भाग-६०(60) श्रीराम का विलाप

 

सीता को न देखकर शोक से व्याकुलचित्त हुए धर्मात्मा महाबाहु कमलनयन श्रीराम विलाप करने लगे। रघुनाथजी सीता के प्रति अधिक प्रेम के कारण उनके वियोग में कष्ट पा रहे थे। वे उन्हें न देखकर भी देखते हुए समान ऐसी बात कहने लगे, जो विलाप का आश्रय होने से गद्दकण्ठ के कारण कठिनता से बोली जा रही थी।  

'प्रिये! तुम्हें फूल अधिक प्रिय हैं, इसलिये खिली हुई अशोक की शाखाओं से अपने शरीर को छिपाती हो और मेरा शोक बढ़ा रही हो। देवी! मैं केले के तनों के तुल्य और कदली दल से ही छिपे हुए तुम्हारे दोनों ऊरुओं (जाँघों) को देख रहा हूँ। तुम उन्हें छिपा नहीं सकती। भद्रे! देवी! तुम हँसती हुई कनेर- पुष्पों की वाटिका का सेवन करती हो। बंद करो इस परिहास को, इससे मुझे बड़ा कष्ट हो रहा है। विशेषतः आश्रम स्थान में यह हास-परिहास अच्छा नहीं बताया जाता है। प्रिये! मैं जानता हूँ, तुम्हारा स्वभाव परिहासप्रिय है। विशाललोचने! आओ। तुम्हारी यह पर्णशाला सूनी है ।' 

फिर भ्रम दूर होने पर वे सुमित्राकुमार से बोले –  लक्ष्मण ! अब तो भलीभाँति स्पष्ट हो गया कि राक्षसों ने सीता को खा लिया अथवा हर लिया; क्योंकि मैं विलाप कर रहा हूँ और वह मेरे पास नहीं आ रही है। लक्ष्मण! ये जो मृगसमूह हैं, ये भी अपने नेत्रों में आँसू भरकर मानो मुझसे यही कह रहे हैं कि देवी सीता को निशाचर खा गये। हा मेरी आर्ये! (आदरणीये!) तुम कहाँ चली गयी? हा साध्वि ! हा वरवर्णिनि ! तुम कहाँ गयी? 

‘सीता के साथ अयोध्या से निकला था। यदि सीता के बिना ही वहाँ लौटा तो अपने सूने अन्त: पुर में कैसे प्रवेश करूँगा। सारा संसार मुझे पराक्रमहीन और निर्दय कहेगा। सीता के अपहरण से मेरी कायरता ही प्रकाश में आयेगी। जब वनवास से लौटने पर मिथिला नरेश जनक मुझसे कुशल पूछने आयेंगे, उस समय मैं कैसे उनकी ओर देख सकूँगा?'

'मुझे सीता से रहित देख विदेहराज जनक अपनी पुत्री के विनाश से संतप्त हो निश्चय ही मूर्च्छित हो जायँगे अथवा अब मैं भरत द्वारा पालित अयोध्यापुरी को नहीं जाऊँगा। जानकी के बिना मुझे स्वर्ग भी सूना ही जान पड़ेगा। इसलिये अब तुम मुझे वन में ही छोड़कर सुन्दर अयोध्यापुरी को लौट जाओ। मैं तो अब सीता के बिना किसी तरह जीवित नहीं रह सकता।' 

‘भरत का गाढ़ आलिङ्गन करके तुम उनसे मेरा संदेश कह देना, 'कैकेयीनन्दन ! तुम सारी पृथ्वीका पालन करो, इसके लिये राम ने तुम्हें आज्ञा दे दी है।' 

'विभो ! मेरी माता कौसल्या, कैकेयी तथा सुमित्रा को प्रतिदिन यथोचित रीति से प्रणाम करते हुए उन सबकी रक्षा करना और सदा उनकी आज्ञा के अनुसार चलना,' यह तुम्हारे लिये मेरी आज्ञा है। शत्रुसूदन! मेरी माता के समक्ष सीता के विनाश का यह समाचार विस्तारपूर्वक कह सुनाना।' 

