भाग-२०(20) त्रिजटा का स्वप्न, राक्षसों के विनाश और श्रीरघुनाथजी की विजय की शुभ सूचना, विलाप करती हुई सीता का प्राण त्याग के लिये उद्यत होना और उनको शुभ शकुन होना

 


सीता ने जब ऐसी भयंकर बात कही, तब वे राक्षसियाँ क्रोध से अचेत सी हो गयीं और उनमें से कुछ उस दुरात्मा रावण से वह संवाद कहने के लिये चल दीं। 

तत्पश्चात् भयंकर दिखायी देने वाली वे राक्षसियाँ सीता के पास आकर पुन: एक ही प्रयोजन से सम्बन्ध रखने वाली कठोर बातें, जो उनके लिये ही अनर्थकारिणी थीं, कहने लगीं - पापपूर्ण विचार रखने वाली अनार्ये सीते! आज इसी समय ये सब राक्षसियाँ मौज के साथ तेरा यह मांस खायेंगी

उन दुष्ट निशाचरियों के द्वारा सीता को इस प्रकार डरायी जाती देख बूढ़ी राक्षसी त्रिजटा, जो तत्काल सोकर उठी थी, उन सबसे कहने लगी - नीच निशाचरियो! तुम लोग अपने-आपको ही खा जाओ। राजा जनक की प्यारी पुत्री तथा महाराज दशरथ की प्रिय पुत्रवधू सीताजी को नहीं खा सकोगी। आज मैंने बड़ा भयंकर और रोमाञ्चकारी स्वप्न देखा है, जो राक्षसों के विनाश और सीतापति के अभ्युदय की सूचना देने वाला है। 

त्रिजटा के ऐसा कहने पर वे सब राक्षसियाँ, जो पहले क्रोध से मूर्च्छित हो रही थीं, भयभीत हो उठीं और त्रिजटा से इस प्रकार बोलीं - अरी! बताओ तो सही, तुमने आज रात में यह कैसा स्वप्न देखा है?

उन राक्षसियों के मुख से निकली हुई यह बात सुनकर त्रिजटा ने उस समय वह स्वप्न- सम्बन्धी बात इस प्रकार कही - आज स्वप्न में मैंने देखा है कि आकाश में चलने वाली एक दिव्य शिबिका (पालकी) है। वह हाथीदाँत की बनी हुई है। उसमें एक हजार घोड़े जुते हुए हैं और श्वेत पुष्पों की माला तथा श्वेत वस्त्र धारण किये स्वयं श्रीरघुनाथजी लक्ष्मण के साथ उस शिबिका पर चढ़कर यहाँ पधारे हैं। आज स्वप्न में मैंने यह भी देखा है कि सीता श्वेत वस्त्र धारण किये श्वेत पर्वत के शिखर पर बैठी हैं और वह पर्वत समुद्र से घिरा हुआ है, वहाँ जैसे सूर्यदेव से उनकी प्रभा मिलती है, उसी प्रकार सीता श्रीरामचन्द्रजी से मिली हैं। मैंने श्रीरघुनाथजी को फिर देखा, वे चार दाँत वाले विशाल गजराज पर, जो पर्वत के समान ऊँचा था, लक्ष्मण के साथ बैठे हुए बड़ी शोभा पा रहे थे। 

'तदनन्तर अपने तेज से सूर्य के समान प्रकाशित होते तथा श्वेत माला और श्वेत वस्त्र धारण किये वे दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण जानकीजी के पास आये। फिर उस पर्वत-शिखर पर आकाश में ही खड़े हुए और पति द्वारा पकड़े गये उस हाथी के कंधे पर जानकीजी भी आ पहुँचीं। इसके बाद कमलनयनी सीता अपने पति के अङ्क से ऊपर को उछलकर चन्द्रमा और सूर्य के पास पहुँच गयीं। वहाँ मैंने देखा, वे अपने दोनों हाथों से चन्द्रमा और सूर्य को पोंछ रही हैं। उन पर हाथ फेर रही हैं।' 

'तत्पश्चात् जिस पर वे दोनों राजकुमार और विशाललोचना सीताजी विराजमान थीं, वह महान् गजराज लङ्का के ऊपर आकर खड़ा हो गया। फिर मैंने देखा कि आठ सफेद बैलों से जुते हुए एक रथ पर आरूढ़ हो ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामचन्द्रजी श्वेत पुष्पों की माला और वस्त्र धारण किये अपनी धर्मपत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ यहाँ पधारे हैं। इसके बाद दूसरी जगह मैंने देखा, सत्यपराक्रमी और बल- विक्रमशाली पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ सूर्यतुल्य तेजस्वी दिव्य पुष्पक विमान पर आरूढ़ हो उत्तर दिशा को लक्ष्य करके यहाँ से प्रस्थित हुए हैं। इस प्रकार मैंने स्वप्न में भगवान् विष्णु के समान पराक्रमी श्रीराम का उनकी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ दर्शन किया।' 

