महात्मा हनुमान्जी के द्वारा मन्त्री के पुत्र भी मारे गये – यह जानकर रावण ने भयभीत होने पर भी अपने आकार को प्रयत्नपूर्वक छिपाया और उत्तम बुद्धि का आश्रय ले आगे के कर्तव्य का निश्चय किया। दशग्रीव ने विरूपाक्ष, यूपाक्ष, दुर्धर, प्रघस और भासकर्ण – इन पाँच सेनापतियों को, जो बड़े वीर, नीतिनिपुण, धैर्यवान् तथा युद्ध में वायु के समान वेगशाली थे, हनुमानजी को पकड़ने के लिये आज्ञा दी।
उसने कहा - सेना के अग्रगामी वीरो! तुम लोग घोड़े, रथ और हाथियों सहित बड़ी भारी सेना साथ लेकर जाओ और उस वानर को बलपूर्वक पकड़कर उसे अच्छी तरह शिक्षा दो। उस वनचारी वानर के पास पहुँचकर तुम सब लोगों को सावधान और अत्यन्त प्रयत्नशील हो जाना चाहिये तथा वही कार्य करना चाहिये, जो देश और काल के अनुरूप हो। जब मैं उसके अलौकिक कर्म को देखते हुए उसके स्वरूप पर विचार करता हूँ, तब वह मुझे वानर नहीं जान पड़ता है। वह सर्वथा कोई महान् प्राणी है, जो महान् बल से सम्पन्न है।
‘यह वानर है' ऐसा समझकर मेरा मन उसकी ओर से शुद्ध (विश्वस्त) नहीं हो रहा है। यह जैसा प्रसङ्ग उपस्थित है या जैसी बातें चल रही हैं, उन्हें देखते हुए मैं उसे वानर नहीं मानता हूँ। सम्भव है इन्द्र ने हम लोगों का विनाश करने के लिये अपने तपोबल से इसकी सृष्टि की हो। मेरी आज्ञा से तुम सब लोगों ने मेरे साथ रहकर नागों सहित यक्षों, गन्धर्वों, देवताओं, असुरों और महर्षियों को भी अनेक बार पराजित किया है; अतः वे अवश्य हमारा कुछ अनिष्ट करना चाहेंगे।'
‘अत: यह उन्हीं का रचा हुआ प्राणी है, इसमें संदेह नहीं। तुमलोग उसे हठपूर्वक पकड़ ले आओ। मेरी सेना के अग्रगामी वीरो! तुम हाथी, घोड़े और रथों सहित बड़ी भारी सेना साथ लेकर जाओ और उस वानर को अच्छी तरह शिक्षा दो। वानर समझकर तुम्हें उसकी अवहेलना नहीं करनी चाहिये; क्योंकि वह धीर और पराक्रमी है। मैंने पहले बड़े-बड़े पराक्रमी वानर और भालू देखे हैं। जिनके नाम इस प्रकार हैं- वाली, सुग्रीव, महाबली जाम्बवान्, सेनापति नील तथा द्विविद आदि अन्य वानर।'
‘किंतु उनका वेग ऐसा भयंकर नहीं है और न उनमें ऐसा तेज, पराक्रम, बुद्धि, बल, उत्साह तथा रूप धारण करने की शक्ति ही है। वानर के रूप में यह कोई बड़ा शक्तिशाली जीव प्रकट हुआ है, ऐसा जानना चाहिये। अतः तुम लोग महान् प्रयत्न करके उसे कैद करो। भले ही इन्द्रसहित देवता, असुर, मनुष्य एवं तीनों लोक उतर आयें, वे रणभूमि में तुम्हारे सामने ठहर नहीं सकते। तथापि समराङ्गण में विजय की इच्छा रखने वाले नीतिज्ञ पुरुष को यन्तपूर्वक अपनी रक्षा करनी चाहिये; क्योंकि युद्ध में सफलता अनिश्चित होती है।'