सुन्दर केशवाली सीता के विरह में भगवान् श्रीराम लीलावश जब एक साधारण कामी और मौह में फंसे मनुष्य की भांति वन के भीतर जाकर जब इस तरह दीनभाव से विलाप करने लगे, तब लक्ष्मण के भी मुख पर भयजनित व्याकुलता के चिह्न दिखायी देने लगे। उनका मन व्यथित हो उठा और वे अत्यन्त घबरा गये। 

अपनी प्रिया सीता से रहित हो राजकुमार श्रीराम शोक और मोह से पीड़ित होने लगे। वे स्वयं तो पीड़ित थे ही, अपने भाई लक्ष्मण को भी विषाद में डालते हुए पुनः तीव्र शोक में मग्न हो गये। 

लक्ष्मण शोक के अधीन हो रहे थे, उनसे महान् शोक में डूबे हुए श्रीराम दुःख के साथ रोते हुए गरम उच्छ्वास लेकर अपने ऊपर पड़े हुए संकट के अनुरूप वचन बोले - सुमित्रानन्दन! मालूम होता है, मेरे जैसा पापकर्म करने वाला मनुष्य इस पृथ्वी पर दूसरा कोई नहीं है; क्योंकि एक के बाद दूसरा शोक मेरे हृदय (प्राण) और मन को विदीर्ण करता हुआ लगातार मुझ पर आता जा रहा है। निश्चय ही पूर्वजन्म में मैंने अपनी इच्छा के अनुसार बारंबार बहुत-से पापकर्म किये हैं; उन्हीं में से कुछ कर्मों का यह परिणाम आज प्राप्त हुआ है, जिससे मैं एक दु:ख से दूसरे दुःख में पड़ता जा रहा हूँ। 

‘पहले तो मैं राज्य से वञ्चित हुआ; फिर मेरा स्वजनों से वियोग हुआ। तत्पश्चात् पिताजी का परलोकवास हुआ, फिर माता से भी मुझे बिछुड़ जाना पड़ा। लक्ष्मण ! ये सारी बातें जब मुझे याद आती हैं, तब मेरे शोक के वेग को बढ़ा देती हैं। लक्ष्मण! वन में आकर क्लेश का अनुभव करके भी यह सारा दुःख सीता के समीप रहने से मेरे शरीर में ही शान्त हो गया था, परंतु सीता के वियोग से वह फिर उद्दीप्त हो उठा है, जैसे सूखे काठ का संयोग पाकर आग सहसा प्रज्वलित हो उठती है।' 

'हाय! मेरी श्रेष्ठ स्वभाववाली भीरु पत्नी को अवश्य ही राक्षस ने आकाशमार्ग से हर लिया। उस समय सुमधुर स्वर में विलाप करने वाली सीता भय के मारे बारंबार विकृत स्वर में क्रन्दन करने लगी होगी। मेरी प्रिया के वे दोनों गोल-गोल स्तन, जो सदा लाल चन्दनसे चर्चित होनेयोग्य थे, निश्चय ही रक्त की कीच में सन गये होंगे। हाय! इतने पर भी मेरे शरीर का पतन नहीं होता।' 

‘राक्षस के वश में पड़ी हुई मेरी प्रिया का वह मुख जो स्निग्ध एवं सुस्पष्ट मधुर वार्तालाप करनेवाला तथा काले- काले घुँघराले केशों के भार से सुशोभित था, वैसे ही श्रीहीन हो गया होगा, जैसे राहु के मुख में पड़ा हुआ चन्द्रमा शोभा नहीं पाता है। हाय! उत्तम व्रत का पालन करने वाली मेरी प्रियतमा का कण्ठ हर समय हार से सुशोभित होने योग्य था, किंतु रक्तभोजी राक्षसों ने सूने वन में अवश्य उसे फाड़कर उसका रक्त पिया होगा।' 

'मेरे न रहने के कारण निर्जन वन में राक्षसों ने उसे ले-लेकर घसीटा होगा और विशाल एवं मनोहर नेत्रों वाली वह जानकी अत्यन्त दीनभाव से कुररी की भाँति विलाप करती रही होगी। लक्ष्मण ! यह वही शिलातल है, जिस पर उदार स्वभाव वाली सीता पहले एक दिन मेरे साथ बैठी हुई थी। उसकी मुसकान कितनी मनोहर थी, उस समय उसने हँस-हँसकर तुमसे भी बहुत सी बातें कही थीं। 

