भाग-२६(26) हनुमानजी के द्वारा अशोकवाटिका का विध्वंस, राक्षसियों के मुख से एक वानर के द्वारा प्रमदावन (अशोकवाटिका) के विध्वंस का समाचार सुनकर रावण का किंकर नामक राक्षसों को भेजना और हनुमानजी के द्वारा उन सबका संहार

 


हनुमानजी के विराट रूप को देखकर सीताजी के मन में विश्वास हुआ। हनुमान्‌जी ने फिर छोटा रूप धारण कर लिया। 

तत्पश्चात हनुमानजी ने अंजलि बांधकर कहा - हे माता! सुनो, वानरों में बहुत बल-बुद्धि नहीं होती, परंतु प्रभु के प्रताप से बहुत छोटा सर्प भी गरुड़ को खा सकता है (अत्यंत निर्बल भी महान्‌ बलवान्‌ को मार सकता है)। 

भक्ति, प्रताप, तेज और बल से सनी हुई हनुमान्‌जी की वाणी सुनकर सीताजी के मन में संतोष हुआ। उन्होंने श्री रामजी के प्रिय जानकर हनुमान्‌जी को आशीर्वाद दिया कि हे तात! तुम बल और शील के निधान होओ। हे पुत्र! तुम अजर (बुढ़ापे से रहित), अमर और गुणों के खजाने होओ। श्री रघुनाथजी तुम पर बहुत कृपा करें। 'प्रभु कृपा करें' ऐसा कानों से सुनते ही हनुमान्‌जी पूर्ण प्रेम में मग्न हो गए। 

हनुमान्‌जी ने बार-बार सीताजी के चरणों में सिर नवाया और फिर हाथ जोड़कर कहा - हे माता! अब मैं कृतार्थ हो गया। आपका आशीर्वाद अमोघ (अचूक) है, यह बात प्रसिद्ध है। हे माता! सुनो, सुंदर फल वाले वृक्षों को देखकर मुझे बड़ी ही भूख लग आई है। 

सीताजी ने कहा - हे पुत्र! सुनो, बड़े भारी योद्धा राक्षस इस वन की रखवाली करते हैं। 

हनुमान्‌जी ने कहा - हे माता! यदि आप मन में सुख मानें (प्रसन्न होकर) आज्ञा दें तो मुझे उनका भय तो बिलकुल नहीं है। 

हनुमान्‌जी को बुद्धि और बल में निपुण देखकर जानकीजी ने कहा - जाओ। हे तात! श्री रघुनाथजी के चरणों को हृदय में धारण करके मीठे फल खाओ

सीताजी के उत्तम वचनों द्वारा समादर पाकर वानरवीर हनुमानजी जब वहाँ से जाने लगे, तब उस स्थान से दूसरी जगह हटकर वे इस प्रकार विचार करने लगे - मैंने माता सीता का दर्शन तो कर लिया, अब मेरे इस कार्य का थोड़ा सा अंश (शत्रु की शक्ति का पता लगाना) शेष रह गया है। इसके लिये चार उपाय हैं - साम, दान, भेद और दण्ड। यहाँ साम आदि तीन उपायों को लाँघकर केवल चौथे उपाय दण्ड का प्रयोग ही उपयोगी दिखायी देता है। राक्षसों के प्रति सामनीति (समझाना) का प्रयोग करने से कोई लाभ नहीं होता। इनके पास धन भी बहुत है, अत: इन्हें दान देने का भी कोई उपयोग नहीं है। इसके सिवा, ये बल के अभिमान में चूर रहते हैं, अत: भेदनीति के द्वारा भी इन्हें वश में नहीं किया जा सकता। ऐसी दशा में मुझे यहाँ पराक्रम दिखाना ही उचित जान पड़ता है। 

