भाग-५(5) लंकापुरी का वर्णन, उसमें प्रवेश करने के विषय में हनुमानजी का विचार, उनका लघु रूप से पुरी में प्रवेश तथा चन्द्रोदय का वर्णन

 


महाबली हनुमानजी अलङ्घनीय समुद्र को पार करके त्रिकूट (लम्ब) नामक पर्वत के शिखर पर स्वस्थ भाव से खड़े हो लंकापुरी की शोभा देखने लगे। उस समय उनके ऊपर वहाँ वृक्षों से झड़े हुए फूलों की वर्षा होने लगी। इससे वहाँ बैठे हुए पराक्रमी हनुमान् फूल के बने हुए वानर के समान प्रतीत होने लगे। 

उत्तम पराक्रमी श्रीमान् वानरवीर हनुमान् सौ योजन समुद्र लाँघकर भी वहाँ लम्बी साँस नहीं खींच रहे थे और न ग्लानि का ही अनुभव करते थे। उलटे वे यह सोचते थे, मैं सौ-सौ योजनों के बहुत-से समुद्र लाँघ सकता हूँ; फिर इस गिने-गिनाये सौ योजन समुद्र को पार करना कौन बड़ी बात है? बलवानों में श्रेष्ठ तथा वानरों में उत्तम वे वेगवान् पवनकुमार महासागर को लाँघकर शीघ्र ही लंका में जा पहुँचे। रास्ते में हरी-हरी दूब और वृक्षों से भरे हुए मकरन्दपूर्ण सुगन्धित वन देखते हुए वे मध्यमार्ग से जा रहे थे।  

तेजस्वी वानरशिरोमणि हनुमान् वृक्षों से आच्छादित पर्वतों और फूलों से भरी हुई वन श्रेणियों में विचरने लगे। उस पर्वत पर स्थित हो पवनपुत्र हनुमान् ने बहुत-से वन और उपवन देखे तथा उस पर्वत के अग्रभाग में बसी हुई लंका का भी अवलोकन किया। उन कपिश्रेष्ठ ने वहाँ सरल (चीन), कनेर, खिले हुए खजूर, प्रियाल (चिरौंजी), मुचुलिन्द (जम्बीरी नीबू ), कुटज, केतक (केवड़े), सुगन्धपूर्ण प्रियङ्गु (पिप्पली), नीप (कदम्ब या अशोक), छितवन, असन, कोविदार तथा खिले हुए करवीर भी देखे। फूलों के भार से लदे हुए तथा मुकुलित (अधखिले) बहुत-से वृक्ष उन्हें दृष्टिगोचर हुए, जिनमें पक्षी भरे हुए थे और हवा के झोंके से जिनकी डालियाँ झूम रही थीं। 

हंसों और कारण्डवों से व्याप्त तथा कमल और उत्पल से आच्छादित हुई बहुत-सी बावड़ियाँ, भाँति-भाँति के रमणीय क्रीड़ास्थान तथा नाना प्रकार के जलाशय उनके दृष्टिपथ में आये। उन जलाशयों के चारों ओर सभी ऋतुओं में फल-फूल देने वाले अनेक प्रकार के वृक्ष फैले हुए थे। उन वानरशिरोमणि ने वहाँ बहुत से रमणीय उद्यान भी देखे। अद्भुत शोभा से सम्पन्न हनुमानजी धीरे-धीरे रावण - पालित लंकापुरी के पास पहुँचे। उसके चारों ओर खुदी हुई खाइयाँ उस नगरी की शोभा बढ़ा रही थीं। उनमें उत्पल और पद्म आदि कई जातियों के कमल खिले थे। सीता को हर लाने के कारण रावण ने लंकापुरी की रक्षा का विशेष प्रबन्ध कर रखा था। उसके चारों ओर भयंकर धनुष धारण करने वाले राक्षस घूमते रहते थे। 

