हनुमानजी का पूर्वोक्त वचन सुनकर पूर्णचन्द्रमा के समान मनोहर मुख वाली सीता ने उनसे धर्म और अर्थ से युक्त बात कही - वत्स! तुमने जो कहा कि श्रीरघुनाथजी का चित्त दूसरी ओर नहीं जाता और वे शोक में डूबे रहते हैं, तुम्हारा यह कथन मुझे विषमिश्रित अमृत के समान लगा है। कोई बड़े भारी ऐश्वर्य में स्थित हो अथवा अत्यन्त भयंकर विपत्ति में पड़ा हो, काल मनुष्य को इस तरह खींच लेता है, मानो उसे रस्सी में बाँध रखा हो। वा॒नरशिरोमणे! दैव के विधान को रोकना प्राणियों के वश की बात नहीं है। उदाहरण के लिये सुमित्राकुमार लक्ष्मण को, मुझको और श्रीराम को भी देख लो। हम लोग किस तरह वियोग-दुःख से मोहित हो रहे हैं।
‘समुद्र में नौका के नष्ट हो जाने पर अपने हाथों से तैरने वाले पराक्रमी पुरुष की भाँति श्रीरघुनाथजी कैसे इस शोक- सागर से पार होंगे? राक्षसों का वध, रावण का संहार और लङ्कापुरी का विध्वंस करके मेरे पतिदेव मुझे कब देखेंगे? तुम उनसे जाकर कहना, वे शीघ्रता करें। यह वर्ष जब तक पूरा नहीं हो जाता, तभी तक मेरा जीवन शेष है। वत्स ! यह दसवाँ महीना चल रहा है। अब वर्ष पूरा होने में दो ही मास शेष हैं। निर्दयी रावण ने मेरे जीवन के लिये जो अवधि निश्चित की है, उसमें इतना ही समय बाकी रह गया है।'
‘रावण के भाई विभीषण ने मुझे लौटा देने के लिये उससे यन्तपूर्वक बड़ी अनुनय-विनय की थी, किंतु वह उनकी बात नहीं मानता है। मेरा लौटाया जाना रावण को अच्छा नहीं लगता; क्योंकि वह काल के अधीन हो रहा है और युद्ध में मौत उसे ढूँढ़ रही है। कपे! विभीषण की ज्येष्ठ पुत्री का नाम कला है। उसकी माता ने स्वयं उसे मेरे पास भेजा था। उसी ने ये सारी बातें मुझसे कही हैं। अविन्ध्य नाम का एक श्रेष्ठ राक्षस है, जो बड़ा ही बुद्धिमान्, विद्वान्, धीर, सुशील, वृद्ध तथा रावण का सम्मान पात्र है। उसने रावण को यह बताकर कि श्रीराम के हाथ से राक्षसों के विनाश का अवसर आ पहुँचा है, मुझे लौटा देने के लिये प्रेरित किया था, किंतु वह दुष्टात्मा उसके हितकारी वचनों को भी नहीं सुनता है।'
‘कपिश्रेष्ठ! मुझे तो यह आशा हो रही है कि मेरे पतिदेव मुझसे शीघ्र ही आ मिलेंगे; क्योंकि मेरी अन्तरात्मा शुद्ध है और श्रीरघुनाथजी में बहुत-से गुण हैं। पुत्र! श्रीरघुनाथजी में उत्साह, पुरुषार्थ, बल, दयालुता, कृतज्ञता, पराक्रम और प्रभाव आदि सभी गुण विद्यमान हैं। जिन्होंने जनस्थान में अपने भाई की सहायता लिये बिना ही चौदह हजार राक्षसों का संहार कर डाला, उनसे कौन शत्रु भयभीत न होगा?'
