भाग-२४(24) हनुमानजी का सीता को मुद्रिका देना, सीता का 'श्रीराम कब मेरा उद्धार करेंगे' यह उत्सुक होकर पूछना तथा हनुमानजी का श्रीराम के सीताविषयक प्रेम का वर्णन करके उन्हें सान्त्वना देना

 


तदनन्तर महातेजस्वी पवनकुमार हनुमानजी सीताजी को विश्वास दिलाने के लिये पुन: विनययुक्त वचन बोले - महाभागे! मैं परम बुद्धिमान् भगवान् श्रीराम का दूत वानर हूँ। माता! यह श्रीरामनाम से अङ्कित मुद्रिका है, इसे लेकर देखिये। आपको विश्वास दिलाने के लिये ही मैं इसे लेता आया हूँ। महात्मा श्रीरामचन्द्रजी ने स्वयं यह अंगूठी मेरे हाथ में दी थी। आपका कल्याण हो। अब आप धैर्य धारण करें। आपको जो दुःखरूपी फल मिल रहा था, वह अब समाप्त हो चला है। 

पति के हाथ को सुशोभित करने वाली उस मुद्रिका को लेकर सीताजी उसे ध्यान से देखने लगीं। उस समय जानकीजी को इतनी प्रसन्नता हुई, मानो स्वयं उनके पतिदेव ही उन्हें मिल गये हों। उनका लाल, सफेद और विशाल नेत्रों से युक्त मनोहर मुख हर्ष से खिल उठा, मानो चन्द्रमा राहु के ग्रहण से मुक्त हो गया हो। वे लजीली विदेहबाला प्रियतम का संदेश पाकर बहुत प्रसन्न हुईं। उनके मन को बड़ा संतोष हुआ। 

वे महाकपि हनुमानजी का आदर करके उनकी प्रशंसा करने लगीं - वानरश्रेष्ठ! तुम बड़े पराक्रमी, शक्तिशाली और बुद्धिमान् हो; क्योंकि तुमने अकेले ही इस राक्षसपुरी को पददलित कर दिया है। तुम अपने पराक्रम के कारण प्रशंसा के योग्य हो; क्योंकि तुमने मगर आदि जन्तुओं से भरे हुए सौ योजन विस्तार वाले महासागर को लाँघते समय उसे गाय की खुरी के बराबर समझा है, इसलिये प्रशंसा के पात्र हो। वानरशिरोमणे! मैं तुम्हें कोई साधारण वानर नहीं मानती हूँ; क्योंकि तुम्हारे मन में रावण जैसे राक्षस से भी न तो भय होता है और न घबराहट ही। 

'कपिश्रेष्ठ! यदि तुम्हें आत्मज्ञानी भगवान् श्रीरघुवीर ने भेजा है तो तुम अवश्य इस योग्य हो कि मैं तुमसे बातचीत करूँ। दुर्धर्ष वीर श्रीरामचन्द्रजी विशेषत: मेरे निकट ऐसे किसी पुरुष को नहीं भेजेंगे, जिसके पराक्रम का उन्हें ज्ञान न हो तथा जिसके शीलस्वभाव की उन्होंने परीक्षा न कर ली हो। सत्यप्रतिज्ञ एवं धर्मात्मा भगवान् श्रीरघुनाथी सकुशल हैं तथा माता सुमित्रा का आनन्द बढ़ाने वाले महातेजस्वी मेरे देवर लक्ष्मण भी स्वस्थ एवं सुखी हैं, यह जानकर मुझे बड़ा हर्ष हुआ है और यह शुभ संवाद मेरे लिये सौभाग्य का सूचक है।' 

‘यदि ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम सकुशल हैं तो वे प्रलयकाल में उठे हुए प्रलयंकर अग्नि के समान कुपित हो समुद्रों से घिरी हुई सारी पृथ्वी को दग्ध क्यों नहीं कर देते हैं? अथवा वे दोनों भाई देवताओं को भी दण्ड देने की शक्ति रखते हैं (तो भी अब तक जो चुप बैठे हैं, इसमें उनका नहीं मेरे ही भाग्य का दोष है)। मैं समझती हूँ कि अभी मेरे ही दुःखों का अन्त नहीं आया है। अच्छा, यह तो बताओ, पुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्रजी के मन में कोई व्यथा तो नहीं है? आगे जो कुछ करना है, उसे वे करते हैं या नहीं? वे संतप्त तो नहीं होते? उन्हें किसी प्रकार की दीनता या घबराहट तो नहीं है? वे काम करते-करते मोह के वशीभूत तो नहीं हो जाते? क्या श्रीरघुनाथजी पुरुषोचित कार्य (पुरुषार्थ) करते हैं ?' 