स्वामी की आज्ञा स्वीकार करके वे सब के सब अग्नि के समान तेजस्वी, महान् वेगशाली और अत्यन्त बलवान् राक्षस तेज चलने वाले घोड़ों, मतवाले हाथियों तथा विशाल रथों पर बैठकर युद्ध के लिये चल दिये। वे सब प्रकार के तीखे शस्त्रों और सेनाओं से सम्पन्न थे। आगे जाने पर उन वीरों ने देखा, महाकपि हनुमानजी फाटक पर खड़े हैं और अपनी तेजोमयी किरणों से मण्डित हो उदयकाल के सूर्य की भाँति देदीप्यमान हो रहे हैं। उनकी शक्ति, बल, वेग, बुद्धि, उत्साह, शरीर और भुजाएँ सभी महान् थीं। उन्हें देखते ही वे सब राक्षस, जो सभी दिशाओं में खड़े थे, भयंकर अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा करते हुए चारों ओर से उन पर टूट पड़े।
निकट पहुँचने पर पहले दुर्धर ने हनुमानजी के मस्तक पर लोहे के बने हुए पाँच बाण मारे। वे सभी बाण मर्मभेदी और पैनी धारवाले थे। उनके अग्रभाग पर सोने का पानी दिया गया था। जिससे वे पीतमुख दिखायी देते थे। वे पाँचों बाण उनके सिर पर प्रफुल्लकमलदल के समान शोभा पा रहे थे। मस्तक में उन पाँच बाणों से गहरी चोट खाकर वानरवीर हनुमानजी अपनी भीषण गर्जना से दसों दिशाओं को प्रतिध्वनित करते हुए आकाश में ऊपर की ओर उछल पड़े। तब रथ में बैठे हुए महाबली वीर दुर्धर ने धनुष चढ़ाये कई सौ बाणों की वर्षा करते हुए उनका पीछा किया।
आकाश में खड़े हुए उन वानरवीर पर बाणों की वर्षा करते हुए दुर्धर को अपने हुंकार मात्र से उसी प्रकार रोक दिया, जैसे वर्षा-ऋतु के अन्त में वृष्टि करने वाले बादल को वायु रोक देती है। जब दुर्धर अपने बाणों से अधिक पीड़ा देने लगा, तब वे परम पराक्रमी पवनकुमार पुनः विकट गर्जना करने और अपने शरीर को बढ़ाने लगे। तत्पश्चात् वे महावेगशाली वानरवीर बहुत दूर तक ऊँचे उछलकर सहसा दुर्धर के रथ पर कूद पड़े, मानो किसी पर्वत पर बिजली का समूह गिर पड़ा हो। उनके भार से रथ के आठों घोड़ों का कचूमर निकल गया, धुरी और कूबर टूट गये तथा दुर्धर प्राणहीन हो उस रथ को छोड़कर पृथ्वी पर गिर पड़ा।
दुर्धर को धराशायी हुआ देख शत्रुओं का दमन करने वाले दुर्धर्ष वीर विरूपाक्ष और यूपाक्ष को बड़ा क्रोध हुआ। दोनों आकाश में उछले। उन दोनों ने सहसा उछलकर निर्मल आकाश में खड़े हुए महाबाहु कपिवर हनुमानजी की छाती में मुद्गरों से प्रहार किया। उन दोनों वेगवान् वीरों के वेग को विफल करके महाबली हनुमानजी वेगशाली गरुड़ के समान पुनः पृथ्वी पर कूद पड़े। वहाँ वानरशिरोमणि पवनकुमार ने एक साल-वृक्ष के पास जाकर उसे उखाड़ लिया और उसी के द्वारा उन दोनों राक्षसवीरों को मार डाला।
उन वेगशाली वानरवीर के द्वारा उन तीनों राक्षसों को मारा गया देख महान् वेग से युक्त बलवान् वीर प्रघस हँसता हुआ उनके पास आया। दूसरी ओर से पराक्रमी वीर भासकर्ण भी अत्यन्त क्रोध में भरकर शूल हाथ में लिये वहाँ आ पहुँचा। वे दोनों यशस्वी कपिश्रेष्ठ हनुमानजी के निकट एक ही ओर खड़े हो गये। प्रघस ने तेज धार वाले पट्टिश से तथा राक्षस भासकर्ण ने शूल से कपिकुञ्जर हनुमानजी पर प्रहार किया। उन दोनों के प्रहारों से हनुमानजी के शरीर में कई जगह घाव हो गये और उनके शरीर की रोमावली रक्त से रँग गयी। उस समय क्रोध में भरे हुए वानरवीर हनुमान् प्रात: काल के सूर्य की भाँति अरुण कान्ति से प्रकाशित हो रहे थे।
