भाग-६२(62) लक्ष्मण का श्रीराम को समझा-बुझाकर शान्त करना

 


सीताहरण के शोक से पीड़ित हुए श्रीराम जब उस समय संतप्त हो प्रलयकालिक अग्नि के समान समस्त लोकों का संहार करने को उद्यत हो गये और धनुष की डोरी चढ़ाकर बारंबार उसकी ओर देखने लगे तथा लंबी साँस खींचने लगे, साथ ही कल्पान्तकाल में रुद्रदेव की भाँति समस्त संसार को दग्ध कर देने की इच्छा करने लगे।  

तब जिन्हें इस रूप में पहले कभी देखा नहीं गया था, उन अत्यन्त कुपित हुए श्रीराम की ओर देखकर लक्ष्मण हाथ जोड़ सूखे हुए मुँह से इस प्रकार बोले – आर्य! आप पहले कोमल स्वभाव से युक्त, जितेन्द्रिय और समस्त प्राणियों के हित में तत्पर रहे हैं। अब क्रोध के वशीभूत होकर अपनी प्रकृति (स्वभाव) का परित्याग न करें। चन्द्रमा में शोभा, सूर्य में प्रभा, वायु में गति और पृथ्वी में क्षमा जैसे नित्य विराजमान रहती है, उसी प्रकार आपमें सर्वोत्तम यश सदा प्रकाशित होता है 

‘आप किसी एक के अपराध से समस्त लोकों का संहार न करें। मैं यह जानने की चेष्टा करता हूँ कि यह टूटा हुआ युद्धोपयोगी रथ किसका है। अथवा किसने किस उद्देश्य से जूए तथा अन्य उपकरणों सहित इस रथ को तोड़ा है? इसका भी पता लगाना है। राजकुमार! यह स्थान खून की बूँदों से सिंच उठा है। इससे सिद्ध होता है कि यहाँ बड़ा भयंकर संग्राम हुआ था, परंतु यह संग्राम-चिह्न किसी एक ही रथी का है, दो का नहीं।' 'वक्ताओं में श्रेष्ठ श्रीराम ! मैं यहाँ किसी विशाल सेना का पदचिह्न नहीं देख रहा हूँ; अतः किसी एक ही के अपराध के कारण आपको समस्त लोकों का विनाश नहीं करना चाहिये। क्योंकि राजा लोग अपराध के अनुसार ही उचित दण्ड देनेवाले, कोमल स्वभाव वाले और शान्त होते हैं। आप तो सदा ही समस्त प्राणियों को शरण देने वाले तथा उनकी परम गति हैं।' 

‘रघुनन्दन्! आपकी स्त्री का विनाश या अपहरण कौन अच्छा समझेगा? जैसे यज्ञ में दीक्षित हुए पुरुष का साधुस्वभाव वाले ऋत्विज् कभी अप्रिय नहीं कर सकते, उसी प्रकार सरिताएँ, समुद्र, पर्वत, देवता, गन्धर्व और दानव ये कोई भी आपके प्रतिकूल आचरण नहीं कर सकते। राजन्! जिस ने भाभी सीता का अपहरण किया है, उसी का अन्वेषण करना चाहिये। आप मेरे साथ धनुष हाथ में लेकर बड़े-बड़े ऋषियों की सहायता से उसका पता लगावें।' 

‘हम सब लोग एकाग्रचित्त हो समुद्र में खोजेंगे, पर्वतों और वनों में ढूँढेंगे, नाना प्रकार की भयंकर गुफाओं और भाँति-भाँति के सरोवरों को छान डालेंगे तथा देवताओं और गन्धर्वो के लोकों में भी खोज करेंगे। जब तक आपकी पत्नी का अपहरण करने वाले दुरात्मा का पता नहीं लगा लेंगे, तब तक हम अपना यह प्रयत्न जारी रखेंगे। कोशलनरेश! यदि हमारे शान्तिपूर्ण बर्ताव से देवेश्वरगण आपकी पत्नी का पता नहीं देंगे तो उस अवसर के अनुरूप कार्य आप कीजियेगा। नरेन्द्र ! यदि अच्छे शील स्वभाव, सामनीति, विनय और न्याय के अनुसार प्रयत्न करने पर भी आपको देवी सीता का पता न मिले, तब आप सुवर्णमय पंख वाले महेन्द्र के वज्रतुल्य बाणसमूहों से समस्त लोकों का संहार कर डालें।' 

श्रीरामचन्द्रजी शोक से संतप्त हो अनाथ की तरह विलाप करने लगे। वे महान् मोह से युक्त और अत्यन्त दुर्बल हो गये। उनका चित्त स्वस्थ नहीं था। 

उन्हें इस अवस्था में देखकर सुमित्राकुमार लक्ष्मण ने दो घड़ी तक आश्वासन दिया; फिर वे उनका पैर दबाते हुए उन्हें समझाने लगे – भैया! हमारे पिता महाराज दशरथ ने बड़ी तपस्या और महान् कर्म का अनुष्ठान करके आपको पुत्ररूप में प्राप्त किया, जैसे देवताओं ने महान् प्रयास से अमृत पा लिया था। आपने भरत भैया के मुँह से जैसा सुना था, उसके अनुसार भूपाल महाराज दशरथ आपके ही गुणों से बँधे हुए थे और आपका ही वियोग होने से देवलोक को प्राप्त हुए। 

