भाग-२३(23) सीताजी के पूछने पर हनुमानजी का श्रीराम के शारीरिक चिह्नों और गुणों का वर्णन करना तथा नर-वानर की मित्रता का प्रसङ्ग सुनाकर सीताजी के मन में विश्वास उत्पन्न करना

 


वानरश्रेष्ठ हनुमानजी के मुख से श्रीरामचन्द्रजी की चर्चा सुनकर विदेहराजकुमारी सीता शान्तिपूर्वक मधुर वाणी में बोलीं - कपिवर! तुम्हारा श्रीरामचन्द्रजी के साथ सम्बन्ध कहाँ हुआ ? तुम लक्ष्मण को कैसे जानते हो? मनुष्यों और वानरों का यह मेल किस प्रकार सम्भव हुआ? वानर! श्रीराम और लक्ष्मण के जो चिह्न हैं, उनका फिर से वर्णन करो, जिससे मेरे मन में किसी प्रकार के शोक का समावेश न हो। मुझे बताओ भगवान् श्रीरघुनाथ और लक्ष्मण की आकृति कैसी है? उनका रूप किस तरह का है?  

विदेहराजकुमारी सीता के इस प्रकार पूछने पर पवनकुमार हनुमानजी ने श्रीरामचन्द्रजी के स्वरूप का यथावत् वर्णन आरम्भ किया - कमल के समान सुन्दर नेत्रों वाली विदेहराजकुमारी ! आप अपने पतिदेव श्रीराम के तथा देवर लक्ष्मणजी के शरीर के विषय में जानती हुई भी जो मुझसे पूछ रही हैं, यह मेरे लिये बड़े सौभाग्य की बात है। माता! श्रीराम और लक्ष्मण के जिन जिन चिह्नों को मैंने लक्ष्य किया है, उन्हें बताता हूँ। मुझसे सुनिये। 

‘हे माता ! श्रीरामचन्द्रजी के नेत्र प्रफुल्लकमल - दल के समान विशाल एवं सुन्दर हैं। मुख पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान मनोहर है। वे जन्मकाल से ही रूप और उदारता आदि गुणों से सम्पन्न हैं। वे तेज में सूर्य के समान, क्षमा में पृथ्वी के तुल्य, बुद्धि में बृहस्पति के सदृश और यश में इन्द्र के समान हैं। वे सम्पूर्ण जीव-जगत के तथा स्वजनों के भी रक्षक हैं। शत्रुओं को संताप देने वाले श्रीराम अपने सदाचार और धर्म की रक्षा करते हैं। 

'माते! श्रीरामचन्द्रजी जगत के चारों वर्णों की रक्षा करते हैं। लोक में धर्म की मर्यादाओं को बाँधकर उनका पालन करने और कराने वाले भी वे ही हैं। सर्वत्र अत्यन्त भक्तिभाव से उनकी पूजा होती है। ये कान्तिमान् एवं परम प्रकाशस्वरूप हैं, ब्रह्मचर्य व्रत के पालन में लगे रहते हैं, साधु पुरुषों का उपकार मानते और आचरणों द्वारा सत्कर्मों के प्रचार का ढंग जानते हैं। वे राजनीति में पूर्ण शिक्षित, ब्राह्मणों के उपासक, ज्ञानवान्, शीलवान्, विनम्र तथा शत्रुओं को संताप देने में समर्थ हैं। 

'उन्हें यजुर्वेद की भी अच्छी शिक्षा मिली है। वेदवेत्ता विद्वानों ने उनका बड़ा सम्मान किया है। वे चारों वेद, धनुर्वेद और छहों वेदाङ्गों के भी परिनिष्ठित विद्वान् हैं। उनके कंधे मोटे, भुजाएँ बड़ी-बड़ी, गला शङ्ख के समान और मुख सुन्दर है। गले की हँसली मांस से ढकी हुई है। तथा नेत्रों में कुछ-कुछ लालिमा है। वे लोगों में 'श्रीराम' के नाम से प्रसिद्ध हैं। उनका स्वर दुन्दुभि के समान गम्भीर और शरीर का रंग सुन्दर एवं चिकना है। उनका प्रताप बहुत बढ़ा-चढ़ा है। उनके सभी अङ्ग सुडौल और बराबर हैं। उनकी कान्ति स्याम है।' 

