भाग-२(2) मैनाक के द्वारा हनुमानजी का स्वागत

 


हनुमानजी के शरीर से उठी हुई वायु से प्रेरित हो वृक्षों के भाँति-भाँति के पुष्प अत्यन्त हलके होने के कारण जब समुद्र में गिरते थे, तब डूबते नहीं थे। इसलिये उनकी विचित्र शोभा होती थी। उन फूलों के कारण वह महासागर तारों से भरे हुए आकाश के समान सुशोभित होता था। अनेक रंग की सुगन्धित पुष्पराशि से उपलक्षित वानर - वीर हनुमानजी बिजली से सुशोभित होकर उठते हुए मेघ के समान जान पड़ते थे। उनके वेग से झड़े हुए फूलों के कारण समुद्र का जल उगे हुए रमणीय तारों से खचित आकाश के समान दिखायी देता था। 

आकाश में फैलायी गयी उनकी दोनों भुजाएँ ऐसी दिखायी देती थीं, मानो किसी पर्वत के शिखर से पाँच फनवाले दो सर्प निकले हुए हों। उस समय महाकपि हनुमान् ऐसे प्रतीत होते थे, मानो तरङ्ग मालाओं सहित महासागर को पी रहे हों। वे ऐसे दिखायी देते थे, मानो आकाश को भी पी जाना चाहते हों। वायु के मार्ग का अनुसरण करने वाले हनुमानजी के बिजली की-सी चमक पैदा करने वाले दोनों नेत्र ऐसे प्रकाशित हो रहे थे, मानो पर्वत पर दो स्थानों में लगे हुए दावानल दहक रहे हों। 

पिंगल नेत्र वाले वानरों में श्रेष्ठ हनुमानजी की दोनों गोल बड़ी-बड़ी और पीले रंग की आँखें चन्द्रमा और सूर्य के समान प्रकाशित हो रही थीं। लाल-लाल नासिका के कारण उनका सारा मुँह लाली लिये हुए था, अत: वह संध्याकाल से संयुक्त सूर्यमण्डल के समान सुशोभित होता था। आकाश में तैरते हुए पवनपुत्र हनुमान की उठी हुई टेढ़ी पूँछ इन्द्र की ऊँची ध्वजा के समान जान पड़ती थी। महाबुद्धिमान् पवनपुत्र हनुमानजी की दाहें सफेद थीं और पूँछ गोलाकार मुड़ी हुई थी। इसलिये वे परिधि से घिरे हुए सूर्यमण्डल के समान जान पड़ते थे। उनकी कमर के नीचे का भाग बहुत लाल था। इससे वे महाकपि हनुमान् फटे हुए गेरू से युक्त विशाल पर्वत के समान शोभा पाते थे। 

ऊपर-ऊपर से समुद्र को पार करते हुए वानरसिंह हनुमान् की काँख से होकर निकली हुई वायु बादल के समान गरजती थी। जैसे ऊपर की दिशा से प्रकट हुई पुच्छयुक्त उल्का आकाश में जाती देखी जाती है, उसी प्रकार अपनी पूँछ के कारण कपिश्रेष्ठ हनुमानजी भी दिखायी देते थे। चलते हुए सूर्य के समान विशालकाय हनुमानजी अपनी पूँछ के कारण ऐसी शोभा पा रहे थे, मानो कोई बड़ा गजराज अपनी कमर में बँधी हुई रस्सी से सुशोभित हो रहा हो। 

हनुमानजी का शरीर समुद्र से ऊपर-ऊपर चल रहा था और उनकी परछाईं जल में डूबी हुई-सी दिखायी देती थी। इस प्रकार शरीर और परछाईं दोनों से उपलक्षित हुए वे कपिवर हनुमान् समुद्र के जल में पड़ी हुई उस नौका के समान प्रतीत होते थे, जिसका ऊपरी भाग (पाल) वायु से परिपूर्ण हो और निम्न भाग समुद्र के जल से लगा हुआ हो। वे समुद्रके जिस-जिस भाग में जाते थे, वहाँ-वहाँ उनके अंग के वेग से उत्ताल तरङ्गे उठने लगती थीं। अत: वह भाग उन्मत्त (विक्षुब्ध) - सा दिखायी देता था। 

