भाग-२७(27) हनुमानजी के द्वारा चैत्यप्रासाद का विध्वंस तथा उसके रक्षकों का वध, प्रहस्त- पुत्र जम्बुमाली का वध, मन्त्री के सात पुत्रों का वध

 


इधर किंकरों का वध करके हनुमानजी यह सोचने लगे कि मैंने वन को तो उजाड़ दिया, परंतु इस चैत्य - प्रासाद (लङ्का में राक्षसों के कुलदेवता का जो स्थान था, उसी का नाम 'चैत्यप्रासाद' रखा गया था ) को नष्ट नहीं किया है। अत: आज इस चैत्यप्रासाद का भी विध्वंस किये देता हूँ। मन-ही-मन ऐसा विचारकर पवनपुत्र वानरश्रेष्ठ हनुमानजी अपने बल का प्रदर्शन करते हुए मेरुपर्वत के शिखर की भाँति ऊँचे उस चैत्यप्रासाद पर उछलकर चढ़ गये। 

उस पर्वताकार प्रासाद पर चढ़कर महातेजस्वी वानरयूथपति हनुमान् तुरंत के उगे हुए दूसरे सूर्य की भाँति शोभा पाने लगे। उस ऊँचे प्रासाद पर आक्रमण करके दुर्धर्ष वीर हनुमानजी अपनी सहज शोभा से उद्भासित होते हुए पारियात्र पर्वत के समान प्रतीत होने लगे। वे तेजस्वी पवनकुमार विशाल शरीर धारण करके लङ्का को प्रतिध्वनित करते हुए धृष्टतापूर्वक उस प्रासाद को तोड़ने-फोड़ने लगे। जोर-जोर से होनेवाला वह तोड़-फोड़ का शब्द कानों से टकराकर उन्हें बहरा किये देता था। इससे मूर्च्छित हो वहाँ के पक्षी और प्रासाद रक्षक भी पृथ्वी पर गिर पड़े। 

उस समय हनुमानजी ने पुन: यह घोषणा की - अस्त्रवेत्ता भगवान् श्रीराम तथा महाबली लक्ष्मण की जय हो। श्रीरघुनाथजी के द्वारा सुरक्षित राजा सुग्रीव की भी जय हो। मैं अनायास ही महान् पराक्रम करने वाले कोशलनरेश श्रीरामचन्द्रजी का दास हूँ। मेरा नाम हनुमान् है। मैं वायु का पुत्र तथा शत्रुसेना का संहार करने वाला हूँ। जब मैं हजारों वृक्षों और पत्थरों से प्रहार करने लगूँगा, उस समय सहस्रों रावण मिलकर भी युद्ध में मेरे बल की समानता अथवा मेरा सामना नहीं कर सकते। मैं लङ्कापुरी को तहस-नहस कर डालूँगा और मिथिलेशकुमारी सीता को प्रणाम करने के अनन्तर सब राक्षसों के देखते-देखते अपना कार्य सिद्ध करके जाऊँगा। 

ऐसा कहकर चैत्यप्रासाद पर खड़े हुए विशालकाय वानरयूथपति हनुमान् राक्षसों के मन में भय उत्पन्न करते हुए भयानक आवाज में गर्जना करने लगे। उस भीषण गर्जना से प्रभावित हो सैकड़ों प्रासाद रक्षक नाना प्रकार के प्रास, खड्ग और फरसे लिये वहाँ आये। उन विशालकाय राक्षसों ने उन सब अस्त्रों का प्रहार करते हुए वहाँ पवनकुमार हनुमानजी को घेर लिया। विचित्र गदाओं, सोने के पत्र जड़े हुए परिघों और सूर्यतुल्य तेजस्वी बाणों से सुसज्जित हो वे सब के सब उन वानरश्रेष्ठ हनुमान् पर चढ़ आये। वानरश्रेष्ठ हनुमान् को चारों ओर से घेरकर खड़ा हुआ राक्षसों का वह महान् समुदाय गङ्गाजी के जल में उठे हुए बड़े भारी भँवर के समान जान पड़ता था। 