तब मृग, सर्प और वृक्षों सहित एक पर्वत शिखर को उखाड़कर कपिश्रेष्ठ वीर हनुमान् ने उन दोनों राक्षसों पर दे मारा। पर्वत-शिखर के आघात से वे दोनों पिस गये और उनके शरीर तिल के समान खण्ड-खण्ड हो गये। इस प्रकार उन पाँचों सेनापतियों के नष्ट हो जाने पर हनुमानजी ने उनकी बची-खुची सेना का भी संहार आरम्भ किया। जैसे देवराज इन्द्र असुरों का विनाश करते हैं, उसी प्रकार उन वानरवीर ने घोड़ों से घोड़ों का, हाथियों से हाथियों का, योद्धाओं से योद्धाओं का और रथों से रथों का संहार कर डाला। मरे हुए हाथियों और तीव्रगामी घोड़ों से, टूटी हुई धुरीवाले विशाल रथों से तथा मारे गये राक्षसों की लाशों से वहाँ की सारी भूमि चारों ओर से इस तरह पाट गयी थी कि आने-जाने का रास्ता बंद हो गया था।
इस प्रकार सेना और वाहनों सहित उन पाँचों वीर सेनापतियों को रणभूमि में मौत के घाट उतारकर महावीर वानर हनुमानजी पुनः युद्ध के लिये अवसर पाकर पहले की ही भाँति फाटक पर जाकर खड़े हो गये। उस समय वे प्रजा का संहार करने के लिये उद्यत हुए काल के समान जान पड़ते थे।
हनुमान्जी के द्वारा अपने पाँच सेनापतियों को सेवकों और वाहनों सहित मारा गया सुनकर राजा रावण ने अपने सामने बैठे हुए पुत्र अक्षकुमार की ओर देखा, जो युद्ध में उद्धत और उसके लिये उत्कण्ठित रहने वाला था। पिता के दृष्टिपातमत्र से प्रेरित हो वह प्रतापी वीर युद्ध के लिये उत्साह पूर्वक उठा। उसका धनुष सुवर्णजटित होने के कारण विचित्र शोभा धारण करता था। जैसे श्रेष्ठ ब्राह्मणों द्वारा यज्ञशाला में हविष्य की आहुति देने पर अग्निदेव प्रज्वलित हो उठते हैं, उसी प्रकार वह भी सभा में उठकर खड़ा हो गया।
वह महापराक्रमी राक्षसशिरोमणि अक्ष प्रातः कालीन सूर्य के समान कान्तिमान् तथा तपाये हुए सुवर्ण के जाल से आच्छादित रथ पर आरूढ़ हो उन महाकपि हनुमानजी के पास चल दिया। वह रथ उसे बड़ी भारी तपस्याओं के संग्रह से प्राप्त हुआ था। उसमें तपे हुए जाम्बूनद (सुवर्ण) की जाली जड़ी हुई थी। पताका फहरा रही थी। उसका ध्वजदण्ड रन्तों से विभूषित था। उसमें मन के समान वेग वाले आठ घोड़े अच्छी तरह जुते हुए थे। देवता और असुर कोई भी उस रथ को नष्ट नहीं कर सकते थे। उसकी गति कहीं रुकती नहीं थी।
वह बिजली के समान प्रकाशित होता और आकाश में भी चलता था। उस रथ को सब सामग्रियों से सुसज्जित किया गया था। उसमें तरकस रखे गये थे। आठ तलवारों के बँधे रहने से वह और भी सुन्दर दिखायी देता था। उसमें यथास्थान शक्ति और तोमर आदि अस्त्र-शस्त्र क्रम से रखे गये थे। चन्द्रमा और सूर्य के समान दीप्तिमान् तथा सोने की रस्सी से युक्त युद्ध के समस्त उपकरणों से सुशोभित उस सूर्यतुल्य तेजस्वी रथ पर बैठकर देवताओं के तुल्य पराक्रमी अक्षकुमार राजमहल से बाहर निकला। घोड़े, हाथी और बड़े-बड़े रथों की भयंकर आवाज से पर्वतों सहित पृथ्वी तथा आकाश को गुँजाता हुआ वह बड़ी भारी सेना साथ लेकर वाटिका के द्वार पर बैठे हुए शक्तिशाली वीर वानर हनुमानजी के पास जा पहुँचा।