‘सरिताओं में श्रेष्ठ यह गोदावरी मेरी प्रियतमा को सदा ही प्रिय रही है। सोचता हूँ, शायद वह इसी के तट पर गयी हो, किंतु अकेली तो वह कभी वहाँ नहीं जाती थी। उसका मुख और विशाल नेत्र प्रफुल्ल कमलों के समान सुन्दर हैं, सम्भव है, वह कमलपुष्प लाने के लिये ही गोदावरी तट पर गयी हो, परंतु यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि वह मुझे साथ लिये बिना कभी कमलों के पास नहीं जाती थी।' 

'हो सकता है कि वह इन पुष्पित वृक्षसमूहों से युक्त और नाना प्रकार के पक्षियों से सेवित वन में भ्रमण के लिये गयी हो; परंतु यह भी ठीक नहीं लगता; क्योंकि वह भीरु तो अकेली वन में जाने से बहुत डरती थी। सूर्यदेव! संसार में किसने क्या किया और क्या नहीं किया - इसे तुम जानते हो; लोगों के सत्य-असत्य (पुण्य और पाप) कर्मों के तुम्हीं साक्षी हो। मेरी प्रिया सीता कहाँ गयी अथवा उसे किसने हर लिया, यह सब मुझे बताओ; क्योंकि मैं उसके शोक से पीड़ित हूँ।' 

‘वायुदेव! समस्त विश्व में ऐसी कोई बात नहीं है, जो तुम्हें सदा ज्ञात न रहती हो। मेरी कुलपालिका सीता कहाँ है, यह बता दो। वह मर गयी, हर ली गयी अथवा मार्ग में ही है। 

इस प्रकार शोक के अधीन होकर जब श्रीरामचन्द्रजी संज्ञाशून्य हो विलाप करने लगे, तब उनकी ऐसी अवस्था देख न्यायोचित मार्ग पर स्थित रहने वाले उदारचित्त सुमित्राकुमार लक्ष्मण ने उनसे यह समयोचित बात कही - आर्य! आप शोक छोड़कर धैर्य धारण करें; भाभी सीता की खोज के लिये मन में उत्साह रखें; क्योंकि उत्साही मनुष्य जगत में अत्यन्त दुष्कर कार्य आ पड़ने पर भी कभी दुःखी नहीं होते हैं। 

बढ़े हुए पुरुषार्थ वाले सुमित्राकुमार लक्ष्मण जब इस प्रकार की बातें कह रहे थे, उस समय रघुकुल की वृद्धि करने वाले श्रीराम ने आर्त होकर उनके कथन के औचित्य पर कोई ध्यान नहीं दिया; उन्होंने धैर्य छोड़ दिया और वे पुनः महान् दुःख में पड़ गये। 

(भगवान् श्रीराम स्वयं सचिदानंद परब्रह्म हैं; किन्तु इस समय उन्होंने पूर्ण मानव रूप में अवतार लिया है अतः यहाँ उन्होंने सिर्फ लीला करते हुए यह दिखाया है की एक साधारण मनुष्य विपत्ति आने पर कैसा बर्ताव करता है। उनकी ऐसी दशा देखकर शिवपत्नी देवी सती को भी भ्रम हो गया था। वैसे प्रभु की माया बलवती है जिसका पार पाना हमारे लिए असंभव है। फिर भी भक्ति मार्ग पर चलने से मायापति श्रीराम की थोड़ी लीला को समझना सरल हो जाता है। रामायण में उनकी इन्ही लीलाओं के गूढ़ रहस्य को समझने के लिए अध्याय-१ रामायण माहात्म्य के सभी भाग विस्तार से पढ़ें।)   

इति श्रीमद् राम कथा अरण्यकाण्ड अध्याय-७ का भाग-६०(60) समाप्त ! 

No comments:

Post a Comment

रामायण: एक परिचय

रामायण संस्कृत के रामायणम् का हिंदी रूपांतरण है जिसका शाब्दिक अर्थ है राम की जीवन यात्रा। रामायण और महाभारत दोनों सनातन संस्कृति के सबसे प्र...