तब राक्षसों को इस प्रकार आक्रमण करते देख पवनकुमार हनुमान् ने कुपित हो बड़ा भयंकर रूप धारण किया। उन महावीर ने उस प्रासाद के एक सुवर्णभूषित खंभे को, जिसमें सौ धारें थीं, बड़े वेग से उखाड़ लिया। उखाड़कर उन महाबली वीर ने उसे घुमाना आरम्भ किया। घुमाने पर उससे आग प्रकट हो गयी, जिससे वह प्रासाद जलने लगा। 

प्रासाद को जलते देख वानरयूथपति हनुमान् ने वज्र से असुरों का संहार करने वाले इन्द्र की भाँति उन सैकड़ों राक्षसों को उस खंभे से ही मार डाला और आकाश में खड़े होकर उन तेजस्वी वीर ने इस प्रकार कहा - राक्षसो! सुग्रीव के वश में रहने वाले मेरे जैसे सहस्रों विशालकाय बलवान् वानरश्रेष्ठ सब ओर भेजे गये हैं। हम तथा दूसरे सभी वानर समूची पृथ्वी पर घूम रहे हैं। किन्हीं में दस हाथियों का बल है तो किन्हीं में सौ हाथियों का। कितने ही वानर एक सहस्र हाथियों के समान बल - विक्रम से सम्पन्न हैं। किन्हीं का बल जल के महान् प्रवाह की भाँति असह्य है। कितने ही वायु के समान बलवान् हैं और कितने ही वानर-यूथपति अपने भीतर असीम बल धारण करते हैं। दाँत और नख ही जिनके आयुध हैं ऐसे अनन्त बलशाली सैकड़ों, हजारों, लाखों और करोड़ों वानरों से घिरे हुए वानरराज सुग्रीव यहाँ पधारेंगे, जो तुम सब निशाचरों का संहार करने में समर्थ हैं। अब न तो यह लङ्कापुरी रहेगी, न तुम लोग रहोगे और न वह रावण ही रह सकेगा, जिसने इक्ष्वाकुवंशी वीर महात्मा श्रीराम के साथ वैर बाँध रखा है। 

राक्षसराज रावण की आज्ञा पाकर प्रहस्त का बलवान् पुत्र जम्बुमाली, जिसकी दाढ़ें बहुत बड़ी थीं, हाथ में धनुष लिये राजमहल से बाहर निकला। वह लाल रंग के फूलों की माला और लाल रंग के ही वस्त्र पहने हुए था। उसके गले में हार और कानों में सुन्दर कुण्डल शोभा दे रहे थे। उसकी आँखें घूम रही थीं। वह विशालकाय, क्रोधी और संग्राम में दुर्जय था। उसका धनुष इन्द्रधनुष के समान विशाल था। उसके द्वारा छोड़े जाने वाले बाण भी बड़े सुन्दर थे। जब वह वेग से उस धनुष को खींचता, तब उससे वज्र और अशनि के समान गड़गड़ाहट पैदा होती थी। उस धनुष की महती टंकार ध्वनि से सम्पूर्ण दिशाएँ, विदिशाएँ और आकाश सभी सहसा गूँज उठे। 

वह रथ पर बैठकर आया था। उसे देखकर वेगशाली हनुमानजी बड़े प्रसन्न हुए और जोर-जोर से गर्जना करने लगे। महातेजस्वी जम्बुमाली ने महाकपि हनुमानजी को फाटक के छज्जे पर खड़ा देख उन्हें तीखे बाणों से बींधना आरम्भ कर दिया। उसने अर्द्धचन्द्र नामक बाण से उनके मुख पर, कर्णी नामक एक बाण से मस्तक पर और दस नाराचों से उन कपीश्वर की दोनों भुजाओं पर गहरी चोट की। उसके बाण से घायल हुआ हनुमानजी का लाल मुँह शरद् ऋतु में सूर्य की किरणों से विद्ध हो खिले हुए लाल कमल के समान शोभा पा रहा था। 