‘उनके तीन अङ्ग (वक्ष:स्थल, कलाई और मुट्ठी) स्थिर (सुदृढ़ हैं। भौंहें, भुजाएँ और मेद्र – ये तीन अङ्ग लंबे हैं। केशों का अग्रभाग और घुटने - ये तीन समान बराबर हैं। वक्षःस्थल, नाभि के किनारे का भाग और उदर - ये तीन उभरे हुए हैं। नेत्रों के कोने, नख और हाथ-पैर के तलवे – ये तीन लाल हैं। शिन के अग्रभाग, दोनों पैरों की रेखाएँ और सिर के बाल - ये तीन चिकने हैं तथा स्वर, चाल और नाभि ये तीन गम्भीर हैं। उनके उदर तथा गले में तीन रेखाएँ हैं। तलवों के मध्यभाग, पैरों की रेखाएँ ये धँसे हुए हैं। गला, पीठ तथा दोनों पिण्डलियाँ – ये चार अङ्ग छोटे हैं। मस्तक में तीन भँवरें हैं। पैरों के अँगूठे के नीचे तथा ललाट में चार-चार रेखाएँ हैं। वे चार हाथ ऊँचे हैं। उनके कपोल, भुजाएँ, जाँघें और घुटने - ये चार अङ्ग बराबर हैं।' 

'श्रीरामचन्द्रजी सत्यधर्म के अनुष्ठान में संलग्न, श्रीसम्पन्न, न्यायसङ्गत धन का संग्रह और प्रजा पर अनुग्रह करने में तत्पर, देश और काल के विभाग को समझने वाले तथा सब लोगों से प्रिय वचन बोलने वाले हैं। उनके भाई लक्ष्मण भी बड़े तेजस्वी हैं। अनुराग, रूप और सद्गुणों की दृष्टि से भी वे श्रीरामचन्द्रजी के ही समान हैं। उन दोनों भाइयों में अन्तर इतना ही है कि लक्ष्मण के शरीर की कान्ति सुवर्ण के समान गौर है और महायशस्वी श्रीरामचन्द्रजी का विग्रह श्यामसुन्दर है। वे दोनों नरश्रेष्ठ आपके दर्शन के लिये उत्कण्ठित हो सारी पृथ्वी पर आपकी ही खोज करते हुए हम लोगों से मिले थे।' 

‘आपको ही ढूँढ़ने के लिये पृथ्वी पर विचरते हुए उन दोनों भाइयों ने वानरराज सुग्रीव का साक्षात्कार किया, जो अपने बड़े भाई के द्वारा राज्य से उतार दिये गये थे। ऋष्यमूक पर्वत के मूलभाग में जो बहुत से वृक्षों द्वारा घिरा हुआ है, भाई के भय से पीड़ित हो बैठे हुए प्रियदर्शन सुग्रीव से वे दोनों भाई मिले। उन दिनों जिन्हें बड़े भाई ने राज्य से उतार दिया था, उन सत्यप्रतिज्ञ वानरराज सुग्रीव की सेवा में हम सब लोग रहा करते थे।' 

‘शरीर पर वल्कलवस्त्र तथा हाथ में धनुष धारण किये वे दोनों भाई जब ऋष्यमूक पर्वत के रमणीय प्रदेश में आये, तब धनुष धारण करने वाले उन दोनों नरश्रेष्ठ वीरों को वहाँ उपस्थित देख वानरशिरोमणि सुग्रीव भय से घबरा उठे और उछलकर उस पर्वत के उच्चतम शिखर पर जा चढ़े। उस शिखर पर बैठने के पश्चात् वानरराज सुग्रीव ने मुझे ही शीघ्रतापूर्वक उन दोनों बन्धुओं के पास भेजा।' 

‘सुग्रीव की आज्ञा से उन प्रभावशाली रूपवान् तथा शुभलक्षण सम्पन्न दोनों पुरुषसिंह वीरों की सेवा में मैं हाथ जोड़कर उपस्थित हुआ। मुझसे यथार्थ बातें जानकर उन दोनों को बड़ी प्रसन्नता हुई। फिर मैं अपनी पीठ पर चढ़ाकर उन दोनों पुरुषोत्तम बन्धुओं को उस स्थान पर ले गया (जहाँ वानरराज सुग्रीव थे)। वहाँ महात्मा सुग्रीव को मैंने इन दोनों बन्धुओं का यथार्थ परिचय दिया। तत्पश्चात् श्रीराम और सुग्रीव ने परस्पर बातें कीं, इससे उन दोनों में बड़ा प्रेम हो गया। वहाँ उन दोनों यशस्वी वानरेश्वर और नरेश्वरों ने अपने ऊपर बीती हुई पहले की घटनाएँ सुनायीं तथा दोनों ने दोनों को आश्वासन दिया। 

