सीता के इस वचन को सुनकर प्रतापी दशमुख रावण ने अपने हाथ पर हाथ मारकर शरीर को बहुत बड़ा बना लिया। वह बातचीत करने की कला जानता था। उसने मिथिलेशकुमारी सीता से फिर इस प्रकार कहना आरम्भ किया - मेरी समझ में तुम पागल हो गयी हो, इसीलिये तुमने मेरे बल और पराक्रम की बातें अनसुनी कर दी हैं। अरी! मैं आकाश में खड़ा हो इन दोनों भुजाओं से ही सारी पृथ्वी को उठा ले जा सकता हूँ। समुद्र को पी जा सकता हूँ और युद्ध में स्थित हो मौत को भी मार सकता हूँ। काम तथा रूप से उन्मत्त रहने वाली नारी! यदि चाहूँ तो अपने तीखे बाणों से सूर्य को भी व्यथित कर दूँ और इस भूतल को भी विदीर्ण कर डालूँ । मैं इच्छानुसार रूप धारण करने में समर्थ हूँ। तुम मेरी ओर देखो।
ऐसा कहते-कहते क्रोध से भरे हुए रावण की आँखें, जिनके प्रान्तभाग काले थे, जलती आग के समान लाल हो गयीं। कुबेर के छोटे भाई रावण ने तत्काल अपने सौम्य रूप को त्यागकर तीखा एवं काल के समान विकराल अपना स्वाभाविक रूप धारण कर लिया। उस समय रावण के सभी नेत्र लाल हो रहे थे। वह पक्के सोने के आभूषणों से अलंकृत था और महान् क्रोध से आविष्ट हो नीलमेघ के समान काला दिखायी देने लगा।
वह विशालकाय निशाचर परिव्राजक के उस छद्मवेश को त्यागकर दस मुखों और बीस भुजाओं से संयुक्त हो गया। उस समय राक्षसराज रावण ने अपने सहज रूप को ग्रहण कर लिया और लाल रंग के वस्त्र पहनकर वह स्त्री - रत्न सीता की ओर देखता हुआ खड़ा हो गया। काले केशवाली मैथिली वस्त्राभूषणों से विभूषित हो सूर्य की प्रभा - सी जान पड़ती थीं।
रावण ने उनसे कहा – वरारोहे! यदि तुम तीनों लोकों में विख्यात पुरुष को अपना पति बनाना चाहती हो तो मेरा आश्रय लो। मैं ही तुम्हारे योग्य पति हूँ। भद्रे! मुझे सुदीर्घकाल के लिये स्वीकार करो। मैं तुम्हारे लिये स्पृहणीय एवं प्रशंसनीय पति होऊँगा तथा कभी तुम्हारे मन के प्रतिकूल कोई बर्ताव नहीं करूँगा। मनुष्य राम के विषय में जो तुम्हारा अनुराग है, उसे त्याग दो और मुझ से स्नेह करो। अपने को पण्डि (बुद्धिमती) मानने वाली मूढ़ नारी! जो राज्य से भ्रष्ट है, जिसका मनोरथ सफल नहीं हुआ तथा जिसकी आयु सीमित है, उस राम में किन गुणों के कारण तुम अनुरक्त हो। जो एक स्त्री के कहने से सुहृदों सहित सारे राज्य का त्याग करके इस हिंसक जन्तुओं से सेवित वन में निवास करता है, उसकी बुद्धि कैसी खोटी है? (वह सर्वथा मूढ़ है)।
जो प्रिय वचन सुनने के योग्य और सबसे प्रिय वचन बोलनेवाली थीं, उन मिथिलेशकुमारी सीता से ऐसा अवचन कहकर काम से मोहित हुए उस अत्यन्त दुष्टात्मा राक्षस रावण ने निकट जाकर (माता के समान आदरणीया) सीता को पकड़ लिया, मानो बुध ने आकाश में अपनी माता रोहिणी को पकड़ने का दुस्साहस किया हो। (यहाँ अभूतोपमालंकार है। बुध चन्द्रमा के पुत्र हैं और रोहिणी चन्द्रमा की पन्ती। बुध ने न तो कभी रोहिणी को पकड़ा है और न वे ऐसा कर ही सकते हैं। यहाँ यह दिखाया गया है कि यदि कदाचित् बुध कामवश अपनी माता रोहिणी को पकड़ लें तो वह जैसा घोर पाप होगा, वही पाप रावण ने सीता को पकड़ने के कारण किया था।)
उसने बायें हाथ से कमलनयनी सीता के केशों सहित मस्तक को पकड़ा तथा दाहिना हाथ उनकी दोनों जाँघों के नीचे लगाकर उसके द्वारा उन्हें उठा लिया। उस समय तीखी दाड़ों और विशाल भुजाओं से युक्त पर्वतशिखर के समान प्रतीत होने वाले उस काल के समान विकराल राक्षस को देखकर वन के समस्त देवता भयभीत होकर भाग गये। इतने ही में रावण का वह विशाल सुवर्णमय मायानिर्मित दिव्य पुष्पक विमान वहाँ दिखायी दिया। विमान के प्रकट होते ही जोर-जोर से गर्जना करने वाले रावण ने कठोर वचनों द्वारा विदेहह्नन्दिनी सीता को डाँटा और पूर्वोक्त रूप से गोद में उठाकर तत्काल विमान पर बिठा दिया।