रक्त से रञ्जित हुआ उनका वह रक्तवर्ण का मुख ऐसी शोभा पा रहा था, मानो आकाश में लाल रंग के विशाल कमल को सुवर्णमय जल की बूँदों से सींच दिया गया हो उस पर सोने का पानी चढ़ा दिया गया हो। राक्षस जम्बुमाली के बाणों की चोट खाकर महाकपि हनुमानजी कुपित हो उठे। उन्होंने अपने पास ही पत्थर की एक बहुत बड़ी चट्टान पड़ी देखी और उसे वेग से उठाकर उन बलवान् वीर ने बड़े जोर से उस राक्षस की ओर फेंका। किंतु क्रोध में भरे उस राक्षस ने दस बाण मारकर उस प्रस्तर - शिला को तोड़-फोड़ डाला। अपने उस कर्म को व्यर्थ हुआ देख प्रचण्ड पराक्रमी और बलशाली हनुमान् ने एक विशाल साल का वृक्ष उखाड़कर उसे घुमाना आरम्भ किया। 

उन महान् बलशाली वानरवीर को साल का वृक्ष घुमाते देख महाबली जम्बुमाली ने उनके ऊपर बहुत-से बाणों की वर्षा की। उसने चार बाणों से सालवृक्ष को काट गिराया, पाँच से हनुमानजी की भुजाओं में, एक बाण से उनकी छाती में और दस बाणों से उनके दोनों स्तनों के मध्यभाग में चोट पहुँचायी। बाणों से हनुमानजी का सारा शरीर भर गया। फिर तो उन्हें बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने उसी परिघ को उठाकर उसे बड़े वेग से घुमाना आरम्भ किया। अत्यन्त वेगवान् और उत्कट बलशाली हनुमान् ने बड़े वेग से घुमाकर उस परिघ को जम्बुमाली की विशाल छाती पर दे मारा। 

फिर तो न उसके मस्तक का पता लगा और न दोनों भुजाओं तथा घुटनों का ही। न धनुष बचा न रथ, न वहाँ घोड़े दिखायी दिये और न बाण ही। उस परिघ से वेगपूर्वक मारा गया महारथी जम्बुमाली चूर-चूर हुए वृक्ष की भाँति पृथ्वी पर गिर पड़ा। जम्बुमाली तथा महाबली किंकरों के मारे जाने का समाचार सुनकर रावण को बड़ा क्रोध हुआ। उसकी आँखें रोष से रक्तवर्ण की हो गयीं। महाबली प्रहस्तपुत्र जम्बुमाली के मारे जाने पर निशाचरराज रावण के नेत्र रोष से लाल होकर घूमने लगे। उसने तुरंत ही अपने मन्त्री के पुत्रों को, जो बड़े बलवान् और पराक्रमी थे, युद्ध के लिये जाने की आज्ञा दी। 

राक्षसों के राजा रावण की आज्ञा पाकर मन्त्री के सात पुत्र, जो अग्नि के समान तेजस्वी थे, उस राजमहल से बाहर निकले। उनके साथ बहुत बड़ी सेना थी। वे अत्यन्त बलवान्, धनुर्धर, अस्त्रवेत्ताओं में श्रेष्ठ तथा परस्पर होड़ लगाकर शत्रु पर विजय पाने की इच्छा रखने वाले थे। उनके घोड़े जुते हुए विशाल रथ सोने की जाली से ढके हुए थे। उन पर ध्वजा - पताकाएँ फहरा रही थीं और उनके पहियों के चलने से मेघों की गम्भीर गर्जना के समान ध्वनि होती थी। ऐसे रथों पर सवार हो वे अमित पराक्रमी मन्त्रिकुमार तपाये हुए सोने से चित्रित अपने धनुषों की टङ्कार करते हुए बड़े हर्ष और उत्साह के साथ आगे बढ़े। उस समय वे सब-के-सब विद्युत्सहित मेघ के समान शौभा पाते थे। 

