भाग-५९(59) श्रीराम और लक्ष्मण के द्वारा सीता की खोज और उनके न मिलने से श्रीराम की व्याकुलता

 


दशरथनन्दन श्रीराम ने देखा कि आश्रम के सभी स्थान सीता से सूने हैं तथा पर्णशाला में भी सीता नहीं हैं और बैठने के आसन इधर-उधर फेंके पड़े हैं। तब उन्होंने पुन: वहाँ के सभी स्थानों का निरीक्षण किया और चारों ओर ढूँढने पर भी जब विदेहकुमारी का कहीं पता नहीं लगा, तब श्रीरामचन्द्रजी अपनी दोनों सुन्दर भुजाएँ ऊपर उठाकर सीता का नाम ले जोर-जोर से पुकार करके लक्ष्मण से बोले - भैया लक्ष्मण! विदेहराजकुमारी कहाँ हैं? यहाँ से किस देश में चली गयीं? सुमित्रानन्दन ! मेरी प्रिया सीता को कौन हर ले गया? अथवा किस राक्षस ने खा डाला? 

फिर वे सीता को सम्बोधित करके बोले – सीते! यदि तुम वृक्षों की आड़ में अपने को छिपाकर मुझसे हँसी करना चाहती हो तो इस समय यह हँसी ठीक नहीं है। मैं बहुत दुःखी हो रहा हूँ, तुम मेरे पास आ जाओ। सौम्य स्वभाववाली सीते! जिन विश्वस्त मृगछौनों के साथ तुम खेला करती थी, वे आज तुम्हारे बिना दु:खी हो आँखों में आँसू भरकर चिन्तामग्न हो गये हैं। 

‘लक्ष्मण! सीता से रहित होकर मैं जीवित नहीं रह सकता। सीताहरण जनित महान् शोक ने मुझे चारों ओर से घेर लिया है। निश्चय ही अब परलोक में मेरे पिता महाराज दशरथ मुझे देखेंगे। वे मुझे उपालम्भ देते हुए कहेंगे - 'मैंने तो तुम्हें वनवास के लिये आज्ञा दी थी और तुमने भी वहाँ रहने की प्रतिज्ञा कर ली थी। फिर उतने समय तक वहाँ रहकर उस प्रतिज्ञा को पूर्ण किये बिना ही तुम यहाँ मेरे पास कैसे चले आये? 

‘तुम-जैसे स्वेच्छाचारी, अनार्य और मिथ्यावादी को धिक्कार है। यह बात परलोक में पिताजी मुझसे अवश्य कहेंगे। वरारोहे! सुमध्यमे ! सीते! मैं विवश, शोक संतप्त, दीन, भग्नमनोरथ हो करुणा जनक अवस्था में पड़ गया हूँ। जैसे कुटिल मनुष्य को कीर्ति त्याग देती है, उसी प्रकार तुम मुझे यहाँ छोड़कर कहाँ चली जा रही हो? मुझे न छोड़ो, न छोड़ो। तुम्हारे वियोगमें मैं अपने प्राण त्याग दूँगा।' 

इस प्रकार अत्यन्त दु:ख से आतुर हो विलाप करते हुए रघुकुल- नन्दन श्रीराम सीता के दर्शन के लिये अत्यन्त उत्कण्ठित हो गये, किंतु वे जनकनन्दिनी उन्हें दिखायी न पड़ीं। 

जैसे कोई हाथी किसी बड़ी भारी दलदल में फँसकर कष्ट पा रहा हो, उसी प्रकार सीता को न पाकर अत्यन्त शोक में डूबे हुए श्रीराम से उनके हित की कामना रखकर लक्ष्मण यों बोले – महामते ! आप विषाद न करें; मेरे साथ जानकी को ढूँढने का प्रयत्न करें। वीरवर! यह सामने जो ऊँचा पहाड़ दिखायी देता है, अनेक कन्दराओं से सुशोभित है। 

