रावण को आकाश में उड़ते देख मिथिलेशकुमारी जानकी दु:खमग्न हो अत्यन्त उद्विग्न हो रही थीं। वे बहुत बड़े भय में पड़ गयी थीं। रोष और रोदन के कारण उनकी आँखें लाल हो गयी थीं। हरी जाती हुई सीता करुणाजनक स्वर में रोती हुई उस भयंकर नेत्र वाले राक्षसराज से इस प्रकार बोलीं - ओ नीच रावण! क्या तुझे अपने इस कुकर्म से लज्जा नहीं आती है, जो मुझे स्वामी से रहित अकेली और असहाय जानकर चुराये लिये भागा जाता है? दुष्टात्मन्! तू बड़ा कायर और डरपोक है। निश्चय ही मुझे हर ले जाने की इच्छा से तूने ही माया द्वारा मृग रूप में उपस्थित हो मेरे स्वामी को आश्रम से दूर हटा दिया था। मेरे श्वशुर के सखा वे जो बूढ़े जटायु मेरी रक्षा करने के लिये उद्यत हुए थे, उनको भी तूने मार गिराया।
‘नीच राक्षस! अवश्य तुझ में बड़ा भारी बल दिखायी देता है (क्योंकि तू बूढ़े पक्षी को भी मार गिराता है!), तूने अपना नाम बताकर श्रीरघुवीर-लक्ष्मण के साथ युद्ध करके मुझे नहीं जीता है। ओ नीच! जहाँ कोई रक्षक न हो - ऐसे स्थान पर जाकर परायी स्त्री के अपहरण जैसा निन्दित कर्म करके तू लज्जित कैसे नहीं होता है ? तू तो अपने को बड़ा शूर-वीर मानता है, परंतु संसार के सभी वीर पुरुष तेरे इस कर्म को घृणित, क्रूरतापूर्ण और पापरूप ही बतायेंगे।'
'तूने पहले स्वयं ही जिसका बड़े ताव से वर्णन किया था, तेरे उस शौर्य और बल को धिक्कार है! कुल में कलङ्क लगाने वाले तेरे ऐसे चरित्र को संसार में सदा धिक्कार ही प्राप्त होगा। किंतु इस समय क्या किया जा सकता है? क्योंकि तू बड़े वेग से भागा जा रहा है। अरे! दो घड़ी भी तो ठहर जा, फिर यहाँ से जीवित नहीं लौट सकेगा। उन दोनों राजकुमारों के दृष्टिपथ में आ जाने पर तू सेना के साथ हो तो भी दो घड़ी भी जीवित नहीं रह सकता। जैसे कोई आकाशचारी पक्षी वन में प्रज्वलित हुए दावानल का स्पर्श सहन करने में समर्थ नहीं होता, उसी प्रकार तू मेरे पति और उनके भाई दोनों के बाणों का स्पर्श किसी तरह सह नहीं सकता।'
‘रावण! यदि तू मुझे छोड़ नहीं देता है तो मेरे तिरस्कार से कुपित हुए मेरे पतिदेव अपने भाई के साथ चढ़ आयँगे और तेरे विनाश का उपाय करेंगे, अतः तू अच्छी तरह अपनी भलाई सोच ले और मुझे छोड़ दे। यही तेरे लिये अच्छा होगा। नीच ! तू जिस संकल्प या अभिप्राय से बलपूर्वक मेरा हरण करना चाहता है, तेरा वह अभिप्राय व्यर्थ होगा। मैं अपने देवोपम पति का दर्शन न पाने पर शत्रु के अधीनता में अधिक काल तक अपने प्राणों को नहीं धारण कर सकूँगी।'
'निश्चय ही तू अपने कल्याण और हित का विचार नहीं करता है। जैसे मरने के समय मनुष्य स्वास्थ्य के विरोधी पदार्थों का सेवन करने लगता है, वही दशा तेरी है। प्राय: सभी मरणासन्न मनुष्यों को पथ्य (हितकारक सलाह या भोजन) नहीं रुचता है। निशाचर! मैं देखती हूँ, तेरे गले में काल की फाँसी पड़ चुकी है, इसी से इस भय के स्थान पर भी तू निर्भय बना हुआ है।'
‘रावण! अवश्य ही तू सुवर्णमय वृक्षों को देख रहा है, रक्त का स्रोत बहाने वाली भयंकर वैतरणी नदी का दर्शन कर रहा है, भयानक असिपत्र - वन को भी देखना चाहता है तथा जिसमें तपाये हुए सुवर्ण के समान फूल तथा श्रेष्ठ वैदूर्यमणि (नीलम) के समान पत्ते हैं और जिसमें लोहे के काँटे चिने गये हैं, उस तीखी शाल्मलि का भी अब तू शीघ्र ही दर्शन करेगा।'
'निर्दयी निशाचर! तू महात्मा श्रीराम का ऐसा महान् अपराध करके विषपान किये हुए मनुष्य की भाँति अधिक काल तक जीवन धारण नहीं कर सकेगा। रावण ! तू अटल कालपाश से बँध गया है। मेरे महात्मा पति से बचकर तू कहाँ जाकर शान्ति पा सकेगा। जिन्होंने अपने भाई लक्ष्मण की सहायता लिये बिना ही युद्ध में पलक मारते-मारते चौदह हजार राक्षसों का विनाश कर डाला, वे सम्पूर्ण अस्त्रों का प्रयोग करने में कुशल बलवान् वीर रघुनाथजी अपनी प्यारी पत्नी का अपहरण करने वाले तुझ जैसे पापी को तीखे बाणों द्वारा क्यों नहीं काल के गाल में भेज देंगे।'
रावण के चंगुल में फँसी हुई विदेहराजकुमारी सीता भय और शोक से व्याकुल हो ये तथा और भी बहुत-से कठोर वचन सुनाकर करुण स्वर में विलाप करने लगीं। अत्यन्त दु:ख से आतुर हो विलापपूर्वक बहुत-सी करुणाजनक बातें कहती और छूटने के लिये नाना प्रकार की चेष्टा करती हुई तरुणी भामिनी राजकुमारी सीता को वह पापी निशाचर हर ले गया।