सिंह के समान भयंकर नेत्र वाले अक्ष ने वहाँ पहुँचकर लोकसंहार के समय प्रज्वलित हुई प्रलयानि के समान स्थित और विस्मय एवं सम्भ्रम में पड़े हुए हनुमानजी को अत्यन्त गर्वभरी दृष्टि से देखा। उन महात्मा कपिश्रेष्ठ के वेग तथा शत्रुओं के प्रति उनके पराक्रम का और अपने बल का भी विचार करके वह महाबली रावणकुमार प्रलयकाल के सूर्य की भाँति बढ़ने लगा। हनुमानजी के पराक्रम पर दृष्टिपात करके उसे क्रोध आ गया। अतः स्थिरतापूर्वक स्थित हो उसने एकाग्रचित्त से तीन तीखे बाणों द्वारा रणदुर्जय हनुमानजी को युद्ध के लिये प्रेरित किया।
तदनन्तर हाथ में धनुष और बाण लिये अक्ष ने यह जानकर कि 'ये खेद या थकावट को जीत चुके हैं, शत्रुओं को पराजित करने की योग्यता रखते हैं और युद्ध के लिये इनके मन का उत्साह बढ़ा हुआ है; इसीलिये ये गर्वीले दिखायी देते हैं, उनकी ओर दृष्टिपात किया। गले में सुवर्ण के निष्क (पदक), बाँहों में बाजूबंद और कानों में मनोहर कुण्डल धारण किये वह शीघ्रपराक्रमी रावणकुमार हनुमानजी के पास आया। उस समय उन दोनों वीरों में जो टक्कर हुई, उसकी कहीं तुलना नहीं थी। उनका युद्ध देवताओं और असुरों के मन में भी घबराहट पैदा कर देने वाला था।
कपिश्रेष्ठ हनुमान् और अक्षकुमार का वह संग्राम देखकर भूतल के सारे प्राणी चीख उठे। सूर्य का ताप कम हो गया। वायु की गति रुक गयी। पर्वत हिलने लगे। आकाश में भयंकर शब्द होने लगा और समुद्र में तूफान आ गया। अक्षकुमार निशाना साधने, बाण को धनुष पर चढ़ाने और उसे लक्ष्य की ओर छोड़ने में बड़ा प्रवीण था। उस वीर ने विषधर सर्पों के समान भयंकर, सुवर्णमय पंखों से युक्त, सुन्दर अग्रभाग वाले तथा पत्रयुक्त तीन बाण हनुमानजी के मस्तक में मारे। उन तीनों की चोट हनुमानजी के माथे में एक साथ ही लगी, इससे खून की धारा गिरने लगी। वे उस रक्त से नहा उठे और उनकी आँखें घूमने लगीं। उस समय बाण रूपी किरणों से युक्त हो वे तुरंत के उगे हुए अंशुमाली सूर्य के समान शोभा पाने लगे।
तदनन्तर वानरराज के श्रेष्ठ मन्त्री हनुमानजी राक्षसराज रावण के राजकुमार अक्ष को अति उत्तम विचित्र आयुध एवं अद्भुत धनुष धारण किये देख हर्ष और उत्साह से भर गये और युद्ध के लिये उत्कण्ठित हो अपने शरीर को बढ़ाने लगे। हनुमानजी का क्रोध बहुत बढ़ा हुआ था। वे बल और पराक्रम से सम्पन्न थे, अतः मन्दराचल के शिखर पर प्रकाशित होने वाले सूर्यदेव के समान वे अपनी नेत्राग्निमयी किरणों से उस समय सेना और सवारियों सहित राजकुमार अक्ष को दग्ध-सा