जटायु उस समय सो रहे थे। उसी अवस्था में उन्होंने सीता की वह करुण पुकार सुनी। सुनते ही तुरंत आँख खोलकर उन्होंने विदेहनन्दिनी सीता तथा रावण को देखा। पक्षियों में श्रेष्ठ श्रीमान् जटायु का शरीर पर्वत शिखर के समान ऊँचा था और उनकी चोंच बड़ी ही तीखी थी।
वे पेड़ पर बैठे ही बैठे रावण को लक्ष्य करके यह शुभ वचन बोले - दशमुख रावण! मैं प्राचीन (सनातन) धर्म में स्थित, सत्यप्रतिज्ञ और महाबलवान् गृध्रराज हूँ। मेरा नाम जटायु है। भैया! इस समय मेरे सामने तुम्हें ऐसा निन्दित कर्म नहीं करना चाहिये। दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्रजी सम्पूर्ण जगत के स्वामी, इन्द्र और वरुण के समान पराक्रमी तथा सब लोगों के हित में संलग्न रहने वाले हैं। ये उन्हीं जगदीश्वर श्रीराम की यशस्विनी धर्मपत्नी हैं। इन सुन्दर शरीर वाली देवी का नाम सीता है, जिन्हें तुम हरकर ले जाना चाहते हो।
‘अपने धर्म में स्थित रहने वाला कोई भी राजा भला परायी स्त्री का स्पर्श कैसे कर सकता है? महाबली रावण ! राजाओं की स्त्रियों की तो सभी को विशेषरूप से रक्षा करनी चाहिये। परायी स्त्री के स्पर्श से जो नीच गति प्राप्त होने वाली है, उसे अपने आप से दूर हटा दो। धीर (बुद्धिमान्) वह कर्म न करे जिसकी दूसरे लोग निन्दा करें। जैसे पराये पुरुषों के स्पर्श से अपनी स्त्री की रक्षा की जाती है, उसी प्रकार दूसरों की स्त्रियों की भी रक्षा करनी चाहिये।'
‘पुलस्त्यकुलनन्दन! जिनकी शास्त्रों में चर्चा नहीं है ऐसे धर्म, अर्थ अथवा काम का भी श्रेष्ठ पुरुष केवल राजा की देखादेखी आचरण करने लगते हैं (अत: राजा को अनुचित या अशास्त्रीय कर्म में प्रवृत्त नहीं होना चाहिये)। राजा धर्म और काम का प्रवर्तक तथा द्रव्यों की उत्तम निधि है, अत: धर्म, सदाचार अथवा पाप - इनकी प्रवृत्ति का मूल कारण राजा ही है। राक्षसराज! जब तुम्हारा स्वभाव ऐसा पापपूर्ण है और तुम इतने चपल हो, तब पापी को देवताओं के विमान की भाँति तुम्हें यह ऐश्वर्य कैसे प्राप्त हो गया ?'
'जिसके स्वभाव में काम की प्रधानता है, उसके उस स्वभाव का परिमार्जन नहीं किया जा सकता; क्योंकि दुष्टात्माओं के घर में दीर्घकाल के बाद भी पुण्य का आवास नहीं होता। जब महाबली धर्मात्मा श्रीराम तुम्हारे राज्य अथवा नगर में कोई अपराध नहीं करते हैं, तब तुम उनका अपराध कैसे कर रहे हो? यदि पहले शूर्पणखा का बदला लेने के लिये चढ़कर आये हुए अत्याचारी खर का अनायास ही महान् कर्म करने वाले श्रीराम ने वध किया तो तुम्हीं ठीक-ठीक बताओ कि इसमें श्रीराम का क्या अपराध है, जिससे तुम उन जगदीश्वर की पत्नी को हर ले जाना चाहते हो?'
