इन्द्रजीत के उस नीतिपूर्ण कर्म से विस्मित तथा रावण के सीताहरण आदि कर्मों से कुपित हो रोष से लाल आँखें किये भयंकर पराक्रमी हनुमानजी ने राक्षसराज रावण की ओर देखा। वह महातेजस्वी राक्षसराज सोने के बने हुए बहुमूल्य एवं दीप्तिमान् मुकुट से, जिसमें मोतियों का काम किया हुआ था, उद्भासित हो रहा था। उसके विभिन्न अङ्गों में सोने के विचित्र आभूषण ऐसे सुन्दर लगते थे मानो मानसिक संकल्प द्वारा बनाये गये हो। उनमें हीरे तथा बहुमूल्य मणिरत्न जड़े हुए थे, उन आभूषणों से रावण की अद्भुत शोभा होती थी।
बहुमूल्य रेशमी वस्त्र उसके शरीर की शोभा बढ़ा रहे थे। वह लाल चन्दन से चर्चित था और भाँति-भाँति की विचित्र रचनाओं से युक्त सुन्दर अङ्गरागों से उसका सारा अङ्ग सुशोभित हो रहा था। उसकी आँखें देखने योग्य लाल-लाल और भयावनी थीं; उनसे और चमकीली तीखी एवं बड़ी-बड़ी दाढ़ों तथा लंबे-लंबे ओठों के कारण उसकी विचित्र शोभा होती थी। वीर हनुमानजी ने देखा, अपने दस मस्तकों से सुशोभित महाबली रावण नाना प्रकार के सर्पों से भरे हुए अनेक शिखरों द्वारा शोभा पाने वाले मन्दराचल के समान प्रतीत हो रहा है।
उसका शरीर काले कोयले के ढेर की भाँति काला था और वक्षःस्थल चमकीले हार से विभूषित था। वह पूर्ण चन्द्र के समान मनोरम मुख द्वारा प्रात: काल के सूर्य से युक्त मेघ की भाँति शोभा पा रहा था। जिनमें केयूर बँधे थे, उत्तम चन्दन का लेप हुआ था और चमकीले अङ्गद शोभा दे रहे थे, उन भयंकर भुजाओं से सुशोभित रावण ऐसा जान पड़ता था, मानो पाँच सिर वाले अनेक सर्पों से सेवित हो रहा हो। वह स्फटिकमणि के बने हुए विशाल एवं सुन्दर सिंहासन पर, जो नाना प्रकार के रत्नों के संयोग से चित्रित, विचित्र तथा सुन्दर बिछौनों से आच्छादित था, बैठा हुआ था।
वस्त्र और आभूषणों से खूब सजी हुई बहुत-सी युवतियाँ हाथ में चँवर लिये सब ओर से आस-पास खड़ी हो उसकी सेवा करती थीं।
मन्त्र-तत्त्व को जानने वाले दुर्धर, प्रहस्त, महापार्श्व तथा निकुम्भ – ये चार राक्षसजातीय मन्त्री उसके पास बैठे थे। उन चारों राक्षसों से घिरा हुआ बलाभिमानी रावण चार समुद्रों से घिरे हुए समस्त भूलोक की भाँति शोभा पा रहा था। जैसे देवता देवराज इन्द्र को सान्त्वना देते हैं, उसी प्रकार मन्त्र- तत्त्व के ज्ञाता मन्त्री तथा दूसरे-दूसरे शुभचिन्तक सचिव उसे आश्वासन दे रहे थे। इस प्रकार हनुमानजी ने मन्त्रियों से घिरे हुए अत्यन्त तेजस्वी, सिंहासनारूढ़ राक्षसराज रावण को मेरुशिखर पर विराजमान सजल जलधर के समान देखा। उन भयानक पराक्रमी राक्षसों से पीड़ित होने पर भी हनुमानजी अत्यन्त विस्मित होकर राक्षसराज रावण को बड़े गौर से देखते रहे।
