तब शाखा के भीतर छिपे हुए, विद्युत्पुञ्ज के समान अत्यन्त पिंगल वर्ण वाले और लाल वस्त्रधारी हनुमानजी पर उनकी दृष्टि पड़ी। फिर तो उनका चित्त चञ्चल हो उठा। उन्होंने देखा, फूले हुए अशोक के समान अरुण कान्ति से प्रकाशित एक विनीत और प्रियवादी वानर डालियों के बीच में बैठा है। उसके नेत्र तपाये हुए सुवर्ण के समान चमक रहे हैं।
वानरश्रेष्ठ हनुमानजी को देखकर मिथिलेशकुमारी को बड़ा आश्चर्य हुआ। वे मन-ही-मन विनीतभाव से बैठे हुए सोचने लगीं - अहो! वानर योनि का यह जीव तो बड़ा ही भयंकर है। इसे पकड़ना बहुत ही कठिन है। इसकी ओर तो आँख उठाकर देखने का भी साहस नहीं होता।
ऐसा विचारकर वे पुनः भय से मूर्च्छित सी हो गयीं। भय से मोहित हुई भामिनी सीता अत्यन्त करुणा जनक स्वरमें 'हा रघुवीर ! हा लक्ष्मण!' ऐसा कहकर दु:ख से आतुर हो अत्यन्त विलाप करने लगीं। उस समय सीता मन्द स्वर में सहसा रो पड़ीं।
इतने ही में उन्होंने देखा, वह श्रेष्ठ वानर बड़ी विनय के साथ निकट आ बैठा है। तब भामिनी मिथिलेशकुमारी ने सोचा - यह कोई स्वप्न तो नहीं है।
उधर दृष्टिपात करते हुए उन्होंने वानरराज सुग्रीव के आज्ञापालक विशाल और टेढ़े मुख वाले परम आदरणीय, बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, वानर प्रवर पवनपुत्र हनुमानजी को देखा। उन्हें देखते ही सीताजी अत्यन्त व्यथित होकर ऐसी दशा को पहुँच गयीं, मानो उनके प्राण निकल गये हों।
फिर बड़ी देर में चेत होने पर विशाललोचना विदेह - राजकुमारी ने इस प्रकार विचार किया - आज मैंने यह बड़ा बुरा स्वप्न देखा है। सपने में वानर को देखना शास्त्रों ने निषिद्ध बताया है। मेरी भगवान् से प्रार्थना है कि श्रीरघुनाथजी, लक्ष्मण और मेरे पिता जनक का मंगल हो (उन पर इस दुःस्वप्न का प्रभाव न पड़े)। परंतु यह स्वप्न तो हो नहीं सकता; क्योंकि शोक और दु:ख से पीड़ित रहने के कारण मुझे कभी नींद आती ही नहीं है (नींद उसे आती है, जिसे सुख हो)। मुझे तो उन पूर्णचन्द्र के समान मुख वाले श्रीरघुनाथजी से बिछुड़ जाने के कारण अब सुख सुलभ ही नहीं है।
‘मैं बुद्धि से सर्वदा ‘श्रीराम! श्रीराम !' ऐसा चिन्तन करके वाणी द्वारा भी श्रीराम नाम का ही उच्चारण करती रहती हूँ; अत: उस विचार के अनुरूप वैसे ही अर्थवाली यह कथा देख और सुन रही हूँ।
'मेरा हृदय सर्वदा श्रीरघुनाथ में ही लगा हुआ है; अतः श्रीराम-दर्शन की लालसा से अत्यन्त पीड़ित हो सदा उन्हीं का चिन्तन करती हुई उन्हीं को देखती और उन्हीं की कथा सुनती हूँ। सोचती हूँ कि सम्भव है यह मेरे मन की ही कोई भावना हो तथापि बुद्धि से भी तर्क-वितर्क करती हूँ कि यह जो कुछ दिखायी देता है, इसका क्या कारण है? मनोरथ या मन की भावना का कोई स्थूल रूप नहीं होता; परंतु इस वानर का रूप तो स्पष्ट दिखायी दे रहा है और यह मुझसे बातचीत भी करता है। मैं वाणी के स्वामी बृहस्पति को, वज्रधारी इन्द्र को, स्वयम्भू ब्रह्माजी को तथा वाणी के अधिष्ठातृ देवता अग्नि को भी नमस्कार करती हूँ। इस वनवासी वानर ने मेरे सामने यह जो कुछ कहा है, वह सब सत्य हो, उसमें कुछ भी अन्यथा न हो।'