तब, पहले जो किंकर नामक राक्षस मारे गये थे, उनकी मृत्यु का समाचार पाकर इन सबकी माताएँ अमङ्गल की आशङ्का से भाई-बन्धु और सुहृदों सहित शोक से घबरा उठीं। तपाये हुए सोने के आभूषणों से विभूषित वे सातों वीर परस्पर होड़-सी लगाकर फाटक पर खड़े हुए हनुमानजी पर टूट पड़े। जैसे वर्षाकाल में मेघ वर्षा करते हुए विचरते हैं, उसी प्रकार वे राक्षसरूपी बादल बाणों की वर्षा करते हुए वहाँ विचरण करने लगे। रथों की घर्घराहट ही उनकी गर्जना थी। 

तदनन्तर राक्षसों द्वारा की गयी उस बाण वर्षा से हनुमानजी उसी तरह आच्छादित हो गये, जैसे कोई गिरिराज जल की वर्षा से ढक गया हो। उस समय निर्मल आकाश में शीघ्रतापूर्वक विचरते हुए कपिवर हनुमान् उन राक्षसवीरों के बाणों तथा रथ के वेगों को व्यर्थ करते हुए अपने-आपको बचाने लगे। जैसे व्योममण्डल में शक्तिशाली वायुदेव इन्द्रधनुषयुक्त मेघों के साथ क्रीडा करते हैं, उसी प्रकार वीर पवनकुमार उन धनुर्धर वीरों के साथ खेल-सा करते हुए आकाश में अद्भुत शोभा पा रहे थे। पराक्रमी हुनुमान् ने राक्षसों की उस विशाल वाहिनी को भयभीत करते हुए घोर गर्जना की और उन राक्षसों पर बड़े वेग से आक्रमण किया। 

शत्रुओं को संताप देने वाले उन वानरवीर ने किन्हीं को थप्पड़ से ही मार गिराया, किन्हीं को पैरों से कुचल डाला, किन्हीं का घूँसों से काम तमाम किया और किन्हीं को नखों से फाड़ डाला। कुछ लोगों को छाती से दबाकर उनका कचूमर निकाल दिया और किन्हीं - किन्हीं को दोनों जाँघों से दबोचकर मसल डाला। कितने ही निशाचर उनकी गर्जना से ही प्राणहीन होकर वहीं पृथ्वी पर गिर पड़े। 

इस प्रकार जब मन्त्री के सारे पुत्र मारे जाकर धराशायी हो गये, तब उनकी बची-खुची सारी सेना भयभीत होकर दसों दिशाओं में भाग गयी। उस समय हाथी वेदना के मारे बुरी तरह से चिग्घाड़ रहे थे, घोड़े धरती पर मरे पड़े थे तथा जिनके बैठक, ध्वज और छत्र आदि खण्डित हो गये थे, ऐसे टूटे हुए रथों से समूची रणभूमि पाट गयी थी। मार्ग में खून की नदियाँ बहती दिखायी दीं तथा लङ्कापुरी राक्षसों के विविध शब्दों के कारण मानो उस समय विकृत स्वर से चीत्कार कर रही थी। प्रचण्ड पराक्रमी और महाबली वानरवीर हनुमानजी उन बढ़े- चढ़े राक्षसों को मौत के घाट उतार कर दूसरे राक्षसों के साथ युद्ध करने की इच्छा से फिर उसी फाटक पर जा पहुँचे। 

इति श्रीमद् राम कथा सुन्दरकाण्ड अध्याय-९ का भाग-२७(27) समाप्त ! 

No comments:

Post a Comment

रामायण: एक परिचय

रामायण संस्कृत के रामायणम् का हिंदी रूपांतरण है जिसका शाब्दिक अर्थ है राम की जीवन यात्रा। रामायण और महाभारत दोनों सनातन संस्कृति के सबसे प्र...