‘इस कार्य की सिद्धि के लिये पराक्रम के सिवा यहाँ और किसी उपाय का अवलम्बन ठीक नहीं जँचता। यदि युद्ध में राक्षसों के मुख्य-मुख्य वीर मारे जायँ तो ये लोग किसी तरह कुछ नरम पड़ सकते हैं। जो पुरुष प्रधान कार्य के सम्पन्न हो जाने पर दूसरे-दूसरे बहुत से कार्यों को भी सिद्ध कर लेता है और पहले के कार्यों में बाधा नहीं आने देता, वही कार्य को सुचारु रूप में कर सकता है। छोटे-से-छोटे कर्म की भी सिद्धि के लिये कोई एक ही साधक हेतु नहीं हुआ करता। जो पुरुष किसी कार्य या प्रयोजन को अनेक प्रकार से सिद्ध करने की कला जानता हो, वही कार्य साधन में समर्थ हो सकता है।' 

‘यदि इसी यात्रा में मैं इस बात को ठीक-ठीक समझ लूँ कि अपने और शत्रुपक्ष में युद्ध होने पर कौन प्रबल होगा और कौन निर्बल, तत्पश्चात् भविष्य के कार्य का भी निश्चय करके आज सुग्रीव के पास चलूँ तो मेरे द्वारा स्वामी की आज्ञा का पूर्ण रूप से पालन हुआ समझा जायगा। परंतु आज मेरा यहाँ तक आना सुखद अथवा शुभ परिणाम का जनक कैसे होगा? राक्षसों के साथ हठात् युद्ध करने का अवसर मुझे कैसे प्राप्त होगा? तथा दशमुख रावण समर में अपनी सेना को और मुझे भी तुलनात्मक दृष्टि से देखकर कैसे यह समझ सकेगा कि कौन सबल है ?' 

‘उस युद्ध में मन्त्री, सेना और सहायकों सहित रावण का सामना करके मैं उसके हार्दिक अभिप्राय तथा सैनिक- शक्ति का अनायास ही पता लगा लूँगा। उसके बाद यहाँ से जाऊँगा। इस निर्दयी रावण का यह सुन्दर उपवन नेत्रों को आनन्द देने वाला और मनोरम है। नाना प्रकार के वृक्षों और लताओं से व्याप्त होने के कारण यह नन्दनवन के समान उत्तम प्रतीत होता है। जैसे आग सूखे वन को जला डालती है, उसी प्रकार मैं भी आज इस उपवन का विध्वंस कर डालूँगा। इसके भग्न हो जाने पर रावण अवश्य मुझ पर क्रोध करेगा।' 

‘तत्पश्चात् वह राक्षसराज हाथी, घोड़े तथा विशाल रथों से युक्त और त्रिशूल, कालायस एवं पट्टिश आदि अस्त्र- शस्त्रों से सुसज्जित बहुत बड़ी सेना लेकर आयेगा। फिर तो यहाँ महान् संग्राम छिड़ जायगा। उस युद्ध में मेरी गति रुक नहीं सकती। मेरा पराक्रम कुण्ठित नहीं हो सकता। मैं प्रचण्ड पराक्रम दिखाने वाले उन राक्षसों से भिड़ जाऊँगा और रावण की भेजी हुई उस सारी सेना को मौत के घाट उतारकर सुखपूर्वक सुग्रीव के निवास स्थान किष्किन्धापुरी को लौट जाऊँगा।' 

ऐसा सोचकर भयानक पुरुषार्थ प्रकट करने वाले पवनकुमार हनुमानजी क्रोध से भर गये और वायु के समान बड़े भारी वेग से वृक्षों को उखाड़ उखाड़कर फेंकने लगे। तदनन्तर वीर हनुमान् ने मतवाले पक्षियों के कलरव से मुखरित और नाना प्रकार के वृक्षों एवं लताओं से भरे-पूरे उस प्रमदावन (अन्त: पुर के उपवन) को उजाड़ डाला। वहाँ के वृक्षों को खण्ड-खण्ड कर दिया। जलाशयों को मथ डाला और पर्वत शिखरों को चूर-चूर कर डाला। इससे वह सुन्दर वन कुछ ही क्षणों में अभव्य दिखायी देने लगा। 