'श्रीरघुनाथजी पुरुषों में श्रेष्ठ हैं। वे संकटों से तोले या विचलित किये जायँ, यह सर्वथा असम्भव है। जैसे पुलोम कन्या शची इन्द्र के प्रभाव को जानती हैं, उसी तरह मैं श्रीरघुनाथजी की शक्ति सामर्थ्य को अच्छी तरह जानती हूँ। कपिवर! शूरवीर भगवान् श्रीराम सूर्य के समान हैं। उनके बाण समूह ही उनकी किरणें हैं। वे उनके द्वारा शत्रुभूत राक्षस रूपी जल को शीघ्र ही सोख लेंगे।'
इतना कहते-कहते सीता के मुख पर आँसुओं की धारा बह चली। वे श्रीरामचन्द्रजी के लिये शोक से पीड़ित हो रही थीं।
उस समय कपिवर हनुमानजी ने उनसे कहा - माता ! आप धैर्य धारण करें। मेरा वचन सुनते ही श्रीरघुनाथजी वानर और भालुओं की विशाल सेना लेकर शीघ्र यहाँ के लिये प्रस्थान कर देंगे। अथवा मैं अभी आपको इस राक्षसजनित दु:ख से छुटकारा दिला दूँगा। माता! आप मेरी पीठ पर बैठ जाइये। आपको पीठ पर बैठाकर मैं समुद्र को लाँघ जाऊँगा। मुझमें रावण सहित सारी लङ्का को भी ढो ले जाने की शक्ति है। माता ! रघुनाथजी प्रस्रवणगिरि पर रहते हैं। मैं आज ही आपको उनके पास पहुँचा दूँगा। ठीक उसी तरह, जैसे अग्निदेव हवन किये गये हविष्य को इन्द्र की सेवा में ले जाते हैं।
'विदेहनन्दिनि! दैत्यों के वध के लिये उत्साह रखने वाले भगवान् विष्णु की भाँति राक्षसों के संहार के लिये सचेष्ट हुए श्रीराम और लक्ष्मण का आप आज ही दर्शन करेंगी। आपके दर्शन का उत्साह मन में लिये महाबली श्रीराम पर्वत शिखर पर अपने आश्रम में उसी प्रकार बैठे हैं, जैसे देवराज इन्द्र गजराज ऐरावत की पीठ पर विराजमान होते हैं। माता ! आप मेरी पीठ पर बैठिये। शोभने ! मेरे कथन की उपेक्षा न कीजिये। चन्द्रमा से मिलने वाली रोहिणी की भाँति आप श्रीरामचन्द्रजी के साथ मिलने का निश्चय कीजिये।'
‘मुझे भगवान् श्रीराम से मिलना है, इतना कहते ही आप चन्द्रमा से रोहिणी की भाँति श्रीरघुनाथजी से मिल जायँगी। आप मेरी पीठ पर आरूढ़ होइये और आकाशमार्ग से ही महासागर को पार कीजिये। माता ! मैं आपको लेकर जब यहाँ से चलूँगा, उस समय समूचे लङ्का - निवासी मिलकर भी मेरा पीछा नहीं कर सकते। जिस प्रकार मैं यहाँ आया हूँ, उसी तरह आपको लेकर आकाशमार्ग से चला जाऊँगा, इसमें संदेह नहीं है। आप मेरा पराक्रम देखिये।'
वानरश्रेष्ठ हनुमान् के मुख से यह अद्भुत वचन सुनकर मिथिलेशकुमारी सीता के सारे शरीर में हर्ष और विस्मय के कारण रोमाञ्च हो आया। उन्होंने हनुमानजी से कहा - वानरयूथपति हनुमान्! तुम इतने दूर के मार्ग पर मुझे कैसे ले चलना चाहते हो? तुम्हारे इस दुःसाहस को मैं वानरोचित चपलता ही समझती हूँ। वानरशिरोमणे! तुम्हारा शरीर तो बहुत छोटा है। फिर तुम मुझे मेरे स्वामी महाराज श्रीरघुवीरजी के पास ले जाने की इच्छा कैसे करते हो?
सीताजी की यह बात सुनकर शोभा शाली पवनकुमार हनुमान् ने इसे अपने लिये नया तिरस्कार ही माना।
वे सोचने लगे - माता सीता मेरे बल और प्रभाव को नहीं जानतीं। इसलिये आज मेरे उस रूप को, जिसे मैं इच्छानुसार धारण कर लेता हूँ, ये देख लें।
ऐसा विचार करके शत्रुमर्दन वानरशिरोमणि हनुमान् ने उस समय सीता को अपना स्वरूप दिखाया। वे बुद्धिमान् कपिवर उस वृक्ष से नीचे कूद पड़े और सीताजी को विश्वास दिलाने के लिये बढ़ने लगे। बात-की- बात में उनका शरीर मेरुपर्वत के समान ऊँचा हो गया। वे प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी प्रतीत होने लगे। इस तरह् विशाल रूप धारण करके वे वानरश्रेष्ठ हनुमान् सीताजी के सामने खड़े हो गये।