‘क्या शत्रुओं को संताप देने वाले श्रीरघुनाथजी मित्रों के प्रति मित्र भाव रखकर साम और दानरूप दो उपायों का ही अवलम्बन करते हैं? तथा शत्रुओं के प्रति उन्हें जीतने की इच्छा रखकर दान, भेद और दण्ड – इन तीन प्रकार के उपायों का ही आश्रय लेते हैं? क्या श्रीरघुनाथजी स्वयं प्रयत्नपूर्वक मित्रों का संग्रह करते हैं ? क्या उनके शत्रु भी शरणागत होकर अपनी रक्षा के लिये उनके पास आते हैं? क्या उन्होंने मित्रों का उपकार करके उन्हें अपने लिये कल्याणकारी बना लिया है? क्या वे कभी अपने मित्रों से भी उपकृत या पुरस्कृत होते हैं? क्या श्रीरघुनाथजी कभी देवताओं का भी कृपाप्रसाद चाहते है। उनकी कृपा के लिये प्रार्थना करते हैं? क्या वे पुरुषार्थ और दैव दोनों का आश्रय लेते हैं?' 

‘दुर्भाग्यवश मैं उनसे दूर हो गयी हूँ। इस कारण श्रीरघुनाथजी मुझ पर स्नेहहीन तो नहीं हो गये हैं? क्या वे मुझे कभी इस संकट से छुड़ायेंगे? वे सदा सुख भोगने के ही योग्य हैं, दुःख भोगने के योग्य कदापि नहीं हैं; परंतु इन दिनों दुःख-पर-दुःख उठाने के कारण श्रीरघुनाथजी अधिक खिन्न और शिथिल तो नहीं हो गये हैं? क्या उन्हें माता कौशल्या, कैकेयी, सुमित्रा तथा भरत का कुशल-समाचार बराबर मिलता रहता है? क्या सम्माननीय श्रीरघुनाथजी मेरे लिये होने वाले शोक से अधिक संतप्त हैं? वे मेरी ओर से अन्यमनस्क तो नहीं हो गये हैं? क्या श्रीरघुनाथजी मुझे इस संकट से उबारेंगे?' 

‘क्या भाई पर अनुराग रखने वाले भरतजी मेरे उद्धार के लिये मन्त्रियों द्वारा सुरक्षित भयंकर अक्षौहिणी सेना भेजेंगे? क्या श्रीमान् वानरराज सुग्रीव दाँत और नखों से प्रहार करने वाले वीर वानरों को साथ ले मुझे छुड़ाने के लिये यहाँ तक आने का कष्ट करेंगे ? क्या शूरवीर भैया लक्ष्मण, जो अनेक अस्त्रों के ज्ञाता हैं, अपने बाणों की वर्षा से राक्षसों का संहार करेंगे? क्या मैं रावण को उसके बन्धु बान्धवों सहित थोड़े ही दिनों में श्रीरघुनाथजी के द्वारा युद्ध में भयंकर अस्त्र-शस्त्रों से मारा गया देखूँगी? जैसे पानी सूख जाने पर धूप से कमल सूख जाता है, उसी प्रकार मेरे बिना शोक से दुःखी हुआ श्रीरघुनाथजी का वह सुवर्ण के समान कान्तिमान् और कमल के सदृश सुगन्धित मुख सुख तो नहीं गया है?' 

'धर्मपालन के उद्देश्य से अपने राज्य का त्याग करते और मुझे पैदल ही वन में लाते समय जिन्हें तनिक भी भय और शोक नहीं हुआ, वे श्रीरघुनाथजी इस संकट के समय हृदय में धैर्य तो धारण करते हैं न? हनुमान् ! उनके माता-पिता तथा अन्य कोई सम्बन्धी भी ऐसे नहीं हैं, जिन्हें उन का स्नेह मुझसे अधिक अथवा मेरे बराबर भी मिला हो। मैं तो तभी तक जीवित रहना चाहती हूँ, जब तक यहाँ आने के सम्बन्ध में अपने प्रियतम की प्रवृत्ति सुन रही हूँ।' 

देवी सीता वानरश्रेष्ठ हनुमान् के  प्रति इस प्रकार महान् अर्थ से युक्त मधुर वचन कहकर श्रीरामचन्द्रजी से सम्बन्ध रखने वाली उनकी मनोहर वाणी पुनः सुनने के लिये चुप हो गयीं। 