महान् वेगशाली महाकपि हनुमान् पर्वतों के समान ऊँची महासागर की तरङ्गमालाओं को अपनी छाती से चूर- चूर करते हुए आगे बढ़ रहे थे। कपिश्रेठ हनुमान् के शरीर से उठी हुई तथा मेघों की घटा में व्याप्त हुई प्रबल वायु ने भीषण गर्जना करने वाले समुद्र में भारी हलचल मचा दी। वे कपिकेसरी अपने प्रचण्ड वेग से समुद्र में बहुत-सी ऊँची-ऊँची तरङ्गों को आकर्षित करते हुए इस प्रकार उड़े जा रहे थे, मानो पृथ्वी और आकाश दोनों को विक्षुब्ध कर रहे हैं। वे महान् वेगशाली वानरवीर उस महासमुद्र में उठी हुई सुमेरु और मन्दराचल के समान उत्ताल तरङ्गों की मानो गणना करते हुए आगे बढ़ रहे थे। 

उस समय उनके वेग से ऊँचे उठकर मेघमण्डल के साथ आकाश में स्थित हुआ समुद्र का जल शरत्काल के फैले हुए मेघों के समान जान पड़ता था। जल हट जाने के कारण समुद्र के भीतर रहने वाले मगर, नाकेंरु, मछलियाँ और कछुए साफ-साफ दिखायी देते थे। जैसे वस्त्र खींच लेने पर देहधारियों के शरीर नंगे दीखने लगते हैं। समुद्र में विचरने वाले सर्प आकाश में जाते हुए कपिश्रेष्ठ हनुमानजी को देखकर उन्हें गरुड़ के ही समान समझने लगे। 

कपिकेसरी हनुमानजी की दस योजन चौड़ी और तीस योजन लम्बी छाया वेग के कारण अत्यन्त रमणीय जान पड़ती थी। खारे पानी के समुद्र में पड़ी हुई पवनपुत्र हनुमान् का अनुसरण करने वाली उनकी वह छाया श्वेत बादलों की पंक्ति के समान शोभा पाती थी। वे परम तेजस्वी महाकाय महाकपि हनुमान् आलम्बनहीन आकाश में पंखधारी पर्वत के समान जान पड़ते थे।वे बलवान् कपिश्रेष्ठ जिस मार्ग से वेगपूर्वक निकल जाते थे, उस मार्ग से संयुक्त समुद्र सहसा कठौते या कड़ाह के समान हो जाता था (उनके वेग से उठी हुई वायु के द्वारा वहाँ का जल हट जाने से वह स्थान कठौते आदि के समान गहरा-सा दिखायी पड़ता था )। पक्षी-समूहों के उड़ने के मार्ग में पक्षिराज गरुड़ की भाँति जाते हुए हनुमान् वायु के समान मेघमालाओं को अपनी ओर खींच लेते थे। 

हनुमानजी के द्वारा खींचे जाते हुए वे श्वेत, अरुण, नील और मजीठ के-से रंग वाले बड़े-बड़े मेघ वहाँ बड़ी शोभा पाते थे। वे बारम्बार बादलों के समूह में घुस जाते और बाहर निकल आते थे। इस तरह छिपते और प्रकाशित होते हुए चन्द्रमा के समान दृष्टिगोचर होते थे। उस समय तीव्रगति से आगे बढ़ते हुए वानरवीर हनुमानजी को देखकर देवता, गन्धर्व और चारण उनके ऊपर फूलों की वर्षा करने लगे। वे श्रीरामचन्द्रजी का कार्य सिद्ध करने के लिये जा रहे थे, अतः उस समय वेग से जाते हुए वानरराज हनुमान् को सूर्यदेव ने ताप नहीं पहुँचाया और वायुदेव ने भी उनकी सेवा की। आकाशमार्ग से यात्रा करते हुए वानरवीर हनुमान् की ऋषि-मुनि स्तुति करने लगे तथा देवता और गन्धर्व उनकी प्रशंसा के गीत गाने लगे। उन कपिश्रेष्ठ को बिना थकावट के सहसा आगे बढ़ते देख नाग, यक्ष और नाना प्रकार के राक्षस सभी उनकी स्तुति करने लगे। 