'श्रीरामचन्द्रजी महातेजस्वी हैं। उन्हें देवता, असुर, राक्षस तथा दूसरे लोग भी कदापि जीत नहीं सकते। ठीक उसी तरह, जैसे पापी मनुष्य स्वर्ग लोक पर विजय नहीं पा सकते। मैंने रावण को भी सपने में देखा था। वह मूड़ मुड़ाये तेल से नहाकर लाल कपड़े पहने हुए था। मदिरा पीकर मतवाला हो रहा था तथा करवीर के फूलों की माला पहने हुए था। इसी वेशभूषा में आज रावण पुष्पक विमान से पृथ्वी पर गिर पड़ा था। एक स्त्री उस मुण्डित - मस्तक रावण को कहीं खींचे लिये जा रही थी।' 

'उस समय मैंने फिर देखा, रावण ने काले कपड़े पहन रखे हैं। वह गधे जुते हुए रथ से यात्रा कर रहा था। लाल फूलों की माला और लाल चन्दन से विभूषित था। तेल पीता, हँसता और नाचता था। पागलों की तरह उसका चित्त भ्रान्त और इन्द्रियाँ व्याकुल थीं। वह गधे पर सवार हो शीघ्रतापूर्वक दक्षिण दिशा की ओर जा रहा था। तदनन्तर मैंने फिर देखा राक्षसराज रावण गधे से नीचे भूमि पर गिर पड़ा है। उसका सिर नीचे की ओर है (और पैर ऊपर की ओर) तथा वह भय से मोहित हो रहा है।' 

‘फिर वह भयातुर हो घबराकर सहसा उठा और मद से विह्वल हो पागल के समान नंग-धडंग वेष में बहुत-से दुर्वचन (गाली आदि) बकता हुआ आगे बढ़ गया। सामने ही दुर्गन्धयुक्त दुःसह घोर अन्धकारपूर्ण और नरकतुल्य मल का पङ्क था, रावण उसी में घुसा और वहीं डूब गया। तदनन्तर फिर देखा, रावण दक्षिण की ओर जा रहा है। उसने एक ऐसे तालाब में प्रवेश किया है, जिसमें कीचड़ का नाम नहीं है। वहाँ एक काले रंग की स्त्री है, जिसके अंगों में कीचड़ लिपटी हुई है। वह युवती लाल वस्त्र पहने हुए है और रावण का गला बाँधकर उसे दक्षिण दिशा की ओर खींच रही है। वहाँ महाबली कुम्भकर्ण को भी मैंने इसी अवस्था में देखा है।' 

'रावण के सभी पुत्र भी मूड़ मुड़ाये और तेल में नहाये दिखायी दिये हैं। यह भी देखने में आया कि रावण सूअर पर, इन्द्रजित् सूँस पर और कुम्भकर्ण ऊँट पर सवार हो दक्षिण दिशा को गये हैं। राक्षसों में एकमात्र विभीषण ही ऐसे हैं, जिन्हें मैंने वहाँ श्वेत छत्र लगाये, सफेद माला पहने, श्वेत वस्त्र धारण किये तथा श्वेत चन्दन और अंगराग लगाये देखा है। उनके पास शङ्खध्वनि हो रही थी, नगाड़े बजाये जा रहे थे। इनके गम्भीर घोष के साथ ही नृत्य और गीत भी हो रहे थे, जो विभीषण की शोभा बढ़ा रहे थे। विभीषण वहाँ अपने चार मन्त्रियों के साथ पर्वत के समान विशालकाय मेघ समान गम्भीर शब्द करने वाले तथा चार दाँतों वाले दिव्य गजराज पर आरूढ़ हो आकाश में खड़े थे।' 

'यह भी देखने में आया कि तेल पीने वाले तथा लाल माला और लाल वस्त्र धारण करने वाले राक्षसों का वहाँ बहुत बड़ा समाज जुटा हुआ है एवं गीतों और वाद्यों की मधुर ध्वनि हो रही है। यह रमणीय लङ्कापुरी घोड़े, रथ और हाथियों सहित समुद्र में गिरी हुई देखी गयी है। इसके बाहरी और भीतरी दरवाजे टूट गये हैं। मैंने स्वप्न में देखा है कि रावण द्वारा सुरक्षित लङ्कापुरी को श्रीरामचन्द्रजी का दूत बनकर आये हुए एक वेगशाली वानर ने जलाकर भस्म कर दिया है। राख से रूखी हुई लङ्का में सारी राक्षस रमणियाँ तेल पीकर मतवाली हो बड़े जोर-जोर से ठहाका मारकर हँसती हैं।' 