नाना प्रकार के पक्षी वहाँ भय के मारे चें-चें करने लगे, जलाशयों के घाट टूट-फूट गये, तामे के समान वृक्षों के लाल- लाल पल्लव मुरझा गये तथा वहाँ के वृक्ष और लताएँ भी रौंद डाली गयीं। इन सब कारणों से वह प्रमदावन (अशोकवाटिका) वहाँ ऐसा जान पड़ता था, मानो दावानल से झुलस गया हो। वहाँ की लताएँ अपने आवरणों के नष्ट-भ्रष्ट हो जाने से घबरायी हुई स्त्रियों के समान प्रतीत होती थीं। लतामण्डप और चित्रशालाएँ उजाड़ हो गयीं। पाले हुए हिंसक जन्तु, मृग तथा तरह-तरह के पक्षी आर्तनाद करने लगे। प्रस्तरनिर्मित प्रासाद तथा अन्य साधारण गृह भी तहस नहस हो गये। इससे उस महान् प्रमदावन का सारा रूप-सौन्दर्य नष्ट हो गया। 

दशमुख रावण की स्त्रियों की रक्षा करने वाले तथा अन्त: पुर के क्रीडाविहार के लिये उपयोगी उस विशाल कानन की भूमि, जहाँ चंचल अशोक-लताओं के समूह शोभा पाते थे, कपिवर हनुमानजी के बल प्रयोग से श्रीहीन होकर शोचनीय लताओं के विस्तार से युक्त हो गयी (उसकी दुरवस्था देखकर दर्शक के मन में दुःख होता था )। इस प्रकार महामना राजा रावण के मन को विशेष कष्ट पहुँचाने वाला कार्य करके अनेक महाबलियों के साथ अकेले ही युद्ध करने का हौसला लेकर कपिश्रेष्ठ हनुमानजी प्रमदावन के फाटक पर आ गये। उस समय वे अपने अद्भुत तेज से प्रकाशित हो रहे थे। 

उधर पक्षियों के कोलाहल और वृक्षों के टूटने की आवाज सुनकर समस्त लंकानिवासी भय से घबरा उठे। पशु और पक्षी भयभीत होकर भागने तथा आर्तनाद करने लगे। राक्षसों के सामने भयंकर अपशकुन प्रकट होने लगे। प्रमदावन में सोयी हुई विकराल मुखवाली राक्षसियों की निद्रा टूट गयी। उन्होंने उठने पर उस वन को उजड़ा हुआ देखा। साथ ही उनकी दृष्टि उन वीर महाकपि हनुमानजी पर भी पड़ी। महाबली, महान् साहसी एवं महाबाहु हनुमानजी ने जब उन राक्षसियों को देखा, तब उन्हें डराने वाला विशाल रूप धारण कर लिया। 

पर्वत के समान बड़े शरीर वाले महाबली वानर को देखकर वे राक्षसियाँ जनकनन्दिनी सीता से पूछने लगीं - सीता! यह कौन है? किसका है? और कहाँ से किसलिये यहाँ आया है? इसने तुम्हारे साथ क्यों बातचीत की है? कजरारे नेत्रप्रान्तवाली सुन्दरी ! ये सब बातें हमें बताओ। तुम्हें डरना नहीं चाहिये। इसने तुम्हारे साथ क्या बातें की थीं? 

तब सर्वांगसुन्दरी साध्वी सीता ने कहा - इच्छानुसार रूप धारण करने वाले राक्षसों को समझने या पहचानने का मेरे पास क्या उपाय है ? तुम्हीं जानो यह कौन है और क्या करेगा? साँप के पैरों को साँप ही पहचानता है, इसमें संशय नहीं है। मैं भी इसे देखकर बहुत डरी हुई हूँ। मुझे नहीं मालूम कि यह कौन है? मैं तो इसे इच्छानुसार रूप धारण करके आया हुआ कोई राक्षस ही समझती हूँ। 

