सीता के ऐसा कहने पर रावण रोष में भर गया और ललाट में भौंहें टेढ़ी करके वह कठोर वाणी में बोला - सुन्दरी ! मैं कुबेर का सौतेला भाई परम प्रतापी दशग्रीव रावण हूँ। तुम्हारा भला हो। जैसे प्रजा मौत के भय से सदा डरती रहती है, उसी प्रकार देवता, गन्धर्व, पिशाच, पक्षी और नाग सदा जिससे भयभीत होकर भागते हैं, जिसने किसी कारणवश अपने सौतेले भाई कुबेर के साथ द्वन्द्वयुद्ध किया और क्रोधपूर्वक पराक्रम करके रणभूमि में उन्हें परास्त कर दिया था, वही रावण मैं हूँ।
'मेरे ही भय से पीड़ित हो नरवाहन कुबेर ने अपनी समृद्धिशालिनी पुरी लङ्का का परित्याग करके इस समय पर्वतश्रेष्ठ कैलाश की शरण ली है। भद्रे ! उनका सुप्रसिद्ध पुष्पक नामक सुन्दर विमान, जो इच्छा के अनुसार चलनेवाला है, मैंने पराक्रम से जीत लिया है और उसी विमान के द्वारा मैं आकाश में विचरता हूँ। मिथिलेशकुमारी! जब मुझे रोष चढ़ता है, उस समय इन्द्र आदि सब देवता मेरा मुँह देखकर ही भय से थर्रा उठते हैं और इधर-उधर भाग जाते हैं।'
'जहाँ मैं खड़ा होता हूँ, वहाँ हवा डरकर धीरे-धीरे चलने लगती है। मेरे भय से आकाश में प्रचण्ड किरणों वाला सूर्य भी चन्द्रमा के समान शीतल हो जाता है। जिस स्थान पर मैं ठहरता या भ्रमण करता हूँ, वहाँ वृक्षों के पत्ते तक नहीं हिलते और नदियों का पानी स्थिर हो जाता है। समुद्र के उस पार लङ्का नामक मेरी सुन्दर पुरी है, जो इन्द्र की अमरावती के समान मनोहर तथा घोर राक्षसों से भरी हुई है। उसके चारों ओर बनी हुई सफेद चारदिवारी उस पुरी की शोभा बढ़ाती है। लङ्कापुरी के महलों के दालान, फर्श आदि सोने के बने हैं और उसके बाहरी दरवाजे वैदूर्यमय हैं। वह पुरी बहुत ही रमणीय है।'
'हाथी, घोड़े और रथों से वहाँ की सड़कें भरी रहती हैं। भाँति-भाँति के वाद्यों की ध्वनि गूँजा करती है । सब प्रकार के मनोवाञ्छित फल देने वाले वृक्षों से लङ्कापुरी व्याप्त है। नाना प्रकार के उद्यान उसकी शोभा बढ़ाते हैं। राजकुमारी सीते! तुम मेरे साथ उस पुरी में चलकर निवास करो। मनस्विनि ! वहाँ रहकर तुम मानवी स्त्रियों को भूल जाओगी।'
'सुन्दरी ! लङ्का में दिव्य और मानुष- भोगों का उपभोग करती हुई तुम उस मनुष्य राम का कभी स्मरण नहीं करोगी, जिसकी आयु अब समाप्त हो चली है। विशाललोचने! राजा दशरथ ने अपने प्यारे पुत्र को राज्य पर बिठाकर जिस अल्पपराक्रमी ज्येष्ठ पुत्र को वन में भेज दिया, उस राज्यभ्रष्ट, बुद्धिहीन एवं तपस्या में लगे हुए तापस राम को लेकर क्या करोगी? यह राक्षसों का स्वामी स्वयं तुम्हारे द्वार पर आया है, तुम इसकी रक्षा करो, इसे मन से चाहो। यह कामदेव के बाणों से पीड़ित है। इसे ठुकराना तुम्हारे लिये उचित नहीं है।'
‘भीरु! मुझे ठुकराकर तुम उसी तरह पश्चात्ताप करोगी, जैसे पुरूरवा को लात मारकर उर्वशी पछतायी थी। सुन्दरी ! युद्ध में मनुष्य जातीय राम मेरी एक अङ्गुलि के बराबर भी नहीं है। तुम्हारे भाग्य से मैं आ गया हूँ। तुम मुझे स्वीकार करो।'
रावण के ऐसा कहने पर विदेहकुमारी सीता के नेत्र क्रोध से लाल हो गये। उन्होंने उस एकान्त स्थान में राक्षसराज रावण से कठोर वाणी में कहा - अरे! भगवान् कुबेर तो सम्पूर्ण देवताओं के वन्दनीय हैं। तू उन्हें अपना भाई बताकर ऐसा पापकर्म कैसे करना चाहता है? रावण! जिनका तुझ-जैसा क्रूर, दुर्बुद्धि और अजितेन्द्रिय राजा है, वे सब राक्षस अवश्य ही नष्ट हो जायँगे। इन्द्रकी पत्नी शची का अपहरण करके सम्भव है कोई जीवित रह जाय; किंतु श्रीरामपत्नी मुझ सीता का हरण करके कोई कुशल से नहीं रह सकता। राक्षस! वज्रधारी इन्द्र की अनुपम रूपवती भार्या शची का तिरस्कार करके सम्भव है कोई उसके बाद भी चिरकाल तक जीवित रह जाय; परंतु मेरी जैसी स्त्री का अपमान करके तू अमृत पी ले तो भी तुझे जीते-जी छुटकारा नहीं मिल सकता।'
इति श्रीमद् राम कथा अरण्यकाण्ड अध्याय-७ का