‘कुम्भकर्ण आदि ये समस्त राक्षस शिरोमणि वीर लाल कपड़े पहनकर गोबर के कुण्ड में घुस गये हैं। अत: अब तुम लोग हट जाओ और देखो कि किस तरह श्रीरघुनाथजी सीता को प्राप्त कर रहे हैं। वे बड़े अमर्षशील हैं, राक्षसों के साथ तुम सबको भी मरवा डालेंगे। जिन्होंने वनवास में भी उनका साथ दिया है, उन अपनी पतिव्रता भार्या और परमादरणीया प्रियतमा सीता का इस तरह धमकाया और डराया जाना श्रीरघुनाथजी कदापि सहन नहीं करेंगे। अत: अब इस तरह कठोर बातें सुनाना छोड़ो; क्योंकि इनसे कोई लाभ नहीं होगा। अब तो मधुर वचन का ही प्रयोग करो। मुझे तो यही अच्छा लगता है कि हम लोग विदेह्नन्दिनी सीता से कृपा और क्षमा की याचना करें।'  

'जिस दुःखिनी नारी के विषय में ऐसा स्वप्न देखा जाता है, वह बहुसंख्यक दुःखों से छुटकारा पाकर परम उत्तम प्रिय वस्तु प्राप्त कर लेती है। राक्षसियो! मैं जानती हूँ, तुम्हें कुछ और कहने या बोलने की इच्छा है; किंतु इससे क्या होगा? यद्यपि तुमने सीता को बहुत धमकाया है तो भी इनकी शरण में आकर इनसे अभय की याचना करो; क्योंकि श्रीरघुनाथजी की ओर से राक्षसों के लिये घोर भय उपस्थित हुआ है। राक्षसियो! जनकनन्दिनी मिथिलेशकुमारी सीता केवल प्रणाम करने से ही प्रसन्न हो जायँगी। ये ही उस महान् भय से तुम्हारी रक्षा करने में समर्थ हैं। इन विशाललोचना सीता के अंगों में मुझे कोई सूक्ष्म से सूक्ष्म भी विपरीत लक्षण नहीं दिखायी देता (जिससे समझा जाय कि ये सदा कष्ट में ही रहेंगी )।' 

‘मैं तो समझती हूँ कि इन्हें जो वर्तमान दुःख प्राप्त हुआ है, वह ग्रहण के समय चन्द्रमा पर पड़ी हुई छाया के समान थोड़ी ही देर का है; क्योंकि ये देवी सीता मुझे स्वप्न में विमान पर बैठी दिखायी दी हैं, अतः ये दुःख भोगने के योग्य कदापि नहीं हैं। मुझे तो अब जानकीजी के अभीष्ट मनोरथ की सिद्धि उपस्थित दिखायी देती है। राक्षसराज रावण के विनाश और रघुनाथजी की विजय में अब अधिक विलम्ब नहीं है। कमलदल के समान इनका विशाल बायाँ नेत्र फड़कता दिखायी देता है। यह इस बात का सूचक है कि इन्हें शीघ्र ही अत्यन्त प्रिय संवाद सुनने को मिलेगा।' 

‘इन उदारहृदया विदेहराजकुमारी की एक बायीं बाँह कुछ रोमाञ्चित होकर सहसा काँपने लगी है (यह भी शुभ का ही सूचक है)। हाथी की सूँड़ के समान जो इनकी परम उत्तम बायीं जाँघ है, वह भी कम्पित होकर मानो यह सूचित कर रही है कि अब श्रीरघुनाथजी शीघ्र ही तुम्हारे सामने उपस्थित होंगे। देखो, सामने यह पक्षी शाखा के ऊपर अपने घोंसले में बैठकर बारम्बार उत्तम सान्त्वनापूर्ण मीठी बोली बोल रहा है। इसकी वाणी से 'सुस्वागतम्' की ध्वनि निकल रही है और इसके द्वारा यह हर्ष में भरकर मानो पुनः पुनः मंगल प्राप्ति की सूचना दे रहा है अथवा आने वाले प्रियतम की अगवानी के लिये प्रेरित कर रहा है। कहते हैं भोर का स्वप्न सत्य होता है। इसलिए कुछ समय पश्चात यह सत्य होकर रहेगा।' 