‘उस समय श्रीरघुनाथजी ने स्त्री के लिये अपने महातेजस्वी भाई वाली द्वारा घर से निकाले हुए सुग्रीव को सान्त्वना दी। तत्पश्चात् अनायास ही महान् कर्म करने वाले भगवान् श्रीराम को आपके वियोग से जो शोक हो रहा था, लक्ष्मण ने वानरराज सुग्रीव को सुनाया। लक्ष्मणजी की कही हुई वह बात सुनकर वानरराज सुग्रीव उस समय ग्रहग्रस्त सूर्य के समान अत्यन्त कान्तिहीन हो गये। तदनन्तर वानर-यूथपतियों ने आपके शरीर पर शोभा पाने वाले उन सब आभूषणों को ले आकर बड़ी प्रसन्नता के साथ श्रीरामचन्द्रजी को दिखाया, जिन्हें आपने उस समय पृथ्वी पर गिराया था, जब कि राक्षस आपको हरकर लिये जा रहा था।' 

'वानरों ने आभूषण तो दिखाये, किंतु उन्हें आपका पता कुछ भी मालूम नहीं था। आपके द्वारा गिराये जाने पर वे सब आभूषण झनझन की आवाज के साथ जमीन पर गिरे और बिखर गये थे। मैं ही उन सबको बटोर कर ले आया था। उस दिन जब वे गहने श्रीरामचन्द्रजी को दिये गये, उस समय वे उन्हें अपनी गोद में लेकर अचेत-से हो गये थे। उन दर्शनीय आभूषणों को छाती से लगाकर देवतुल्य आभा वाले भगवान् श्रीराम ने बहुत विलाप किया। उन आभूषणों को बारंबार देखते रोते और तिलमिला उठते थे। उस समय दशरथनन्दन श्रीराम की शोकाग्नि प्रज्वलित हो उठी। उस दु:ख से आतुर हो वे महात्मा रघुवीर बहुत देर तक मूर्च्छित अवस्था में पड़े रहे। तब मैंने नाना प्रकार के सान्त्वनापूर्ण वचन कहकर बड़ी कठिनाई से उन्हें उठाया। 

‘लक्ष्मण सहित श्रीरघुनाथजी ने उन बहुमूल्य आभूषणों को बारंबार देखा और दिखाया। फिर वे सब सुग्रीव को दे दिये। आर्ये! आपको न देख पाने के कारण श्रीरघुनाथजी को बड़ा दुःख और संताप हो रहा है। जैसे ज्वालामुखी पर्वत जलती हुई बड़ी भारी आग से सदा तपता रहता है, उसी प्रकार वे आपकी विरहाग्नि से जल रहे हैं। आपके लिये महात्मा श्रीरघुनाथजी को अनिद्रा (निरन्तर जागरण), शोक और चिन्ता – ये तीनों उसी प्रकार संताप देते हैं, जैसे आहवनीय आदि त्रिविध अग्नियाँ अग्निशाला को तपाती रहती हैं।' 

‘माता ! आपको न देख पाने का शोक श्रीरघुनाथजी को उसी प्रकार विचलित कर देता है, जैसे भारी भूकम्प से महान् पर्वत भी हिल जाता है। माता ! आपको न देखने के कारण रमणीय काननों, नदियों और झरनों के पास विचरने पर भी श्रीराम को सुख नहीं मिलता है। पुरुषसिंह भगवान् श्रीराम रावण को उसके मित्र और बन्धु बान्धवों सहित मारकर शीघ्र ही आपसे मिलेंगे। उन दिनों श्रीराम और सुग्रीव जब मित्रभाव से मिले, तब दोनों ने एक-दूसरे की सहायता के लिये प्रतिज्ञा की। श्रीराम ने वाली को मारने का और सुग्रीव ने आपकी खोज कराने का वचन दिया। इसके बाद उन दोनों वीर राजकुमारों ने किष्किन्धा में जाकर वानरराज वाली को युद्ध में मार गिराया।'  

'युद्ध में वेगपूर्वक वाली को मारकर श्रीराम ने सुग्रीव को समस्त भालुओं और वानरों का राजा बना दिया। श्रीराम और सुग्रीव में इस प्रकार मित्रता हुई है। मैं उन दोनों का दूत बनकर यहाँ आया हूँ। आप मुझे हनुमान् समझें। अपना राज्य पाने के अनन्तर सुग्रीव ने अपने आश्रय में रहने वाले बड़े-बड़े बलवान् वानरों को बुलाया और उन्हें आपकी खोज के लिये दसों दिशाओं में भेजा। वानरराज सुग्रीव की आज्ञा पाकर गिरिराज के समान विशालकाय महाबली वानर पृथ्वी पर सब ओर चल दिये। सुग्रीव की आज्ञा से भयभीत हो हम तथा अन्य वानर आपकी खोज करते हुए समस्त भूमण्डल में विचर रहे हैं।'