वह महापुरी सोने की चहारदीवारी से घिरी हुई थी तथा पर्वत के समान ऊँचे और शरद् ऋतु के बादलों के समान श्वेत भवनों से भरी हुई थी। श्वेत रंग की ऊँची-ऊँची सड़कें उस पुरी को सब ओर से घेरे हुए थीं। सैकड़ों अट्टालिकाएँ वहाँ शोभा पा रही थीं तथा फहराती हुई ध्वजा-पताकाएँ उस नगरी की शोभा बढ़ा रही थीं। उसके बाहरी फाटक सोने के बने हुए थे और उनकी दीवारें लता-बेलों के चित्र से सुशोभित थीं। हनुमानजी ने उन फाटकों से सुशोभित लंका को उसी प्रकार देखा, जैसे कोई देवता देवपुरी का निरीक्षण कर रहा हो। 

तेजस्वी कपि हनुमान् ने सुन्दर शुभ्र सदनों से सुशोभित और पर्वत के शिखर पर स्थित लंका को इस तरह देखा, मानो वह आकाश में विचरने वाली नगरी हो। कपिवर हनुमान् ने विश्वकर्मा द्वारा निर्मित तथा राक्षसराज रावण द्वारा सुरक्षित उस पुरी को आकाश में तैरती-सी देखा। विश्वकर्मा की बनायी हुई लंका मानो उनके मानसिक संकल्प से रची गयी एक सुन्दरी स्त्री थी। चहारदीवारी और उसके भीतर की वेदी उसकी जघनस्थली जान पड़ती थीं, समुद्र का विशाल जलराशि और वन उसके वस्त्र थे, शतघ्नी और शूल नामक अस्त्र ही उसके केश थे और बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएँ उसके लिये कर्णभूषण-सी प्रतीत हो रही थीं। 

उस पुरी के उत्तर द्वार पर पहुँचकर वानरवीर हनुमानजी चिन्ता में पड़ गये। वह द्वार कैलाश पर्वत पर बसी हुई अलकापुरी के बहिर्द्वार के समान ऊँचा था और आकाश में रेखा - सी खींचता जान पड़ता था। ऐसा जान पड़ता था मानो अपने ऊँचे-ऊँचे प्रासादों पर आकाश को उठा रखा है। लंकापुरी भयानक राक्षसों से उसी तरह भरी थी, जैसे पाताल की भोगवती पुरी नागों से भरी रहती है। उसकी निर्माण कला अचिन्त्य् थी। उसकी रचना सुन्दर ढंग से की गयी थी। वह हनुमानजी को स्पष्ट दिखायी देती थी। पूर्वकाल में साक्षात् कुबेर वहाँ निवास करते थे। हाथों में शूल और पट्टिश लिये बड़ी-बड़ी दाढों वाले बहुत-से शूरवीर घोर राक्षस लंकापुरी की उसी प्रकार रक्षा करते थे, जैसे विषधर सर्प अपनी पुरी की करते हैं। 

उस नगर की बड़ी भारी चौकसी, उसके चारों ओर समुद्र की खाईं तथा रावण जैसे भयंकर शत्रु को देखकर हनुमानजी इस प्रकार विचारने लगे - यदि वानर यहाँ तक आ जायँ तो भी वे व्यर्थ ही सिद्ध होंगे; क्योंकि युद्ध के द्वारा देवता भी लंका पर विजय नहीं पा सकते। जिससे बढ़कर विषम (संकटपूर्ण) स्थान और कोई नहीं है, उस रावणपालित इस दुर्गम लंका में आकर महाबाहु श्रीरघुनाथजी भी क्या करेंगे? राक्षसों पर सामनीति के प्रयोग के लिये तो कोई गुंजाइश ही नहीं है। इन पर दान, भेद और युद्ध (दण्ड) नीति का प्रयोग भी सफल होता नहीं दिखायी देता। यहाँ चार ही वेगशाली वानरों की पहुँच हो सकती है - बालिपुत्र अंगद की, नील की, मेरी और बुद्धिमान् राजा सुग्रीव की। अच्छा, पहले यह तो पता लगाऊँ कि विदेहकुमारी सीता जीवित हैं या नहीं। जनककिशोरी का दर्शन करनेके पश्चात् ही मैं इस विषय में कोई विचार करूंगा। 