इस प्रकार पतिदेव की विजय के संवाद से हर्ष में भरी हुई लजीली सीता उन सबसे बोलीं - यदि तुम्हारी बात ठीक हुई तो मैं अवश्य ही तुम सबकी रक्षा करूंगी। 

पति के विरह के दु:ख से व्याकुल हुई सीता राक्षसराज रावण के उन अप्रिय वचनों को याद करके उसी तरह भयभीत हो गयीं, जैसे वन में सिंह के पंजे में पड़ी हुई कोई गजराज की बच्ची। राक्षसियों के बीच में बैठकर उनके कठोर वचनों से बारम्बार धमकायी और रावण द्वारा फटकारी गयी भीरु स्वभाव वाली सीता निर्जन एवं बीहड़ वन में अकेली छूटी हुई अल्पवयस्का बालिका के समान विलाप करने लगीं। 

वे बोलीं – संतजन लोक में यह बात ठीक ही कहते हैं कि बिना समय आये किसी की मृत्यु नहीं होती, तभी तो इस प्रकार धमकायी जाने पर भी मैं पुण्यहीना नारी क्षणभर भी जीवित रह पाती हूँ। मेरा यह हृदय सुख से रहित और अनेक प्रकार के दुःखों से भरा होने पर भी निश्चय ही अत्यन्त दृढ़ है। इसीलिये वज्र के मारे हुए पर्वतशिखर की भाँति आज इसके सहस्रों टुकड़े नहीं हो जाते। 

‘मैं इस दुष्ट रावण के हाथ से मारी जाने वाली हूँ, इसलिये यहाँ आत्मघात करने से भी मुझे कोई दोष नहीं लग सकता। कुछ भी हो, जैसे द्विज किसी शूद्र को वेदमन्त्र का उपदेश नहीं देता, उसी प्रकार मैं भी इस निशाचर को अपने हृदय का अनुराग नहीं दे सकती। हाय! लोकनाथ भगवान् श्रीरघुनाथजी के आने से पहले ही यह दुष्ट राक्षसराज निश्चय ही अपने तीखे शस्त्रों से मेरे अंगों के शीघ्र ही टुकड़े-टुकड़े कर डालेगा। ठीक वैसे ही, जैसे शल्यचिकित्सक किसी विशेष अवस्था में गर्भस्थ शिशु के टूक-टूक कर देता है (अथवा जैसे इन्द्र ने दिति के गर्भ में स्थित शिशु के उनचास टुकड़े कर डाले थे)।' 

‘मैं बड़ी दु:खिया हूँ। दु:ख की बात है कि मेरी अवधि के ये दो महीने भी जल्दी ही समाप्त हो जायँगे। राजा के कारागार में कैद हुए और रात्रि के अन्त में फाँसी की सजा पाने वाले अपराधी चोर की जो दशा होती है, वही मेरी भी है। हा रघुनाथ ! हा लक्ष्मण! हा माता सुमित्रे! हा माता कौशल्ये! और हा मेरी माताओ! जिस प्रकार बवंडर में पड़ी हुई नौका महासागर में डूब जाती है, उसी प्रकार आज मैं मन्दभागिनी सीता प्राणसङ्कट की दशा में पड़ी हुई हूँ।'  

'निश्चय ही उस मृगरूपधारी जीव ने मेरे कारण उन दोनों वेगशाली राजकुमारों को मार डाला होगा। जैसे दो श्रेष्ठ सिंह बिजली से मार दिये जायँ, वही दशा उन दोनों भाइयों की हुई होगी। अवश्य ही उस समय काल ने ही मृग का रूप धारण करके मुझ मन्दभागिनी को लुभाया था, जिससे प्रभावित हो मुझ मूढ नारी ने उन दोनों आर्यपुत्रों श्रीरघुनाथजी और लक्ष्मण को उसके पीछे भेज दिया था। हा सत्यव्रतधारी महाबाहु श्रीरघुनाथजी ! हा पूर्ण चन्द्रमा के समान मनोहर मुख वाले रघुनन्दन ! हा जीवजगत के हितैषी और प्रियतम! आपको पता नहीं है कि मैं राक्षसों के हाथ से मारी जाने वाली हूँ।' 

