सीता के कठोर वचन कहने पर कुपित हुए लक्ष्मण श्रीराम से मिलने की विशेष इच्छा रखकर शीघ्र ही वहाँ से चल दिये। लक्ष्मण के चले जाने पर रावण को अवसर मिल गया, अत: वह संन्यासी का वेष धारण करके शीघ्र ही विदेहकुमारी सीता के समीप गया। वह शरीर पर साफ-सुथरा गेरुए रंग का वस्त्र लपेटे हुए था। उसके मस्तक पर शिखा, हाथ में छाता और पैरों में जूते थे। उसने बायें कंधे पर डंडा रखकर उसमें कमण्डलु लटका रखा था।
अत्यन्त बलवान् रावण उस वन में परिव्राजक का रूप धारण करके श्रीराम और लक्ष्मण दोनों बन्धुओं से रहीत हुई अकेली विदेहकुमारी सीता के पास गया। जैसे सूर्य और चन्द्रमा से हीन हुई संध्या के पास महान् अंधकार उपस्थित हो, उसी प्रकार वह सीता के निकट गया। तदनन्तर जैसे चन्द्रमा से रहित हुई रोहिणी पर अत्यन्त दारुण ग्रह मंगल या शनैश्वर की दृष्टि पड़े, उसी प्रकार उस अतिशय क्रूर रावण ने उस भोली भाली यशस्विनी राजकुमारी की ओर देखा।
उस भयंकर पापाचारी को आया देख जनस्थान के वृक्षों ने हिलना बंद कर दिया और हवा का वेग रुक गया। लाल नेत्रों वाले रावण को अपनी ओर दृष्टिपात करते देख तीव्र गति से बहने वाली गोदावरी नदी भय के मारे धीरे-धीरे बहने लगी। राम से बदला लेने का अवसर ढूँढने वाला दशमुख रावण उस समय भिक्षुरूप से विदेहकुमारी सीता के पास पहुँचा। उस समय विदेहराजकुमारी सीता अपने पति के लिये शोक और चिन्ता में डूबी हुई थीं। उसी अवस्था में अभव्य रावण भव्य रूप धारण करके उनके सामने उपस्थित हुआ, मानो शनैश्चर ग्रह चित्रा के सामने जा पहुँचा हो।
जैसे कुआँ तिनकों से ढका हुआ हो, उसी प्रकार भव्य रूप से अपनी अभव्यता को छिपाकर रावण सहसा वहाँ जा पहुँचा और यशस्विनी रामपत्नी वैदेही को देखकर खड़ा हो गया। उस समय रावण वहाँ खड़ा खड़ा रामपत्नी सीता को देखने लगा। वे बड़ी सुन्दरी थीं। उनके दाँत और ओठ भी सुन्दर थे, मुख पूर्ण चन्द्रमा की शोभा को छीने लेता था। वे पर्णशाला में बैठी हुई शोक से पीड़ित हो आँसू बहा रही थीं। वह निशाचर प्रसन्नचित्त हो रेशमी पीताम्बर से सुशोभित कमलनयनी विदेहकुमारी के सामने गया। उन्हें देखते ही कामदेव के बाणों से घायल हो राक्षसराज रावण वेदमन्त्र का उच्चारण करने लगा और उस एकान्त स्थान में विनीतभाव से उनसे कुछ कहने को उद्यत हुआ।
रावण ने जनकनंदिनी से कहा - देवी मैं बहुत दूर से आया हूँ तथा थक भी गया हूँ, कृपा कर मुझे थोड़ा सा अन्न और जल मिल जाए तो कुछ तृप्ति हो।
