भाग-२९(29) इन्द्रजीत और हनुमानजी का युद्ध, उसके दिव्यास्त्र के बन्धन में बँधकर हनुमानजी का रावण के दरबार में उपस्थित होना

 


तदनन्तर हनुमानजी के द्वारा अक्षकुमार के मारे जाने पर राक्षसों का स्वामी महाकाय रावण अपने मन को किसी तरह सुस्थिर करके रोष से जल उठा और देवताओं के तुल्य पराक्रमी कुमार इन्द्रजीत (मेघनाद) को इस प्रकार आज्ञा दी - पुत्र! तुमने ब्रह्माजी की आराधना करके अनेक प्रकार के अस्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया है। तुम अस्त्रवेत्ता, शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ तथा देवताओं और असुरों को भी शोक प्रदान करने वाले हो। इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओं के समुदाय में तुम्हारा पराक्रम देखा गया है। 

'इन्द्र के आश्रय में रहने वाले देवता और मरुद्गण भी समरभूमि में तुम्हारे अस्त्र बल का सामना होने पर टिक नहीं सके हैं। तीनों लोकों में तुम्हारे सिवा दूसरा कोई ऐसा नहीं है, जो युद्ध से थकता न हो। तुम अपने बाहुबल से तो सुरक्षित हो ही, तपस्या के बल से भी पूर्णतः निरापद हो। देश - काल का ज्ञान रखने वालों में प्रधान और बुद्धि की दृष्टि से भी सर्वश्रेष्ठ तुम्हीं हो। युद्ध में तुम्हारे वीरोचित कर्मों के द्वारा कुछ भी असाध्य नहीं है। शास्त्रानुकूल बुद्धिपूर्वक राजकार्य का विचार करते समय तुम्हारे लिये कुछ भी असम्भव नहीं है। तुम्हारा कोई भी विचार ऐसा नहीं होता, जो कार्य का साधक न हो। त्रिलोकी में एक भी ऐसा वीर नहीं है, जो तुम्हारी शारीरिक शक्ति और अस्त्र बल को न जानता हो।' 

'तुम्हारा तपोबल, युद्धविषयक पराक्रम और अस्त्र बल मेरे ही समान है। युद्धस्थल में तुमको पाकर मेरा मन कभी खेद या विषाद को नहीं प्राप्त होता; क्योंकि इसे यह निश्चित विश्वास रहता है कि विजय तुम्हारे पक्ष में होगी। देखो, किंकर नाम वाले समस्त राक्षस मार डाले गये। जम्बुमाली नाम का राक्षस भी जीवित न रह सका, मन्त्री के सातों वीर पुत्र तथा मेरे पाँच सेनापति भी काल के गाल में चले गये। उनके साथ ही हाथी, घोड़े और रथोंसहित मेरी बहुत-सी बल- वीर्य से सम्पन्न सेनाएँ भी नष्ट हो गयीं और तुम्हारा प्रिय बन्धु कुमार अक्ष भी मार डाला गया।' 

'शत्रुसूदन ! मुझमें जो तीनों लोकों पर विजय पाने की शक्ति है, वह तुम्हीं में है। पहले जो लोग मारे गये हैं, उनमें वह शक्ति नहीं थी इसलिये तुम्हारी विजय निश्चित है। इस प्रकार अपनी विशाल सेना का संहार और उस वानर का प्रभाव एवं पराक्रम देखकर तुम अपने बल का भी विचार कर लो; फिर अपनी शक्ति के अनुसार उद्योग करो। शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ वीर! तुम्हारे सब शत्रु शान्त हो चुके हैं। तुम अपने और पराये बल का विचार करके ऐसा प्रयत्न करो, जिससे युद्धभूमि के निकट तुम्हारे पहुँचते ही मेरी सेना का विनाश रुक जाय।' 

