भाग-५३(53) सीता का श्रीराम के प्रति अपना अनन्य अनुराग दिखाकर रावण को फटकारना तथा रावण की आज्ञा से राक्षसियों का उन्हें अशोक वाटिका में ले जाकर डराना

 


रावण के ऐसा कहने पर शोक से कष्ट पाती हुई विदेह राजकुमारी सीता बीच में तिनके की ओट करके उस निशाचर से निर्भय होकर बोलीं - महाराज दशरथ धर्म के अचल सेतु के समान थे। वे अपनी सत्यप्रतिज्ञता के लिये सर्वत्र विख्यात थे। उनके पुत्र जो रघुकुलभूषण श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे भी अपने धर्मात्मापन के लिये तीनों लोकों में प्रसिद्ध हैं, उनकी भुजाएँ लंबी और आँखें बड़ी-बड़ी हैं। वे ही मेरे आराध्य देवता और पति हैं। उनका जन्म इक्ष्वाकुकुल में हुआ है। उनके कंधे सिंह के समान और तेज महान् है। वे अपने भाई लक्ष्मण के साथ आकर तेरे प्राणों का विनाश कर डालेंगे। 

‘यदि तू उनके सामने बलपूर्वक मेरा अपहरण करता तो अपने भाई खर की तरह जनस्थान के युद्धस्थल में ही मारा जाकर सदा के लिये सो जाता। तूने जो इन घोर रूपधारी महाबली राक्षसों की चर्चा की है, श्रीराम के पास जाते ही इन सबका विष उतर जायगा; ठीक उसी तरह जैसे गरुड़ के पास सारे सर्प विष के प्रभाव से रहित हो जाते हैं। जैसे बढ़ी हुई गङ्गा की लहरें अपने कगारों को काट गिराती हैं, उसी प्रकार श्रीराम के धनुष की डोरी से छूटे हुए सुवर्णभूषित बाण तेरे शरीर को छिन्न-भिन्न कर डालेंगे।' 

‘रावण! तू असुरों अथवा देवताओं से यदि अवध्य है तो सम्भव है वे तुझे न मार सकें; किंतु भगवान् श्रीराम के साथ यह महान् वैर ठानकर तू किसी तरह जीवित नहीं छूट सकेगा। श्रीरघुनाथजी बड़े बलवान् हैं। वे तेरे शेष जीवन का अन्त कर डालेंगे। यूप में बँधे हुए पशु की भाँति तेरा जीवन दुर्लभ हो जायगा। राक्षस! यदि श्रीरामचन्द्रजी अपनी रोष भरी दृष्टि से तुझे देख लें तो तू अभी उसी तरह जलकर खाक हो जायगा जैसे भगवान् शङ्कर ने कामदेव को भस्म किया था।' 

‘जो चन्द्रमा को आकाश से पृथ्वी पर गिराने या नष्ट करने की शक्ति रखते हैं अथवा जो समुद्र को भी सुखा सकते हैं, वे भगवान् श्रीराम यहाँ पहुँचकर सीता को भी छुड़ा सकते हैं। तू समझ ले कि तेरे प्राण अब चले गये। तेरी राज्यलक्ष्मी नष्ट हो गयी। तेरे बल और इन्द्रियों का भी नाश हो गया तथा तेरे ही पाप के कारण तेरी यह लङ्का भी अब विधवा हो जायगी।' 

‘तेरा यह पापकर्म तुझे भविष्य में सुख नहीं भोगने देगा; क्योंकि तूने मुझे बलपूर्वक पति के पास से दूर हटाया है। मेरे स्वामी महान् तेजस्वी हैं और मेरे देवर के साथ अपने ही पराक्रम का भरोसा करके सूने दण्डकारण्य में निर्भयतापूर्वक निवास करते हैं। वे युद्ध में बाणों की वर्षा करके तेरे शरीर से बल, पराक्रम, घमंड तथा ऐसे उच्छ्रङ्खल आचरण को भी निकाल बाहर करेंगे।' 

‘जब काल की प्रेरणा से प्राणियों का विनाश निकट आता है, उस समय मृत्यु के अधीन हुए जीव प्रत्येक कार्य में प्रमाद करने लगते हैं। अधम निशाचर! मेरा अपहरण करने के कारण तेरे लिये भी वही काल आ पहुँचा है। तेरे अपने लिये, सारे राक्षसों के लिये तथा इस अन्त: पुर के लिये भी विनाश की घड़ी निकट आ गयी है।' 