अपने सामने रावण को ब्राह्मण वेश में देखकर सीता ने उन्हें नमन किया और तुरंत ही अपनी कुटिया के भीतर अन्न, जलादि का प्रबंध करने हेतु गयी। तब रावण ने उचित अवसर जानकर सीता को कुटिया के भीतर से ही पकड़ने का प्रयास किया। किन्तु महापराक्रमी लक्ष्मण द्वारा खींची गयी रेखा को वह पापी पार नहीं कर पाया। इसके पश्चात उसने दूसरा उपाय सोचा और वह चुपचाप एक कौन में जाकर खड़ा हो गया। कुटिया से सीता बाहर आती है। त्रिलोकसुन्दरी सीता अपने शरीर से कमल से रहित कमलालया लक्ष्मी की भाँति शोभा पा रही थीं।
रावण उनकी प्रशंसा करता हुआ बोला – उत्तम सुवर्ण की-सी कान्तिवाली तथा रेशमी पीताम्बर धारण करने वाली सुन्दरी ! (तुम कौन हो ?) तुम्हारे मुख, नेत्र, हाथ और पैर कमलों के समान हैं, अत: तुम पद्मिनी (पुष्करिणी) की भाँति कमलों की सुन्दर-सी माला धारण करती हो। शुभानने! तुम श्री, ह्री, कीर्ति, शुभस्वरूपा लक्ष्मी अथवा अप्सरा तो नहीं हो? अथवा वरारोहे! तुम भूति या स्वेच्छापूर्वक विहार करने वाली कामदेव की पत्नी रति तो नहीं हो?
'तुम्हारे दाँत बराबर हैं। उनके अग्रभाग कुन्द की कलियों के समान शोभा पाते हैं। वे सब-के-सब चिकने और सफेद हैं। तुम्हारी दोनों आँखें बड़ी-बड़ी और निर्मल हैं। उनके दोनों कोये लाल हैं और पुतलियाँ काली हैं। कटि का अग्रभाग विशाल एवं मांसल है। दोनों जाँघें हाथी की सूँड़ के समान शोभा पाती हैं। तुम्हारे ये दोनों स्तन् पुष्ट, गोलाकार, परस्पर सटे हुए, प्रगल्भ, मोटे, उठे हुए मुख वाले, कमनीय, चिकने ताड़फल के समान आकार वाले, परम सुन्दर और श्रेष्ठ मणिमय आभूषणों से विभूषित हैं।'
'सुन्दर मुसकान, रुचिर दन्तावली और मनोहर नेत्रवाली विलासिनी रमणी! तुम अपने रूप-सौन्दर्य से मेरे मन को वैसे ही हरे लेती हो, जैसे नदी जल के द्वारा अपने तट का अपहरण करती है। तुम्हारी कमर इतनी पतली है कि मुट्ठी में आ जाय। केश चिकने और मनोहर हैं। दोनों स्तन एक-दूसरे से सटे हुए हैं। सुन्दरी! देवता, गन्धर्व, यक्ष और किन्नर जाति की स्त्रियों में भी कोई तुम जैसी नहीं है।'
'पृथ्वी पर तो ऐसी रूपवती नारी मैंने आज से पहले कभी देखी ही नहीं थी। कहाँ तो तुम्हारा यह तीनों लोकों में सबसे सुन्दर रूप, सुकुमारता और नयी अवस्था और कहाँ इस दुर्गम वन में निवास ! ये सब बातें ध्यान में आते ही मेरे मन को मथे डालती हैं। तुम्हारा कल्याण हो। यहाँ से चली जाओ। तुम यहाँ रहने के योग्य नहीं हो। यह तो इच्छानुसार रूप धारण करने वाले भयंकर राक्षसों के रहने की जगह है। तुम्हें तो रमणीय राजमहलों, समृद्धिशाली नगरों और सुगन्धयुक्त उपवनों में निवास करना और विचरना चाहिये।'