उधर मूँगे के समान लाल मुख वाले महातेजस्वी पवनकुमार हनुमानजी ने उस अशोक वृक्ष से नीचे उतरकर माथे पर अञ्जलि बाँध ली और विनीतभाव से दीनतापूर्वक निकट आकर प्रणाम करने के अनन्तर सीताजी से मधुर वाणी में कहा - प्रफुल्ल कमलदल के समान विशाल नेत्रों वाली देवी ! यह मलिन रेशमी पीताम्बर धारण किये आप कौन हैं? अनिन्दिते! इस वृक्ष की शाखा का सहारा लिये आप यहाँ क्यों खड़ी हैं? कमल के पत्तों से झरते हुए जल-बिन्दुओं के समान आपकी आँखों से ये शोक के आँसू क्यों गिर रहे हैं।
‘शोभने! आप देवता, असुर, नाग, गन्धर्व, राक्षस, यक्ष, किन्नर, रुद्र, मरुद्गण अथवा वसुओं में से कौन हैं? इनमें से किसकी कन्या अथवा पत्नी हैं? सुमुखि ! वरारोहे! मुझे तो आप कोई देवता - सी जान पड़ती हैं। क्या आप चन्द्रमा से बिछुड़कर देवलोक से गिरी हुई नक्षत्रों में श्रेष्ठ और गुणों में सबसे बड़ी चढ़ी रोहिणी देवी हैं? अथवा कजरारे नेत्रों वाली देवी ! आप कोप या मोह से अपने पति वशिष्ठजी को कुपित करके यहाँ आयी हुई कल्याण स्वरूपा सती शिरोमणि अरुन्धती तो नहीं हैं।'
‘सुमध्यमे! आपका पुत्र, पिता, भाई अथवा पति कौन इस लोक से चलकर परलोक वासी हो गया है, जिसके लिये आप शोक करती हैं। रोने, लम्बी साँस खींचने तथा पृथ्वी का स्पर्श करने के कारण मैं आपको देवी नहीं मानता। आप बारम्बार किसी राजा का नाम ले रही हैं तथा आपके चिह्न और लक्षण जैसे दिखायी देते हैं, उन सब पर दृष्टिपात करने से यही अनुमान होता है कि आप किसी राजा की महारानी तथा किसी नरेश की कन्या हैं।'
‘रावण जनस्थान से जिन्हें बलपूर्वक हर लाया था, वे सीताजी ही यदि आप हों तो आपका कल्याण हो। आप ठीक-ठीक मुझे बताइये। मैं आपके विषय में जानना चाहता हूँ। दु:ख के कारण आप में जैसी दीनता आ गयी है, जैसा आपका अलौकिक रूप है तथा जैसा तपस्विनी का-सा वेष है, इन सबके द्वारा निश्चय ही आप श्रीरामचन्द्रजी की महारानी जान पड़ती हैं।'
हनुमानजी की बात सुनकर विदेहनन्दिनी सीता श्रीरामचन्द्रजी की चर्चा से बहुत प्रसन्न थीं; अत: वृक्ष का सहारा लिये खड़े हुए उन पवनकुमार से इस प्रकार बोलीं - कपिवर! जो भूमण्डल के श्रेष्ठ राजाओं में प्रधान थे, जिनकी सर्वत्र प्रसिद्धि थी तथा जो शत्रुओं की सेना का संहार करने में समर्थ थे, उन महाराज दशरथ की मैं पुत्रवधू हूँ, विदेहराज महात्मा जनक की पुत्री हूँ और परम बुद्धिमान् भगवान् श्रीराम की धर्मपत्नी हूँ। मेरा नाम सीता है। अयोध्या में श्रीरघुनाथजी के अन्तः पुर में बारह वर्षों तक मैं सब प्रकार के मानवीय भोग भोगती रही और मेरी सारी अभिलाषाएँ सदैव पूर्ण होती रहीं।