'वाली के शोभाशाली पुत्र महाबली कपिश्रेष्ठ अंगद वानरों की एक तिहाई सेना साथ लेकर आपकी खोज में निकले थे (उन्हीं के दल में मैं भी था )। पर्वतश्रेष्ठ विन्ध्य में आकर खो जाने के कारण हमने वहाँ बड़ा कष्ट उठाया और वहीं हमारे बहुत दिन बीत गये। अब हमें कार्य सिद्धि की कोई आशा नहीं रह गयी और निश्चित अवधि से भी अधिक समय बिता देने के कारण वानरराज सुग्रीव का भी भय था, इसलिये हम सब लोग अपने प्राण त्याग देने के लिये उद्यत हो गये।' 

‘पर्वत के दुर्गम स्थानों में, नदियों के तटों पर और झरनों के आस-पास की सारी भूमि छान डाली तो भी जब हमें आपके स्थान का पता न चला, तब हम प्राण त्याग देने को तैयार हो गये। मरणान्त उपवास का निश्चय करके हम सब के सब उस पर्वत के शिखर पर बैठ गये। उस समय समस्त वानर- शिरोमणियों को प्राण त्याग देने के लिये बैठे देख कुमार अङ्गद अत्यन्त शोक के समुद्र में डूब गये और विलाप करने लगे। माता ! आपका पता न लगने, वाली के मारे जाने, हम लोगों के मरणान्त उपवास करने तथा जटायु के मरने की बात पर विचार करके कुमार अङ्गद को बड़ा दुःख हुआ था।' 

'स्वामी के आज्ञापालन से निराश होकर हम मरना ही चाहते थे कि दैववश हमारा कार्य सिद्ध करने के लिये गृधराज जटायु के बड़े भाई सम्पाति, जो स्वयं भी गीधों के राजा और महान् बलवान् पक्षी हैं, वहाँ आ पहुँचे। हमारे मुँह से अपने भाई के वध की चर्चा सुनकर वे कुपित हो उठे और बोले - "वानरशिरोमणियो ! बताओ, मेरे छोटे भाई जटायु का वध किसने किया है? वह कहाँ मारा गया है? यह सब वृत्तान्त मैं तुम लोगों से सुनना चाहता हूँ।" 

‘तब अंगद ने जनस्थान में आपकी रक्षा के उद्देश्य से जूझते समय जटायु का उस भयानक रूपधारी राक्षस के द्वारा जो महान् वध किया गया था, वह सब प्रसंग ज्यों-का-त्यों कह सुनाया। जटायु के वध का वृत्तान्त सुनकर अरुण पुत्र सम्पाति को बड़ा दुःख हुआ। माता ! उन्होंने ही हमें बताया कि आप रावण के घर में निवास कर रही हैं। सम्पाति का वह वचन वानरों के लिये बड़ा हर्षवर्धक था। उसे सुनकर उन्हीं के भेजने से अङ्गद आदि हम सभी वानर आपके दर्शन की आशा से उत्साहित हो विन्ध्यपर्वत से उठकर समुद्र के उत्तम तट पर आये। इस प्रकार अङ्गद आदि सभी हृष्ट-पुष्ट वानर समुद्र के किनारे आ पहुँचे।' 

‘आपके दर्शन के लिये उत्सुक होने पर भी सामने अपार समुद्र को देखकर सब वानर फिर भयानक चिन्ता में पड़ गये। समुद्र को देखकर वानर सेना कष्ट में पड़ गयी है, यह जानकर मैं उन सबके तीव्र भय को दूर करता हुआ सौ योजन समुद्र को लाँघकर यहाँ आ गया। राक्षसों से भरी हुई लङ्का में मैंने रात में ही प्रवेश किया है। यहाँ आकर रावण को देखा है और शोक से पीड़ित हुई आपका भी दर्शन किया है। सतीशिरोमणे! यह सारा वृत्तान्त मैंने ठीक-ठीक आपके सामने रखा है। हे माता ! मैं दशरथनन्दन श्रीराम का दूत हूँ, अतः आप मुझसे बात कीजिये।' 