जिस समय कपिकेसरी हनुमानजी उछलकर समुद्र पार कर रहे थे, उस समय इक्ष्वाकुकुल का सम्मान करने की इच्छा से समुद्र ने विचार किया - यदि मैं वानरराज हनुमानजी की सहायता नहीं करूँगा तो बोलने की इच्छा वाले सभी लोगों की दृष्टि में मैं सर्वथा निन्दनीय हो जाऊँगा। मुझे इक्ष्वाकुकुल के महाराज सगर ने बढ़ाया था। इस समय ये हनुमानजी भी इक्ष्वाकुवंशी वीर श्रीरघुनाथजी की सहायता कर रहे हैं, अत: इन्हें इस यात्रा में किसी प्रकार का कष्ट नहीं होना चाहिये। मुझे ऐसा कोई उपाय करना चाहिये, जिससे वानरवीर यहाँ कुछ विश्राम कर लें। मेरे आश्रय में विश्राम कर लेने पर मेरे शेष भाग को ये सुगमता से पार कर लेंगे। 

यह शुभ विचार करके समुद्र ने अपने जल में छिपे हुए सुवर्णमय गिरिश्रेष्ठ मैनाक से कहा - शैलप्रवर! महामना देवराज इन्द्र ने तुम्हें यहाँ पातालवासी असुर समूहों के निकलने के मार्ग को रोकने के लिये परिषरूप से स्थापित किया है। इन असुरों का पराक्रम सर्वत्र प्रसिद्ध है। वे फिर पाताल से ऊपर को आना चाहते हैं, अत: उन्हें रोकने के लिये तुम अप्रमेय पाताल लोक के द्वार को बंद करके खड़े हो। 

‘शैल! ऊपर-नीचे और अगल-बगल में सब ओर बढ़ने की तुममें शक्ति है। गिरिश्रेष्ठ! इसीलिये मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ कि तुम ऊपर की ओर उठो। देखो, ये पराक्रमी कपिकेसरी हनुमान् तुम्हारे ऊपर होकर जा रहे हैं। ये बड़ा भयंकर कर्म करने वाले हैं, इस समय श्रीराम का कार्य सिद्ध करने के लिये इन्होंने आकाश में छलाँग मारी है। ये इक्ष्वाकुवंशी राम के सेवक हैं, अतः मुझे इनकी सहायता करनी चाहिये। इक्ष्वाकुवंश के लोग मेरे पूजनीय हैं और तुम्हारे लिये तो वे परम पूजनीय हैं। अत: तुम हमारी सहायता करो। जिससे हमारे कर्तव्य कर्म का (हनुमानजी के सत्काररूपी कार्य का) अवसर बीत न जाय। यदि कर्तव्य का पालन नहीं किया जाय तो वह सत्पुरुषों के क्रोध को जगा देता है।' 

‘इसलिये तुम पानी से ऊपर उठो, जिससे ये छलाँग मारने वालों में श्रेष्ठ कपिवर हनुमान् तुम्हारे ऊपर कुछ काल तक ठहरें - विश्राम करें। वे हमारे पूजनीय अतिथि भी हैं। देवताओं और गन्धर्वों द्वारा सेवित तथा सुवर्णमय विशाल शिखर वाले मैनाक! तुम्हारे ऊपर विश्राम करने के पश्चात् हनुमानजी शेष मार्ग को सुखपूर्वक तय कर लेंगे। ककुत्स्थवंशी श्रीरामचन्द्रजी की दयालुता, मिथिलेशकुमारी सीता का परदेश में रहने के लिये विवश होना तथा वानरराज हनुमान् का परिश्रम देखकर तुम्हें अवश्य ऊपर उठना चाहिये।' 

यह सुनकर बड़े-बड़े वृक्षों और लताओं से आवृत सुवर्णमय मैनाक पर्वत तुरंत ही क्षार समुद्र के जल से ऊपर को उठ गया। जैसे उद्दीप्त किरणों वाले दिवाकर (सूर्य) मेघों के आवरण को भेदकर उदित होते हैं, उसी प्रकार उस समय महासागर के जल का भेदन करके वह पर्वत बहुत ऊँचा उठ गया। समुद्र की आज्ञा पाकर जल में छिपे रहने वाले उस विशालकाय पर्वत ने दो ही घड़ी में हनुमानजी को अपने शिखरों का दर्शन कराया। 

