तदनन्तर दीन हुए श्रीरामचन्द्रजी ने दीन वाणी में लक्ष्मण से कहा – लक्ष्मण ! तुम शीघ्र ही गोदावरी नदी के तट पर जाकर पता लगाओ। सीता कमल लाने के लिये तो नहीं चली गयीं।
श्रीराम की ऐसी आज्ञा पाकर लक्ष्मण शीघ्र गति से पुन: रमणीय गोदावरी नदी के तट पर गये।
अनेक तीर्थों (घाटों) से युक्त गोदावरी के तट पर खोजकर लक्ष्मण पुन: लौट आये और श्रीराम से बोले – भैया! मैं गोदावरी के घाटों पर भाभी को नहीं देख पाता हूँ; जोर-जोरसे पुकारने पर भी वे मेरी बात नहीं सुनती हैं। श्रीराम! क्लेशों का नाश करने वाली विदेहराजकुमारी न जाने किस देश में चली गयीं। भैया श्रीराम ! जहाँ भाभी सीता गयी हैं, उस स्थान को मैं नहीं जानता।
लक्ष्मण की यह बात सुनकर दीन एवं संताप से मोहित हुए श्रीरामचन्द्रजी स्वयं ही गोदावरी नदी के तट पर गये।
वहाँ पहुँचकर श्रीराम ने पूछा - 'सीता कहाँ है?' परंतु वध के योग्य राक्षसराज रावण द्वारा हरी गयी सीता के विषय में समस्त भूतों में से किसी ने कुछ नहीं कहा। गोदावरी नदी ने भी श्रीराम को कोई उत्तर नहीं दिया।
तदनन्तर वन के समस्त प्राणियों ने उन्हें प्रेरित किया कि 'तुम श्रीराम को उनकी प्रिया का पता बता दो !' किंतु शोकमग्न श्रीराम के पूछने पर भी गोदावरी ने सीता का पता नहीं बताया। दुरात्मा रावण के उस रूप और कर्म को याद करके भय के मारे गोदावरी नदी ने वैदेही के विषय में श्रीराम से कुछ नहीं कहा।
सीता के दर्शन के विषय में जब नदी ने उन्हें पूर्ण निराश कर दिया, तब सीता को न देखने से कष्ट में पड़े हुए श्रीराम सुमित्राकुमार से इस प्रकार बोले - सौम्य लक्ष्मण! यह गोदावरी नदी तो मुझे कोई उत्तर ही नहीं देती है। अब मैं राजा जनक से मिलने पर उन्हें क्या उत्तर दूँगा? जानकी के बिना उसकी माता से मिलकर भी मैं उनसे यह अप्रिय बात कैसे सुनाऊँगा? राज्यहीन होकर वन में जंगली फल-मूलों से निर्वाह करते समय भी जो मेरे साथ रहकर मेरे सभी दु:खों को दूर किया करती थी, वह विदेहराजकुमारी कहाँ चली गयी?
‘बन्धु-बान्धवों से तो मेरा बिछोह हो ही गया था, अब सीता के दर्शन से भी मुझे वञ्चित होना पड़ा; उसकी चिन्ता में निरन्तर जागते रहने के कारण अब मेरी सभी रातें बहुत बड़ी हो जायँगी। मन्दाकिनी नदी, जनस्थान तथा प्रस्रवण पर्वत – इन सभी स्थानों पर मैं बारंबार भ्रमण करूँगा। शायद वहाँ सीता का पता चल जाय। वीर लक्ष्मण ! ये विशाल मृग मेरी ओर बारंबार देख रहे हैं, मानो यहाँ ये मुझसे कुछ कहना चाहते हैं। मैं इनकी चेष्टाओं को समझ रहा हूँ।
तदनन्तर उन सबकी ओर देखकर पुरुषसिंह श्रीरामचन्द्रजी ने उनसे कहा - 'बताओ, सीता कहाँ हैं?' उन मृगों की ओर देखते हुए राजा श्रीराम ने जब अश्रुगद्गद वाणी से इस प्रकार पूछा, तब वे मृग सहसा उठकर खड़े हो गये और ऊपर की ओर देखकर आकाशमार्ग की ओर लक्ष्य कराते हुए सब-के-सब दक्षिण दिशा की ओर मुँह किये दौड़े। मिथिलेशकुमारी सीता हरी जाकर जिस दिशा की ओर गयी थीं, उसी ओर के मार्ग से जाते हुए वे मृग राजा श्रीरामचन्द्रजी की ओर मुड़-मुड़कर देखते रहते थे।
वे मृग आकाशमार्ग और भूमि दोनों की ओर देखते और गर्जना करते हुए पुन: आगे बढ़ते थे। लक्ष्मण ने उनकी इस चेष्टा को लक्ष्य किया। वे जो कुछ कहना चाहते थे, उसका सारसर्वस्वरूप जो उनकी चेष्टा थी, उसे उन्होंने अच्छी तरह समझ लिया।