उस दीप्ति शाली राक्षसराज को अच्छी तरह देखकर उसके तेज से मोहित हो हनुमानजी मन-ही-मन इस प्रकार विचार करने लगे - अहो! इस राक्षसराज का रूप कैसा अद्भुत है! कैसा अनोखा धैर्य है। कैसी अनुपम शक्ति है! और कैसा आश्चर्यजनक तेज है! इसका सम्पूर्ण राजोचित लक्षणों से सम्पन्न होना कितने आश्चर्य की बात है ! यदि इसमें प्रबल अधर्म न होता तो यह राक्षसराज रावण इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवलोक का संरक्षक हो सकता था। इसके लोकनिन्दित क्रूरतापूर्ण निष्ठुर कर्मों के कारण देवताओं और दानवों सहित सम्पूर्ण लोक इससे भयभीत रहते हैं। यह कुपित होने पर समस्त जगत को एकार्णव में निमग्न कर सकता है। संसार में प्रलय मचा सकता है।
अमित तेजस्वी राक्षसराज के प्रभाव को देखकर वे बुद्धिमान् वानरवीर ऐसी अनेक प्रकार की चिन्ताएँ करते रहे। समस्त लोकों को रुलाने वाला महाबाहु रावण भूरी आँखों वाले हनुमानजी को सामने खड़ा देख महान् रोष से भर गया।
साथ ही तरह-तरह की आशङ्काओं से उसका दिल बैठ गया। अतः वह तेजस्वी वानरराज के विषय में विचार करने लगा - क्या इस वानर के रूप में साक्षात् भगवान् नन्दी यहाँ पधारे हुए हैं, जिन्होंने पूर्वकाल में कैलाश पर्वत पर जब कि मैंने उनका उपहास किया था, मुझे शाप दे दिया था? वे ही तो वानर का स्वरूप धारण करके यहाँ नहीं आये हैं? (इस कथा को विस्तार से जानने के लिए अध्याय-३ रावण चरित्र के भाग - ३७ को पढ़ें।) अथवा इस रूप में बाणासुर का आगमन तो नहीं हुआ है?
इस तरह तर्क-वितर्क करते हुए राजा रावण ने क्रोध से लाल आँखें करके मन्त्रिवर प्रहस्त से समयानुकूल गम्भीर एवं अर्थयुक्त बात कही - अमात्य ! इस दुरात्मा से पूछो तो सही, यह कहाँ से आया है? इसके आने का क्या कारण है? प्रमदावन को उजाड़ने तथा राक्षसों को मारने में इसका क्या उद्देश्य था ? मेरी दुर्जय पुरी में जो इसका आना हुआ है, इसमें इसका क्या प्रयोजन है? अथवा इसने जो राक्षसों के साथ युद्ध छेड़ दिया है, उसमें इसका क्या उद्देश्य है? ये सारी बातें इस दुर्बुद्धि वानर से पूछो।
रावण की बात सुनकर प्रहस्त ने हनुमानजी से कहा – वानर ! तुम घबराओ न, धैर्य रखो। तुम्हारा भला हो। तुम्हें डरने की आवश्यकता नहीं है। यदि तुम्हें इन्द्र ने महाराज रावण की नगरी में भेजा है तो ठीक-ठीक बता दो। वानर ! डरो न । छोड़ दिये जाओगे। अथवा यदि तुम कुबेर, यम या वरुण के दूत हो और यह सुन्दर रूप धारण करके हमारी इस पुरी में घुस आये हो तो यह भी बता दो। अथवा विजय की अभिलाषा रखने वाले विष्णु ने तुम्हें दूत बनाकर भेजा है? तुम्हारा तेज वानरों का-सा नहीं है। केवल रूपमात्र वानर का है। वानर! इस समय सच्ची बात कह दो, फिर तुम छोड़ दिये जाओगे। यदि झूठ बोलोगे तो तुम्हारा जीना असम्भव हो जायगा। अथवा और सब बातें छोड़ो। तुम्हारा इस रावण के नगर में आने का क्या उद्देश्य है? यही बता दो।