‘रावण! अब शीघ्र ही विदेहकुमारी सीता को छोड़ दो, जिससे श्रीरामचन्द्रजी अपनी अग्नि के समान भयंकर दृष्टि से तुम्हें जलाकर भस्म न कर डालें। जैसे इन्द्र के वज्र ने वृत्रासुर का विनाश कर डाला था (इस कथा को विस्तार से जानने के लिए अध्याय - ५ बालकाण्ड के भाग १७ से २३ तक को पढ़ें), उसी प्रकार श्रीराम की रोषपूर्ण दृष्टि तुम्हें दग्ध कर डालेगी। तुमने अपने वस्त्र में विषधर सर्प को बाँध लिया है, फिर भी इस बात को समझ नहीं पाते हो। तुमने अपने गले में मौत की फाँसी डाल ली है, फिर भी यह तुम्हें सूझ नहीं रहा है।'
'सौम्य ! पुरुष को उतना ही बोझ उठाना चाहिये, जो उसे शिथिल न कर दे और वही अन्न भोजन करना चाहिये, जो पेट में जाकर पच जाय, रोग न पैदा करे। जो कार्य करने से न तो धर्म होता हो, न कीर्ति बढ़ती हो और न अक्षय यश ही प्राप्त होता हो, उल्टे शरीर को खेद हो रहा हो, उस कर्म का अनुष्ठान कौन करेगा?'
'रावण! पिता-पितामहों से प्राप्त इस पक्षियों के राज्य का विधिवत् पालन करते हुए मुझे जन्म से लेकर अब तक साठ हजार वर्ष बीत गये। अब मैं बूढ़ा हो गया हूँ और तुम नवयुवक हो। (मेरे पास कोई युद्ध का साधन नहीं है, किंतु ) तुम्हारे पास धनुष, कवच, बाण तथा रथ सब कुछ है, फिर भी तुम सीता को लेकर कुशलपूर्वक नहीं जा सकोगे। मेरे देखते-देखते तुम विदेहनन्दिनी सीता का बलपूर्वक अपहरण नहीं कर सकते; ठीक उसी तरह जैसे कोई न्यायसङ्गत हेतुओं से सत्य सिद्ध हुई वैदिक श्रुति को अपनी युक्तियों के बल पर पलट नहीं सकता।
‘रावण! यदि शूरवीर हो तो युद्ध करो। मेरे सामने दो घड़ी ठहर जाओ; फिर जैसे पहले खर मारा गया था, उसी प्रकार तुम भी मेरे द्वारा मारे जाकर सदा के लिये सो जाओगे। जिन्होंने युद्ध में अनेक बार दैत्यों और दानवों का वध किया है, वे चीरवस्त्रधारी भगवान् श्रीराम तुम्हारा भी शीघ्र ही युद्धभूमि में विनाश करेंगे। इस समय मैं क्या कर सकता हूँ, वे दोनों राजकुमार बहुत दूर चले गये हैं। नीच! (यदि मैं उन्हें बुलाने जाऊँ तो) तुम उन दोनों से भयभीत होकर शीघ्र ही भाग जाओगे (आँखों से ओझल हो जाओगे), इसमें संशय नहीं है।'
‘कमल के समान नेत्रों वाली ये शुभलक्षणा सीता श्रीरामचन्द्रजी की प्यारी पटरानी हैं। इन्हें मेरे जीते जी तुम नहीं ले जाने पाओगे। मुझे अपने प्राण देकर भी महात्मा श्रीराम तथा राजा दशरथ का प्रिय कार्य अवश्य करना होगा। दशमुख रावण! ठहरो, ठहरो! केवल दो घड़ी रुक जाओ, फिर देखो, जैसे डंठल से फल गिरता है, उसी प्रकार तुम्हें इस उत्तम विमान से नीचे गिराये देता हूँ। निशाचर! अपनी शक्ति के अनुसार युद्ध में मैं तुम्हारा पूरा आतिथ्य सत्कार करूँगा - तुम्हें भलीभाँति भेंटपूजा दूँगा।'