तदनन्तर बुद्धिमान् लक्ष्मण ने आर्त से होकर अपने बड़े भाई से इस प्रकार कहा - आर्य! जब आपने पूछा कि सीता कहाँ हैं, तब ये मृग सहसा उठकर खड़े हो गये और पृथ्वी तथा दक्षिण की ओर हमारा लक्ष्य कराने लगे हैं; अतः देव! यही अच्छा होगा कि हम लोग इस नैर्ऋत्य दिशा की ओर चलें। सम्भव है, इधर जाने से सीता का कोई समाचार मिल जाय अथवा आर्या सीता स्वयं ही दृष्टिगोचर हो जायँ।
तब 'बहुत अच्छा' कहकर श्रीमान् रामचन्द्रजी लक्ष्मण को साथ ले पृथ्वी की ओर ध्यान से देखते हुए दक्षिण दिशा की ओर चल दिये। वे दोनों भाई आपस में इसी प्रकार की बातें करते हुए ऐसे मार्ग पर जा पहुँचे, जहाँ भूमि पर कुछ फूल गिरे दिखायी देते थे।
पृथ्वी पर फूलों की उस वर्षा को देखकर वीर श्रीराम ने दु:खी हो लक्ष्मण से यह दुःखभरा वचन कहा - लक्ष्मण ! मैं इन फूलों को पहचानता हूँ। ये वे ही फूल यहाँ गिरे हैं, जिन्हें वन में मैंने विदेहनन्दिनी को दिया था और उन्होंने अपने केशों में लगा लिया था। मैं समझता हूँ, सूर्य, वायु और यशस्विनी पृथ्वी ने मेरा प्रिय करने के लिये ही इन फूलों को सुरक्षित रखा है।
पुरुषप्रवर लक्ष्मण से ऐसा कहकर धर्मात्मा महाबाहु श्रीराम ने झरनों से भरे हुए प्रस्रवण गिरि से कहा – पर्वतराज! क्या तुमने इस वन के रमणीय प्रदेश में मुझसे बिछुड़ी हुई सर्वाङ्गसुन्दरी रमणी सीता को देखा है?
तदनन्तर जैसे सिंह छोटे मृग को देखकर दहाड़ता है, उसी प्रकार वे कुपित हो वहाँ उस पर्वत से बोले – पर्वत! जब तक मैं तुम्हारे सारे शिखरों का विध्वंस नहीं कर डालता हूँ, इसके पहले ही तुम उस काञ्चन की-सी काया- कान्तिवाली सीता का मुझे दर्शन करा दो।
श्रीराम के द्वारा मैथिली के लिये ऐसा कहे जाने पर उस पर्वत ने सीता को दिखाता हुआ-सा कुछ चिह्न प्रकट कर दिया। श्रीरघुनाथजी के समीप वह सीता को साक्षात् उपस्थित न कर सका।
तब दशरथनन्दन श्रीराम ने उस पर्वत से कहा – अरे! तू मेरे बाणों की आग से जलकर भस्मीभूत हो जायगा। किसी भी ओर से तू सेवन के योग्य नहीं रह जायगा। तेरे तृण, वृक्ष और पल्लव नष्ट हो जायँगे। (इसके बाद वे सुमित्राकुमारसे बोले ) 'लक्ष्मण ! यदि यह नदी आज मुझे चन्द्रमुखी सीता का पता नहीं बताती है तो मैं अब इसे भी सुखा डालूँगा।
ऐसा कहकर रोष में भरे हुए श्रीरामचन्द्रजी उसकी ओर इस तरह देखने लगे, मानो अपनी दृष्टि द्वारा उसे जलाकर भस्म कर देना चाहते हैं। इतने ही में उस पर्वत और गोदावरी के समीप की भूमि पर राक्षस का विशाल पदचिह्न उभरा हुआ दिखायी दिया। साथ ही राक्षस ने जिनका पीछा किया था और जो श्रीराम की अभिलाषा रखकर रावण के भयसे संत्रस्त हो इधर-उधर भागती फिरी थीं, उन विदेहराजकुमारी सीता के चरणचिह्न भी वहाँ दिखायी दिये।
सीता और राक्षस के पैरों के निशान, टूटे धनुष, तरकस और छिन्न-भिन्न होकर अनेक टुकड़ों में बिखरे हुए रथ (पुष्पक विमान) को देखकर श्रीरामचन्द्रजी का हृदय घबरा उठा। वे अपने प्रिय भ्राता सुमित्राकुमार से बोले - लक्ष्मण! देखो, ये सीता के आभूषणों में लगे हुए सोने के घुँघुरू बिखरे पड़े हैं। सुमित्रानन्दन ! उसके नाना प्रकार के हार भी टूटे पड़े हैं। सुमित्राकुमार! देखो, यहाँ की भूमि सब ओर से सुवर्ण की बूँदों के समान ही विचित्र रक्तबिन्दुओं से रँगी दिखायी देती है।
‘लक्ष्मण! मुझे तो ऐसा मालूम होता है कि इच्छानुसार रूप धारण करने वाले राक्षसों ने यहाँ सीता के टुकड़े-टुकड़े करके उसे आपस में बाँटा और खाया होगा। सुमित्रानन्दन! सीता के लिये परस्पर विवाद करने वाले दो राक्षसों में यहाँ घोर युद्ध भी हुआ है। सौम्य ! तभी तो यहाँ यह मोती और मणियों से जटित एवं विभूषित किसी का अत्यन्त सुन्दर और विशाल धनुष खण्डित होकर पृथ्वी पर पड़ा है। यह किसका धनुष हो सकता है?'