‘तदनन्तर तेरहवें वर्ष में महाराज दशरथ ने राजगुरु वशिष्ठजी के साथ इक्ष्वाकु कुलभूषण भगवान् श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारी आरम्भ की। जब वे श्रीरघुनाथजी के अभिषेक के लिये आवश्यक सामग्री का संग्रह कर रहे थे, उस समय माता कैकेयी जो उनकी भार्या थी ने पति से इस प्रकार कहा – "अब न तो मैं जलपान करूँगी और न प्रतिदिन का भोजन ही ग्रहण करूंगी। यदि श्रीराम का राज्याभिषेक हुआ तो यही मेरे जीवन का अन्त होगा। नृपश्रेष्ठ! आपने प्रसन्नतापूर्वक मुझे जो वचन दिया है, उसे यदि असत्य नहीं करना है तो श्रीराम वन को चले जायँ।" 'महाराज दशरथ बड़े सत्यवादी थे। उन्होंने माता कैकेयी को दो वर देने के लिये कहा था। उस वरदान का स्मरण करके माता कैकेयी के क्रूर एवं अप्रिय वचन को सुनकर वे मूर्च्छित हो गये।'
‘तदनन्तर सत्यधर्म में स्थित हुए बूढ़े महाराज ने अपने यशस्वी ज्येष्ठ पुत्र श्रीरघुनाथजी से भरत के लिये राज्य माँगा। श्रीरघुनाथजी को पिता के वचन राज्याभिषेक से भी बढ़कर प्रिय थे। इसलिये उन्होंने पहले उन वचनों को मन से ग्रहण किया, फिर वाणी से भी स्वीकार कर लिया। सत्य-पराक्रमी भगवान् श्रीराम केवल देते हैं, लेते नहीं। वे सदा सत्य बोलते हैं, अपने प्राणों की रक्षा के लिये भी कभी झूठ नहीं बोल सकते। उन महायशस्वी श्रीरघुनाथजी ने बहुमूल्य उत्तरीय वस्त्र उतार दिये और मन से राज्य का त्याग करके मुझे अपनी माता के हवाले कर दिया।'
‘किंतु मैं तुरंत ही उनके आगे-आगे वन की ओर चल दी ; क्योंकि उनके बिना मुझे स्वर्ग में रहना अच्छा नहीं लगता। अपने सुहृदों को आनन्द देने वाले सुमित्राकुमार महाभाग लक्ष्मण भी अपने बड़े भाई का अनुसरण करने के लिये उनसे भी पहले कुश तथा चीर-वस्त्र धारण करके तैयार हो गये। इस प्रकार हम तीनों ने अपने स्वामी महाराज दशरथ की आज्ञा को अधिक आदर देकर दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रत का पालन करते हुए उस सघन वन में प्रवेश किया, जिसे पहले कभी नहीं देखा था। वहाँ दण्डकारण्य में रहते समय उन अमिततेजस्वी भगवान् श्रीरघुनाथजी की भार्या मुझ सीता को दुरात्मा राक्षस रावण यहाँ हर लाया है। उसने अनुग्रहपूर्वक मेरे जीवन-धारण के लिये दो मास की अवधि निश्चित कर दी है। उन दो महीनों के बाद मुझे अपने प्राणों का परित्याग करना पड़ेगा।'
दुःख-पर-दुःख उठाने के कारण पीड़ित हुई सीता का उपर्युक्त वचन सुनकर वानरशिरोमणि हनुमानजी ने उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा – माता! मैं श्रीरामचन्द्रजी का दूत हूँ और आपके लिये उनका संदेश लेकर आया हूँ। विदेह्नन्दिनी! श्रीरामचन्द्रजी सकुशल हैं और उन्होंने आपका कुशल- समाचार पूछा है। माता ! जिन्हें ब्रह्मास्त्र और वेदों का भी पूर्ण ज्ञान है, वे वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ दशरथनन्दन श्रीराम स्वयं सकुशल रहकर आपकी भी कुशल पूछ रहे हैं। आपके पति के अनुचर तथा प्रिय महातेजस्वी लक्ष्मण ने भी शोक से संतप्त हो आपके चरणों में मस्तक झुकाकर प्रणाम कहलाया है।