'मैंने श्रीरामचन्द्रजी के कार्य की सिद्धि के लिये ही यह सारा उद्योग किया है और आपके दर्शन के निमित्त मैं यहाँ आया हूँ। माते! आप मुझे सुग्रीव का मन्त्री तथा वायुदेवता का पुत्र हनुमान् समझें। आपके पतिदेव समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी सकुशल हैं तथा बड़े भाई की सेवा में संलग्न रहने वाले शुभलक्षण लक्ष्मण भी प्रसन्न हैं। वे आपके उन पराक्रमी पतिदेव के हित साधन में ही तत्पर रहते हैं। मैं सुग्रीव की आज्ञा से अकेला ही यहाँ आया हूँ। इच्छानुसार रूप धारण करने की शक्ति रखता हूँ। आपका पता लगाने की इच्छा से मैंने बिना किसी सहायक के अकेले ही घूम-फिरकर इस दक्षिण दिशा का अनुसंधान किया है।' 

‘आपके विनाश की सम्भावना से जो निरन्तर शोक में डूबे रहते हैं, उन वानर सैनिकों को यह बताकर कि आप मिल गयीं, मैं उनका संताप दूर करूँगा। यह मेरे लिये बड़े हर्ष की बात होगी। माता ! मेरा समुद्र को लाँघकर यहाँ तक आना व्यर्थ नहीं हुआ। सबसे पहले आपके दर्शन का यह यश मुझे ही मिलेगा। यह मेरे लिये सौभाग्य की बात है। महापराक्रमी श्रीरामचन्द्रजी राक्षसराज रावण को उसके पुत्र और बन्धु बान्धवों सहित मारकर शीघ्र ही आपसे आ मिलेंगे। 

'माता ! पर्वतों में माल्यवान् नाम से प्रसिद्ध एक उत्तम पर्वत है। वहाँ केसरी नामक वानर निवास करते थे। एक दिन वे वहाँ से गोकर्ण पर्वत पर गये। महाकपि केसरी मेरे पिता हैं। उन्होंने समुद्र के तट पर विद्यमान उस पवित्र गोकर्ण-तीर्थ में देवर्षियों की आज्ञा से शम्बसादन नामक दैत्य का संहार किया था। मिथिलेशकुमारी ! उन्हीं कपिराज केसरी की स्त्री के गर्भ से वायुदेवता के द्वारा मेरा जन्म हुआ है। मैं लोक में अपने ही कर्मद्वारा 'हनुमान्' नाम से विख्यात हूँ। आपको विश्वास दिलाने के लिये मैंने आपके स्वामी के गुणों का वर्णन किया है। माता ! श्रीरघुनाथजी शीघ्र ही आपको यहाँ से ले चलेंगे। यह निश्चित बात है।' 

इस प्रकार युक्तियुक्त एवं विश्वसनीय कारणों तथा पहचान के रूप में बताये गये श्रीराम और लक्ष्मण के शारीरिक चिह्नों द्वारा हनुमानजी ने शोक से दुर्बल हुई सीता को अपना विश्वास दिलाया। तब उन्होंने हनुमानजी को श्रीराम का दूत समझा। उस समय जनकनन्दिनी सीता को अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ। उस महान् हर्ष के कारण वे कुटिल बरौनियों वाले दोनों नेत्रों से आनन्द के आँसू बहाने लगीं। उस अवसर पर विशाललोचना सीता का मनोहर मुख, जो लाल, सफेद और बड़े-बड़े नेत्रों से युक्त था, राहु ग्रहण से मुक्त हुए चन्द्रमा के समान शोभा पा रहा था।

अब वे हनुमान् को वास्तविक वानर मानने लगीं। इसके विपरीत मायामय रूपधारी राक्षस नहीं। तदनन्तर हनुमानजी ने प्रियदर्शना सीता से फिर कहा – मिथिलेशकुमारी! इस प्रकार आपने जो कुछ पूछा था, वह सब मैंने बता दिया। अब आप धैर्य धारण करें। बताइये, मैं आपकी कैसी और क्या सेवा करूँ। इस समय आपकी रुचि क्या है, आज्ञा हो तो अब मैं लौट जाऊँ। महर्षियों की प्रेरणा से कपिवर केसरी द्वारा युद्ध में शम्बसादन नामक असुर के मारे जाने पर मैंने पवनदेवता के द्वारा जन्म ग्रहण किया। अतः माता ! मैं उन वायुदेवता के समान ही प्रभावशाली वानर हूँ। 

इति श्रीमद् राम कथा सुन्दरकाण्ड अध्याय-९ का भाग-२३(23) समाप्त ! 

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