भाग-२१(21) सीताजी से वार्तालाप करने के विषय में हनुमानजी का विचार करना, हनुमानजी का सीता को सुनाने के लिये श्रीराम कथा का वर्णन करना

 


पराक्रमी हनुमानजी ने भी सीताजी का विलाप, त्रिजटा की स्वप्न चर्चा तथा राक्षसियों की डाँट-डपट - ये सब प्रसंग ठीक-ठीक सुन लिये। 

सीताजी ऐसी जान पड़ती थीं मानो नन्दनवन में कोई देवी हों। उन्हें देखते हुए वानरवीर हनुमानजी तरह- तरह की चिन्ता करने लगे - जिन सीताजी को हजारों-लाखों वानर समस्त दिशाओं में ढूँढ़ रहे हैं, आज उन्हें मैंने पा लिया। मैं स्वामी द्वारा नियुक्त दूत बनकर गुप्त रूप से शत्रु की शक्ति का पता लगा रहा था। इसी सिलसिले में मैंने राक्षसों के तारतम्य का, इस पुरी का तथा इस राक्षसराज रावण के प्रभाव का भी निरीक्षण कर लिया। 

'सीता माता असीम प्रभावशाली तथा सब जीवों पर दया करने वाले भगवान् श्रीराम की भार्या हैं। ये अपने पतिदेव का दर्शन पाने की अभिलाषा रखती हैं, अत: इन्हें सान्त्वना देना उचित है। इनका मुख पूर्णचन्द्रमा के समान मनोहर है। इन्होंने पहले कभी ऐसा दुःख नहीं देखा था, परंतु इस समय दुःख का पार नहीं पा रही हैं। अत: मैं इन्हें आश्वासन दूँगा। ये शोक के कारण अचेत सी हो रही हैं, यदि मैं इन सती-साध्वी सीता को सान्त्वना दिये बिना ही चला जाऊँगा तो मेरा वह जाना दोषयुक्त होगा।' 

'मेरे चले जाने पर अपनी रक्षा का कोई उपाय न देखकर ये यशस्विनी राजकुमारी जानकी अपने जीवन का अन्त कर देंगी। पूर्णचन्द्रमा के समान मनोहर मुख वाले महाबाहु श्रीरामचन्द्रजी भी सीता माता के दर्शन के लिये उत्सुक हैं। जिस प्रकार उन्हें सीता माता का संदेश सुनाकर सान्त्वना देना उचित है, उसी प्रकार सीता माता को भी उनका संदेश सुनाकर आश्वासन देना उचित होगा। परंतु राक्षसियों के सामने इन से बात करना मेरे लिये ठीक नहीं होगा। ऐसी अवस्था में यह कार्य कैसे सम्पन्न करना चाहिये, यही निश्चय करना मेरे लिये सबसे बड़ी कठिनाई है।' 

'यदि इस रात्रि बीतते-बीतते मैं माता को सान्त्वना नहीं दे देता हूँ तो ये सर्वथा अपने जीवन का परित्याग कर देंगी, इसमें संदेह नहीं है। यदि श्रीरामचन्द्रजी मुझसे पूछें कि सीता ने मेरे लिये क्या संदेश भेजा है तो इन सुमध्यमा सीता से बात किये बिना मैं उन्हें क्या उत्तर दूँगा। यदि मैं माता  का संदेश लिये बिना ही यहाँ से तुरंत लौट गया तो ककुत्स्थकुलभूषण भगवान् श्रीराम अपनी क्रोधभरी दुःसह दृष्टि से मुझे जलाकर भस्म कर डालेंगे।' 

'यदि मैं इन्हें सान्त्वना दिये बिना ही लौट जाऊँ और श्रीरामचन्द्रजी के कार्य की सिद्धि के लिये अपने स्वामी वानरराज सुग्रीव को उत्तेजित करूँ तो वानरसेना के साथ उनका यहाँ तक आना व्यर्थ हो जायगा क्योंकि माता इसके पहले ही अपने प्राण त्याग देंगी। अच्छा तो राक्षसियों के रहते हुए ही अवसर पाकर आज मैं यहीं बैठे-बैठे इन्हें धीरे-धीरे सान्त्वना दूंगा; क्योंकि इनके मन में बड़ा संताप है। एक तो मेरा शरीर अत्यन्त सूक्ष्म है, दूसरे मैं वानर हूँ। विशेषतः वानर होकर भी मैं यहाँ मानवोचित संस्कृत- भाषा में बोलूँगा।' 

'परंतु ऐसा करने में एक बाधा है, यदि मैं द्विज की भाँति संस्कृत-वाणी का प्रयोग करूँगा तो माता मुझे रावण समझकर भयभीत हो जायँगी। ऐसी दशा में अवश्य ही मुझे उस सार्थक भाषा का प्रयोग करना चाहिये, जिसे अयोध्या के आस-पास की साधारण जनता बोलती है, अन्यथा इन सती-साध्वी सीता माता को मैं उचित आश्वासन नहीं दे सकता। यदि मैं सामने जाऊँ तो मेरे इस वानर रूप को देखकर और मेरे मुख से मानवोचित भाषा सुनकर ये जनकनन्दिनी सीता माता, जिन्हें पहले से ही राक्षसों ने भयभीत कर रखा है और भी डर जायँगी।' 

