भाग-४(4) सिंहिका का वध करके हनुमानजी का समुद्र के उस पार पहुँचकर लंका की शोभा देखना

 


हनुमानजी वरुण के निवासभूत अलङ्घ्य समुद्र के निकट आकर आकाश का ही आश्रय ले गरुड़ के समान वेग से आगे बढ़ने लगे। जो जल की धाराओं से सेवित, पक्षियों से संयुक्त, गानविद्या के आचार्य तुम्बुरु आदि गन्धर्वो के विचरण का स्थान तथा ऐरावत के आने-जाने का मार्ग है, सिंह, हाथी, बाघ, पक्षी और सर्प आदि वाहनों से जुते और उड़ते हुए निर्मल विमान जिसकी शोभा बढ़ाते हैं, जिनका स्पर्श वज्र और अशनि के समान दुःसह तथा तेज अग्नि के समान प्रकाशमान है तथा जो स्वर्गलोक पर विजय पा चुके हैं, ऐसे महाभाग पुण्यात्मा पुरुषों का जो निवास स्थान है, देवता के लिये अधिक मात्रा में हविष्य का भार वहन करने वाले अग्निदेव जिसका सदा सेवन करते हैं, ग्रह, नक्षत्र, चन्द्रमा, सूर्य और तारे आभूषण की भाँति जिसे सजाते हैं, महर्षियों के समुदाय, गन्धर्व, नाग और यक्ष जहाँ भरे रहते हैं, जो जगत का आश्रय स्थान, एकान्त और निर्मल है, गन्धर्वराज विश्वावसु जिसमें निवास करते हैं, देवराज इन्द्र का हाथी जहाँ चलता-फिरता है, जो चन्द्रमा और सूर्य का भी मङ्गलमय मार्ग है, इस जीव जगत के लिये विमल वितान (चंदोवा) है, साक्षात् परब्रह्म परमात्मा ने ही जिसकी सृष्टि की है, जो बहुसंख्यक वीरों से सेवित और विद्याधर गणों से आवृत है, उस वायुपथ आकाश में पवननन्दन हनुमानजी गरुड़ के समान वेग से चले। 

वायु के समान हनुमानजी अगर के समान काले तथा लाल, पीले और श्वेत बादलों को खींचते हुए आगे बढ़ने लगे। उनके द्वारा खींचे जाते हुए वे बड़े-बड़े बादल अद्भुत शोभा पा रहे थे। वे बारम्बार मेघ-समूहों में प्रवेश करते और बाहर निकलते थे। उस अवस्था में बादलों में छिपते तथा प्रकट होते हुए वर्षाकाल के चन्द्रमा की भाँति उनकी बड़ी शोभा हो रही थी। सर्वत्र दिखायी देते हुए पवनकुमार हनुमानजी पंखधारी गिरिराज के समान निराधार आकाश का आश्रय लेकर आगे बढ़ रहे थे। 

इस तरह जाते हुए हनुमानजी को इच्छानुसार रूप धारण करने वाली विशालकाया सिंहिका नाम वाली राक्षसी ने देखा। देखकर वह मन ही मन इस प्रकार विचार करने लगी -  आज दीर्घकाल के बाद यह विशाल जीव मेरे वश में आया है। इसे खा लेने पर बहुत दिनों के लिये मेरा पेट भर जायगा। 

अपने हृदय में ऐसा सोचकर उस राक्षसी ने हनुमानजी की छाया पकड़ ली। छाया पकड़ी जाने पर वानरवीर हनुमान् ने सोचा - ‘अहो! सहसा किसने मुझे पकड़ लिया, इस पकड़ के सामने मेरा पराक्रम पङ्ग हो गया है। जैसे प्रतिकूल हवा चलने पर समुद्र में जहाज की गति अवरुद्ध हो जाती है, वैसी ही दशा आज मेरी भी हो गयी है। 

यही सोचते हुए कपिवर हनुमान् ने उस समय अगल-बगल में, ऊपर और नीचे दृष्टि डाली। इतने ही में उन्हें समुद्र के जल के ऊपर उठा हुआ एक विशालकाय प्राणी दिखायी दिया। 

उस विकराल मुखवाली राक्षसी को देखकर पवनकुमार हनुमान् सोचने लगे – वानरराज सुग्रीव ने जिस महापराक्रमी छायाग्राही अद्भुत जीव की चर्चा की थी, वह नि:संदेह यही है। 

तब बुद्धिमान् कपिवर हनुमानजी ने यह निश्चय करके कि वास्तव में यही सिंहिका है, वर्षाकाल के मेघ की भाँति अपने शरीर को बढ़ाना आरम्भ किया। इस प्रकार वे विशालकाय हो गये। उन महाकपि के शरीर को बढ़ते देख सिंहिका ने अपना मुँह पाताल और आकाश के मध्यभाग के समान फैला लिया और मेघों की घटा के समान गर्जना करती हुई उन वानरवीर की ओर दौड़ी। हनुमानजी ने उसका अत्यन्त विकराल और बढ़ा हुआ मुँह देखा। उन्हें अपने शरीर के बराबर ही उसका मुँह दिखायी दिया। उस समय बुद्धिमान् महाकपि हनुमान् ने सिंहिका के मर्मस्थानों को अपना लक्ष्य बनाया। 