‘शोभने! वही पुरुष श्रेष्ठ है, वही गन्ध उत्तम है और वही वस्त्र सुन्दर है, जो तुम्हारे उपयोग में आये। कजरारे नेत्रों वाली सुन्दरी! मैं उसी को श्रेष्ठ पति मानता हूँ, जिसे तुम्हारा सुखद संयोग प्राप्त हो। पवित्र मुसकान और सुन्दर अङ्गोंवाली देवी! तुम कौन हो? मुझे तो तुम रुद्रों, मरुद्गुणों अथवा वसुओं से सम्बन्ध रखने वाली देवी जान पड़ती हो। यहाँ गन्धर्व, देवता तथा किन्नर नहीं आते-जाते हैं। यह राक्षसों का निवास स्थान है, फिर तुम कैसे यहाँ आ गयी।'
‘यहाँ वानर, सिंह, चीते, व्याघ्र, मृग, भेड़िये, रीछ, शेर और कंक (गीध आदि पक्षी) रहते हैं। तुम्हें इनसे भय क्यों नहीं हो रहा है? वरानने! इस विशाल वन के भीतर अत्यन्त वेगशाली और भयंकर मदमत्त गजराजों के बीच अकेली रहती हुई तुम भयभीत कैसे नहीं होती हो ? कल्याणमयी देवी! बताओ, तुम कौन हो? किसकी हो? और कहाँ से आकर किस कारण इस राक्षस सेवित घोर दण्डकारण्य में अकेली विचरण करती हो?'
वेशभूषा से महात्मा बनकर आये हुए रावण ने जब विदेहकुमारी सीता की इस प्रकार प्रशंसा की, तब ब्राह्मण वेष में वहाँ पधारे हुए रावण को देखकर मैथिली ने अतिथि-सत्कार के लिये उपयोगी सभी सामग्रियों द्वारा उसका पूजन किया।पहले बैठने के लिये आसन दे, पाद्य (पैर धोने के लिये जल) निवेदन किया।
तदनन्तर ऊपर से सौम्य दिखायी देने वाले उस अतिथि को भोजन के लिये निमन्त्रण देते हुए कहा – ब्रह्मन् ! भोजन तैयार है, ग्रहण कीजिये।
वह ब्राह्मण के वेषमें आया था, कमण्डलु और गेरुआ वस्त्र धारण किये हुए था। ब्राह्मण वेष में आये हुए अतिथि की उपेक्षा असम्भव थी। उसकी वेशभूषा में ब्राह्मणत्व का निश्चय कराने वाले चिह्न दिखायी देते थे, अत: उस रूप में आये हुए उस रावण को देखकर मैथिली ने ब्राह्मण के योग्य सत्कार करनेके लिये ही उसे निमन्त्रित किया।
वे बोलीं – ब्राह्मण! यह चटाई है, इस पर इच्छानुसार बैठ जाइये। यह पैर धोने के लिये जल है, इसे ग्रहण कीजिये और यह वन में ही उत्पन्न हुआ उत्तम फल - मूल आपके लिये ही तैयार करके रखा गया है, यहाँ शान्तभाव से उसका उपभोग कीजिये। अतिथिके लिये सबकुछ तैयार है।
ऐसा कहकर सीता ने जब उसे भोजन के लिये निमन्त्रित किया, तब रावण ने ‘सर्वं सम्पन्नम्’ कहने वाली राजरानी मैथिली की ओर देखा और अपने ही वध के लिये उसने हठपूर्वक सीता का हरण करने के निमित्त मन में दृढ़ निश्चय कर लिया। तदनन्तर सीता शिकार खेलने के लिये गये हुए लक्ष्मणसहित अपने सुन्दर वेषधारी पति श्रीरामचन्द्रजी की प्रतीक्षा करने लगीं। उन्होंने चारों ओर दृष्टि दौड़ायी, किंतु उन्हें सब ओर हराभरा विशाल वन ही दिखायी दिया, श्रीराम और लक्ष्मण नहीं दीख पड़े।
इति श्रीमद् राम कथा अरण्यकाण्ड अध्याय-७ का