प्रहस्त के इस प्रकार पूछने पर उस समय वानरश्रेष्ठ हनुमान् ने राक्षसों के स्वामी रावण से कहा - मैं इन्द्र, यम अथवा वरुण का दूत नहीं हूँ। कुबेर के साथ भी मेरी मैत्री नहीं है और भगवान् विष्णु ने भी मुझे यहाँ नहीं भेजा है। मैं जन्म से ही वानर हूँ और राक्षस रावण से मिलने के उद्देश्य से ही मैंने उनके इस दुर्लभ वन को उजाड़ा है। इसके बाद तुम्हारे बलवान् राक्षस युद्ध की इच्छा से मेरे पास आये और मैंने अपने शरीर की रक्षा के लिये रणभूमि में उनका सामना किया।
'देवता अथवा असुर भी मुझे अस्त्र अथवा पाश से बाँध नहीं सकते। इसके लिये मुझे भी ब्रह्माजी से वरदान मिल चुका है। राक्षसराज को देखने की इच्छा से ही मैंने ब्रह्मास्त्र से बँधना स्वीकार किया है। यद्यपि इस समय मैं ब्रह्मास्त्र से मुक्त हूँ तथापि इन राक्षसों ने मुझे बँधा समझकर ही यहाँ लाकर तुम्हें सौंपा है। भगवान् श्रीरामचन्द्रजी का कुछ कार्य है, जिसके लिये मैं तुम्हारे पास आया हूँ। प्रभो ! मैं अमित तेजस्वी श्रीरघुनाथजी का दूत हूँ, ऐसा समझकर मेरे इस हितकारी वचन को अवश्य सुनो।'
महाबली दशमुख रावण की ओर देखते हुए शक्तिशाली वानरशिरोमणि हनुमान् ने शान्तभाव से यह अर्थयुक्त बात कही - राक्षसराज! मैं सुग्रीव का संदेश लेकर यहाँ तुम्हारे पास आया हूँ। वानरराज सुग्रीव तुम्हारे भाई हैं। इसी नाते उन्होंने तुम्हारा कुशल- समाचार पूछा है। अब तुम अपने भाई महात्मा सुग्रीव का संदेश - धर्म और अर्थयुक्त वचन, जो इहलोक और परलोक में भी लाभदायक है, सुनो।
'अभी हाल में ही दशरथ नाम से प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं, जो पिता की भाँति प्रजा के हितैषी, इन्द्र के समान तेजस्वी तथा रथ, हाथी, घोड़े आदि से सम्पन्न थे। उनके परम प्रिय ज्येष्ठ पुत्र महातेजस्वी, प्रभावशाली महाबाहु श्रीरामचन्द्रजी पिता की आज्ञा से धर्ममार्ग का आश्रय लेकर अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ दण्डकारण्य में आये थे। सीता विदेहदेश के राजा महात्मा जनक की पुत्री हैं। जनस्थान में आने पर श्रीरामपन्ती सीता कहीं खो गयी हैं। राजकुमार श्रीराम अपने भाई के साथ उन्हीं सीतादेवी की खोज करते हुए ऋष्यमूक पर्वत पर आये और सुग्रीव से मिले।'
‘सुग्रीव ने उनसे सीता को ढूँढ़ निकालने की प्रतिज्ञा की और श्रीराम ने सुग्रीव को वानरों का राज्य दिलाने का वचन दिया। तत्पश्चात् राजकुमार श्रीरामचन्द्रजी ने युद्ध में वाली को मारकर सुग्रीव को किष्किन्धा के राज्य पर स्थापित कर दिया। इस समय सुग्रीव वानरों और भालुओं के समुदाय के स्वामी हैं। वानरराज वाली को तो तुम पहले से ही जानते हो। उस वानरवीर को युद्धभूमि में श्रीराम ने एक ही बाण से मार गिराया था।'
