भाग-५४(54) ब्रह्माजी की आज्ञा से देवराज इन्द्र का निद्रा सहित लङ्का में जाकर सीता को दिव्य खीर अर्पित करना और उनसे विदा लेकर लौटना

 


जब सीता का लङ्का में प्रवेश हो गया, तब पितामह ब्रह्माजी ने संतुष्ट हुए देवराज इन्द्र से इस प्रकार कहा - देवराज! तीनों लोकों के हित और राक्षसों के विनाश के लिये दुरात्मा रावण ने (साक्षात् देवी लक्ष्मी) सीता को लङ्का में पहुँचा दिया। पतिव्रता महाभागा जानकी सदा सुख में ही पली हैं। इस समय वे अपने पति के दर्शन से वंचित हो गयी हैं और राक्षसियों से घिरी रहने के कारण सदा उन्हीं को अपने सामने देखती हैं। उनके हृदय में अपने पति के दर्शन की तीव्र लालसा बनी हुई है। 

'लङ्कापुरी समुद्र के तट पर बसी हुई है। वहाँ रहती हुई सती-साध्वी सीता का पता श्रीरामचन्द्रजी को कैसे लगेगा। सीता दुःख के साथ नाना प्रकार की चिन्ताओंमें डूबी रहती हैं। पति के लिये इस समय वे अत्यन्त दुर्लभ हो गयी हैं। प्राणयात्रा (भोजन) नहीं करती हैं; अतः ऐसी दशा में नि:संदेह वे अपने प्राणों का परित्याग कर देंगी। सीता के प्राणों का क्षय हो जाने पर हमारे उद्देश्य की सिद्धि में पुनः पूर्ववत् संदेह उपस्थित हो जायगा। अत: तुम शीघ्र ही यहाँ से जाकर लङ्कापुरी में प्रवेश करके सुमुखी सीता से मिलो और उन्हें उत्तम हविष्य (दिव्य खीर) प्रदान करो। 

ब्रह्माजी के ऐसा कहने पर पाकशासन भगवान् इन्द्र निद्रा को साथ लेकर रावण द्वारा पालित लङ्कापुरी में आये। 

वहाँ आकर इन्द्र ने निद्रा से कहा – 'तुम राक्षसों को मोहित करो।' 

इन्द्र से ऐसी आज्ञा पाकर देवी निद्रा बहुत प्रसन्न हुईं। देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिये उन्होंने राक्षसों को मोह (निद्रा) में डाल दिया। 

इसी बीच में सहस्र नेत्रधारी शचीपति देवराज इन्द्र अशोक वाटिका में बैठी हुई सीता के पास गये और इस प्रकार बोले – पवित्र मुसकानवाली देवी ! आपका भला हो। मैं देवराज इन्द्र यहाँ आपके पास आया हूँ। जनककिशोरी ! मैं आपके उद्धार कार्य की सिद्धि के लिये महात्मा श्रीरघुनाथजी की सहायता करूँगा, अतः आप शोक न करें। वे मेरे प्रसाद से बड़ी भारी सेना के साथ समुद्र को पार करेंगे। शुभे ! मैंने ही यहाँ इन राक्षसियों को अपनी माया से मोहित किया है। 

‘विदेहनन्दिनी सीते! इसलिये मैं स्वयं ही यह भोजन – यह हविष्यान्न लेकर निद्रा के साथ तुम्हारे पास आया हूँ। शुभे! रम्भोरु! यदि मेरे हाथ से इस हविष्य को लेकर खा लोगी तो तुम्हें हजारों वर्षों तक भूख और प्यास नहीं सतायेगी।' 

देवराज के ऐसा कहने पर शङ्कित हुई सीता ने उनसे कहा – मुझे कैसे विश्वास हो कि आप शचीपति देवराज इन्द्र ही यहाँ पधारे हैं ? देवेन्द्र! मैंने श्रीराम और लक्ष्मण के समीप देवताओं के लक्षण अपनी आँखों देखे हैं। यदि आप साक्षात् देवराज हैं तो उन लक्षणों को दिखाइये। 

सीता की यह बात सुनकर शचीपति इन्द्र ने वैसा ही किया। उन्होंने अपने पैरों से पृथ्वी का स्पर्श नहीं किया - आकाश में निराधार खड़े रहे। उनकी आँखों की पलकें नहीं गिरती थीं। उन्होंने जो वस्त्र धारण किया था, उस पर धूल का स्पर्श नहीं होता था। उनके कण्ठ में जो पुष्पमाला थी, उसके पुष्प कुम्हलाते नहीं थे। देवोचित लक्षणों से इन्द्र को पहचानकर सीता बहुत प्रसन्न हुई। 

वे भगवान् श्रीराम के लिये रोती हुई बोलीं - 'भगवन्! सौभाग्य की बात है कि आज भाई सहित महाबाहु श्रीरघुवीर का नाम मेरे कानों में पड़ा है। 

'मेरे लिये जैसे मेरे श्वशुर महाराज दशरथ तथा पिता मिथिला नरेश जनक हैं, उसी रूप में मैं आज आपको देखती हूँ। मेरे पति आपके द्वारा सनाथ हैं। देवेन्द्र! आपकी आज्ञा से मैं यह पायस रूप हविष्य (दूध की बनी हुई खीर), जिसे आपने दिया है, खाऊँगी। यह रघुकुल की वृद्धि करने वाला हो।' 

इन्द्र के हाथ से उस खीर को लेकर उन पवित्र मुसकान वाली मैथिली ने मन-ही-मन पहले उसे अपने स्वामी श्रीराम और देवर लक्ष्मण को निवेदन किया और इस प्रकार कहा – यदि मेरे महाबली स्वामी अपने भाई के साथ जीवित हैं तो यह भक्तिभाव से उन दोनों के लिये समर्पित है। 

इतना कहने के पश्चात् उन्होंने स्वयं उस खीर को खाया। इस प्रकार उस हविष्य को खाकर सुन्दर मुखवाली जानकी ने भूख-प्यास के कष्ट को त्याग दिया और इन्द्र के मुख से श्रीराम तथा लक्ष्मण का समाचार पाकर वे जनकनन्दिनी मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुईं। तब निद्रासहित महात्मा देवराज इन्द्र भी प्रसन्न हो सीता से विदा लेकर श्रीरामचन्द्रजी के कार्य की सिद्धि के लिये अपने निवास स्थान देवलोक को चले गये। 

इति श्रीमद् राम कथा अरण्यकाण्ड अध्याय-७ का भाग-५४(54) समाप्त ! 

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