भाग-६५(65) श्रीराम और लक्ष्मण का परस्पर विचार करके कबन्ध की दोनों भुजाओं को काट डालना, कबन्ध की आत्मकथा, अपने शरीर का दाह हो जाने पर उसका श्रीराम को सीता के अन्वेषण में सहायता देने का आश्वासन

 



अपने बाहुपाश से घिरकर वहाँ खड़े हुए उन दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण की ओर देखकर कबन्ध ने कहा - क्षत्रियशिरोमणि राजकुमारो ! मुझे भूख से पीड़ित देखकर भी खड़े क्यों हो? (मेरे मुँह में चले आओ) क्योंकि दैव ने मेरे भोजन के लिये ही तुम्हें यहाँ भेजा है। इसीलिये तुम दोनों की बुद्धि मारी गयी है। 

यह सुनकर पीड़ित हुए लक्ष्मण ने उस समय पराक्रम का ही निश्चय करके यह समयोचित एवं हितकर बात कही - भैया! यह नीच राक्षस मुझको और आपको तुरंत मुँह में ले ले, इसके पहले ही हमलोग अपनी तलवारों से इसकी बड़ी-बड़ी बाँहें शीघ्र ही काट डालें। यह महाकाय राक्षस बड़ा भीषण है। इसकी भुजाओं में ही इसका सारा बल और पराक्रम निहित है। यह समस्त संसार को सर्वथा पराजित-सा करके अब हमलोगों को भी यहाँ मार डालना चाहता है। राजन्! रघुनन्दन! यज्ञ में लाये गये पशुओं के समान निश्चेष्ट प्राणियों का वध राजा के लिये निन्दित बताया गया है (इसलिये हमें इसके प्राण नहीं लेने चाहिये, केवल भुजाओं का ही उच्छेद कर देना चाहिये)। 

उन दोनों की यह बातचीत सुनकर उस राक्षस को बड़ा क्रोध हुआ और वह अपना भयंकर मुख फैलाकर उन्हें खा जाने को उद्यत हो गया। इतने में ही देशकाल (अवसर) का ज्ञान रखने वाले उन दोनों रघुवंशी राजकुमारों ने अत्यन्त हर्ष में भरकर तलवारों से ही उसकी दोनों भुजाएँ कंधों से काट गिरायीं। भगवान् श्रीराम उसके दाहिने भाग में खड़े थे। उन्होंने अपनी तलवार से उसकी दाहिनी बाँह बिना किसी रुकावट के वेगपूर्वक काट डाली तथा वाम भाग में खड़े वीर लक्ष्मण ने उसकी बायीं भुजा को तलवार से उड़ा दिया। भुजाएँ कट जाने पर वह महाबाहु राक्षस मेघ के समान गम्भीर गर्जना करके पृथ्वी, आकाश तथा दिशाओं को जाता हुआ धरती पर गिर पड़ा। 

अपनी भुजाओं को कटी हुई देख खून से लथपथ हुए उस दानव ने दीन वाणी में पूछा - वीरो ! तुम दोनों कौन हो?

कबन्ध के इस प्रकार पूछने पर शुभ लक्षणों वाले महाबली लक्ष्मण ने उसे श्रीरामचन्द्रजी का परिचय देना आरम्भ किया - ये इक्ष्वाकुवंशी महाराज दशरथ के पुत्र हैं और लोगों में श्रीराम नाम से विख्यात हैं। मुझे इन्हीं का छोटा भाई समझो। मेरा नाम लक्ष्मण है। माता कैकेयी के द्वारा जब इनका राज्याभिषेक रोक दिया गया, तब ये पिता की आज्ञा से वन में चले आये और मेरे तथा अपनी पत्नी के साथ इस विशाल वन में विचरण करने लगे। इस निर्जन वन में रहते हुए इन देवतुल्य प्रभावशाली श्रीरघुनाथजी की पत्नी को किसी राक्षस ने हर लिया है। उन्हीं का पता लगाने की इच्छा से हमलोग यहाँ आये हैं। तुम कौन हो? और कबन्ध के समान रूप धारण करके क्यों इस वन में पड़े हो? छाती के नीचे चमकता हुआ मुँह और टूटी हुई जंघा (पिण्डली) लिये तुम किस कारण इधर-उधर लुढ़कते फिरते हो? 