'अब सत्यप्रतिज्ञ सुग्रीव सीता को खोज निकालने के लिये व्यग्र हो उठे हैं। उन वानरराज ने समस्त दिशाओं में वानरों को भेजा है। इस समय सैकड़ों, हजारों और लाखों वानर सम्पूर्ण दिशाओं तथा आकाश और पाताल में भी सीताजी की खोज कर रहे हैं। उन वानरवीरों में से कोई गरुड़ के समान वेगवान् हैं तो कोई वायु के समान। उनकी गति कहीं नहीं रुकती। वे कपिवीर शीघ्रगामी और महान् बली हैं। मेरा नाम हनुमान् है। मैं वायुदेवता का औरस पुत्र हूँ। सीता का पता लगाने और तुमसे मिलने के लिये सौ योजन विस्तृत समुद्र को लाँघकर तीव्र गति से यहाँ आया हूँ। घूमते-घूमते तुम्हारे अन्त: पुर में मैंने जनकनन्दिनी सीता को देखा है।'
‘महामते! तुम धर्म और अर्थ के तत्त्व को जानते हो। तुमने बड़े भारी तप का संग्रह किया है। अत: दूसरे की स्त्री को अपने घर में रोक रखना तुम्हारे लिये कदापि उचित नहीं है। धर्मविरुद्ध कार्यों में बहुत-से अनर्थ भरे रहते हैं। वे कर्ता का जड़मूल से नाश कर डालते हैं। अत: तुम-जैसे बुद्धिमान् पुरुष ऐसे कार्यों में नहीं प्रवृत्त होते। देवताओं और असुरों में भी कौन ऐसा वीर है, जो श्रीरामचन्द्रजी के क्रोध करने के पश्चात् लक्ष्मण के छोड़े हुए बाणों के सामने ठहर सके।'
'राजन् ! तीनों लोकों में एक भी ऐसा प्राणी नहीं है, जो भगवान् श्रीराम का अपराध करके सुखी रह सके। इसलिये मेरी धर्म और अर्थ के अनुकूल बात, जो तीनों कालों में हितकर है, मान लो और जानकीजी को श्रीरामचन्द्रजी के पास लौटा दो। मैंने इन देवी सीता का दर्शन कर लिया। जो दुर्लभ वस्तु थी, उसे यहाँ पा लिया। इसके बाद जो कार्य शेष है, उसके साधन में श्रीरघुनाथजी ही निमित्त हैं। मैंने यहाँ सीता की अवस्था को लक्ष्य किया है। वे निरन्तर शोक में डूबी रहती हैं। सीता तुम्हारे घर में पाँच फनवाली नागिन के समान निवास करती हैं, जिन्हें तुम नहीं जानते हो। जैसे अत्यन्त विषमिश्रित अन्न को खाकर कोई उसे बलपूर्वक नहीं पचा सकता, उसी प्रकार सीताजी को अपनी शक्ति से पचा लेना देवताओं और असुरों के लिये भी असम्भव है।'
'तुमने तपस्या का कष्ट उठाकर धर्म के फलस्वरूप जो यह ऐश्वर्य का संग्रह किया है तथा शरीर और प्राणों को चिरकाल तक धारण करने की शक्ति प्राप्त की है, उसका विनाश करना उचित नहीं। तुम तपस्या के प्रभाव से देवताओं और असुरों द्वारा जो अपनी अवध्यता देख रहे हो, उसमें भी तपस्याजनित यह धर्म ही महान् कारण है (अथवा उस अवध्यता के होते हुए भी तुम्हारे वध का दूसरा महान् कारण उपस्थित है)।'
‘राक्षसराज! सुग्रीव और श्रीरामचन्द्रजी न तो देवता हैं, न यक्ष हैं और न राक्षस ही हैं। श्रीरघुनाथजी मनुष्य हैं और सुग्रीव वानरों के राजा। अत: उनके हाथ से तुम अपने प्राणों की रक्षा कैसे करोगे? जो पुरुष प्रबल अधर्म के फल से बँधा हुआ है, उसे धर्म का फल नहीं मिलता। वह उस अधर्म फल को ही पाता है। हाँ, यदि उस अधर्म के बाद किसी प्रबल धर्म का अनुष्ठान किया गया हो तो वह पहले के अधर्म का नाशक होता है।'