विदेहनन्दिनी सीता की यह बात सुनकर राक्षसियाँ बड़े वेग से भागीं। उनमें से कुछ तो वहीं खड़ी हो गयीं और कुछ रावण को सूचना देने के लिये चली गयीं। रावण के समीप जाकर उन विकराल मुख वाली राक्षसियों ने रावण को यह सूचना दी कि कोई विकट रूपधारी भयंकर वानर प्रमदावन में आ पहुँचा है। 

वे बोलीं – राजन्! अशोकवाटिका में एक वानर आया है, जिसका शरीर बड़ा भयंकर है। उसने सीता से बातचीत की है। वह महापराक्रमी वानर अभी वहीं उपस्थित है। हमने बहुत पूछा तो भी जनककिशोरी मृगनयनी सीता उस वानर के विषय में हमें कुछ बताना नहीं चाहती हैं। सम्भव है वह इन्द्र या कुबेर का दूत हो अथवा श्रीराम ने ही उसे सीता की खोज के लिये भेजा हो। अद्भुत रूप धारण करने वाले उस वानर ने आपके मनोहर प्रमदावन को, जिसमें नाना प्रकार के पशु-पक्षी रहा करते थे, उजाड़ दिया। प्रमदावन का कोई भी ऐसा भाग नहीं है, जिसको उसने नष्ट न कर डाला हो। केवल वह स्थान जहाँ जानकी देवी रहती हैं, उसने नष्ट नहीं किया है। 

'जानकीजी की रक्षा के लिये उसने उस स्थान को बचा दिया है या परिश्रम से थककर – यह निश्चित रूप से नहीं जान पड़ता है। अथवा उसे परिश्रम तो क्या हुआ होगा? उसने उस स्थान को बचाकर सीता की ही रक्षा की है। मनोहर पल्लवों और पत्तों से भरा हुआ वह विशाल अशोक वृक्ष, जिसके नीचे सीता का निवास है, उसने सुरक्षित रख छोड़ा है। जिसने सीता से वार्तालाप किया और उस वन को उजाड़ डाला, उस उग्र रूपधारी वानर को आप कोई कठोर दण्ड देने की आज्ञा प्रदान करें। राक्षसराज ! जिन्हें आपने अपने हृदय में स्थान दिया है, उन सीता देवी से कौन बातें कर सकता है? जिसने अपने प्राणों का मोह नहीं छोड़ा है, वह उनसे वार्तालाप कैसे कर सकता है? 

राक्षसियों की यह बात सुनकर राक्षसों का राजा रावण प्रज्वलित चिता की भाँति क्रोध से जल उठा। उसके नेत्र रोष से घूमने लगे। क्रोध में भरे हुए रावण की आँखों से आँसू की बूँदें टपकने लगीं, मानो जलते हुए दो दीपकों से आग की लपटों के साथ तेल की बूँदें झर रही हों। उस महातेजस्वी निशाचर ने हनुमानजी को कैद करने के लिये अपने ही समान वीर किंकर नामधारी राक्षसों को जाने की आज्ञा दी। राजा की आज्ञा पाकर अस्सी हजार वेगवान् किंकर हाथों में कूट और मुद्गर लिये उस महल से बाहर निकले। उनकी दाढ़ें विशाल, पेट बड़ा और रूप भयानक था। वे सब के सब महान् बली, युद्ध के अभिलाषी और हनुमानजी को पकड़ने के लिये उत्सुक थे। 

प्रमदावन के फाटक पर खड़े हुए उन वानरवीर के पास पहुँचकर वे महान् वेगशाली निशाचर उन पर चारों ओर से इस प्रकार झपटे, जैसे फतिंगे आग पर टूट पड़े हों। वे विचित्र गदाओं, सोने से मढ़े हुए परिघों और सूर्य के समान प्रज्वलित बाणों के साथ वानरश्रेष्ठ हनुमान् पर चढ़ आये। हाथ में प्रास और तोमर लिये मुद्गर, पट्टिश और शूलों से सुसज्जित हो वे सहसा हनुमान् को चारों ओर से घेरकर उनके सामने खड़े हो गये। तब पर्वत के समान विशाल शरीर वाले तेजस्वी श्रीमान् हनुमान् भी अपनी पूँछ को पृथ्वी पर पटक कर बड़े जोर से गर्जने लगे। पवनपुत्र हनुमान् अत्यन्त विशाल शरीर धारण करके अपनी पूँछ फटकारने और उसके शब्द से लङ्का को प्रतिध्वनित करने लगे। उनकी पूँछ फटकारने का गम्भीर घोष बहुत दूर तक गूंज उठता था। उससे भयभीत हो पक्षी आकाश से गिर पड़ते थे। 