'भाभी को वन में घूमना प्रिय लगता है, वे वन की शोभा देखकर हर्ष से उन्मत्त हो उठती हैं; अतः वन में गयी होंगी, अथवा सुन्दर कमल के फूलों से भरे हुए इस सरोवर के या मत्स्य तथा वेतसलता से सुशोभित सरिता के तट पर जा पहुँची होंगी। अथवा पुरुष प्रवर! हमलोगों को डराने की इच्छा से हम दोनों उन्हें खोज पाते हैं कि नहीं, इस जिज्ञासा से कहीं वन में ही छिप गयी होंगी। अत: श्रीमन्! वन में जहाँ-जहाँ जानकी के होने की सम्भावना हो, उन सभी स्थानों पर हम दोनों शीघ्र ही उनकी खोज के लिये प्रयत्न करें। रघुनन्दन! यदि आपको मेरी यह बात ठीक लगे तो आप शोक छोड़ दें।' 

लक्ष्मण के द्वारा इस प्रकार सौहार्दपूर्वक समझाये जाने पर श्रीरामचन्द्रजी सावधान हो गये और उन्होंने सुमित्राकुमार के साथ सीता को खोजना आरम्भ किया। दशरथ के वे दोनों पुत्र सीता की खोज करते हुए वनों में, पर्वतों पर, सरिताओं और सरोवरों के किनारे घूम-घूम कर पूरी चेष्टा के साथ अनुसंधान में लगे रहे। उस पर्वत की चोटियों, शिलाओं और शिखरों पर उन्होंने अच्छी तरह जानकी को ढूँढा; किंतु कहीं भी उनका पता नहीं लगा। 

पर्वत के चारों ओर खोजकर श्रीरामचन्द्रजी ने लक्ष्मण से कहा – 'सुमित्रानन्दन! इस पर्वत पर तो मैं सुन्दरी वैदेही को नहीं देख पाता हूँ। 

तब दु:ख से संतप्त हुए लक्ष्मण ने दण्डकारण्य में घूमते-घूमते अपने उद्दीप्त तेजस्वी भाई से इस प्रकार कहा - महामते! जैसे महाबाहु भगवान् विष्णु ने राजा बलि को बाँधकर यह पृथ्वी प्राप्त कर ली थी, उसी प्रकार आप भी मिथिलेशकुमारी जानकी को पा जायँगे। 

वीर लक्ष्मण के ऐसा कहने पर दु:ख से व्याकुलचित्त हुए श्रीरघुनाथजी ने दीन वाणी में कहा - महाप्राज्ञ लक्ष्मण! मैंने सारा वन खोज डाला। विकसित कमलों से भरे हुए सरोवर भी देख लिये तथा अनेक कन्दराओं और झरनों से सुशोभित इस पर्वत को भी सब ओर से छान डाला; परंतु मुझे अपने प्राणों से भी प्यारी वैदेही कहीं दिखायी नहीं पड़ी। 

इस प्रकार सीता-हरण के कष्ट से पीड़ित हो विलाप करते हुए श्रीरामचन्द्रजी दीन और शोकमग्न हो दो घड़ी तक अत्यन्त व्याकुलता में पड़े रहे। उनका सारा अङ्ग विह्वल (शिथिल) हो गया, बुद्धि काम नहीं दे रही थी, चेतना लुप्त सी होती जा रही थी। वे गरम-गरम लंबी साँस खींचते हुए दीन और आतुर होकर विषाद में डूब गये। 

बारंबार उच्छवास लेकर कमलनयन श्रीराम आँसुओं से गद्गद वाणी में ' हा प्रिये!' कहकर बहुत रोने - विलखने लगे। तब शोक से पीड़ित हुए लक्ष्मण ने विनीतभाव से हाथ जोड़कर अपने प्रिय भाई को अनेक प्रकार से सान्त्वना दी। लक्ष्मण के ओष्ठपुटों से निकली हुई इस बात का आदर न करके श्रीरामचन्द्रजी अपनी प्यारी पत्नी सीता को न देखने के कारण उन्हें बारंबार पुकारने और रोने लगे। 

इति श्रीमद् राम कथा अरण्यकाण्ड अध्याय-७ का भाग-५९(59) समाप्त ! 

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