भाग-३(3) सुरसा पर हनुमानजी की विजय

 


तत्पश्चात् और भी ऊँचे उठकर उस पर्वत को देखते हुए कपिश्रेष्ठ पवनपुत्र हनुमानजी बिना किसी आधार के आगे बढ़ने लगे। हनुमानजी का यह दूसरा अत्यन्त दुष्कर कर्म देखकर सम्पूर्ण देवता, सिद्ध और महर्षिगण उनकी प्रशंसा करने लगे। वहाँ आकाश में ठहरे हुए देवता तथा सहस्र नेत्रधारी इन्द्र उस सुन्दर मध्य भाग वाले सुवर्णमय मैनाक पर्वत के उस कार्य से बहुत प्रसन्न हुए। 

उस समय स्वयं बुद्धिमान् शचीपति इन्द्र ने अत्यन्त संतुष्ट होकर पर्वतश्रेष्ठ 'सुनाभ' मैनाक से गद्गद वाणी में कहा - सुवर्णमय शैलराज मैनाक! मैं तुम पर बहुत प्रसन्न हूँ। सौम्य ! तुम्हें अभय दान देता हूँ। तुम सुखपूर्वक जहाँ चाहो, जाओ। सौ योजन समुद्र को लाँघते समय जिनके मन में कोई भय नहीं रहा है, फिर भी जिनके लिये हमारे हृदय में यह भय था कि पता नहीं इनका क्या होगा ? उन्हीं हनुमानजी को विश्राम का अवसर देकर तुमने उनकी बहुत बड़ी सहायता की है। ये वानरश्रेष्ठ हनुमान् दशरथनन्दन श्रीराम की सहायता के लिये ही जा रहे हैं। तुमने यथाशक्ति इनका सत्कार करके मुझे पूर्ण संतोष प्रदान किया है। 

देवताओं के स्वामी शतक्रतु इन्द्र को संतुष्ट देखकर पर्वतों में श्रेष्ठ मैनाक को बड़ा हर्ष प्राप्त हुआ। इस प्रकार इन्द्र का दिया हुआ वर पाकर मैनाक उस समय जल में स्थित हो गया और हनुमानजी समुद्र के उस प्रदेश को उसी मुहूर्त में लाँघ गये। 

तब देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षियों ने सूर्यतुल्य तेजस्विनी नाग माता सुरसा से कहा - ये पवननन्दन श्रीमान् हनुमानजी समुद्र के ऊपर होकर जा रहे हैं। तुम दो घड़ी के लिये इनके मार्ग में विघ्न डाल दो। तुम पर्वत के समान अत्यन्त भयंकर राक्षसी का रूप धारण करो। उसमें विकराल दाढ़ें, पीले नेत्र और आकाश को स्पर्श करने वाला विकट मुँह बनाओ। हम लोग पुन: हनुमानजी के बल और पराक्रम की परीक्षा लेना चाहते हैं। या तो किसी उपाय से ये तुम्हें जीत लेंगे अथवा विषाद में पड़ जायँगे (इससे इनके बलाबल का ज्ञान हो जायगा)।  

देवताओं के सत्कारपूर्वक इस प्रकार कहने पर देवी सुरसा ने समुद्र के बीच में राक्षसी का रूप धारण किया। उसका वह रूप बड़ा ही विकट, बेडौल और सबके लिये भयावना था। वह समुद्र के पार जाते हुए हनुमानजी को घेरकर उनसे इस प्रकार बोली - कपिश्रेष्ठ! देवेश्वरों ने तुम्हें मेरा भक्ष्य बताकर मुझे अर्पित कर दिया है, अतः मैं तुम्हें खाऊँगी। तुम मेरे इस मुँह में चले आओ। पूर्वकाल में ब्रह्माजी ने मुझे यह वर दिया था। 

ऐसा कहकर वह तुरंत ही अपना विशाल मुँह फैलाकर हनुमानजी के सामने खड़ी हो गयी। 

सुरसा के ऐसा कहने पर हनुमानजी ने प्रसन्नमुख होकर कहा - देवी ! दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्रजी अपने भाई लक्ष्मण और धर्मपत्नी सीताजी के साथ दण्डकारण्य में आये थे। वहाँ परहित-साधन में लगे हुए श्रीराम का राक्षसों के साथ वैर बँध गया। अतः रावण ने उनकी यशस्विनी भार्या सीता को हर लिया। मैं श्रीराम की आज्ञा से उनका दूत बनकर सीता माता के पास जा रहा हूँ। तुम भी श्रीराम के राज्य में निवास करती हो। अत: तुम्हें उनकी सहायता करनी चाहिये। अथवा (यदि तुम मुझे खाना ही चाहती हो तो) मैं सीताजी का दर्शन करके अनायास ही महान् कर्म करने वाले श्रीरामचन्द्रजी से जब मिल लूँगा, तब तुम्हारे मुख में आ जाऊँगा – यह तुमसे सच्ची प्रतिज्ञा करके कहता हूँ।  