तदनन्तर उस पर्वत-शिखर पर खड़े हुए कपिश्रेष्ठ हनुमानजी श्रीरामचन्द्रजी के अभ्युदय के लिये सीताजी का पता लगाने के उपाय पर दो घड़ी तक विचार करते रहे। 

उन्होंने सोचा - मैं इस रूप से राक्षसों की इस नगरी में प्रवेश नहीं कर सकता; क्योंकि बहुत से क्रूर और बलवान् राक्षस इसकी रक्षा कर रहे हैं। माता जानकी की खोज करते समय मुझे अपने को छिपाने के लिये यहाँ के सभी महातेजस्वी, महापराक्रमी और बलवान् राक्षसों से आँख बचानी होगी। अतः मुझे रात्रि के समय ही नगर में प्रवेश करना चाहिये और सीता माता का अन्वेषण रूप यह महान् समयोचित कार्य सिद्ध करने के लिये ऐसे रूप का आश्रय लेना चाहिये, जो आँख से देखा न जा सके। केवल कार्य से यह अनुमान हो कि कोई आया था। 

देवताओं और असुरों के लिये भी दुर्जय वैसी लंकापुरी को देखकर हनुमानजी बारम्बार लम्बी साँस खींचते हुए यों विचार करने लगे - किस उपाय से काम लूँ, जिससे दुरात्मा राक्षसराज रावण की दृष्टि से ओझल रहकर मैं मिथिलेशनन्दिनी जनककिशोरी सीता का दर्शन प्राप्त कर सकूँ। किस रीति से कार्य किया जाय, जिससे जगद्विख्यात श्रीरामचन्द्रजी का काम भी न बिगड़े और मैं एकान्त में अकेली जानकीजी से भेंट भी कर लूँ। कई बार कातर अथवा अविवेकपूर्ण कार्य करने वाले दूत के हाथ में पड़कर देश और काल के विपरीत व्यवहार होने के कारण बने-बनाये काम भी उसी तरह बिगड़ जाते हैं, जैसे सूर्योदय होने पर अन्धकार नष्ट हो जाता है। 

‘राजा और मन्त्रियों के द्वारा निश्चित किया हुआ कर्तव्याकर्तव्य विषयक विचार भी किसी अविवेकी दूत का आश्रय लेने से शोभा (सफलता) नहीं पाता है। अपने को पण्डित मानने वाले अविवेकी दूत सारा काम ही चौपट कर देते हैं। अच्छा तो किस उपाय का अवलम्बन करने से स्वामी का कार्य नहीं बिगड़ेगा; मुझे घबराहट या अविवेक नहीं होगा और मेरा यह समुद्र का लाँघना भी व्यर्थ नहीं होने पायेगा। यदि राक्षसों ने मुझे देख लिया तो रावण का अनर्थ चाहने वाले उन विख्यातनामा भगवान् श्रीराम का यह कार्य सफल न हो सकेगा।' 

‘यहाँ दूसरे किसी रूप की तो बात ही क्या है, राक्षस का रूप धारण करके भी राक्षसों से अज्ञात रहकर कहीं ठहरना असम्भव है। मेरा तो ऐसा विश्वास है कि राक्षसों से छिपे रहकर वायुदेव भी इस पुरी में विचरण नहीं कर सकते। यहाँ कोई भी ऐसा स्थान नहीं है, जो इन भयंकर कर्म करने वाले राक्षसों को ज्ञात न हो। यदि यहाँ मैं अपने इस रूप से छिपकर भी रहूँगा तो मारा जाऊँगा और मेरे स्वामी के कार्य में भी हानि पहुँचेगी। अत: मैं श्रीरघुनाथजी का कार्य सिद्ध करने के लिये रात में अपने इसी रूप से छोटा-सा शरीर धारण करके लंका में प्रवेश करूँगा। यद्यपि रावण की इस पुरी में जाना बहुत ही कठिन है तथापि रात को इसके भीतर प्रवेश करके सभी घरों में घुसकर मैं जानकीजी की खोज करूँगा। 