उस पर्वत के वे शिखर सुवर्णमय थे। उन पर किन्नर और बड़े-बड़े नाग निवास करते थे। सूर्योदय के समान तेजःपुञ्ज से विभूषित वे शिखर इतने ऊँचे थे कि आकाश में रेखा-सी खींच रहे थे। उस पर्वत के उठे हुए सुवर्णमय शिखरों के कारण शस्त्र के समान नील वर्ण वाला आकाश सुनहरी प्रभा से उद्भासित होने लगा। उन परम कान्तिमान् और तेजस्वी सुवर्णमय शिखरों से वह गिरिश्रेष्ठ मैनाक सैकड़ों सूर्यों के समान देदीप्यमान हो रहा था। क्षार समुद्र के बीचमें अविलम्ब उठकर सामने खड़े हुए मैनाक को देखकर हनुमानजी ने मन-ही-मन निश्चित किया कि यह कोई विघ्न उपस्थित हुआ है। अत: वायु जैसे बादल को छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार महान् वेगशाली महाकपि हनुमान् ने बहुत ऊँचे उठे हुए मैनाक पर्वत के उस उच्चतर शिखर को अपनी छाती के धक्के से नीचे गिरा दिया। इस प्रकार कपिवर हनुमानजी के द्वारा नीचा देखने पर उनके उस महान् वेग का अनुभव करके पर्वतश्रेष्ठ मैनाक बड़ा प्रसन्न हुआ और गर्जना करने लगा। 

तब आकाश में स्थित हुए उस पर्वत ने आकाशगत वीर वानर हनुमानजी से प्रसन्नचित्त होकर कहा। वह मनुष्य रूप धारण करके अपने ही शिखर पर स्थित हो इस प्रकार बोला - वानरशिरोमणे! आपने यह दुष्कर कर्म किया है। अब उतरकर मेरे इन शिखरों पर सुखपूर्वक विश्राम कर लीजिये, फिर आगे की यात्रा कीजियेगा। श्रीरघुनाथजी के पूर्वजों ने समुद्र की वृद्धि की थी, इस समय आप उनका हित करने में लगे हैं; अत: समुद्र आपका सत्कार करना चाहता है। किसीने उपकार किया हो तो बदले में उसका भी उपकार किया जाय – यह सनातन धर्म है। इस दृष्टि से प्रत्युपकार करने की इच्छा वाला यह सागर आपसे सम्मान पाने के योग्य है। आप इसका सत्कार ग्रहण करें, इतने से ही इसका सम्मान हो जायगा। 

‘आपके सत्कार के लिये समुद्र ने बड़े आदर से मुझे नियुक्त किया है और कहा है - "इन कपिवर हनुमान् ने सौ योजन दूर जाने के लिये आकाश में छलाँग मारी है, अतः कुछ देर तक तुम्हारे शिखरों पर ये विश्राम कर लें, फिर शेष भाग का लङ्घन करेंगे।" 

'अतः कपिश्रेष्ठ ! आप कुछ देर तक मेरे ऊपर विश्राम कर लीजिये, फिर जाइयेगा। इस स्थान पर ये बहुत से सुगन्धित और सुस्वादु कन्द, मूल तथा फल हैं। वानरशिरोमणे! इनका आस्वादन करके थोड़ी देर तक सुस्ता लीजिये। उसके बाद आगे की यात्रा कीजियेगा। कपिवर! आपके साथ हमारा भी कुछ सम्बन्ध है। आप महान् गुणों का संग्रह करने वाले और तीनों लोकों में विख्यात हैं।' 