पुरुषसिंह श्रीराम और लक्ष्मण का समाचार सुनकर देवी सीता के सम्पूर्ण अंगों में हर्षजनित रोमांच हो आया और वे हनुमानजी से बोलीं - यदि मनुष्य जीवित रहे तो उसे सौ वर्ष बाद भी आनन्द प्राप्त होता ही है, यह लौकिक कहावत आज मुझे बिलकुल सत्य एवं कल्याणमयी जान पड़ती है।
सीता और हनुमान के इस मिलाप (परस्पर दर्शन ) - से दोनों को ही अद्भुत प्रसन्नता प्राप्त हुई। वे दोनों विश्वस्त होकर एक-दूसरे से वार्तालाप करने लगे।
शोकसंतप्त सीता की वे बातें सुनकर पवनकुमार हनुमानजी उनके कुछ निकट चले गये। हनुमानजी ज्यों-ज्यों निकट आते, त्यों-ही-त्यों सीता को यह शङ्का होती कि यह कहीं रावण न हो।
ऐसा विचार आते ही वे मन-ही-मन कहने लगीं - अहो ! धिक्कार है, जो इसके सामने मैंने अपने मन की बात कह दी। यह दूसरा रूप धारण करके आया हुआ वह रावण ही है।
फिर तो निर्दोष अङ्गों वाली सीता उस अशोक वृक्ष की शाखा को छोड़ शोक से कातर हो वहीं जमीन पर बैठ गयीं।
तत्पश्चात् महाबाहु हनुमान् ने जनकनन्दिनी सीता के चरणों में प्रणाम किया, किंतु वे भयभीत होने के कारण फिर उनकी ओर देख न सकीं।
वानर हनुमान् को बारम्बार वन्दना करते देख चन्द्रमुखी सीता लम्बी साँस खींचकर उनसे मधुर वाणी में बोलीं – यदि तुम स्वयं मायावी रावण हो और मायामय शरीर में प्रवेश करके फिर मुझे कष्ट दे रहे हो तो यह तुम्हारे लिये अच्छी बात नहीं है। जिसे मैंने जनस्थान में देखा था तथा जो अपने यथार्थ रूप को छोड़कर संन्यासी का रूप धारण करके आया था, तुम वही रावण हो। इच्छानुसार रूप धारण करने वाले निशाचर! मैं उपवास करते-करते दुबली हो गयी हूँ और मन-ही-मन दु:खी रहती हूँ। इतने पर भी जो तुम फिर मुझे संताप दे रहे हो, यह तुम्हारे लिये अच्छी बात नहीं है। अथवा जिस बात की मेरे मनमें शङ्का हो रही है, वह न भी हो; क्योंकि तुम्हें देखने से मेरे मन में प्रसन्नता हुई है।
‘वानरश्रेष्ठ! सचमुच ही यदि तुम भगवान् श्रीराम के दूत हो तो तुम्हारा कल्याण हो। मैं तुमसे उनकी बातें पूछती हूँ; क्योंकि श्रीराम की चर्चा मुझे बहुत ही प्रिय है। वानर! मेरे प्रियतम श्रीराम के गुणों का जो वर्णन थोड़ी देर पहले जो तुमने मुझे सुनाया था उसी प्रकार का वर्णन पुनः करो। सौम्य ! जैसे जल का वेग नदी के तट को हर लेता है, उसी प्रकार तुम श्रीरघुनाथजी की चर्चा से मेरे चित्त को चुराये लेते हो। अहो! यह स्वप्न कैसा सुखद हुआ? जिससे यहाँ चिरकाल से हरकर लायी गयी मैं आज भगवान् श्रीराम के भेजे हुए दूत वानर को देख रही हूँ।'
‘यदि मैं लक्ष्मणसहित वीरवर श्रीरघुनाथजी को स्वप्न में भी देख लिया करूँ तो मुझे इतना कष्ट न हो; परंतु स्वप्न भी मुझसे डाह करता है। मैं इसे स्वप्न नहीं समझती; क्योंकि स्वप्न में वानर को देख लेने पर किसी का अभ्युदय नहीं हो सकता और मैंने यहाँ अभ्युदय प्राप्त किया है (अभ्युदयकाल में जैसी प्रसन्नता होती है, वैसी ही प्रसन्नता मेरे मन में छा रही है)। अथवा यह मेरे चित्त का मोह तो नहीं है। वात विकार से होने वाला भ्रम तो नहीं है। उन्माद का विकार तो नहीं उमड़ आया अथवा यह मृगतृष्णा तो नहीं है। अथवा यह उन्मादजनित विकार नहीं है। उन्माद के समान लक्षणवाला मोह भी नहीं है; क्योंकि मैं अपने- आपको देख और समझ रही हूँ तथा इस वानर को भी ठीक-ठीक देखती और समझती हूँ (उन्माद आदि की अवस्थाओं में इस तरह ठीक-ठीक ज्ञान होना सम्भव नहीं है।)'
