवर ऋष्यमूक पर निवास करते हैं, जो पम्पासरोवर तक फैला हुआ है। वे वानरों के राजा महापराक्रमी सुग्रीव तेजस्वी, अत्यन्त कान्तिमान्, सत्यप्रतिज्ञ, विनयशील, धैर्यवान्, बुद्धिमान्, महापुरुष, कार्यदक्ष, निर्भीक, दीप्तिमान् तथा महान् बल और पराक्रम से सम्पन्न हैं।' 

'वीर श्रीराम ! उनके महामना भाई वाली ने सारे राज्य को अपने अधिकार में कर लेने के लिये उन्हें राज्य से बाहर निकाल दिया है; अतः वे सीता  की खोज के लिये आपके सहायक और मित्र होंगे। इसलिये आप अपने मन को शोक में न डालिये। इक्ष्वाकुवंशी वीरों में श्रेष्ठ श्रीराम ! जो होनहार है, उसे कोई भी पलट नहीं सकता। काल का विधान सभी के लिये दुर्लङ्घ्य होता है (अत: आप पर जो कुछ भी बीत रहा है, इसे काल या प्रारब्ध का विधान समझकर आपको धैर्य धारण करना चाहिये)।' 

‘वीर रघुनाथजी! आप यहाँ से शीघ्र ही महाबली सुग्रीव के पास जाइये और जाकर तुरंत उन्हें अपना मित्र बना लीजिये। प्रज्वलित अग्नि को साक्षी बनाकर परस्पर द्रोह न करने के लिये मैत्री स्थापित कीजिये और ऐसा करने के बाद आपको कभी उन वानरराज सुग्रीव का अपमान नहीं करना चाहिये। वे इच्छानुसार रूप धारण करने वाले, पराक्रमी और कृतज्ञ हैं तथा इस समय स्वयं ही अपने लिये एक सहायक ढूँढ़ रहे हैं। उनका जो अभीष्ट कार्य है उसे सिद्ध करने में आप दोनों भाई समर्थ हैं।' 

'सुग्रीव का मनोरथ पूर्ण हो या न हो, वे आपका कार्य अवश्य सिद्ध करेंगे। वे ऋक्षरजा के क्षेत्रज पुत्र हैं और वाली से शङ्कित रहकर पम्पासरोवर के तट पर भ्रमण करते हैं। उन्हें सूर्यदेव का औरस पुत्र कहा गया है। उन्होंने वाली का अपराध किया है (इसीलिये वे उससे डरते हैं)। रघुनन्दन! अग्नि के समीप हथियार रखकर शीघ्र ही सत्य की शपथ खाकर ऋष्यमूकनिवासी वनचारी वानर सुग्रीव को आप अपना मित्र बना लीजिये। कपिश्रेष्ठ सुग्रीव संसार में नरमांसभक्षी राक्षसों के जितने स्थान हैं, उन सबको पूर्णरूप से निपुणतापूर्वक जानते हैं।' 

‘रघुनन्दन! शत्रुदमन! सहस्रों किरणों वाले सूर्यदेव जहाँ तक तपते हैं, वहाँ तक संसार में कोई ऐसा स्थान या वस्तु नहीं है, जो सुग्रीव के लिये अज्ञात हो। वे वानरों के साथ रहकर समस्त नदियों, बड़े-बड़े पर्वतों, पहाड़ी दुर्गम स्थानों और कन्दराओं में भी खोज कराकर आपकी पत्नी का पता लगा लेंगे। राघव! वे आपके वियोग में शोक करती हुई सीता की खोजके लिये सम्पूर्ण दिशाओं में विशालकाय वानरों को भेजेंगे, तथा रावण के घर से भी सुन्दर अङ्गों वाली मिथिलेशकुमारी को ढूंढ निकालेंगे। आपकी प्रिया सती-साध्वी सीता मेरुशिखर के अग्रभाग पर पहुँचायी गयी हों या पाताल में प्रवेश करके रखी गयी हों, वानरशिरोमणि सुग्रीव समस्त राक्षसों का वध करके उन्हें पुन: आपके पास ला देंगे। 

इति श्रीमद् राम कथा अरण्यकाण्ड अध्याय-७ का भाग-६६(66) समाप्त ! 

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