तत्पश्चात् पर्वत के समान विशालकाय, तामे के समान लाल मुख तथा वज्र के समान दाढ़ और नख वाले भयानक महाबली वानरवीर हनुमान् विदेहनन्दिनी से इस प्रकार बोले - माता ! मुझमें पर्वत, वन, अट्टालिका, चहारदिवारी और नगरद्वार सहित इस लङ्कापुरी को रावण के साथ ही उठा ले जाने की शक्ति है। अत: आप मेरे साथ चलने का निश्चय कर लीजिये। आपकी आशङ्का व्यर्थ है। हे माता ! आप मेरे साथ चलकर लक्ष्मण सहित श्रीरघुनाथजी का शोक दूर कीजिये।
वायु के औरस पुत्र हनुमानजी को पर्वत के समान विशाल शरीर धारण किये देख प्रफुल्ल कमलदल के समान बड़े- बड़े नेत्रों वाली जनककिशोरी ने उनसे कहा - महाकपे ! मैं तुम्हारी शक्ति और पराक्रम को जानती हूँ। वायु के समान तुम्हारी गति और अग्नि के समान तुम्हारा अद्भुत तेज है। वानरयूथपते! दूसरा कोई साधारण वानर अपार महासागर के पार की इस भूमि में कैसे आ सकता है? मैं जानती हूँ तुम समुद्र पार करने और मुझे ले जाने में भी समर्थ हो, तथापि तुम्हारी तरह मुझे भी अपनी कार्यसिद्धि के विषय में अवश्य भलीभाँति विचार कर लेना चाहिये।
‘कपिश्रेष्ठ! तुम्हारे साथ मेरा जाना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है; क्योंकि तुम्हारा वेग वायु के वेग के समान तीव्र है। जाते समय यह वेग मुझे मूर्च्छित कर सकता है। मैं समुद्र के ऊपर-ऊपर आकाश में पहुँच जाने पर अधिक वेग से चलते हुए तुम्हारे पृष्ठभाग से नीचे गिर सकती हूँ। इस तरह समुद्र में, जो तिमि नामक बड़े-बड़े मत्स्यों, नाकों और मछलियों से भरा हुआ है, गिरकर विवश हो मैं शीघ्र ही जल-जन्तुओं का उत्तम आहार बन जाऊँगी। इसलिये शत्रुनाशन वीर! मैं तुम्हारे साथ नहीं चल सकूँगी। एक स्त्री को साथ लेकर जब तुम जाने लगोगे, उस समय राक्षसों को तुम पर संदेह होगा, इसमें संशय नहीं है।'
'मुझे हरकर ले जायी जाती देख दुरात्मा रावण की आज्ञा से भयंकर पराक्रमी राक्षस तुम्हारा पीछा करेंगे। वीर! उस समय मुझ जैसी रक्षणीया अबला के साथ होने के कारण तुम हाथों में शूल और मुद्गर धारण करने वाले उन शौर्यशाली राक्षसों से घिरकर प्राणसंशय की अवस्था में पहुँच जाओगे। आकाश में अस्त्र-शस्त्रधारी बहुत-से राक्षस तुम पर आक्रमण करेंगे और तुम्हारे हाथ में कोई भी अस्त्र न होगा। उस दशा में तुम उन सबके साथ युद्ध और मेरी रक्षा दोनों कार्य कैसे कर सकोगे?'
'कपिश्रेष्ठ! उन क्रूरकर्मा राक्षसों के साथ जब तुम युद्ध करने लगोगे, उस समय मैं भय से पीड़ित होकर तुम्हारी पीठ से अवश्य ही गिर जाऊँगी। कपिश्रेष्ठ! यदि कहीं वे महान् बलवान् भयानक राक्षस किसी तरह तुम्हें युद्ध में जीत लें अथवा युद्ध करते समय मेरी रक्षा की ओर तुम्हारा ध्यान न रहने से यदि मैं गिर गयी तो वे पापी राक्षस मुझ गिरी हुई अबला को फिर पकड़ ले जायँगे। अथवा यह भी सम्भव है कि वे निशाचर मुझे तुम्हारे हाथ से छीन ले जायँ या मेरा वध ही कर डालें; क्योंकि युद्ध में विजय और पराजय को अनिश्चित ही देखा जाता है। अथवा वानरशिरोमणे ! यदि राक्षसों की अधिक डाँट पड़ने पर मेरे प्राण निकल गये तो फिर तुम्हारा यह सारा प्रयत्न निष्फल ही हो जायगा।'
‘यद्यपि तुम भी सम्पूर्ण राक्षसों का संहार करने में समर्थ हो तथापि तुम्हारे द्वारा राक्षसों का वध हो जाने पर श्रीरघुनाथजी के सुयश में बाधा आयेगी (लोग यही कहेंगे कि श्रीराम स्वयं कुछ भी न कर सके)। अथवा यह भी सम्भव है कि राक्षसलोग मुझे ले जाकर किसी ऐसे गुप्त स्थान में रख दें, जहाँ न तो वानरों को मेरा पता लगे और न श्रीरघुनाथजी को ही। यदि ऐसा हुआ तो मेरे लिये किया गया तुम्हारा यह सारा उद्योग व्यर्थ हो जायगा। यदि तुम्हारे साथ श्रीरामचन्द्रजी यहाँ पधारें तो उनके आने से बहुत बड़ा लाभ होगा।'
