भाग-५८(58) श्रीराम का विलाप करते हुए वृक्षों और पशुओं से सीता का पता पूछना, भ्रान्त होकर रोना और बारंबार उनकी खोज करना

 


आश्रम की ओर आते समय श्रीराम की बायीं आँख की नीचे वाली पलक जोर-जोर से फड़कने लगी। श्रीराम चलते- चलते लड़खड़ा गये और उनके शरीर में कम्प होने लगा। बारंबार इन अपशकुनों को देखकर वे कहने लगे - क्या सीता सकुशल होगी ? 

सीता को देखनेके लिये उत्कण्ठित हो वे बड़ी उतावली के साथ आश्रम पर गये। वहाँ कुटिया सूनी देख उनका मन अत्यन्त उद्विग्न हो उठा रघुनन्दन बड़े वेग से इधर-उधर चक्कर लगाने और हाथ-पैर चलाने लगे। उन्होंने वहाँ जहाँ-तहाँ बनी हुई एक- एक पर्णशाला को चारों ओर से देख डाला, किंतु उस समय उसे सीता से सूनी ही पाया। जैसे हेमन्त ऋतु में कमलिनी हिम से ध्वस्त हो श्रीहीन हो जाती है, उसी प्रकार प्रत्येक पर्णशाला शोभाशून्य हो गयी थी। 

वह स्थान वृक्षों की सनसनाहट के द्वारा मानो रो रहा था, फूल मुरझा गये थे, मृग और पक्षी मन मारे बैठे थे। वहाँ की सम्पूर्ण शोभा नष्ट हो गयी थी । सारी कुटी उजाड़ दिखायी देती थी। वन के देवता भी उस स्थान को छोड़कर चले गये थे। सब ओर मृगचर्म और कुश बिखरे हुए थे। चटाइयाँ अस्त-व्यस्त पड़ी थीं। 

पर्णशाला को सूनी देख भगवान् श्रीराम बारंबार विलाप करने लगे - हाय ! सीता को किसी ने हर तो नहीं लिया। उसकी मृत्यु तो नहीं हो गयी अथवा वह खो तो नहीं गयी या किसी राक्षस ने उसे खा तो नहीं लिया। वह भीरु कहीं छिप तो नहीं गयी है अथवा फल-फूल लाने के लिये वन के भीतर तो नहीं चली गयी। सम्भव है, फल-फूल लाने के लिये ही गयी हो या जल लाने के लिये किसी पुष्करिणी अथवा नदी के तट पर गयी हो। 

श्रीरामचन्द्रजी ने प्रयत्नपूर्वक अपनी प्रिय पत्नी सीता को वन में चारों ओर ढूँढा, किंतु कहीं भी उनका पता न लगा। शोक के कारण श्रीमान् राम की आँखें लाल हो गयीं। वे उन्मत्त के समान दिखायी देने लगे। एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष के पास दौड़ते हुए वे पर्वतों, नदियों और नदों के किनारे घूमने लगे। 

शोक से समुद्र में डूबे हुए श्रीरामचन्द्रजी विलाप करते-करते वृक्षों से पूछने लगे – कदम्ब ! मेरी प्रिया सीता तुम्हारे पुष्प से बहुत प्रेम करती थी, क्या वह यहाँ है? क्या तुमने उसे देखा है? यदि जानते हो तो उस शुभानना सीता का पता बताओ। उसके अङ्ग सुस्निग्ध पल्लवों के समान कोमल हैं तथा शरीर पर पीले रंग की रेशमी साड़ी शोभा पाती है। बिल्व ! मेरी प्रिया के स्तन तुम्हारे ही समान हैं। यदि तुमने उसे देखा हो तो बताओ अथवा अर्जुन! तुम्हारे फूलों पर मेरी प्रिया का विशेष अनुराग था, अत: तुम्हीं उसका कुछ समाचार बताओ। कृशाङ्गी जनककिशोरी जीवित है या नहीं। 

‘यह ककुभ- अपने ही समान ऊरु वाली मिथिलेशकुमारी को अवश्य जानता होगा; क्योंकि यह वनस्पति लता, पल्लव तथा फूलों से सम्पन्न हो बड़ी शोभा पा रहा है। ककुभ ! तुम सब वृक्षों में श्रेष्ठ हो, क्योंकि ये भ्रमर तुम्हारे समीप आकर अपने झंकारों द्वारा तुम्हारा यशोगान करते हैं। (तुम्हीं सीता का पता बताओ, अहो ! यह भी कोई उत्तर नहीं दे रहा है।) यह तिलक वृक्ष अवश्य सीता के विषय में जानता होगा; क्योंकि मेरी प्रिया सीता को भी तिलक से प्रेम था।' 

'अशोक ! तुम शोक दूर करनेवाले हो। इधर मैं शोक से अपनी चेतना खो बैठा हूँ। मुझे मेरी प्रियतमा का दर्शन कराकर शीघ्र ही अपने-जैसे नाम वाला बना दो - मुझे अशोक (शोकहीन) कर दो। ताल वृक्ष! तुम्हारे पके हुए फल के समान स्तन वाली सीता को यदि तुमने देखा हो तो बताओ। यदि मुझ पर तुम्हें दया आती हो तो उस सुन्दरी के विषय में अवश्य कुछ कहो। जामुन! जाम्बूनद (सुवर्ण) के समान कान्तिवाली मेरी प्रिया यदि तुम्हारी दृष्टि में पड़ी हो, यदि तुम उसके विषय में कुछ जानते हो तो निःशङ्क होकर मुझे बताओ। कनेर! आज तो फूलों के लगने से तुम्हारी बड़ी शोभा हो रही है। अहो ! मेरी प्रिया साध्वी सीता को तुम्हारे ये पुष्प बहुत पसंद थे। यदि तुमने उसे कहीं देखा हो तो मुझसे कहो।' 