‘वीरवर! तुम्हें अपने साथ सेना नहीं ले जानी चाहिये; क्योंकि वे सेनाएँ समूह-की-समूह या तो भाग जाती हैं या मारी जाती हैं। इसी तरह अधिक तीक्ष्णता और कठोरता से युक्त वज्र लेकर भी जाने की कोई आवश्यकता नहीं है। क्योंकि उसके ऊपर वह भी व्यर्थ सिद्ध हो चुका है। उस वायुपुत्र हनुमान् की गति अथवा शक्ति का कोई माप-तौल या सीमा नहीं है। वह अग्नितुल्य तेजस्वी वानर किसी साधन विशेष से नहीं मारा जा सकता। इन सब बातों का अच्छी तरह विचार करके प्रतिपक्षी में अपने समान ही पराक्रम समझकर तुम अपने चित्त को एकाग्र कर लो - सावधान हो जाओ। अपने इस धनुष के दिव्य प्रभाव को याद रखते हुए आगे बढ़ो और ऐसा पराक्रम करके दिखाओ, जो खाली न जाय।' 

'उत्तम बुद्धिवाले वीर! मैं तुम्हें जो ऐसे संकट में भेज रहा हूँ, यह यद्यपि (स्नेह की दृष्टि से) उचित नहीं है, तथापि मेरा यह विचार राजनीति और क्षत्रिय धर्म के अनुकूल है। शत्रुदमन! वीर पुरुष को संग्राम में नाना प्रकार के शस्त्रों की कुशलता अवश्य प्राप्त करनी चाहिये, साथ ही युद्ध में विजय पाने की भी अभिलाषा रखनी चाहिये।' 

अपने पिता राक्षसराज रावण के इस वचन को सुनकर देवताओं के समान प्रभावशाली वीर मेघनाद ने युद्ध के लिये निश्चित विचार करके जल्दी से अपने स्वामी रावण की परिक्रमा की। तत्पश्चात् सभा में बैठे हुए अपने दल के प्रिय राक्षसों द्वारा भूरि-भूरि प्रशंसित हो इन्द्रजीत विकट युद्ध के लिये मन में उत्साह भरकर संग्राम भूमि की ओर जाने को उद्यत हुआ। उस समय प्रफुल्ल कमलदल के समान विशाल नेत्रों वाला राक्षसराज रावण का पुत्र महातेजस्वी श्रीमान् इन्द्रजीत पर्व के दिन उमड़े हुए समुद्र के समान विशेष हर्ष और उत्साह से पूर्ण हो राजमहल से बाहर निकला। 

जिसका वेग शत्रुओं के लिये असह्य था, वह इन्द्र के समान पराक्रमी मेघनाद पक्षिराज गरुड़ के समान तीव्र गति तथा तीखे दाग़ों वाले चार सिंहों से जुते हुए उत्तम रथ पर आरूढ़ हुआ। अस्त्र-शस्त्रों का ज्ञाता, अस्त्रवेत्ताओं में अग्रगण्य और धनुर्धरों में श्रेष्ठ वह रथी वीर रथ के द्वारा शीघ्र उस स्थान पर गया, जहाँ हनुमानजी उसकी प्रतीक्षा में बैठे थे। उसके रथ की घर्घराहट और धनुष की प्रत्यञ्चा का गम्भीर घोष सुनकर वानरवीर हनुमानजी अत्यन्त हर्ष और उत्साह से भर गये। 

इन्द्रजीत युद्ध की कला में प्रवीण था। वह धनुष और तीखे अग्रभाग वाले सायकों को लेकर हनुमानजी को लक्ष्य करके आगे बढ़ा। हृदय में हर्ष और उत्साह तथा हाथों में बाण लेकर वह ज्यों ही युद्ध के लिये निकला, त्यों ही सम्पूर्ण दिशाएँ मलिन हो गयीं और भयानक पशु नाना प्रकार से आर्तनाद करने लगे। उस समय वहाँ नाग, यक्ष, महर्षि और नक्षत्र - मण्डल में विचरने वाले सिद्धगण भी आ गये। साथ ही पक्षियों के समुदाय भी आकाश को आच्छादित करके अत्यन्त हर्ष में भरकर उच्च स्वर से चहचहाने लगे। 