‘यज्ञशाला के बीच की वेदी पर, जो द्विजातियों के मन्त्र द्वारा पवित्र की गयी होती है तथा जिसे स्रुक्, स्रुवा आदि यज्ञपात्र सुशोभित करते हैं, चाण्डाल अपना पैर नहीं रख सकता। उसी प्रकार मैं नित्य धर्मपरायण भगवान् श्रीराम की धर्मपत्नी हूँ तथा दृढ़तापूर्वक पातिव्रत्य धर्म का पालन करती हूँ (अत: यज्ञवेदी के समान हूँ) और राक्षसाधम ! तू महापापी है (अत: चाण्डालके तुल्य है); इसलिये मेरा स्पर्श नहीं कर सकता। जो सदा कमल के समूहों में राजहंस के साथ क्रीड़ा करती है, वह हंसी तृणों में रहने वाले जलकाक की ओर कैसे दृष्टिपात करेगी।' 

'राक्षस! तू इस संज्ञाशून्य जड शरीर को बाँधकर रख ले या काट डाल। मैं स्वयं ही इस शरीर और जीवन को नहीं रखना चाहती। मैं इस भूतल पर अपने लिये निन्दा या कलङ्क देने वाला कोई कार्य नहीं कर सकती।' 

रावण से क्रोधपूर्वक यह अत्यन्त कठोर वचन कह्कर विदेहकुमारी जानकी चुप हो गयीं; वे वहाँ फिर कुछ नहीं बोलीं। 

सीता का वह कठोर वचन रोंगटे खड़े कर देनेवाला था। उसे सुनकर रावण ने उनसे भय दिखाने वाली बात कही – मनोहर हास्यवाली भामिनि ! मिथिलेशकुमारी! मेरी बात सुन लो। मैं तुम्हें बारह महीने का समय देता हूँ। इतने समय में यदि तुम स्वेच्छापूर्वक मेरे पास नहीं आओगी तो मेरे रसोइये सवेरे का कलेवा तैयार करने के लिये तुम्हारे शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर डालेंगे। 

सीता से ऐसी कठोर बात कहकर शत्रुओं को रुलाने वाला रावण कुपित हो राक्षसियों से इस प्रकार बोला – अपने विकराल रूप के कारण भयङ्कर दिखायी देनेवाली तथा रक्त-मांस का आहार करने वाली राक्षसियो ! तुमलोग शीघ्र ही इस सीता का अहंकार दूर करो। 

रावण के इतना कहते ही वे भयंकर दिखायी देने वाली अत्यन्त घोर राक्षसियाँ हाथ जोड़े मैथिली को चारों ओर से घेरकर खड़ी हो गयीं। 

तब राजा रावण अपने पैरों के धमाके से पृथ्वी को विदीर्ण करता हुआ-सा दो-चार पग चलकर उन भयानक राक्षसियों से बोला – निशाचरियो! तुम लोग मिथिलेशकुमारी सीता को अशोकवाटिका में ले जाओ और चारों ओर से घेरकर वहाँ गूढ़ भाव से इसकी रक्षा करती रहो। वहाँ पहले तो भयंकर गर्जन - तर्जन करके इसे डराना; फिर मीठे-मीठे वचनों से समझा-बुझाकर जंगल की हथिनी की भाँति इस मिथिलेशकुमारी को तुम सब लोग वश में लाने की चेष्टा करना। 

रावण के इस प्रकार आदेश देने पर वे राक्षसियाँ मैथिली को साथ लेकर अशोकवाटिका में चली गयीं। वह वाटिका समस्त कामनाओं को फल रूप में प्रदान करने वाले कल्पवृक्षों तथा भाँति-भाँति के फल-फूलवाले दूसरे दूसरे वृक्षों से भी भरी थी तथा हर समय मदमत्त रहने वाले पक्षी उसमें निवास करते थे। परंतु वहाँ जाने पर मिथिलेशकुमारी जानकी के अङ्ग अङ्ग में शोक व्याप्त हो गया। राक्षसियों के वश में पड़कर उनकी दशा बाघिनों के बीच में घिरी हुई हिरणी के समान हो गयी थी। 

महान् शोक से ग्रस्त हुई मिथिलेशनन्दिनी जानकी जाल में फँसी हुई मृगी के समान भयभीत हो क्षणभर के लिये भी चैन नहीं पाती थीं। विकराल रूप और नेत्रों वाली राक्षसियों की अत्यन्त डाँट फटकार सुनने के कारण मिथिलेशकुमारी सीता को वहाँ शान्ति नहीं मिली। वे भय और शोक से पीड़ित हो प्रियतम पति और देवर का स्मरण करती हुई अचेत-सी हो गयीं। 

इति श्रीमद् राम कथा अरण्यकाण्ड अध्याय-७ का भाग-५३(53) समाप्त ! 

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