'कपिश्रेष्ठ पवननन्दन ! जो-जो वेगशाली और छलाँग मारने वाले वानर हैं, उन सबमें मैं आपको ही श्रेष्ठतम मानता हूँ। धर्म की जिज्ञासा रखने वाले विज्ञ पुरुष के लिये एक साधारण अतिथि भी निश्चय ही पूजा के योग्य माना गया है। फिर आप-जैसे असाधारण शौर्यशाली पुरुष कितने सम्मान के योग्य हैं, इस विषय में तो कहना ही क्या है? कपिश्रेष्ठ! आप देवशिरोमणि महात्मा वायु के पुत्र हैं और वेग में भी उन्हीं के समान हैं। आप धर्म के ज्ञाता हैं। भगवान् शिव के ग्यारहवें अंश हैं आपकी पूजा होने पर साक्षात् वायुदेव का पूजन हो जायगा। इसलिये आप अवश्य ही मेरे पूजनीय हैं। इसमें एक और भी कारण है, उसे सुनिये।' 

‘तात! पूर्वकाल के सत्ययुग की बात है। उन दिनों पर्वतों के भी पंख होते थे। वे भी गरुड़ के समान वेगशाली होकर सम्पूर्ण दिशाओं में उड़ते फिरते थे। उनके इस तरह वेगपूर्वक उड़ने और आने-जाने पर देवता, ऋषि और समस्त प्राणियों को उनके गिरने की आशङ्का से बड़ा भय होने लगा। इससे सहस्र नेत्रों वाले देवराज इन्द्र कुपित हो उठे और उन्होंने अपने वज्र से लाखों पर्वतों के पंख काट डाले। उस समय कुपित हुए देवराज इन्द्र वज्र उठाये मेरी ओर भी आये, किन्तु महात्मा वायु ने सहसा मुझे इस समुद्र में गिरा दिया।' 

‘वानरश्रेष्ठ! इस क्षार समुद्र में गिराकर आपके पिता ने मेरे पंखों की रक्षा कर ली और मैं अपने सम्पूर्ण अंश से सुरक्षित बच गया। पवननन्दन! कपिश्रेष्ठ! इसीलिये मैं आपका आदर करता हूँ, आप मेरे माननीय हैं। आपके साथ मेरा यह सम्बन्ध महान् गुणों से युक्त है। महामते! इस प्रकार चिरकाल के बाद जो यह प्रत्युपकार रूप कार्य (आपके पिता के उपकार का बदला चुकाने का अवसर) प्राप्त हुआ है, इसमें आप प्रसन्नचित्त होकर मेरी और समुद्र की भी प्रीति का सम्पादन करें (हमारा आतिथ्य ग्रहण करके हमें संतुष्ट करें )। वानरशिरोमणे! आप यहाँ अपनी थकान उतारिये, हमारी पूजा ग्रहण कीजिये और मेरे प्रेम को भी स्वीकार कीजिये। मैं आप जैसे माननीय पुरुष के दर्शन से बहुत प्रसन्न हुआ हूँ।' 

मैनाक के ऐसा कहने पर कपिश्रेष्ठ हनुमानजी ने उस उत्तम पर्वत से कहा - 'मैनाक! मुझे भी आपसे मिलकर बड़ी प्रसन्नता हुई है। मेरा आतिथ्य हो गया। अब आप अपने मन से यह दु:ख अथवा चिन्ता निकाल दीजिये कि इन्होंने मेरी पूजा ग्रहण नहीं की। मेरे कार्य का समय मुझे बहुत जल्दी करने के लिये प्रेरित कर रहा है। यह दिन भी बीता जा रहा है। मैंने वानरों के समीप यह प्रतिज्ञा कर ली है कि मैं यहाँ बीच में कहीं नहीं ठहर सकता। जब तक श्रीरामचन्द्रजी का कार्य नहीं कर लेता तब तक मेरे लिए विश्राम वर्जित है। 

ऐसा कहकर महाबली वानरशिरोमणि हनुमान् ने हँसते हुए से वहाँ मैनाक का अपने हाथ से स्पर्श किया और आकाश में ऊपर उठकर चलने लगे । उस समय पर्वत और समुद्र दोनों ने ही बड़े आदर से उनकी ओर देखा, उनका सत्कार किया और यथोचित आशीर्वादों से उनका अभिनन्दन किया। फिर पर्वत और समुद्र को छोड़कर उनसे दूर ऊपर उठकर अपने पिता के मार्ग का आश्रय ले हनुमानजी निर्मल आकाश में चलने लगे। 

इति श्रीमद् राम कथा सुन्दरकाण्ड अध्याय-९ का भाग-२(2) समाप्त ! 

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