इन्द्राकार चिह्नवाली ध्वजा से सुशोभित रथ पर बैठकर शीघ्रतापूर्वक आते हुए मेघनाद को देखकर वेगशाली वानर-वीर हनुमान् ने बड़े जोर से गर्जना की और अपने शरीर को बढाया। उस दिव्य रथ पर बैठकर विचित्र धनुष धारण करने वाले इन्द्रजीत ने बिजली की गड़गड़ाहट के समान टंकार करने वाले अपने धनुष को खींचा। फिर तो अत्यन्त दु:सह वेग और महान् बल से सम्पन्न हो युद्ध में निर्भय होकर आगे बढ़ने वाले वे दोनों वीर कपिवर हनुमान् तथा राक्षस राजकुमार मेघनाद परस्पर वैर बाँधकर देवराज इन्द्र और दैत्यराज बलि की भाँति एक-दूसरे से भिड़ गये। 

अप्रमेय शक्तिशाली हनुमानजी विशाल शरीर धारण करके अपने पिता वायु के मार्ग पर विचरने और युद्ध में सम्मानित होने वाले उस धनुर्धर महारथी राक्षसवीर के बाणों के महान् वेग को व्यर्थ करने लगे। इतने ही में शत्रुवीरों का संहार करने वाले इन्द्रजीत ने बड़ी और तीखी नोक तथा सुन्दर परों वाले, सोने की विचित्र पंखों से सुशोभित और वज्र के समान वेगशाली बाणों को लगातार छोड़ना आरम्भ किया। उस समय उसके रथ की घर्घराहट, मृदङ्ग, भेरी और पटह आदि बाजों के शब्द एवं खींचे जाते हुए धनुष की टंकार सुनकर हनुमानजी फिर ऊपर की ओर उछले। 

ऊपर जाकर वे महाकपि वानरवीर लक्ष्य बेधने में प्रसिद्ध मेघनाद के साधे हुए निशाने को व्यर्थ करते हुए उसके छोड़े हुए बाणों के बीच से शीघ्रतापूर्वक निकलकर अपने को बचाने लगे। वे पवनकुमार हनुमान् बारंबार उसके बाणों के सामने आकर खड़े हो जाते और फिर दोनों हाथ फैलाकर बात-की-बात में उड़ जाते थे। वे दोनों वीर महान् वेग से सम्पन्न तथा युद्ध करने की कला में चतुर थे। वे सम्पूर्ण भूतों के चित्त को आकर्षित करने वाला उत्तम युद्ध करने लगे। 

वह राक्षस हनुमानजी पर प्रहार करने का अवसर नहीं पाता था और पवनकुमार हनुमानजी भी उस महामनस्वी वीर को धर दबाने का मौका नहीं पाते थे। देवताओं के समान पराक्रमी वे दोनों वीर परस्पर भिड़कर एक-दूसरे के लिये दुःसह हो उठे थे। लक्ष्य वेध के लिये चलाये हुए मेघनाद के वे अमोघ बाण भी जब व्यर्थ होकर गिर पड़े, तब लक्ष्य पर बाणों का संधान करने में सदा एकाग्रचित्त रहने वाले उस महामनस्वी वीर को बड़ी चिन्ता हुई। उन कपिश्रेष्ठ को अवध्य समझकर राक्षस राजकुमार मेघनाद वानरवीरों में प्रमुख हनुमानजी के विषय में यह विचार करने लगा कि 'इन्हें किसी तरह बंदी बना लेना चाहिये, परंतु ये मेरी पकड़ में आ कैसे सकते हैं?