‘महाबाहो! अमित पराक्रमी श्रीरघुनाथजी का, उनके भाइयों का, तुम्हारा तथा वानरराज सुग्रीव के कुल का जीवन मुझ पर ही निर्भर है। शोक और संताप से पीड़ित हुए वे दोनों भाई जब मेरी प्राप्ति की ओर से निराश हो जायँगे, तब सम्पूर्ण रीछों और वानरों के साथ अपने प्राणों का परित्याग कर देंगे। वानरश्रेष्ठ! तुम्हारे साथ न चल सकने का एक प्रधान कारण और भी है। वानरवीर ! पतिभक्ति की ओर दृष्टि रखकर मैं भगवान् श्रीरघुनाथजी के सिवा दूसरे किसी पुरुष के शरीर का स्वेच्छा से स्पर्श करना नहीं चाहती। रावण के शरीर से जो मेरा स्पर्श हो गया है, वह तो उसके बलात् हुआ है। उस समय मैं असमर्थ, अनाथ और बेबस थी, क्या करती।'
‘यदि श्रीरघुनाथजी यहाँ राक्षसों सहित दशमुख रावण का वध करके मुझे यहाँ से ले चलें तो वह उनके योग्य कार्य होगा। मैंने युद्ध में शत्रुओं का मर्दन करने वाले महात्मा श्रीरघुनाथजी के पराक्रम अनेक बार देखे और सुने हैं। देवता, गन्धर्व, नाग और राक्षस सब मिलकर भी संग्राम में उनकी समानता नहीं कर सकते। युद्धस्थल में विचित्र धनुष धारण करने वाले इन्द्रतुल्य पराक्रमी महाबली श्रीरघुनाथजी लक्ष्मण के साथ रह वायु का सहारा पाकर प्रज्वलित हुए अग्नि की भाँति उद्दीप्त हो उठते हैं। उस समय उन्हें देखकर उनका वेग कौन सह सकता है?'
'वानरशिरोमणे! समराङ्गण में अपने बाण रूपी तेज से प्रलयकालीन सूर्य के समान प्रकाशित होने वाले और मतवाले दिग्गज की भाँति खड़े हुए रणमर्दन श्रीरघुनाथजी और लक्ष्मण का सामना कौन कर सकता है? इसलिये कपिश्रेष्ठ! वानरवीर ! तुम प्रयत्न करके यूथपति सुग्रीव और लक्ष्मण सहित मेरे प्रियतम श्रीरामचन्द्रजी को शीघ्र यहाँ बुला ले आओ। मैं श्रीराम के लिये चिरकाल से शोकाकुल हो रही हूँ। तुम उनके शुभागमन से मुझे हर्ष प्रदान करो।'
सीता के इस वचन से कपिश्रेष्ठ हनुमानजी को बड़ी प्रसन्नता हुई। वे बातचीत में कुशल थे। उन्होंने पूर्वोक्त बातें सुनकर सीता से कहा - माता ! आपका कहना बिलकुल ठीक और युक्तिसंगत है। हे माता! आपकी यह बात नारी स्वभाव के तथा पतिव्रताओं की विनयशीलता के अनुरूप है। इसमें संदेह नहीं कि आप अबला होने के कारण मेरी पीठ पर बैठकर सौ योजन विस्तृत समुद्र के पार जाने में समर्थ नहीं हैं। माता! आपने जो दूसरा कारण बताते हुए कहा है कि मेरे लिये श्रीरामचन्द्रजी के सिवा दूसरे किसी पुरुष का स्वेच्छापूर्वक स्पर्श करना उचित नहीं है, यह आपके ही योग्य है।
'हे माता ! महात्मा श्रीराम की धर्मपत्ती के मुख से ऐसी बात निकल सकती है। आपको छोड़कर दूसरी कौन स्त्री ऐसा वचन कह सकती है। मेरे सामने आपने जो जो पवित्र चेष्टाएँ कीं और जैसी जैसी उत्तम बातें कही हैं, वे सब पूर्णरूप से श्रीरामचन्द्रजी मुझसे सुनेंगे। माता ! मैंने जो आपको अपने साथ ले जाने का आग्रह किया, उसके बहुत से कारण हैं। एक तो मैं श्रीरामचन्द्रजी का शीघ्र ही प्रिय करना चाहता था। अतः स्नेहपूर्ण हृदय से ही मैंने ऐसी बात कही है।'
'दूसरा कारण यह है कि लङ्का में प्रवेश करना सबके लिये अत्यन्त कठिन है। तीसरा कारण है, महासागर को पार करने की कठिनाई। इन सब कारणों से तथा अपने में आपको ले जाने की शक्ति होने से मैंने ऐसा प्रस्ताव किया था। मैं आज ही आपको श्रीरघुनाथजी से मिला देना चाहता था। अत: अपने परमाराध्य गुरु श्रीराम के प्रति स्नेह और आपके प्रति भक्ति के कारण ही मैंने ऐसी बात कही थी, किसी और उद्देश्य से नहीं।'