करने लगे। तब जैसे बादल श्रेष्ठ पर्वत पर जल बरसाता है, उसी प्रकार युद्धस्थल में अपने शरासनरूपी इन्द्र-धनुष से युक्त वह राक्षसरूपी मेघ बाणवर्षी होकर कपिश्रेष्ठ हनुमान रूपी पर्वत पर बड़े वेग से बाणों की वृष्टि करने लगा। रणभूमि में अक्षकुमार का पराक्रम बड़ा प्रचण्ड दिखायी देता था। उसके तेज, बल, पराक्रम और बाण सभी बढ़े-चढ़े थे। युद्धस्थल में उसकी ओर दृष्टिपात करके हनुमानजी ने हर्ष और उत्साह में भरकर मेघ के समान भयानक गर्जना की। समराङ्गण में बल के घमंड में भरे हुए अक्षकुमार को उनकी गर्जना सुनकर बड़ा क्रोध हुआ। उसकी आँखें रक्त के समान लाल हो गयीं। वह अपने बालोचित अज्ञान के कारण अनुपम पराक्रमी हनुमानजी का सामना करने के लिये आगे बढ़ा। ठीक उसी तरह, जैसे कोई हाथी तिनकों से ढके हुए विशाल कूप की ओर अग्रसर होता है।
उसके बलपूर्वक चलाये हुए बाणों से विद्ध होकर हनुमानजी ने तुरंत ही उत्साहपूर्वक आकाश को विदीर्ण करते हुए- से मेघ के समान गम्भीर स्वर से भीषण गर्जना की। उस समय दोनों भुजाओं और जाँघों को चलाने के कारण वे बड़े भयंकर दिखायी देते थे। उन्हें आकाश में उछलते देख रथियों में श्रेष्ठ और रथ पर चढ़े हुए उस बलवान्, प्रतापी एवं राक्षसशिरोमणि वीर ने बाणों की वर्षा करते हुए उनका पीछा किया। उस समय वह ऐसा जान पड़ता था मानो कोई मेघ किसी पर्वत पर ओले और पत्थरों की वर्षा कर रहा हो। उस युद्धस्थल में मन के समान वेग वाले वीर हनुमानजी भयंकर पराक्रम प्रकट करने लगे। वे अक्षकुमार के उन बाणों को व्यर्थ करते हुए वायु के पथ पर विचरते और दो बाणों के बीच से हवा की भाँति निकल जाते थे।
अक्षकुमार हाथ में धनुष लिये युद्ध के लिये उन्मुख हो नाना प्रकार के उत्तम बाणों द्वारा आकाश को आच्छादित किये देता था। पवनकुमार हनुमान् ने उसे बड़े आदर की दृष्टि से देखा और वे मन-ही-मन कुछ सोचने लगे। इतने ही में महामना वीर अक्षकुमार ने अपने बाणों द्वारा कपिश्रेष्ठ हनुमानजी की दोनों भुजाओं के मध्यभाग- छाती में गहरा आघात किया।
वे महाबाहु वानरवीर समयोचित कर्तव्यविशेष को ठीक-ठीक जानते थे; अतः वे रणक्षेत्र में उस चोट को सहकर सिंहनाद करते हुए उसके पराक्रम के विषय में इस प्रकार विचार करने लगे - यह महाबली अक्षकुमार बालसूर्य के समान तेजस्वी है और बालक होकर भी बड़ों के समान महान् कर्म कर रहा है। युद्धसम्बन्धी समस्त कर्मों में कुशल होने के कारण अद्भुत शोभा पाने वाले इस वीर को यहाँ मार डालने की मेरी इच्छा नहीं हो रही है। यह महामनस्वी राक्षसकुमार बल पराक्रम की दृष्टि से महान् है। युद्ध में सावधान एवं एकाग्रचित्त है तथा शत्रु के वेग को सहन करने में अत्यन्त समर्थ है। अपने कर्म और गुणों की उत्कृष्टता के कारण यह नागों, यक्षों और मुनियों के द्वारा भी प्रशंसित हुआ होगा, इसमें संशय नहीं है।