फिर तो अस्त्रवेत्ताओं में श्रेष्ठ उस महातेजस्वी वीर ने उन कपिश्रेष्ठ को लक्ष्य करके अपने धनुष पर ब्रह्माजी के दिये हुए अस्त्र का संधान किया। अस्त्र तत्त्व के ज्ञाता इन्द्रजीत ने महाबाहु पवनकुमार को अवध्य जानकर उन्हें उस अस्त्र से बाँध लिया। राक्षस द्वारा उस अस्त्र से बाँध लिये जाने पर वानरवीर हनुमानजी निश्चेष्ट होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। अपने को ब्रह्मास्त्र से बँधा हुआ जानकर भी उन्हीं भगवान् ब्रह्मा के प्रभाव से हनुमानजी  को थोड़ी-सी भी पीड़ा का अनुभव नहीं हुआ। वे प्रमुख वानरवीर अपने ऊपर ब्रह्माजी के महान् अनुग्रह का विचार करने लगे। जिन मन्त्रों के देवता साक्षात् स्वयम्भू ब्रह्मा हैं, उनसे अभिमन्त्रित हुए उस ब्रह्मास्त्र को देखकर हनुमानजी को पितामह ब्रह्मा से अपने लिये मिले हुए वरदान का स्मरण हो आया (ब्रह्माजी ने उन्हें वर दिया था कि मेरा अस्त्र तुम्हें एक ही मुहूर्त में अपने बन्धन से मुक्त कर देगा )। 

फिर वे सोचने लगे - लोकगुरु ब्रह्मा के प्रभाव से मुझमें इस अस्त्र बन्धन से छुटकारा पाने की शक्ति नहीं है - ऐसा मानकर ही इन्द्रजीत ने मुझे इस प्रकार बाँधा है, तथापि मुझे भगवान् ब्रह्मा के सम्मानार्थ इस अनबन्धन का अनुसरण करना चाहिये। 

कपिश्रेष्ठ हनुमानजी ने उस अस्त्र की शक्ति, अपने ऊपर पितामह की कृपा तथा अपने में उसके बन्धन से छूट जाने की सामर्थ्य - इन तीनों पर विचार करके अन्त में ब्रह्माजी की आज्ञा का ही अनुसरण किया। 

उनके मन में यह बात आयी - इस अस्त्र से बँध जाने पर भी मुझे कोई भय नहीं है; क्योंकि ब्रह्मा, इन्द्र और वायुदेवता तीनों मेरी रक्षा करते हैं। राक्षसों द्वारा पकड़े जाने में भी मुझे महान् लाभ ही दिखायी देता है; क्योंकि इससे मुझे राक्षसराज रावण के साथ बातचीत करने का अवसर मिलेगा। अत: शत्रु मुझे पकड़कर ले चलें। 

ऐसा निश्चय करके विचारपूर्वक कार्य करने वाले शत्रुवीरों के संहारक हनुमानजी निश्चेष्ट हो गये। फिर तो सभी शत्रु निकट आकर उन्हें बलपूर्वक पकड़ने और डाँट बताने लगे। उस समय हनुमानजी, मानो कष्ट पा रहे हों, इस प्रकार चीखते और कटकटाते थे। राक्षसों ने देखा, अब यह हाथ-पैर नहीं हिलाता, तब वे शत्रुहन्ता हनुमानजी को सुतरी और वृक्षों के वल्कल को बटकर बनाये गये रस्सों से बाँधने लगे। शत्रुवीरों ने जो उन्हें हठपूर्वक बाँधा और उनका तिरस्कार किया, यह सब कुछ उस समय उन्हें अच्छा लगा। उनके मन में यह निश्चित विचार हो गया था कि ऐसी अवस्था में राक्षसराज रावण सम्भवत: कौतूहल वश मुझे देखने की इच्छा करेगा ( इसीलिये वे सब कुछ सह रहे थे )। 