सीताजी का वचन सुनकर भयंकर पराक्रमी पवनकुमार हनुमान् मस्तक पर अञ्जलि बाँधे उन्हें इस प्रकार उत्तर देने लगे – माता ! कमलनयन भगवान् श्रीराम को यह पता ही नहीं है कि आप लङ्का में रह रही हैं। इसीलिये जैसे इन्द्र दानवों के यहाँ से शची को उठा ले गये, उस प्रकार वे शीघ्र यहाँ से आपको नहीं ले जा रहे हैं। जब मैं यहाँ से लौटकर जाऊँगा, तब मेरी बात सुनते ही श्रीरघुनाथजी वानर और भालुओं की विशाल सेना लेकर तुरंत वहाँसे चल देंगे। 

'ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम अपने बाण-समूहों द्वारा अक्षोभ्य महासागर को भी स्तब्ध करके उस पर सेतु बाँधकर लङ्कापुरी में पहुँच जायँगे और उसे राक्षसों से सूनी कर देंगे। उस समय श्रीराम के मार्ग में यदि मृत्यु, देवता अथवा बड़े-बड़े असुर भी विघ्न बनकर खड़े होंगे तो वे उन सबका भी संहार कर डालेंगे। माता ! आपको न देखने के कारण उत्पन्न हुए शोक से उनका हृदय भरा रहता है; अत: श्रीराम सिंह से पीड़ित हुए हाथी की भाँति क्षणभर को भी चैन नहीं पाते हैं। माता! मन्दर आदि पर्वत हमारे वासस्थान हैं और फल मूल भोजन। अतः मैं मन्दराचल, मलय, विन्ध्य, मेरु तथा दर्दुर पर्वत की और अपनी जीविका के साधन फल- मूल की सौगंध खाकर कहता हूँ कि आप शीघ्र ही श्रीराम का नवोदित पूर्ण चन्द्रमा के समान वह मनोहर मुख देखेंगी, जो सुन्दर नेत्र, बिम्बफल के समान लाल-लाल ओठ और सुन्दर कुण्डलों से अलंकृत एवं चित्ताकर्षक है।' 

'विदेहनन्दिनि ! ऐरावत की पीठ पर बैठे हुए देवराज इन्द्र के समान प्रस्रवण गिरि के शिखर पर विराजमान श्रीराम का आप शीघ्र दर्शन करेंगी। कोई भी रघुवंशी न तो मांस खाता है और न मधु का ही सेवन करता है; फिर भगवान् श्रीराम इन वस्तुओं का सेवन क्यों करते? वे सदा चार समय उपवास करके पाँचवें समय शास्त्रविहित जंगली फल-मूल और नीवार आदि भोजन करते हैं। श्रीरघुनाथजी का चित्त सदा आप में लगा रहता है, अत: उन्हें अपने शरीर पर चढ़े हुए डाँस, मच्छर, कीड़ों और सर्पों को हटाने की भी सुधि नहीं रहती।' 

'श्रीराम आपके प्रेम के वशीभूत हो सदा आपका ही ध्यान करते और निरन्तर आपके ही विरह- शोक में डूबे रहते हैं। आपको छोड़कर दूसरी कोई बात वे सोचते ही नहीं हैं। नरश्रेष्ठ! श्रीराम को सदा आपकी चिन्ता के कारण कभी नींद नहीं आती है। यदि कभी आँख लगी भी तो 'सीता- सीता' इस मधुर वाणी का उच्चारण करते हुए वे जल्दी ही जाग उठते हैं। किसी फल, फूल अथवा स्त्रियों के मन को लुभाने वाली दूसरी वस्तु को भी जब वे देखते हैं, तब लंबी साँस लेकर बारंबार 'हा प्रिये! हा प्रिये!' कहते हुए आपको पुकारने लगते हैं। माता! राजकुमार महात्मा श्रीराम आपके लिये सदा दुःखी रहते हैं, सीता-सीता कहकर आपकी ही रट लगाते हैं तथा उत्तम व्रत का पालन करते हुए आपकी ही प्राप्ति के प्रयत्न में लगे हुए हैं।' 

श्रीरामचन्द्रजी की चर्चा से सीता का अपना शोक तो दूर हो गया; किंतु श्रीराम के शोक की बात सुनकर वे पुनः उन्हीं के समान शोक में निमग्न हो गयीं। उस समय विदेहनन्दिनी सीता शरद् ऋतु आने पर मेघों की घटा और चन्द्रमा दोनों से युक्त (अन्धकार और प्रकाशपूर्ण) रात्रि के समान हर्ष और शोक से युक्त प्रतीत होती थीं। 

इति श्रीमद् राम कथा सुन्दरकाण्ड अध्याय-९ का भाग-२४(24) समाप्त ! 

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