‘मन में भय उत्पन्न हो जाने पर ये विशाललोचना मनस्विनी माता मुझे इच्छानुसार रूप धारण करने वाला रावण समझकर जोर-जोर से चीखने-चिल्लाने लगेंगी। माता के चिल्लाने पर ये यमराज के समान भयानक राक्षसियाँ तरह-तरह के हथियार लेकर सहसा आ धमकेंगी। तदनन्तर ये विकट मुखवाली महाबलवती राक्षसियाँ मुझे सब ओर से घेरकर मारने या पकड़ लेने का प्रयत्न करेंगी। फिर मुझे बड़े-बड़े वृक्षों की शाखा प्रशाखा और मोटी-मोटी डालियों पर दौड़ता देख ये सब की सब सशङ्क हो उठेंगी।' 

‘वन में विचरते हुए मेरे इस विशाल रूप को देखकर राक्षसियाँ भी भयभीत हो बुरी तरह से चिल्लाने लगेंगी। इसके बाद वे निशाचरियाँ राक्षसराज रावण के महल में उसके द्वारा नियुक्त किये गये राक्षसों को बुला लेंगी। इस हलचल में वे राक्षस भी उद्विग्न होकर शूल, बाण, तलवार और तरह-तरह के शस्त्रास्त्र लेकर बड़े वेग से आ धमकेंगे। उनके द्वारा सब ओर से घिर जाने पर मैं राक्षसों की सेना का संहार तो कर सकता हूँ; परंतु समुद्र के उस पार नहीं पहुँच सकता।' 

'यदि बहुत से फुर्तीले राक्षस मुझे घेरकर पकड़ लें तो सीता माता का मनोरथ भी पूरा नहीं होगा और मैं भी बंदी बना लिया जाऊँगा। इसके सिवा हिंसा में रुचि रखने वाले राक्षस यदि इन जनकदुलारी को मार डालें तो श्रीरघुनाथजी और सुग्रीव का यह सीता की प्राप्तिरूप अभीष्ट कार्य ही नष्ट हो जायगा। यह स्थान राक्षसों से घिरा हुआ है। यहाँ आने का मार्ग दूसरों का देखा या जाना हुआ नहीं है तथा इस प्रदेश को समुद्र ने चारों ओर से घेर रखा है। ऐसे गुप्त स्थान में जानकीजी निवास करती हैं।' 

‘यदि राक्षसों ने मुझे संग्राम में मार दिया या पकड़ लिया तो फिर श्रीरघुनाथजी के कार्य को पूर्ण करने के लिये कोई दूसरा सहायक भी मैं नहीं देख रहा हूँ।बहुत विचार करने पर भी मुझे ऐसा कोई वानर नहीं दिखायी देता है, जो मेरे मारे जाने पर सौ योजन विस्तृत महासागर को लाँघ सके। मैं इच्छानुसार सहस्रों राक्षसों को मार डालने में समर्थ हूँ; परंतु युद्ध में फँस जाने पर महासागर के उस पार नहीं जा सकूँगा। युद्ध अनिश्चयात्मक होता है (उसमें किस पक्ष की विजय होगी, यह निश्चित नहीं रहता) और मुझे संशय युक्त कार्य प्रिय नहीं है। कौन ऐसा बुद्धिमान् होगा, जो संशय रहित कार्य को संशय युक्त बनाना चाहेगा।' 

'माता से बातचीत करने में मुझे यही महान् दोष प्रतीत होता है और यदि बातचीत नहीं करता हूँ तो विदेहनन्दिनी सीता का प्राणत्याग भी निश्चित ही है। अविवेकी या असावधान दूत के हाथ में पड़ने पर बने बनाये काम भी देश - काल के विरोधी होकर उसी प्रकार असफल हो जाते हैं, जैसे सूर्य के उदय होने पर सब ओर फैले हुए अन्धकार का कोई वश नहीं चलता, वह निष्फल हो जाता है। कर्तव्य और अकर्तव्य के विषय में स्वामी की निश्चित बुद्धि भी अविवेकी दूत के कारण शोभा नहीं पाती है; क्योंकि अपने को बड़ा बुद्धिमान् या पण्डित समझने वाले दूत अपनी ही नासमझी से कार्य को नष्ट कर डालते हैं।' 

'फिर किस प्रकार यह काम न बिगड़े, किस तरह मुझसे कोई असावधानी न हो, किस प्रकार मेरा समुद्र लाँघना व्यर्थ न हो जाय और किस तरह सीताजी मेरी सारी बातें सुन लें, किंतु घबराहट में न पड़ें – इन सब बातों पर विचार करके बुद्धिमान् हनुमानजी ने यह निश्चय किया - जिनका चित्त अपने जीवन-बन्धु श्रीराम में ही लगा है, उन सीताजी को मैं उनके प्रियतम श्रीराम का जो अनायास ही महान् कर्म करने वाले हैं, गुण गा-गाकर सुनाऊँगा और उन्हें उद्विग्न नहीं होने दूँगा।' 