इसी प्रकार आम, कदम्ब, विशाल शाल, कटहल, कुरव, धव और अनार आदि वृक्षों को भी देखकर महायशस्वी श्रीरामचन्द्रजी उनके पास गये और बकुल, पुन्नाग, चन्दन तथा केवड़े आदि के वृक्षों से भी पूछते फिरे। उस समय वे वन में पागल की तरह इधर-उधर भटकते दिखायी देते थ।  अपने सामने हिरण को देखकर वे बोले – 'मृग ! अथवा तुम्हीं बताओ! मृगनयनी मैथिली को जानते हो। मेरी प्रिया की दृष्टि भी तुम हिरणों की-सी है, अतः सम्भव है, वह हिरणियों के ही साथ हो। श्रेष्ठ गजराज! तुम्हारी सूँड़ के समान ही जिसके दोनों ऊरु हैं, उस सीता को सम्भवत: तुमने देखा होगा। मालूम होता है, तुम्हें उसका पता विदित है, अत: बताओ! वह कहाँ है? व्याघ्र! यदि तुमने मेरी प्रिया चन्द्रमुखी मैथिली को देखा हो तो निःशङ्क होकर बता दो, मुझसे तुम्हें कोई भय नहीं होगा 

इतने ही में उनको भ्रम हुआ कि सीता उधर भागकर छिप रही है, तब वे बोले –  प्रिये! क्यों भागी जा रही हो। कमललोचने! निश्चय ही मैंने तुम्हें देख लिया है। तुम वृक्षों की ओट में अपने आपको छिपाकर मुझसे बात क्यों नहीं करती हो? वरारोहे! ठहरो, ठहरो। क्या तुम्हें मुझ पर दया नहीं आती है। अधिक हास-परिहास करने का तुम्हारा स्वभाव तो नहीं था, फिर किसलिये मेरी उपेक्षा करती हो? सुन्दरी ! पीली रेशमी साड़ी से ही, तुम कहाँ हो – यह सूचना मिल जाती है। भागी जाती हो तो भी मैंने तुम्हें देख लिया है। यदि मेरे प्रति स्नेह एवं सौहार्द हो तो खड़ी हो जाओ। 

(फिर भ्रम दूर होने पर बोले) अथवा निश्चय ही वह नहीं है। उस मनोहर मुसकान वाली सीता को राक्षसों ने मार डाला, अन्यथा इस तरह संकट में पड़े हुए की (मेरी) वह कदापि उपेक्षा नहीं कर सकती थी। स्पष्ट जान पड़ता है कि मांसभक्षी राक्षसों ने मुझसे बिछुड़ी हुई मेरी भोली-भाली प्रिया मैथिली को उसके सारे अङ्ग बाँटकर खा लिया।' 

‘सुन्दर दाँत, मनोहर ओष्ठ, सुघड़ नासिका से युक्त तथा रुचिर कुण्डलों से अलंकृत वह पूर्ण चन्द्रमा के समान अभिराम मुख राक्षसों का ग्रास बनकर निश्चय ही अपनी प्रभा खो बैठा होगा। रोती-बिलखती हुई प्रियतमा सीता की वह चम्पा के समान वर्ण वाली कोमल एवं सुन्दर ग्रीवा, जो हार और हँसली आदि आभूषण पहनने के योग्य थी, निशाचरों का आहार बन गयी।' 

'वे नूतन पल्लवों के समान कोमल भुजाएँ, जो इधर-उधर पटकी जा रही होंगी और जिनके अग्रभाग काँप रहे होंगे, हाथों के आभूषण तथा बाजूबंद सहित निश्चय ही राक्षसों के पेट में चली गयीं। मैंने राक्षसों का भक्ष्य बनने के लिये ही उस बाला को अकेली छोड़ दिया। यद्यपि उसके बन्धु बान्धव बहुत हैं, तथापि वह यात्रियों के समुदाय से विलग हुई किसी अकेली स्त्री की भाँति निशाचरों का ग्रास बन गयी। हा महाबाहु लक्ष्मण! क्या तुम कहीं मेरी प्रियतमा को देखते हो ! हा प्रिये! हा भद्रे ! हा सीते! तुम कहाँ चली गयी?' 

इस तरह बारंबार विलाप करते हुए श्रीरामचन्द्रजी एक वन से दूसरे वन में दौड़ने लगे। वे कहीं सीता की समानता पाकर उद्धान्त हो उठते (उछल पड़ते थे) और कहीं शोक की प्रबलता के कारण विभ्रान्त हो जाते (बवंडर की भाँति चक्कर काटने लगते थे।)  अपनी प्रियतमा की खोज करते हुए वे कभी - कभी पागलों की-सी चेष्टा करने लगते थे। उन्होंने बड़ी दौड़-धूप करके कहीं भी विश्राम न करते हुए वनों, नदियों, पर्वतों, पहाड़ी झरनों और विभिन्न काननों में घूम-घूमकर अन्वेषण किया। 

उस समय मिथिलेशकुमारी को ढूँढने के लिये वे उस विशाल एवं विस्तृत वन में गये और सबमें चक्कर लगाकर थक गये तो भी निराश नहीं हुए। उन्होंने पुनः अपनी प्रियतमा के अनुसंधान के लिये बड़ा भारी परिश्रम किया।  

इति श्रीमद् राम कथा अरण्यकाण्ड अध्याय-७ का भाग-५८(58) समाप्त ! 

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