भाग-५६(56) मार्ग में अनेक प्रकार की आशङ्का करते हुए लक्ष्मण सहित श्रीराम का आश्रम में आना और वहाँ सीता को न पाकर व्यथित होना

 


लक्ष्मण को दीन, संतोष शून्य तथा सीता को साथ लिये बिना आया देख धर्मात्मा दशरथनन्दन श्रीराम ने पूछा - लक्ष्मण! जो दण्डकारण्य की ओर प्रस्थित होने पर अयोध्या से मेरे पीछे-पीछे चली आयी तथा जिसे तुम अकेली छोड़कर यहाँ आ गये, वह विदेहराजकुमारी सीता इस समय कहाँ है? मैं राज्य से भ्रष्ट और दीन होकर दण्डकारण्य में चक्कर लगा रहा हूँ । इस दुःख में जो मेरी सहायिका हुई, वह तनुमध्यमा (सूक्ष्म कटिप्रदेश वाली) विदेहराजकुमारी कहाँ है? 

'वीर ! जिसके बिना मैं दो घड़ी भी जीवित नहीं रह सकता तथा जो मेरे प्राणों की सहचरी है, वह देवकन्या के समान सुन्दरी सीता इस समय कहाँ है ? |लक्ष्मण! तपाये हुए सोने के समान कान्तिवाली जनकनन्दिनी सीता के बिना मैं पृथ्वी का राज्य और देवताओं का आधिपत्य भी नहीं चाहता। वीर! जो मुझे प्राणों से भी बढ़कर प्रिय है, वह विदेहराजकुमारी सीता क्या अब जीवित होगी? मेरा वन में आना सीता को खो देने के कारण व्यर्थ तो नहीं हो जायगा ?' 

‘सुमित्रानन्दन! सीता के नष्ट हो जाने के कारण जब मैं मर जाऊँगा और तुम अकेले ही अयोध्या को लौटोगे, उस समय क्या माता कैकेयी सफल मनोरथ एवं सुखी होगी ? जिसका इकलौता पुत्र मैं मर जाऊँगा, वह तपस्विनी माता कौशल्या क्या पुत्र और राज्य से सम्पन्न तथा कृतकृत्य हुई माता कैकेयी की सेवा में विनीतभाव से उपस्थित होगी ?' 

‘लक्ष्मण! यदि विदेहनन्दिनी सीता जीवित होगी, तभी मैं फिर आश्रम में पैर रखूँगा। यदि सदाचार-परायणा मैथिली मर गयी होगी तो मैं भी प्राणों का परित्याग कर दूँगा। लक्ष्मण! यदि आश्रम में जाने पर विदेहराजकुमारी सीता हँसते हुए मुख से सामने आकर मुझसे बात नहीं करेगी तो मैं जीवित नहीं रहूँगा। लक्ष्मण! बोलो तो सही ! वैदेही जीवित है या नहीं? तुम्हारे असावधान होने के कारण राक्षस उस तपस्विनी को खा तो नहीं गये?' 

‘जो सुकुमारी है, बाला (भोली-भाली है) तथा जिसने वनवास के पहले दुःख का अनुभव नहीं किया था, वह वैदेही आज मेरे वियोग से व्यथित-चित्त होकर अवश्य ही शोक कर रही होगी। उस कुटिल एवं दुरात्मा राक्षस ने उच्च स्वर से 'हा लक्ष्मण !' ऐसा पुकारकर तुम्हारे मन में भी सर्वथा भय उत्पन्न कर दिया। जान पड़ता है, वैदेही ने भी मेरे स्वर से मिलता-जुलता उस राक्षस का स्वर सुन लिया और भयभीत होकर तुम्हें भेज दिया और तुम भी शीघ्र ही मुझे देखने के लिये चले आये।' 

‘जो भी हो - तुमने वन में सीता को अकेली छोड़कर सर्वथा दुःखद कार्य कर डाला। क्रूर कर्म करने वाले राक्षसों को बदला लेने का अवसर दे दिया। मांसभक्षी निशाचर मेरे हाथों खर के मारे जाने से बहुत दुःखी थे। उन घोर राक्षसों ने सीता को मार डाला होगा, इसमें संशय नहीं है शत्रुनाशन! मैं सर्वथा संकट के समुद्र में डूब गया हूँ। ऐसे दुःख का अवश्य ही अनुभव करना पड़ेगा – ऐसी शङ्का हो रही है। अत: अब मैं क्या करूँ ?' 

इस प्रकार सुन्दरी सीता के विषय में चिन्ता करते हुए ही लक्ष्मण सहित श्रीरघुनाथजी तुरंत जनस्थान में आये। अपने दु:खी अनुज लक्ष्मण को कोसते एवं भूख-प्यास तथा परिश्रम से लंबी साँस खींचते हुए सूखे मुँहवाले श्रीरामचन्द्रजी आश्रम के निकटवर्ती स्थान पर आकर उसे सूना देख विषाद में डूब गये। वीर श्रीराम ने आश्रम में प्रवेश करके उसे भी सूना देख कुछ ऐसे स्थलों में अनुसंधान किया, जो सीता के विहारस्थान थे। उन्हें भी सूना पाकर उस क्रीड़ा भूमि में यही वह स्थान है, जहाँ मैंने अमुक प्रकार की क्रीड़ा की थी, ऐसा स्मरण करके उनके शरीर में रोमाञ्च हो आया और वे व्यथा से पीड़ित हो गये। 

इति श्रीमद् राम कथा अरण्यकाण्ड अध्याय-७ का भाग-५६(56) समाप्त ! 

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