लक्ष्मण के ऐसा कहने पर कबन्ध को इन्द्र की कही हुई बात का स्मरण हो आया। अत: उसने बड़ी प्रसन्नता के साथ लक्ष्मण को उनकी बात का उत्तर दिया - पुरुषसिंह वीरो! आप दोनों का स्वागत है। बड़े भाग्य से मुझे आप लोगों का दर्शन मिला है। ये मेरी दोनों भुजाएँ मेरे लिये भारी बन्धन थीं। सौभाग्य की बात है कि आप लोगों ने इन्हें काट डाला। नरश्रेष्ठ श्रीराम ! मुझे जो ऐसा कुरूप रूप प्राप्त हुआ है, यह मेरी ही उद्दण्डता का फल है। यह सब कैसे हुआ, वह प्रसङ्ग आपको मैं ठीक-ठीक बता रहा हूँ। आप मुझसे सुनें। 

‘महाबाहु श्रीराम! पूर्वकाल में मेरा रूप महान् बलपराक्रम से सम्पन्न, अचिन्त्य तथा तीनों लोकों में विख्यात था। सूर्य, चन्द्रमा और इन्द्र का शरीर जैसा तेजस्वी है, वैसा ही मेरा भी था। ऐसा होने पर भी मैं लोगों को भयभीत करने वाले इस अत्यन्त भयंकर राक्षस रूप को धारण करके इधर-उधर घूमता और वन में रहने वाले ऋषियों को डराया करता था। अपने इस बर्ताव से एक दिन मैंने स्थूलशिरा नामक महर्षि को कुपित कर दिया। वे नाना प्रकार के जंगली फल- मूल आदि का संचय कर रहे थे, उसी समय मैंने उन्हें इस राक्षस रूप से डरा दिया।' 

'मुझे ऐसे विकट रूप में देखकर उन्होंने घोर शाप देते हुए कहा - “दुरात्मन्! आज से सदा के लिये तुम्हारा यही क्रूर और निन्दित रूप रह जाय।" यह सुनकर मैंने उन कुपित महर्षि से प्रार्थना की - ‘भगवन्! इस अभिशाप (तिरस्कार ) जनित शाप का अन्त होना चाहिये।' 

'तब उन्होंने इस प्रकार कहा – "जब श्रीराम और लक्ष्मण तुम्हारी दोनों भुजाएँ काटकर तुम्हें निर्जन वन में जलायेंगे, तब तुम पुन: अपने उसी परम उत्तम, सुन्दर और शोभा सम्पन्न रूप को प्राप्त कर लोगे।" 

'लक्ष्मण ! इस प्रकार तुम मुझे एक दुराचारी दानव समझो। मेरा जो यह ऐसा रूप है, यह समराङ्गण में इन्द्र के क्रोध से प्राप्त हुआ है। मैंने पूर्वकाल में राक्षस होने के पश्चात् घोर तपस्या करके पितामह ब्रह्माजी को संतुष्ट किया और उन्होंने मुझे दीर्घजीवी होने का वर दिया। इससे मेरी बुद्धि में यह भ्रम या अहंकार उत्पन्न हो गया कि मुझे तो दीर्घकाल तक बनी रहनेवाली आयु प्राप्त हुई है; फिर इन्द्र मेरा क्या कर लेंगे?' 

‘ऐसे विचार का आश्रय लेकर एक दिन मैंने युद्ध में देवराज पर आक्रमण किया। उस समय इन्द्र ने मुझ पर सौ धारों वाले वज्र का प्रहार किया। उनके छोड़े हुए उस वज्र से मेरी जाँघें और मस्तक मेरे ही शरीर में घुस गये। मैंने बहुत प्रार्थना की, इसलिये उन्होंने मुझे यमलोक नहीं पठाया और कहा - "पितामह ब्रह्माजी ने जो तुम्हें दीर्घजीवी होने के लिये वरदान दिया है, वह सत्य हो।" 

'तब मैंने कहा - देवराज! आपने अपने वज्र की मार से मेरी जाँघें, मस्तक और मुँह सभी तोड़ डाले। अब मैं कैसे आहार ग्रहण करूँगा और निराहार रहकर किस प्रकार सुदीर्घकाल तक जीवित रह सकूँगा?' 

‘मेरे ऐसा कहने पर इन्द्र ने मेरी भुजाएँ एक-एक योजन लंबी कर दीं एवं तत्काल ही मेरे पेट में तीखे दाढ़ों वाला एक मुख बना दिया। इस प्रकार मैं विशाल भुजाओं द्वारा वन में रहने वाले सिंह, चीते, हिरण और बाघ आदि जन्तुओं को सब ओर से समेटकर खाया करता था। इन्द्र ने मुझे यह भी बतला दिया था कि जब लक्ष्मण सहित श्रीराम तुम्हारी भुजाएँ काट देंगे, उस समय तुम स्वर्ग में जाओगे।' 