‘वत्स! पता नहीं, यह राक्षसों का है या देवताओं का ; यह प्रात: काल के सूर्य की भाँति प्रकाशित हो रहा है तथा इसमें वैदूर्यमणि (नीलम) के टुकड़े जड़े हुए हैं। सौम्य! उधर पृथ्वी पर टूटा हुआ एक सोने का कवच पड़ा है, न जाने वह किसका है? दिव्य मालाओं से सुशोभित यह सौ कमानियों वाला छत्र किसका है? इसका डंडा टूट गया है और यह धरती पर गिरा दिया गया है।'
‘संग्राम में काम देनेवाला यह किसका रथ पड़ा है? इसे किसी ने उलटा गिराकर तोड़ डाला है। समराङ्गण में स्वामी को सूचित करने वाली ध्वजा भी इसमें लगी थी। यह तेजस्वी रथ प्रज्वलित अग्नि के समान दमक रहा है। ये भयंकर बाण, जो यहाँ टुकड़े-टुकड़े होकर बिखरे पड़े हैं, किसके हैं? इनकी लंबाई और मोटाई रथ के धुरे के समान प्रतीत होती है। इनके फल-भाग टूट गये हैं तथा ये सुवर्ण से विभूषित हैं।'
‘लक्ष्मण! सौम्य ! यह अवश्य ही किसी राक्षस का पदचिह्न दिखायी देता है। इन अत्यन्त क्रूर हृदय वाले कामरूपी राक्षसों के साथ मेरा वैर सौगुना बढ़ गया है। देखो, यह वैर उनके प्राण लेकर ही शान्त होगा। अवश्य ही तपस्विनी विदेहराजकुमारी हर ली गयी, मृत्यु को प्राप्त हो गयी अथवा राक्षसों ने उसे खा लिया। इस विशाल वन में हरी जाती हुई सीता की रक्षा धर्म भी नहीं कर रहा है। सौम्य लक्ष्मण! जब विदेहनन्दिनी राक्षसों का ग्रास बन गयी अथवा उनके द्वारा हर ली गयी और कोई सहायक नहीं हुआ, तब इस जगत में कौन ऐसे पुरुष हैं, जो मेरा प्रिय करने में समर्थ हों।'
‘लक्ष्मण! जो समस्त लोकों की सृष्टि, पालन और संहार करने वाले 'त्रिपुर - विजय' आदि शौर्य से सम्पन्न महेश्वर हैं, वे भी जब अपने करुणामय स्वभाव के कारण चुप बैठे रहते हैं, तब सारे प्राणी उनके ऐश्वर्य को न जानने से उनका तिरस्कार करने लग जाते हैं। मैं लोकहित में तत्पर, युक्तचित्त, जितेन्द्रिय तथा जीवों पर करुणा करने वाला हूँ, इसीलिये ये इन्द्र आदि देवेश्वर निश्चय ही मुझे निर्बल मान रहे हैं (तभी तो इन्होंने सीता की रक्षा नहीं की है )।'
‘लक्ष्मण! देखो तो सही, यह दयालुता आदि गुण मेरे पास आकर दोष बन गया। तभी तो मुझे निर्बल मानकर मेरी स्त्री का अपहरण किया गया है। अतः अब मुझे पुरुषार्थ ही प्रकट करना होगा। जैसे प्रलयकाल में उदि हुआ महान् सूर्य चन्द्रमा की ज्योत्स्ना (चाँदनी) का संहार करके प्रचण्ड तेज से प्रकाशित हो उठता है, उसी प्रकार अब मेरा तेज आज ही समस्त प्राणियों तथा राक्षसों का अन्त करने के लिये मेरे उन कोमल स्वभाव आदि गुणों को समेटकर प्रचण्ड रूप में प्रकाशित होगा, यह भी तुम देखो।'
‘लक्ष्मण! अब न तो यक्ष, न गन्धर्व, न पिशाच, न राक्षस, न किन्नर और न मनुष्य ही चैन से रहने पायेंगे। सुमित्रानन्दन! देखना, थोड़ी ही देर में आकाश को मैं अपने चलाये हुए बाणों से भर दूँगा और तीन लोकों में विचरने वाले प्राणियों को हिलने-डुलने भी न दूंगा। ग्रहों की गति रुक जायगी, चन्द्रमा छिप जायगा, अग्नि, मरुद्गण तथा सूर्य का तेज नष्ट हो जायगा, सब कुछ अन्धकार से आच्छन्न हो जायगा, पर्वतों के शिखर मथ डाले जायँगे, सारे जलाशय (नदी-सरोवर आदि) सूख जायँगे, वृक्ष, लता और गुल्म नष्ट हो जायँगे और समुद्रों का भी नाश कर दिया जायगा। इस तरह मैं सारी त्रिलोकी में ही काल की विनाशलीला आरम्भ कर दूँगा।'