‘ककुत्स्थकुलभूषण! यदि अपने ऊपर आये हुए इस दु:ख को आप ही धैर्यपूर्वक नहीं सहेंगे तो दूसरा कौन साधारण पुरुष, जिसकी शक्ति बहुत थोड़ी है, सह सकेगा? नरश्रेष्ठ! आप धैर्य धारण करें। संसार में किस प्राणी पर आपत्तियाँ नहीं आतीं। राजन्! आपत्तियाँ अग्नि की भाँति एक क्षण में स्पर्श करतीं और दूसरे ही क्षण में दूर हो जाती हैं। पुरुषसिंह! यदि आप दु:खी होकर अपने तेज से समस्त लोकों को दग्ध कर डालेंगे तो पीड़ित हुई प्रजा किसकी शरण में जाकर सुख और शान्ति पायेगी।' 

'यह लोक का स्वभाव ही है कि यहाँ सब पर दुःख-शोक आता-जाता रहता है। नहुषपुत्र ययाति इन्द्र के समान लोक (देवेन्द्र पद) को प्राप्त हुए थे; किंतु वहाँ भी अन्यायमूलक दुःख उनका स्पर्श किये बिना न रहा। हमारे पिता के पुरोहित जो महर्षि वशिष्ठजी हैं, उन्हें एक ही दिन में सौ पुत्र प्राप्त हुए और फिर एक ही दिन वे सब-के-सब विश्वामित्र के हाथ से मारे गये।' 

‘कोशलेश्वर! यह जो विश्ववन्दिता जगन्माता पृथ्वी है, इसका भी हिलना-डुलना देखा जाता है। जो धर्म के प्रवर्तक और संसार के नेत्र हैं, जिनके आधार पर ही सारा जगत् टिका हुआ है, वे महाबली सूर्य और चन्द्रमा भी राहु के द्वारा ग्रहण को प्राप्त होते हैं। पुरुषप्रवर! बड़े-बड़े भूत और देवता भी दैव (प्रारब्ध - कर्म) की अधीनता से मुक्त नहीं हो पाते हैं; फिर समस्त देहधारी प्राणियों के लिये तो कहना ही क्या है।' 

‘नरश्रेष्ठ! इन्द्र आदि देवताओं को भी नीति और अनीति के कारण सुख और दुःख की प्राप्ति होती सुनी जाती है; इसलिये आपको शोक नहीं करना चाहिये। वीर रघुनन्दन! विदेहराजकुमारी सीता यदि मर जायँ या नष्ट हो जायँ तो भी आपको दूसरे गँवार मनुष्यों की तरह शोक-चिन्ता नहीं करनी चाहिये। श्रीराम! आप-जैसे सर्वज्ञ पुरुष बड़ी से बड़ी विपत्ति आने पर भी कभी शोक नहीं करते हैं। वे निर्वेद (खेद) रहित हो अपनी विचार शक्ति को नष्ट नहीं होने देते।' 

'नरश्रेष्ठ! आप बुद्धि के द्वारा तात्त्विक विचार कीजिये क्या करना चाहिये और क्या नहीं; क्या उचित है और क्या अनुचित — इसका निश्चय कीजिये; क्योंकि बुद्धियुक्त महाज्ञानी पुरुष ही शुभ और अशुभ (कर्तव्य - अकर्तव्य एवं उचित - अनुचित) को अच्छी तरह जानते हैं। जिनके गुण-दोष देखे या जाने नहीं गये हैं तथा जो अध्रुव हैं - फल देकर नष्ट हो जाने वाले हैं, ऐसे कर्मों का शुभाशुभ फल उन्हें आचरण में लाये बिना नहीं प्राप्त होता है।' 

'वीर! पहले आप ही अनेक बार इस तरह की बातें कहकर मुझे समझा चुके हैं, आपको कौन सिखा सकता है। साक्षात् बृहस्पति भी आपको उपदेश देने की शक्ति नहीं रखते हैं। महाप्राज्ञ ! देवताओं के लिये भी आपकी बुद्धि का पता पाना कठिन है। इस समय शोक के कारण आपका ज्ञान सोया-खोया सा जान पड़ता है। इसलिये मैं उसे जगा रहा हूँ।' 

‘इक्ष्वाकुकुलशिरोमणे! अपने देवोचित तथा मानवोचित पराक्रम को देखकर उसका अवसर के अनुरूप उपयोग करते हुए आप शत्रुओं के वध का प्रयत्न कीजिये। पुरुषप्रवर! समस्त संसार का विनाश करने से आपको क्या लाभ होगा? उस पापी शत्रु का पता लगाकर उसी को उखाड़ फेंकने का प्रयत्न करना चाहिये। 

इति श्रीमद् राम कथा अरण्यकाण्ड अध्याय-७ का भाग-६२(62) समाप्त ! 

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