‘तात! राजशिरोमणे! इस शरीर से इस वन के भीतर मैं जो-जो वस्तु देखता हूँ, वह सब ग्रहण कर लेना मुझे ठीक लगता है। इन्द्र तथा मुनि के कथनानुसार मुझे यह विश्वास था कि एक दिन श्रीराम अवश्य मेरी पकड़ में आ जायँगे। इसी विचार को सामने रखकर मैं इस शरीर को त्याग देने के लिये प्रयत्नशील था।' 

‘रघुनन्दन! अवश्य ही आप श्रीराम हैं। आपका कल्याण हो। मैं आपके सिवा दूसरे किसी से नहीं मारा जा सकता था। यह बात महर्षि ने ठीक ही कही थी। नरश्रेष्ठ! आप दोनों जब अग्नि के द्वारा मेरा दाह-संस्कार कर देंगे, उस समय मैं आपकी बौद्धिक सहायता करूँगा। आप दोनों के लिये एक अच्छे मित्र का पता बताऊँगा।' 

उस दानव के ऐसा कहने पर धर्मात्मा श्रीरामचन्द्रजी ने लक्ष्मण के सामने उससे यह बात कही - कबन्ध ! मेरी यशस्विनी भार्या सीता को रावण हर ले गया है। उस समय मैं अपने भाई लक्ष्मण के साथ सुखपूर्वक जनस्थान के बाहर चला गया था। मैं उस राक्षस का नाममात्र जानता हूँ। उसकी शकल - सूरत से परिचित नहीं हूँ। वह कहाँ रहता है और कैसा उसका प्रभाव है, इस बात से हम लोग सर्वथा अनभिज्ञ हैं। इस समय सीता का शोक हमें बड़ी पीड़ा दे रहा है। हम असहाय होकर इसी तरह सब ओर दौड़ रहे हैं। तुम हमारे ऊपर समुचित करुणा करने के लिये इस विषय में हमारा कुछ उपकार करो। 

'वीर! फिर हमलोग हाथियों द्वारा तोड़े गये सूखे काठ लाकर स्वयं खोदे हुए एक बहुत बड़े गड्ढे में तुम्हारे शरीर को रखकर जला देंगे। अत: अब तुम हमें सीता का पता बताओ। इस समय वह कहाँ है? तथा उसे कौन कहाँ ले गया है? यदि ठीक- ठीक जानते हो तो सीता का समाचार बताकर हमारा अत्यन्त कल्याण करो।' 

श्रीरामचन्द्रजी के ऐसा कहने पर बातचीत में कुशल उस दानव ने उन प्रवचनपटु रघुनाथजी से यह परम उत्तम बात कही - श्रीराम! इस समय मुझे दिव्य ज्ञान नहीं है, इसलिये मैं मिथिलेशकुमारी के विषय में कुछ भी नहीं जानता। जब मेरे इस शरीर का दाह हो जायगा, तब मैं अपने पूर्व स्वरूप को प्राप्त होकर किसी ऐसे व्यक्ति का पता बता सकूँगा, जो सीता के विषय में आपको कुछ बतायेगा तथा जो उस उत्कृष्ट राक्षस को भी जानता होगा, ऐसे पुरुष का आपको परिचय दूँगा। 

‘प्रभो! जब तक मेरे इस शरीर का दाह नहीं होगा तब तक मुझमें यह जानने की शक्ति नहीं आ सकती कि वह महापराक्रमी राक्षस कौन है, जिसने आपकी सीता का अपहरण किया है। रघुनन्दन! शाप-दोष के कारण मेरा महान् विज्ञान नष्ट हो गया है। अपनी ही करतूत से मुझे यह लोकनिन्दित रूप प्राप्त हुआ है। किंतु श्रीराम ! जब तक सूर्यदेव अपने वाहनों के थक जाने पर अस्त नहीं हो जाते, तभी तक मुझे गड्ढे में डालकर शास्त्रीय विधि के अनुसार मेरा दाह-संस्कार कर दीजिये।' 

‘महावीर रघुनन्दन! आपके द्वारा विधिपूर्वक गड्ढे में मेरे शरीर का दाह हो जाने पर मैं ऐसे महापुरुष का परिचय दूँगा, जो उस राक्षस को जानते होंगे। शीघ्र पराक्रम प्रकट करने वाले वीर रघुनाथजी ! न्यायोचित आचार वाले उन महापुरुष के साथ आपको मित्रता कर लेनी चाहिये। वे आपकी सहायता करेंगे। रघुनन्दन! उनके लिये तीनों लोकों में कुछ भी अज्ञात नहीं है; क्योंकि किसी कारणवश वे पहले समस्त लोकों में चक्कर लगा चुके हैं। 

इति श्रीमद् राम कथा अरण्यकाण्ड अध्याय-७ का भाग-६५(65) समाप्त ! 

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