वल्कल के रस्से से बँध जाने पर पराक्रमी हनुमान् ब्रह्मास्त्र के बन्धन से मुक्त हो गये; क्योंकि उस अस्त्र का बन्धन किसी दूसरे बन्धन के साथ नहीं रहता। वीर इन्द्रजीत ने जब देखा कि यह वानरशिरोमणि तो केवल वृक्षों के वल्कल से बँधा है, दिव्यास्त्र के बन्धन से मुक्त हो चुका है, तब उसे बड़ी चिन्ता हुई। 

वह सोचने लगा - दूसरी वस्तुओं से बँधा हुआ होने पर भी यह अस्त्र बन्धन में बँधे हुए की भाँति बर्ताव कर रहा है। ओह! इन राक्षसों ने मेरा किया हुआ बहुत बड़ा काम चौपट कर दिया। इन्होंने मन्त्र की शक्ति पर विचार नहीं किया। यह अस्त्र जब एक बार व्यर्थ हो जाता है, तब पुन: दूसरी बार इसका प्रयोग नहीं हो सकता। अब तो विजयी होकर भी हम सब लोग संशय में पड़ गये। 

हनुमानजी यद्यपि अस्त्र के बन्धन से मुक्त हो गये थे तो भी उन्होंने ऐसा बर्ताव किया, मानो वे इस बात को जानते ही न हों। क्रूर राक्षस उन्हें बन्धनों से पीड़ा देते और कठोर मुक्कों से मारते हुए खींचकर ले चले। इस तरह वे वानरवीर राक्षसराज रावण के पास पहुँचाये गये। तब इन्द्रजीत ने उन महाबली वानरवीर को ब्रह्मास्त्र से मुक्त तथा वृक्ष के वल्कलों की रस्सियों से बँधा देख उन्हें वहाँ सभासद्गणों सहित राजा रावण को दिखाया। मतवाले हाथी के समान बँधे हुए उन वानर - शिरोमणि को राक्षसों ने राक्षसराज रावण की सेवा में समर्पित कर दिया। 

उन्हें देखकर राक्षसवीर आपस में कहने लगे - यह कौन है? किसका पुत्र या सेवक है? कहाँ से आया है? यहाँ इसका क्या काम है? तथा इसे सहारा देने वाला कौन है? 

कुछ दूसरे राक्षस जो अत्यन्त क्रोध से भरे थे, परस्पर इस प्रकार बोले – इस वानर को मार डालो, जला डालो या खा डालो। 

महात्मा हनुमान्जी सारा रास्ता तय करके जब सहसा राक्षसराज रावण के पास पहुँच गये, तब उन्होंने उसके चरणों के समीप बहुत-से बड़े-बूढ़े सेवकों को और बहुमूल्य रन्तों से विभूषित सभाभवन को भी देखा। उस समय महातेजस्वी रावण ने विकट आकार वाले राक्षसों के द्वारा इधर-उधर घसीटे जाते हुए कपिश्रेष्ठ हनुमानजी को देखा। 

कपिश्रेष्ठ हनुमान ने भी राक्षसराज रावण को तपते हुए सूर्य के समान तेज और बल से सम्पन्न देखा। हनुमानजी को देखकर दशमुख रावण की आँखें रोष से चञ्चल और लाल हो गयीं। उसने वहाँ बैठे हुए कुलीन, सुशील और मुख्य मन्त्रियों को उनसे परिचय पूछने के लिये आज्ञा दी। उन सबने पहले क्रमशः कपिवर हनुमान से उनका कार्य, प्रयोजन तथा उसके मूल कारण के विषय में पूछा। तब उन्होंने यह बताया कि मैं वानरराज सुग्रीव के पास से उनका दूत होकर आया हूँ। 

इति श्रीमद् राम कथा सुन्दरकाण्ड अध्याय-९ का भाग-२९(29) समाप्त ! 

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