उस समय हनुमानजी ने उच्च स्वर से इस प्रकार घोषणा की - अत्यन्त बलवान् भगवान् श्रीराम तथा महाबली लक्ष्मण की जय हो। श्रीरघुनाथजी के द्वारा सुरक्षित राजा सुग्रीव की भी जय हो। मैं अनायास ही महान् पराक्रम करने वाले कोशलनरेश श्रीरामचन्द्रजी का दास हूँ। मेरा नाम हनुमान् है। मैं वायु का पुत्र तथा शत्रुसेना का संहार करने वाला हूँ। जब मैं हजारों वृक्ष और पत्थरों से प्रहार करने लगूँगा, उस समय सहस्रों रावण मिलकर भी युद्ध में मेरे बल की समानता अथवा मेरा सामना नहीं कर सकते। मैं लङ्कापुरी को तहस-नहस कर डालूँगा और मिथिलेशकुमारी सीता को प्रणाम करने के अनन्तर सब राक्षसों के देखते- देखते अपना कार्य सिद्ध करके जाऊँगा। 

हनुमानजी की इस गर्जना से समस्त राक्षसों पर भय एवं आतंक छा गया। उन सबने हनुमानजी को देखा। वे संध्या-काल के ऊँचे मेघ के समान लाल एवं विशालकाय दिखायी देते थे। हनुमानजी ने अपने स्वामी का नाम लेकर स्वयं ही अपना परिचय दे दिया था, इसलिये राक्षसों को उन्हें पहुचानने में कोई संदेह नहीं रहा। वे नाना प्रकार के भयंकर अस्त्र-शस्त्रों का प्रहार करते हुए चारों ओर से उन पर टूट पड़े। उन शूरवीर राक्षसों द्वारा सब ओर से घिर जाने पर महाबली हनुमान् ने फाटक पर रखा हुआ एक भयंकर लोहे का परिघ उठा लिया। जैसे विनतानन्दन गरुड़ ने छटपटाते हुए सर्प को पंजों में दबा रखा हो, उसी प्रकार उस परिघ को हाथ में लेकर हनुमानजी ने उन निशाचरों का संहार आरम्भ किया।

वीर पवनकुमार उस परिघ को लेकर आकाश में विचरने लगे। जैसे सहस्रनेत्रधारी इन्द्र अपने वज्र से दैत्यों का वध करते हैं, उसी प्रकार उन्होंने उस परिघ से सामने आये हुए समस्त राक्षसों को मार डाला। उन किंकर नामधारी राक्षसों का वध करके महावीर पवनपुत्र हनुमानजी युद्ध की इच्छा से पुन: उस फाटक पर खड़े हो गये। तदनन्तर वहाँ उस भय से मुक्त हुए कुछ राक्षसों ने जाकर रावण को यह समाचार निवेदन किया कि समस्त किंकर नामक राक्षस मार डाले गये। राक्षसों की उस विशाल सेना को मारी गयी सुनकर राक्षसराज रावण की आँखें चढ़ गयीं और उसने प्रहस्त के पुत्र को जिसके पराक्रम की कहीं तुलना नहीं थी तथा युद्ध में जिसे परास्त करना नितान्त कठिन था, हनुमानजी का सामना करने के लिये भेजा। 

इति श्रीमद् राम कथा सुन्दरकाण्ड अध्याय-९ का भाग-२६(26) समाप्त ! 

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