(आश्रम में आने से पहले मार्ग में श्रीराम और लक्ष्मण ने परस्पर जो बातें की थीं, उन्हें पुन: विस्तार के साथ बता रहे हैं)।
सीता के कथनानुसार आश्रम से अपने पास आये हुए सुमित्राकुमार लक्ष्मण से मार्ग में भी रघुकुलनन्दन श्रीराम ने बड़े दु:ख से यह बात पूछी - लक्ष्मण! जब मैंने तुम्हारे विश्वास पर ही वन में सीता को छोड़ा था, तब तुम उसे अकेली छोड़कर क्यों चले आये? लक्ष्मण! मिथिलेशकुमारी को छोड़कर तुम जो मेरे पास आये हो, तुम्हें देखते ही जिस महान् अनिष्टक आशङ्का करके मेरा मन व्यथित हो रहा था, वह सत्य जान पड़ने लगा है। लक्ष्मण! मेरी बायीं आँख और बायीं भुजा फड़क रही है। तुम्हें आश्रम से दूर सीता के बिना ही मार्ग पर आते देख मेरा हृदय भी धक-धक कर रहा है।
श्रीरामचन्द्रजी के ऐसा कहने पर उत्तम लक्षणों से सम्पन्न सुमित्रा कुमार लक्ष्मण अत्यन्त दु:खी होकर अपने शोकग्रस्त भाई श्रीराम से बोले – भैया! मैं स्वयं अपनी इच्छा से उन्हें छोड़कर नहीं आया हूँ। उन्हीं के कठोर वचनों से प्रेरित होकर मुझे आपके पास आना पड़ा है। आपके ही समान स्वर में किसी ने जोर से पुकारा, 'लक्ष्मण! मुझे बचाओ।' यह वाक्य मिथिलेशकुमारी के कानों में भी पड़ा। उस आर्तनाद को सुनकर मैथिली आपके प्रति स्नेह के कारण भय से व्याकुल हो गयीं और रोती हुई मुझसे तुरंत बोलीं- 'जाओ, जाओ'।
‘जब बारंबार उन्होंने 'जाओ' कहकर मुझे प्रेरित किया, तब उन्हें विश्वास दिलाते हुए मैंने मैथिली से यह बात कही - भाभी! मैं ऐसे किसी राक्षस को नहीं देखता, जो भगवान् श्रीराम को भी भय में डाल सके। आप शान्त रहें, यह भैया की आवाज नहीं है। किसी दूसरे ने इस तरह की पुकार की है। भाभी ! जो देवताओं की भी रक्षा कर सकते हैं, वे मेरे बड़े भाई ‘मुझे बचाओ' ऐसा निन्दित (कायरतापूर्ण) वचन कैसे कहेंगे? किसी दूसरे ने किसी बुरे उद्देश्य से मेरे भैया के स्वर की नकल करके 'लक्ष्मण! मुझे बचाओ' यह बात जोर से कही है।
‘शोभने! उस राक्षस ने ही भय के कारण ( मुझे बचाओ ) यह बात मुँह से निकाली है। आपको व्यथित नहीं होना चाहिये। ऐसी व्यथा को नीच श्रेणी की स्त्रियाँ ही अपने मन में स्थान देती हैं। आप व्याकुल मत होओ, स्वस्थ हो जाओ, चिन्ता छोड़ो। तीनों लोकों में ऐसा कोई पुरुष न तो उत्पन्न हुआ है, न हो रहा है और न होगा ही, जो युद्ध में श्रीरघुनाथजी को परास्त कर सके। संग्राम में इन्द्र आदि देवता भी श्रीराम को नहीं जीत सकते।'
'मेरे ऐसा कहने पर विदेहराजकुमारी की चेतना मोह से आच्छन्न हो गयी। वे आँसू बहाती हुई मुझसे अत्यन्त कठोर वचन बोलीं - "लक्ष्मण! तेरे मन में मेरे लिये अत्यन्त पापपूर्ण भाव भरा है। तू अपने भाई के मरने पर मुझे प्राप्त करना चाहता है, परंतु मुझे पा नहीं सकेगा। तू भरत के इशारेसे अपने स्वार्थ के लिये श्रीरामचन्द्रजी के पीछे-पीछे आया है। तभी तो वे जोर-जोर से चिल्ला रहे हैं और तू उनके पास जाता तक नहीं है। तू अपने भाई का छिपा हुआ शत्रु है। मेरे लिये ही श्रीराम का अनुसरण करता है और श्रीराम के छिद्र ढूँढ़ रहा है। तभी तो संकट के समय उनके पास जाने का नाम नहीं लेता है।"
‘विदेहकुमारी के ऐसा कहने पर मैं रोष से भर गया। मेरी आँखें लाल हो गयीं और क्रोध से मेरे होंठ फड़कने लगे। इस अवस्था में मैं आश्रम से निकल आया।'
लक्ष्मण की ऐसी बात सुनकर श्रीरामचन्द्रजी संताप से मोहित हो गये और उनसे बोले – सौम्य ! तुमने बड़ा बुरा किया, जो तुम सीता को छोड़कर यहाँ चले आये। मैं राक्षसों का निवारण करने में समर्थ हूँ, यह जानते हुए भी तुम मैथिली के क्रोधयुक्त वचन से उत्तेजित होकर निकल पड़े। क्रोध में भरी हुई नारी के कठोर वचन को सुनकर जो तुम मिथिलेशकुमारी को छोड़कर यहाँ चले आये, इससे मैं तुम्हारे ऊपर संतुष्ट नहीं हूँ।
'सीता से प्रेरित होकर क्रोध के वशीभूत हो तुमने मेरे आदेश का पालन नहीं किया; यह सर्वथा तुम्हारा अन्याय है। जिसने मृगरूप धारण करके मुझे आश्रम से दूर हटा दिया, वह राक्षस मेरे बाणों से घायल होकर सदा के लिये सो रहा है। धनुष खींचकर उस बाण का संधान करके मैंने लीलापूर्वक चलाये हुए बाणों से ज्यों ही उस मृग को मारा, त्यों ही वह मृग के शरीर का परित्याग करके बाँहों में बाजूबंद धारण करने वाला राक्षस बन गया। उसके स्वर में बड़ी व्याकुलता आ गयी थी। बाण से आहत होने पर ही उसने आर्तवाणी में मेरे स्वर की नकल करके बहुत दूर तक सुनायी देने वाला वह अत्यन्त दारुण वचन कहा था, जिससे तुम मिथिलेशकुमारी सीता को छोड़कर यहाँ चले आये हो।
इति श्रीमद् राम कथा अरण्यकाण्ड अध्याय-७ का
