तदनन्तर जनस्थान से अकम्पन नामक राक्षस बड़ी उतावली के साथ लङ्का की ओर गया और शीघ्र ही उस पुरी में प्रवेश करके रावण से इस प्रकार बोला – राजन्! जनस्थान में जो बहुत-से राक्षस रहते थे, वे मार डाले गये। खर युद्ध में मारा गया। मैं किसी तरह जान बचाकर यहाँ आया हूँ।
अकम्पन के ऐसा कहते ही दशमुख रावण क्रोध से जल उठा और लाल आँखें करके उससे इस तरह बोला, मानो उसे अपने तेज से जलाकर भस्म कर डालेगा।
वह बोला - कौन मौत के मुख में जाना चाहता है, जिसने मेरे भयंकर जनस्थान का विनाश किया है? कौन वह दु:साहसी है, जिसे समस्त लोकों में कहीं भी ठौर-ठिकाना नहीं मिलनेवाला है? मेरा अपराध करके इन्द्र, यम, कुबेर और विष्णु भी चैन से नहीं रह सकेंगे। मैं काल का भी काल हूँ, आग को भी जला सकता हूँ तथा मौत को भी मृत्यु के मुख में डाल सकता हूँ। यदि मैं क्रोध में भर जाऊँ तो अपने वेग से वायु की गति को भी रोक सकता हूँ तथा अपने तेज से सूर्य और अग्नि को भी जलाकर भस्म कर सकता हूँ।
रावण को इस प्रकार क्रोध से भरा देख भय के मारे अकम्पन की बोलती बंद हो गयी। उसने हाथ जोड़कर संशययुक्त वाणी में रावण से अभय की याचना की। तब राक्षसों में श्रेष्ठ दशग्रीव ने उसे अभयदान दिया।
इससे अकम्पन को अपने प्राण बचने का विश्वास हुआ और वह संशयरहित होकर बोला - राक्षसराज! राजा दशरथ के नवयुवक पुत्र श्रीराम पञ्चवटी में रहते हैं। उनके शरीर की गठन सिंह के समान है, कंधे मोटे और भुजाएँ गोल तथा लम्बी हैं, शरीर का रंग साँवला है। वे बड़े यशस्वी और तेजस्वी दिखायी देते हैं। उनके बल और पराक्रम की कहीं तुलना नहीं है। उन्होंने जनस्थान में रहने वाले खर और दूषण आदि का वध किया है।
अकम्पन की यह बात सुनकर राक्षसराज रावण ने नागराज (महान् सर्प) की भाँति लम्बी साँस खींचकर इस प्रकार कहा - अकम्पन! बताओ तो सही क्या राम सम्पूर्ण देवताओं तथा देवराज इन्द्र के साथ जनस्थान में आये हैं?
रावण का यह प्रश्न सुनकर अकम्पन ने महात्मा श्रीराम के बल और पराक्रम का पुन: इस प्रकार वर्णन किया - लङ्केश्वर! जिनका नाम राम है, वे संसार के समस्त धनुर्धरों में श्रेष्ठ और अत्यन्त तेजस्वी हैं। दिव्यास्त्रों के प्रयोग का जो गुण है, उससे भी वे पूर्णतः सम्पन्न हैं। युद्ध की कला में तो वे पराकाष्ठा को पहुँचे हुए हैं। श्रीराम के साथ उनके छोटे भाई लक्ष्मण भी हैं, जो उन्हीं के समान बलवान् हैं। उनका मुख पूर्णिमा के चन्द्रमा की भाँति मनोहर है। उनकी आँखें कुछ-कुछ लाल हैं और स्वर दुन्दुभि के समान गम्भीर है।
'जैसे अग्नि के साथ वायु हों, उसी प्रकार अपने भाई के साथ संयुक्त हुए राजाधिराज श्रीमान् राम बड़े प्रबल हैं। उन्होंने ही जनस्थान को उजाड़ डाला है। उनके साथ न कोई देवता हैं, न महात्मा मुनि। इस विषय में आप कोई विचार न करें। श्रीराम के छोड़े हुए सोने की पाँख वाले बाण पाँच मुख वाले सर्प बनकर राक्षसों को खा जाते थे। भय से कातर हुए राक्षस जिस-जिस मार्ग से भागते थे, वहाँ-वहाँ वे श्रीराम को ही अपने सामने खड़ा देखते थे। अनघ! इस प्रकार अकेले श्रीराम ने ही आपके जनस्थान का विनाश किया है।
अकम्पन की यह बात सुनकर रावण ने कहा - मैं अभी लक्ष्मण सहित राम का वध करने के लिये जनस्थान को जाऊँगा।
उसके ऐसा कहने पर अकम्पन बोला - राजन् ! श्रीराम का बल और पुरुषार्थ जैसा है, उसका यथावत् वर्णन मुझसे सुनिये। महायशस्वी श्रीराम यदि कुपित हो जायँ तो उन्हें अपने पराक्रम के द्वारा कोई भी काबू में नहीं कर सकता। वे अपने बाणों से भरी हुई नदी के वेग को भी पलट सकते हैं तथा तारा, ग्रह और नक्षत्रों सहित सम्पूर्ण आकाशमण्डल को पीड़ा दे सकते हैं। वे श्रीमान् भगवान् राम समुद्र में डूबती हुई पृथ्वी को ऊपर उठा सकते हैं, महासागर की मर्यादा का भेदन करके समस्त लोकों को उसके जल से आप्लावित कर सकते हैं तथा अपने बाणों से समुद्र के वेग अथवा वायु को भी नष्ट कर सकते हैं।
'वे महायशस्वी पुरुषोत्तम अपने पराक्रम से सम्पूर्ण लोकों का संहार करके पुनः नये सिरे से प्रजा की सृष्टि करने में समर्थ हैं। दशग्रीव! जैसे पापी पुरुष स्वर्ग पर अधिकार नहीं प्राप्त कर सकते, उसी प्रकार आप अथवा समस्त राक्षस जगत् भी युद्ध में श्रीराम को नहीं जीत सकते। मेरी समझ में सम्पूर्ण देवता और असुर मिलकर भी उनका वध नहीं कर सकते। उनके वध का यह एक उपाय मुझे सूझा है, उसे आप मेरे मुख से एकचित्त होकर सुनिये।'
‘श्रीराम की पत्नी सीता संसार की सर्वोत्तम सुन्दरी है। उसने यौवन के मध्य में पदार्पण किया है। उसके अङ्ग- प्रत्यङ्ग सुन्दर और सुडौल हैं। वह रत्नमय आभूषणों से विभूषित रहती है। सीता सम्पूर्ण स्त्रियों में एक रत्न है। देवकन्या, गन्धर्वकन्या, अप्सरा अथवा नागकन्या कोई भी रूप में उसकी समानता नहीं कर सकती, फिर मनुष्य जाति की दूसरी कोई नारी उसके समान कैसे हो सकती है। उस विशाल वन में जिस किसी भी उपाय से श्रीराम को धोखे में डालकर आप उनकी पत्नी का अपहरण कर लें। सीता से बिछुड़ जाने पर श्रीराम कदापि जीवित नहीं रहेंगे।'
राक्षसराज रावण को अकम्पन की वह बात पसंद आ गयी। उस महाबाहु दशग्रीव ने कुछ सोचकर अकम्पन से कहा - ठीक है, कल प्रात:काल मैं अकेला ही जाऊँगा और विदेहकुमारी सीता को प्रसन्नतापूर्वक इस महापुरी में ले आऊँगा।