‘मैं इक्ष्वाकु कुलभूषण विदितात्मा भगवान् श्रीराम के सुन्दर, धर्मानुकूल वचनों को सुनाता हुआ यहीं बैठा रहूँगा। मीठी वाणी बोलकर श्रीराम के सारे संदेशों को इस प्रकार सुनाऊँगा, जिससे माता का उन वचनों पर विश्वास हो। जिस तरह उनके मन का संदेह दूर हो, उसी तरह मैं सब बातों का समाधान करूँगा।' 

इस प्रकार भाँति-भाँति से विचार करके अशोक वृक्ष की शाखाओं में छिपकर बैठे हुए महाप्रभावशाली हनुमानजी पृथ्वीपति श्रीरामचन्द्रजी की भार्या की ओर देखते हुए मधुर एवं यथार्थ बात कहने लगे। 

इस प्रकार बहुत-सी बातें सोच-विचारकर महामति हनुमानजी ने सीता को सुनाते हुए मधुर वाणी में इस तरह कहना आरम्भ किया - 

(यहाँ श्रीहनुमानजी द्वारा माता सीता को जो श्रीराम का गुणगान सुनाया गया है यह मूल रामायण का संवाद नहीं है हमने इसे AI के माध्यम से आपके लिए एक मधुर और भावपूर्ण भक्ति गान में रूपांतरित किया है।)


राम तुम्हें हर श्वास पुकारे, हे जनकदुलारी सीता,

नयन बिछाए वन-वन डोले, खोज रहे अपनी सीता।


राम तुम्हें हर श्वास पुकारे, हे जनकदुलारी सीता,

नयन बिछाए वन-वन डोले, खोज रहे अपनी सीता।


अवधपुरी के चन्द्र रघुवर, दीनों के रखवाले,

सत्य, धर्म, करुणा के सागर, सबके भाग्य उजाले।

पिता-वचन की लाज बचाने, त्याग दिए सुख सारे।


राम तुम्हें हर श्वास पुकारे, हे जनकदुलारी सीता,

नयन बिछाए वन-वन डोले, खोज रहे अपनी सीता।


संग तुम्हारे वन में आए, लक्ष्मण सेवक प्यारे,

दुष्ट निशाचर जहाँ दिखाई दिए, सब संकट हारे।

खर-दूषण का मान मिटाकर, धर्म ध्वजा फहराए।


छल से रावण तुम्हें हर लाया, वन सूना-सूना छाया,

"सीते! सीते!" कहकर रघुवर ने पर्वत-पर्वत ध्याया।

नदियाँ, पवन, लताएँ, पत्ते, सबसे पूछत फिरते।


राम तुम्हें हर श्वास पुकारे, हे जनकदुलारी सीता,

नयन बिछाए वन-वन डोले, खोज रहे अपनी सीता।


आँखों में बस एक तुम्हारी छवि, हृदय तुम्हारा धाम,

तुम बिन सूनी अयोध्या लगती, तुम बिन सूने राम।

विरह-अग्नि में जलते रघुवर, गिनते दिन और तारे।


वानर-दल को साथ मिलाकर, खोज तुम्हारी ठानी,

सागर, गिरि और वन सब छाने, छोड़ न कोई निशानी।

धीर धरो हे मिथिलाकुमारी, मिटेंगे दुःख तुम्हारे।


राम तुम्हें हर श्वास पुकारे, हे जनकदुलारी सीता,

नयन बिछाए वन-वन डोले, खोज रहे अपनी सीता।


अब वह घड़ी बहुत निकट है, जब मिट जाएगा अँधियारा,

रावण का अभिमान झुकेगा, होगा धर्म उजियारा।

सीता-राम पुनः मिलेंगे, गाएँगे जग सारे,

                                              जय सिया राम, जय जय सिया राम........


इतना ही कहकर वानरशिरोमणि हनुमानजी चुप हो गये। उनकी बातें सुनकर जनकनन्दिनी सीता को बड़ा विस्मय हुआ। उनके केश घुँघराले और बड़े ही सुन्दर थे। भीरु सीता ने केशों से ढके हुए अपने मुँह को ऊपर उठाकर उस अशोक वृक्ष की ओर देखा। कपि के वचन सुनकर सीता को बड़ी प्रसन्नता हुई। वे सम्पूर्ण वृत्तियों से भगवान् श्रीराम का स्मरण करती हुई समस्त दिशाओं में दृष्टि दौड़ाने लगीं। उन्होंने ऊपर-नीचे तथा इधर-उधर दृष्टिपात करके उन अचिन्त्य बुद्धि वाले पवनपुत्र हनुमान को, जो वानरराज सुग्रीव के मन्त्री थे, उदयाचल पर विराजमान सूर्य के समान देखा

इति श्रीमद् राम कथा सुन्दरकाण्ड अध्याय-९ का भाग-२१(21) समाप्त ! 

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