‘पराक्रम और उत्साहू से इसका मन बढ़ा हुआ है। यह युद्ध के मुहाने पर मेरे सामने खड़ा हो मुझे ही देख रहा है। शीघ्रतापूर्वक युद्ध करने वाले इस वीर का पराक्रम देवताओं और असुरों के हृदय को भी कम्पित कर सकता है। किंतु यदि इसकी उपेक्षा की गयी तो यह मुझे परास्त किये बिना नहीं रहेगा; क्योंकि संग्राम में इसका पराक्रम बढ़ता जा रहा है। अत: अब इसे मार डालना ही मुझे अच्छा जान पड़ता है। बढ़ती हुई आग की उपेक्षा करना कदापि उचित नहीं है।'
इस प्रकार शत्रु के वेग का विचार कर उसके प्रतीकार के लिये अपने कर्तव्य का निश्चय करके महान् बल और पराक्रम से सम्पन्न हनुमानजी ने उस समय अपना वेग बढ़ाया और उस शत्रु को मार डालने का विचार किया। तत्पश्चात् आकाश में विचरते हुए वीर वानर पवनकुमार ने थप्पड़ों की मार से अक्षकुमार के उन आठों उत्तम और विशाल घोड़ों को, जो भार सहन करने में समर्थ और नाना प्रकार के पैंतरे बदलने की कला में सुशिक्षित थे, यमलोक पहुँचा दिया।
तदनन्तर वानरराज सुग्रीव के मन्त्री हनुमानजी ने अक्षकुमार के उस विशाल रथ को भी अभिभूत कर दिया, उन्होंने हाथ से ही पीटकर रथ की बैठक तोड़ डाली और उसके हरसे को उलट दिया। घोड़े तो पहले ही मर चुके थे, अत: वह महान् रथ आकाश से पृथ्वी पर गिर पड़ा। उस समय महारथी अक्षकुमार धनुष और तलवार ले रथ छोड़कर अन्तरिक्ष में ही उड़ने लगा। ठीक वैसे ही, जैसे कोई उग्रशक्ति से सम्पन्न महर्षि योगमार्ग से शरीर त्यागकर स्वर्गलोक की ओर चला जा रहा हो।
तब वायु के समान वेग और पराक्रम वाले कपिवर हनुमानजी ने पक्षिराज गरुड़, वायु तथा सिद्धों से सेवित व्योममार्ग में विचरते हुए उस राक्षस के पास पहुँचकर क्रमश: उसके दोनों पैर दृढ़तापूर्वक पकड़ लिये। फिर तो अपने पिता वायु देवता के तुल्य पराक्रमी वानर - शिरोमणि हनुमान् ने जिस प्रकार गरुड़ बड़े-बड़े सर्पो को घुमाते हैं, उसी तरह उसे हजारों बार घुमाकर बड़े वेग से उस युद्ध भूमि में पटक दिया। नीचे गिरते ही उसकी भुजा, जाँघ, कमर और छाती के टुकड़े-टुकड़े हो गये, खून की धारा बहने लगी, शरीर की हड्डियाँ चूर-चूर हो गयीं, आँखें बाहर निकल आयीं, अस्थियों के जोड़ टूट गये और नस-नाड़ियों के बन्धन शिथिल हो गये। इस तरह वह राक्षस पवनकुमार हनुमानजी के हाथ से मारा गया।
अक्षकुमार को पृथ्वी पर पटककर महाकपि हनुमानजी ने राक्षसराज रावण के हृदय में बहुत बड़ा भय उत्पन्न कर दिया। उसके मारे जाने पर नक्षत्र-मण्डल में विचरने वाले महर्षियों, यक्षों, नागों, भूतों तथा इन्द्रसहित देवताओं ने वहाँ एकत्र होकर बड़े विस्मय के साथ हनुमानजी का दर्शन किया। युद्ध में इन्द्रपुत्र जयन्त के समान पराक्रमी और लाल-लाल आँखों वाले अक्षकुमार का काम तमाम करके वीरवर हनुमानजी प्रजा के संहार के लिये उद्यत हुए काल की भाँति पुनः युद्ध की प्रतीक्षा करते हुए वाटिका के उसी द्वार पर जा पहुँचे।