ऐसा निश्चय करके वीर वानर हनुमान् विदेह्नन्दिनी के दर्शन के लिये उत्सुक हो उस समय सूर्यास्त की प्रतीक्षा करने लगे। सूर्यास्त हो जाने पर रात के समय उन पवनकुमार ने अपने शरीर को छोटा बना लिया। वे बिल्ली के बराबर होकर अत्यन्त अद्भुत दिखायी देने लगे। प्रदोषकाल में पराक्रमी हनुमान् तुरंत ही उछलकर उस रमणीय पुरी में घुस गये। वह नगरी पृथक्-पृथक् बने हुए चौड़े और विशाल राजमार्गों से सुशोभित थी। उसमें प्रासादों की लंबी पंक्तियाँ दूर तक फैली हुई थीं। सुनहरे रंग के खम्भों और सोने की जालियों से विभूषित वह नगरी गन्धर्वनगर के समान रमणीय प्रतीत होती थी। 

हनुमानजी ने उस विशाल पुरी को सतमहले, अठमहले मकानों और सुवर्णजटित स्फटिक मणि की फर्शो सुशोभित देखा। उनमें वैदूर्य (नीलम) भी जड़े गये थे, जिससे उनकी विचित्र शोभा होती थी। मोतियों की जालियाँ भी उन महलों की शोभा बढ़ाती थीं। उन सबके कारण राक्षसों के वे भवन बड़ी सुन्दर शोभा से सम्पन्न हो रहे थे। 

सोने के बने हुए विचित्र फाटक सब ओर से सजी हुई राक्षसों की उस लंका को और भी उद्दीप्त कर रहे थे। ऐसी अचिन्त्य और अद्भुत आकार वाली लंका को देखकर महाकपि हनुमान् विषाद में पड़ गये; परंतु जानकीजी के दर्शन के लिये उनके मन में बड़ी उत्कण्ठा थी, इसलिये उनका हर्ष और उत्साह भी कम नहीं हुआ। परस्पर सटे हुए श्वेतवर्ण के सतमंजिले महलों की पंक्तियाँ लंकापुरी की शोभा बढ़ा रही थीं। बहुमूल्य जाम्बूनद नामक सुवर्ण की जालियों और वन्दनवारों से वहाँ के घरों को सजाया गया था। भयंकर बलशाली निशाचर उस पुरी की अच्छी तरह रक्षा करते थे। रावण के बाहुबल से भी वह सुरक्षित थी। उसके यश की ख्याति सुदूर तक फैली हुई थी। ऐसी लंकापुरी में हनुमानजी ने प्रवेश किया। 

उस समय तारागणों के साथ उनके बीच में विराजमान अनेक सहस्र किरणों वाले चन्द्रदेव भी हनुमानजी की सहायता-सी करते हुए समस्त लोकों पर अपनी चाँदनी का चंदोवा-सा तानकर उदित हो गये। वानरों के प्रमुख वीर श्रीहनुमानजी ने शङ्ख की-सी कान्ति तथा दूध और मृणाल के-से वर्ण वाले चन्द्रमा को आकाश में इस प्रकार उदित एवं प्रकाशित होते देखा, मानो किसी सरोवर में कोई हंस तैर रहा हो। 

इति श्रीमद् राम कथा सुन्दरकाण्ड अध्याय-९ का भाग-५(5) समाप्त ! 

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