इस तरह सीता अनेक प्रकार से राक्षसों की प्रबलता और वानर की निर्बलता का निश्चय करके उन्हें राक्षसराज रावण ही माना; क्योंकि राक्षसों में इच्छानुसार रूप धारण करने की शक्ति होती है। ऐसा विचारकर सूक्ष्म कटिप्रदेश वाली जनककुमारी सीता ने कपिवर हनुमानजी से फिर कुछ नहीं कहा।
सीता के इस निश्चय को समझकर पवनकुमार हनुमानजी उस समय कानों को सुख पहुँचाने वाले अनुकूल वचनों द्वारा उनका हर्ष बढ़ाते हुए बोले - भगवान् श्रीराम सूर्य के समान तेजस्वी, चन्द्रमा के समान लोककमनीय तथा देव कुबेर की भाँति सम्पूर्ण जगत के राजा हैं। महायशस्वी भगवान् विष्णु के समान पराक्रमी तथा बृहस्पतिजी की भाँति सत्यवादी एवं मधुरभाषी हैं। रूपवान्, सौभाग्यशाली और कान्तिमान् तो वे इतने हैं, मानो मूर्तिमान् कामदेव हों। वे क्रोध के पात्र पर ही प्रहार करने में समर्थ और संसार के श्रेष्ठ महारथी हैं।
‘सम्पूर्ण विश्व उन महात्मा की भुजाओं के आश्रय में उन्हीं की छत्रछाया में विश्राम करता है। मृगरूपधारी निशाचर द्वारा श्रीरघुनाथजी को आश्रम से दूर हटाकर जिसने सूने आश्रम में पहुँचकर आपका अपहरण किया है, उसे उस पाप का जो फल मिलने वाला है, उसको आप अपनी आँखों देखेंगी। पराक्रमी श्रीरामचन्द्रजी क्रोधपूर्वक छोड़े गये प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी बाणों द्वारा समराङ्गण में शीघ्र ही रावण का वध करेंगे।'
'मैं उन्हीं का भेजा हुआ दूत होकर यहाँ आपके पास आया हूँ। भगवान् श्रीराम आपके वियोग जनित दु:ख से पीड़ित हैं। उन्होंने आपके पास अपनी कुशल कहलायी है और आपकी भी कुशल पूछी है। माता सुमित्रा का आनन्द बढ़ाने वाले महातेजस्वी महाबाहु लक्ष्मण ने भी आपको प्रणाम करके आपकी कुशल पूछी है। माता ! श्रीरघुनाथजी के सखा एक सुग्रीव नामक वानर हैं, जो मुख्य-मुख्य वानरों के राजा हैं, उन्होंने भी आप से कुशल पूछी है। सुग्रीव और लक्ष्मण सहित श्रीरामचन्द्रजी प्रतिदिन आपका स्मरण करते हैं।'
‘विदेहूनन्दिनि! राक्षसियों के चंगुल में फँसकर भी आप अभी तक जीवित हैं, यह बड़े सौभाग्य की बात है। अब आप शीघ्र ही महारथी श्रीराम और लक्ष्मण का दर्शन करेंगी। साथ ही करोड़ों वानरों से घिरे हुए अमिततेजस्वी सुग्रीव को भी आप देखेंगी। मैं सुग्रीव का मन्त्री हनुमान् नामक वानर हूँ। मैंने महासागर को लाँघकर और दुरात्मा रावण के सिर पर पैर रखकर लङ्कापुरी में प्रवेश किया है। मैं अपने पराक्रम का भरोसा करके आपका दर्शन करने के लिये यहाँ उपस्थित हुआ हूँ। माता ! आप मुझे जैसा समझ रही हैं, मैं वैसा नहीं हूँ। आप यह विपरीत आशङ्का छोड़ दीजिये और मेरी बात पर विश्वास कीजिये।'