हनुमानजी के ऐसा कहने पर इच्छानुसार रूप धारण करने वाली सुरसा बोली - मुझे यह वर मिला है कि कोई भी मुझे लाँघकर आगे नहीं जा सकता। 

फिर भी हनुमानजी को जाते देख उनके बल को जानने की इच्छा रखने वाली नागमाता सुरसा ने उनसे कहा - वानरश्रेष्ठ! आज मेरे मुख में प्रवेश करके ही तुम्हें आगे जाना चाहिये। पूर्वकाल में विधाता ने मुझे ऐसा ही वर दिया था।  

ऐसा कहकर सुरसा तुरंत अपना विशाल मुँह फैलाकर हनुमानजी के सामने खड़ी हो गयी।  

सुरसा के ऐसा कहने पर वानरशिरोमणि हनुमानजी कुपित हो उठे और बोले - तुम अपना मुँह इतना बड़ा बना लो जिससे उसमें मेरा भार सह सको।  

यों कहकर जब वे मौन हुए, तब सुरसा ने अपना मुख दस योजन विस्तृत बना लिया। यह देखकर कुपित हुए हनुमानजी भी तत्काल दस योजन बड़े हो गये। उन्हें मेघ के समान दस योजन विस्तृत शरीर से युक्त हुआ देख सुरसा ने भी अपने मुख को बीस योजन बड़ा बना लिया। तब हनुमानजी ने क्रुद्ध होकर अपने शरीर को तीस योजन अधिक बढ़ा दिया। फिर तो सुरसा ने भी अपने मुँह को चालीस योजन ऊँचा कर लिया। यह देख वीर हनुमान् पचास योजन ऊँचे हो गये। तब सुरसा ने अपना मुँह साठ योजन ऊँचा बना लिया। फिर तो वीर हनुमान् उसी क्षण सत्तर योजन ऊँचे हो गये। अब सुरसा ने अस्सी योजन ऊँचा मुँह बना लिया।

तदनन्तर अग्नि के समान तेजस्वी हनुमान् नब्बे योजन ऊँचे हो गये। यह देख सुरसा ने भी अपने मुँह का विस्तार सौ योजन का कर लिया। सुरसा के फैलाये हुए उस विशाल जिह्वा से युक्त और नरक के समान अत्यन्त भयंकर मुँह को देखकर बुद्धिमान् वायुपुत्र हनुमान् ने मेघ की भाँति अपने शरीर को संकुचित कर लिया। वे उसी क्षण अँगूठे के बराबर छोटे हो गये। 

फिर वे महाबली श्रीमान् पवनकुमार सुरसा के उस मुँह में प्रवेश करके तुरंत निकल आये और आकाश में खड़े होकर इस प्रकार बोले - दक्षकुमारी! तुम्हें नमस्कार है। मैं तुम्हारे मुँह में प्रवेश कर चुका। लो तुम्हारा वर भी सत्य हो गया। अब मैं उस स्थान को जाऊँगा, जहाँ विदेहकुमारी सीता विद्यमान हैं। 

राहु के मुख से छूटे हुए चन्द्रमा की भाँति अपने मुख से मुक्त हुए हनुमानजी को देखकर सुरसा देवी ने अपने असली रूप में प्रकट होकर उन वानरवीर से कहा - कपिश्रेष्ठ! तुम भगवान् श्रीराम के कार्य की सिद्धि के लिये सुखपूर्वक जाओ। सौम्य ! विदेहनन्दिनी सीता को महात्मा श्रीराम से शीघ्र मिलाओ। 

कपिवर हनुमानजी का यह तीसरा अत्यन्त दुष्कर कर्म देख सब प्राणी वाह-वाह करके उनकी प्रशंसा करने लगे। 

इति श्रीमद् राम कथा सुन्दरकाण्ड अध्याय-९ का भाग-३(3) समाप्त ! 

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