‘सुमित्रानन्दन! यदि देवेश्वरगण इसी मुहूर्त में मुझे सीता देवी को सकुशल नहीं लौटा देंगे तो वे मेरा पराक्रम देखेंगे। लक्ष्मण! मेरे धनुष की प्रत्यञ्चा से छूटे हुए बाण समूहों द्वारा आकाश के ठसाठस भर जाने के कारण उसमें कोई प्राणी उड़ नहीं सकेंगे। सुमित्रानन्दन! देखो, आज मेरे नाराचों से रौंदा जाकर यह सारा जगत् व्याकुल और मर्यादा रहित हो जायगा। यहाँ के मृग और पक्षी आदि प्राणी नष्ट एवं उद्भान्त हो जायँगे।'
‘धनुष को कान तक खींचकर छोड़े गये मेरे बाणों को रोकना जीव जगत के लिये बहुत कठिन होगा। मैं सीता के लिये उन बाणों द्वारा इस जगत के समस्त पिशाचों और राक्षसों का संहार कर डालूँगा। रोष और अमर्षपूर्वक छोड़े गये मेरे फलरहित दूरगामी बाणों का बल आज देवता लोग देखेंगे। मेरे क्रोध से त्रिलोकी का विनाश हो जाने पर न देवता रह जायँगे न दैत्य, न पिशाच रहने पायँगे न राक्षस। देवताओं, दानवों, यक्षों और राक्षसों के जो लोक हैं, वे मेरे बाणसमूहों से टुकड़े-टुकड़े होकर बारंबार नीचे गिरेंगे।'
'सुमित्रानन्दन ! यदि देवेश्वरगण मेरी हरी या मरी हुई सीता को लाकर मुझे नहीं देंगे तो आज मैं अपने सायकों की मार से इन तीनों लोकों को मर्यादा से भ्रष्ट कर दूँगा। यदि वे मेरी प्रिया विदेहराजकुमारी को मुझे उसी रूप में वापस नहीं लौटायेंगे तो मैं चराचर प्राणियों सहित समस्त त्रिलोकी का नाश कर डालूँगा। जब तक सीता का दर्शन न होगा, तब तक मैं अपने सायकों से समस्त संसार को संतप्त करता रहूँगा।'
ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजी के नेत्र क्रोध से लाल हो गये, होठ फड़कने लगे। उन्होंने वल्कल और मृगचर्म को अच्छी तरह कसकर अपने जटाभार को भी बाँध लिया। उस समय क्रोध में भरकर उस तरह संहार के लिये उद्यत हुए भगवान् श्रीराम का शरीर पूर्वकाल में त्रिपुर का संहार करने वाले रुद्र के समान प्रतीत होता था। उस समय लक्ष्मण के हाथ से धनुष लेकर श्रीरामचन्द्रजी ने उसे दृढ़तापूर्वक पकड़ लिया और एक विषधर सर्प के समान भयंकर और प्रज्वलित बाण लेकर उसे उस धनुष पर रखा।
तत्पश्चात् शत्रुनगरी पर विजय पाने वाले श्रीराम प्रलयाग्नि के समान कुपित हो इस प्रकार बोले – लक्ष्मण! जैसे बुढ़ापा, जैसे मृत्यु, जैसे काल और जैसे विधाता सदा समस्त प्राणियों पर प्रहार करते हैं, किंतु उन्हें कोई रोक नहीं पाता है, उसी प्रकार निस्संदेह क्रोध में भर जाने पर मेरा भी कोई निवारण नहीं कर सकता। यदि देवता आदि आज पहले की ही भाँति मनोहर दाँतों वाली अनिन्द्यसुन्दरी मिथिलेशकुमारी सीता को मुझे लौटा नहीं देंगे तो मैं देवता, गन्धर्व, मनुष्य, नाग और पर्वतों सहित सारे संसार को उलट दूँगा।'