‘तुमने पहले जो धर्म किया था, उसका पूरा-पूरा फल तो यहाँ पा लिया, अब इस सीताहरण रूपी अधर्म का फल भी तुम्हें शीघ्र ही मिलेगा। जनस्थान के राक्षसों का संहार, वाली का वध और श्रीराम तथा सुग्रीव की मैत्री - इन तीनों कार्यों को अच्छी तरह समझ लो। उसके बाद अपने हित का विचार करो। यद्यपि मैं अकेला ही हाथी, घोड़े और रथों सहित समूची लङ्का का नाश कर सकता हूँ, तथापि श्रीरघुनाथजी का ऐसा विचार नहीं है - उन्होंने मुझे इस कार्य के लिये आज्ञा नहीं दी है। जिन लोगों ने सीता का तिरस्कार किया है, उन शत्रुओं का स्वयं ही संहार करने के लिये श्रीरामचन्द्रजी ने वानरों और भालुओं के सामने प्रतिज्ञा की है।'
‘भगवान् श्रीराम का अपराध करके साक्षात् इन्द्र भी सुख नहीं पा सकते, फिर तुम्हारे जैसे साधारण लोगों की तो बात ही क्या है? जिनको तुम सीता के नाम से जानते हो और जो इस समय तुम्हारे अन्तः पुर में उपस्थित हैं, उन्हें सम्पूर्ण लङ्का का विनाश करने वाली कालरात्रि समझो। सीता का शरीर धारण करके तुम्हारे पास काल की फाँसी आ पहुँची है, उसमें स्वयं गला फँसाना ठीक नहीं है; अत: अपने कल्याण की चिन्ता करो। देखो, अट्टालिकाओं और गलियों सहित यह लङ्कापुरी सीताजी के तेज और श्रीराम की क्रोधाग्नि से जलकर भस्म होने जा रही है (बचा सको तो बचाओ )।'
‘इन मित्रों, मन्त्रियों, कुटुम्बीजनों, भाइयों, पुत्रों, हितकारियों, स्त्रियों, सुख-भोग के साधनों तथा समूची लङ्का को मौत के मुख में न झोंको। राक्षसों के राजाधिराज! मैं भगवान् श्रीराम का दास हूँ, दूत हूँ और विशेषतः वानर हूँ। मेरी सच्ची बात सुनो। महायशस्वी श्रीरामचन्द्रजी चराचर प्राणियों सहित सम्पूर्ण लोकों का संहार करके फिर उनका नये सिरे से निर्माण करने की शक्ति रखते हैं।'
‘भगवान् श्रीराम श्रीविष्णु के तुल्य पराक्रमी हैं। देवता, असुर, मनुष्य, यक्ष, राक्षस, सर्प, विद्याधर, नाग, गन्धर्व, मृग, सिद्ध, किंनर, पक्षी एवं अन्य समस्त प्राणियों में कहीं किसी समय कोई भी ऐसा नहीं है, जो श्रीरघुनाथजी के साथ लोहा ले सके। सम्पूर्ण लोकों के अधीश्वर राजसिंह श्रीराम का ऐसा महान् अपराध करके तुम्हारा जीवित रहना कठिन है।'
'निशाचरराज! श्रीरामचन्द्रजी तीनों लोकों के स्वामी हैं। देवता, दैत्य, गन्धर्व, विद्याधर, नाग तथा यक्ष- ये सब मिलकर भी युद्ध में उनके सामने नहीं टिक सकते। चार मुखों वाले स्वयम्भू ब्रह्मा, तीन नेत्रों वाले त्रिपुरनाशक रुद्र अथवा देवताओं के स्वामी महान् ऐश्वर्यशाली इन्द्र भी समराङ्गण में श्रीरघुनाथजी के सामने नहीं ठहर सकते।'
वीरभाव से निर्भयतापूर्वक भाषण करने वाले महाकपि हनुमानजी की बातें बड़ी सुन्दर एवं युक्तियुक्त थीं, तथापि वे रावण को अप्रिय लगीं। उन्हें सुनकर अनुपम शक्तिशाली दशानन रावण ने क्रोध से आँखें तरेर कर सेवकों को उनके वध के लिये आज्ञा दी।