रावण के द्वारा पकड़ी जाने पर यशस्विनी सीता दुःख से व्याकुल हो गयीं और वन में दूर गये हुए श्रीरामचन्द्रजी को ‘हे आर्य !” कहकर जोर-जोर से पुकारने लगीं। सीता के मन में रावण की कामना नहीं थी - वे उसकी ओर से सर्वथा विरक्त थीं और उसकी कैद से अपने को छुड़ाने के लिये चोट खायी हुई नागिन की तरह उस विमान पर छटपटा रही थीं। उसी अवस्था में कामपीड़ित राक्षस उन्हें लेकर आकाश में उड़ चला।
राक्षसराज जब सीता को हरकर आकाशमार्ग से ले जाने लगा, उस समय उनका चित्त भ्रमित हो उठा। वे पगली- सी हो गयीं और दु:ख से आतुर-सी होकर जोर-जोर से विलाप करने लगीं - हा महाबाहु लक्ष्मण! तुम गुरुजनों के मन को प्रसन्न करनेवाले हो। इस समय इच्छानुसार रूप धारण करने वाला राक्षस मुझे हरकर लिये जाता है, किंतु तुम्हें इसका पता नहीं है। हा रघुनन्दन! आपने धर्म के लिये प्राणों का मोह, शरीर का सुख तथा राज्य - वैभव सब कुछ छोड़ दिया है। यह राक्षस मुझे अधर्मपूर्वक हरकर लिये जा रहा है, परंतु आप नहीं देखते हैं। शत्रुओं को संताप देने वाले आर्यपुत्र! आप तो कुमार्ग पर चलने वाले उद्दण्ड पुरुषों को दण्ड देकर उन्हें राह पर लानेवाले हैं, फिर ऐसे पापी रावण को क्यों नहीं दण्ड देते हैं।
‘उद्दण्ड पुरुष के उद्दण्डतापूर्ण कर्म का फल तत्काल मिलता नहीं दिखायी देता है; क्योंकि इसमें काल भी सहकारी कारण होता है, जैसे कि खेती के पकने के लिये तदनुकूल समय की अपेक्षा होती है। रावण! तेरे सिर पर काल नाच रहा है। उसी ने तेरी विचारशक्ति को नष्ट कर दीया है, इसीलिये तूने ऐसा पापकर्म किया है। तुझे श्रीरघुवीर से वह भयंकर संकट प्राप्त हो, जो तेरे प्राणों का अन्त कर डाले।'
'हाय ! धर्म की अभिलाषा रखने वाले यशस्वी श्रीरघुवीर की धर्मपत्नी होकर भी मैं एक राक्षस द्वारा हरी जा रही हूँ। मैं जनस्थान में खिले हुए कनेर वृक्षों से प्रार्थना करती हूँ, तुमलोग शीघ्र ही श्रीरघुवीर से कहना कि सीता को रावण हर ले जा रहा है। हंसों और सारसों के कलरवों से मुखरित हुई गोदावरी नदी को मैं प्रणाम करती हूँ। माँ! तुम श्रीरघुवीर से शीघ्र ही कह देना, सीता को रावण हर ले जा रहा है। इस वन के विभिन्न वृक्षों पर निवास करने वाले जो-जो देवता हैं, उन सबको मैं नमस्कार करती हूँ। आप सब लोग शीघ्र ही मेरे स्वामी को सूचना दे दें कि आपकी स्त्री को राक्षस हर ले गया।'
'यहाँ पशु-पक्षी आदि जो कोई भी नाना प्रकार के प्राणी रहते हों, उन सबकी मैं शरण लेती हूँ। वे मेरे स्वामी श्रीरघुवीर से कहें कि जो आपको प्राणों से भी बढ़कर प्रिय थी, वह सीता हरी गयी। आपकी सीता को असहाय अवस्था में रावण हर ले गया। महाबाहु श्रीरघुवीर बड़े बलवान् हैं। वे मुझे परलोक में भी गयी हुई जान लें तो यमराज के द्वारा अपहृत होने पर भी मुझको पराक्रमपूर्वक वहाँ से लौटा लायेंगे।'
उस समय अत्यन्त दु:खी हो करुणाजनक बातें कहकर विलाप करती हुई विशाललोचना सीता ने एक वृक्ष पर बैठे हुए गृधराज जटायु को देखा। रावण के वश में पड़ जाने के कारण सुन्दरी सीता अत्यन्त भयभीत हो रही थीं। जटायु को देखकर वे दु:खभरी वाणी में करुण क्रन्दन करने लगीं।
‘आदरणीय जटायो! देखिये, यह पापाचारी राक्षसराज अनाथ की भाँति मुझे निर्दयतापूर्वक हरकर लिये जा रहा है। परंतु आप इस क्रूर निशाचर को रोक नहीं सकते; क्योंकि यह बलवान् है, अनेक युद्धों में विजय पाने के कारण इसका दुस्साहस बढ़ा हुआ है। इसके हाथों में अस्त्र-शस्त्र है और इसके मन में दुष्टता भी भरी हुई है। आदरणीय जटायो! जिस प्रकार मेरा अपहरण हुआ है, यह सब समाचार आप आर्यपुत्र और लक्ष्मण से ज्यों-का ज्यों पूर्णरूप से बता दीजियेगा।'