तदनन्तर वज्रोपम शरीर वाले महाकपि पवनकुमार अपने शरीर को संकुचित करके उसके विकराल मुख में आ गिरे। उस समय सिद्धों और चारणों ने हनुमानजी को सिंहिका के मुख में उसी प्रकार निमग्न होते देखा, जैसे पूर्णिमा की रात में पूर्ण चन्द्रमा राहु के ग्रास बन गये हों। मुख में प्रवेश करके उन वानरवीर ने अपने तीखे नखों से उस राक्षसी के मर्मस्थानों को विदीर्ण कर डाला। इसके पश्चात् वे मनके समान गति से उछलकर वेगपूर्वक बाहर निकल आये। 

दैव के 'अनुग्रह, , स्वाभाविक धैर्य तथा कौशल से उस राक्षसी को मारकर वे मनस्वी वानरवीर पुन: वेग से बढ़कर बड़े हो गये। हनुमानजी ने प्राणों के आश्रयभूत उसके हृदयस्थल को ही नष्ट कर दिया, अत: वह प्राणशून्य होकर समुद्र के जल में गिर पड़ी। विधाता ने ही उसे मार गिराने के लिये हनुमानजी को निमित्त बनाया था। 

उन वानरवीर के द्वारा शीघ्र ही मारी जाकर सिंहिका जल में गिर पड़ी। यह देख आकाश में विचरने वाले प्राणी उन कपिश्रेष्ठ से बोले – कपिवर! तुमने यह बड़ा ही भयंकर कर्म किया है, जो इस विशालकाय प्राणी को मार गिराया है। अब तुम बिना किसी विघ्न-बाधा अपना अभीष्ट कार्य सिद्ध करो। वानरेन्द्र! जिस पुरुष में तुम्हारे समान धैर्य, सूझ, बुद्धि और कुशलता – ये चार गुण होते हैं, उसे अपने कार्य में कभी असफलता नहीं होती। 

इस प्रकार अपना प्रयोजन सिद्ध हो जाने से उन आकाशचारी प्राणियों ने हनुमानजी का बड़ा सत्कार किया। इसके बाद वे आकाश में चढ़कर गरुड़ के समान वेग से चलने लगे। 

सौ योजन अन्त में प्राय: समुद्र के पार पहुँचकर जब उन्होंने सब ओर दृष्टि डाली, तब उन्हें एक हरी-भरी वनश्रेणी दिखायी दी। आकाश में उड़ते हुए ही शाखामृगों में श्रेष्ठ हनुमानजी ने भाँति-भाँति के वृक्षों से सुशोभित लंका नामक द्वीप देखा। उत्तर तट की भाँति समुद्र के दक्षिण तट पर भी मलय नामक पर्वत और उसके उपवन दिखायी दिये। समुद्र, सागरतटवर्ती जलप्राय देश तथा वहाँ उगे हुए वृक्ष एवं सागरपन्ती सरिताओं के मुहानों को भी उन्होंने देखा। 

मन को वश में रखने वाले बुद्धिमान् हनुमानजी ने अपने शरीर को महान् मेघों की घटा के समान विशाल तथा आकाश को अवरुद्ध करता-सा देख मन-ही-मन इस प्रकार विचार किया - अहो! मेरे शरीर की विशालता तथा मेरा यह तीव्र वेग देखते ही राक्षसों के मन में मेरे प्रति बड़ा कौतूहल होगा। वे मेरा भेद जानने के लिये उत्सुक हो जायँगे। 

परम बुद्धिमान् हनुमानजी के मन में यह धारणा पक्की हो गयी। मनस्वी हनुमान् अपने पर्वताकार शरीर को संकुचित करके पुनः अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित हो गये। ठीक उसी तरह, जैसे मन को वश में रखने वाला मोहरहित पुरुष अपने मूल स्वरूप में प्रतिष्ठित होता है। जैसे बलि के पराक्रमसम्बन्धी अभिमान को हर लेने वाले श्रीहरि ने विराट रूप से तीन पग चलकर तीनों लोकों को नाप लेने के पश्चात् अपने उस स्वरूप को समेट लिया था, उसी प्रकार हनुमानजी समुद्र को लाँघ जाने के बाद अपने उस विशाल रूप को संकुचित करके अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित हो गये। 

हनुमानजी बड़े ही सुन्दर और नाना प्रकार के रूप धारण कर लेते थे। उन्होंने समुद्र के दूसरे तट पर, जहाँ दूसरों का पहुँचना असम्भव था, पहुँचकर अपने विशाल शरीर की ओर दृष्टिपात किया। फिर अपने कर्तव्य का विचार करके छोटा-सा रूप धारण कर लिया। महान् मेघ-समूह के समान शरीर वाले महात्मा हनुमानजी केवड़े, लसोड़े और नारियल के वृक्षों से विभूषित लम्बपर्वत के विचित्र लघु शिखरों वाले महान् समृद्धिशाली श्रृङ्ग पर कूद पड़े। 

तदनन्तर समुद्र के तट पर पहुँचकर वहाँ से उन्होंने एक श्रेष्ठ पर्वत के शिखर पर बसी हुई लंका को देखा। देखकर अपने पहले रूप को तिरोहित करके वे वानरवीर वहाँ के पशु-पक्षियों को व्यथित करते हुए उसी पर्वत पर उतर पड़े। इस प्रकार दानवों और सर्पों से भरे हुए तथा बड़ी-बड़ी उत्ताल तरङ्गमालाओं से अलंकृत महासागर को बलपूर्वक लाँघकर वे उसके तट पर उतर गये और अमरावती के समान सुशोभित लंकापुरी की शोभा देखने लगे।  

इति श्रीमद् राम कथा सुन्दरकाण्ड अध्याय-९ का भाग-४(4) समाप्त ! 

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