'मेरी यह अनन्योपासना, क्षमा, भूमिशयन, धर्मसम्बन्धी नियमों का पालन और पतिव्रतपरायणता – ये सब-के-सब कृतघ्नों के प्रति किये गये मनुष्यों के उपकार की भाँति निष्फल हो गये। प्रभो! यदि मैं अत्यन्त कृश और कान्तिहीन होकर आप से बिछुड़ी ही रह गयी तथा आपसे मिलने की आशा खो बैठी, तब तो मैंने जिसका जीवन भर आचरण किया है, वह धर्म मेरे लिये व्यर्थ हो गया और यह एकपत्नी व्रत भी किसी काम नहीं आया।' 

'मैं तो समझती हूँ आप नियमानुसार पिता की आज्ञा का पालन करके अपने व्रत को पूर्ण करने के पश्चात् जब वन से लौटेंगे, तब निर्भय एवं सफलमनोरथ हो विशाल नेत्रों वाली बहुत-सी सुन्दरियों के साथ विवाह करके उनके साथ रमण करेंगे। किंतु श्रीरघुनाथ ! मैं तो केवल आपमें ही अनुराग रखती हूँ। मेरा हृदय चिरकाल तक आपसे ही बँधा रहेगा। मैं अपने विनाश के लिये ही आपसे प्रेम करती हूँ। अब तक मैंने तप और व्रत आदि जो कुछ भी किया है, वह मेरे लिये व्यर्थ सिद्ध हुआ है। उस अभीष्ट फल को न देने वाले धर्म का आचरण करके अब मुझे अपने प्राणों का परित्याग करना पड़ेगा। अतः मुझ मन्दभागिनी को धिक्कार है। मैं शीघ्र ही किसी तीखे शस्त्र अथवा विष से अपने प्राण त्याग दूँगी; परंतु इस राक्षस के यहाँ मुझे कोई विष या शस्त्र देने वाला भी नहीं है।' 

शोक से संतप्त हुई सीता ने इसी प्रकार बहुत कुछ विचार करके अपनी चोटी को पकड़कर निश्चय किया कि मैं शीघ्र ही इस चोटी से फाँसी लगाकर यमलोक में पहुँच जाऊँगी। सीताजी के सभी अंग बड़े कोमल थे। वे उस अशोक वृक्ष के निकट उसकी शाखा पकड़कर खड़ी हो गयीं। इस प्रकार प्राण-त्याग के लिये उद्यत हो जब वे श्रीराम, लक्ष्मण और अपने कुल के विषय में विचार करने लगीं, उस समय शुभांगी सीता के समक्ष ऐसे बहुत से लोकप्रसिद्ध श्रेष्ठ शकुन प्रकट हुए, जो शोक की निवृत्ति करने वाले और उन्हें ढाढ़स बँधाने वाले थे। उन शकुनों का दर्शन और उनके शुभ फलों का अनुभव उन्हें पहले भी हो चुका था। 

इस प्रकार अशोक वृक्ष के नीचे आने पर बहुत-से शुभ शकुन प्रकट हो उन व्यथितहृदया, सती-साध्वी, हर्षशून्य, दीनचित्त तथा शुभलक्षणा सीता का उसी तरह सेवन करने लगे, जैसे श्रीसम्पन्न पुरुष के पास सेवा करने वाले लोग स्वयं पहुँच जाते हैं। उस समय सुन्दर केशों वाली सीता का बाँकी बरौनियों से घिरा हुआ परम मनोहर काला, श्वेत और विशाल बायाँ नेत्र फड़कने लगा। जैसे मछली के आघात से लाल कमल हिलने लगा हो। साथ ही उनकी सुन्दर प्रशंसित गोलाकार मोटी, बहुमूल्य काले अगुरु और चन्दन से चर्चित होने योग्य तथा परम उत्तम प्रियतम द्वारा चिरकाल से सेवित बायीं भुजा भी तत्काल फड़क उठी। 

फिर उनकी परस्पर जुड़ी हुई दोनों जाँघों में से एक बायीं जाँघ, जो गजराज की सूँड़ के समान पीन (मोटी ) थी, बारम्बार फड़क कर मानो यह सूचना देने लगी कि भगवान् श्रीराम तुम्हारे सामने खड़े हैं। तत्पश्चात् अनार के बीज की भाँति सुन्दर दाँत, मनोहर गात्र और अनुपम नेत्र वाली सीता का, जो वहाँ वृक्ष के नीचे खड़ी थीं, सोने के समान रंग वाला किंचित् मलिन रेशमी पीताम्बर तनिक-सा खिसक गया और भावी शुभ की सूचना देने लगा। इनसे तथा और भी अनेक शकुनों से, जिनके द्वारा पहले भी मनोरथसिद्धि का परिचय मिल चुका था, प्रेरित हुई सुन्दर भौंहों वाली सीता उसी प्रकार हर्ष से खिल उठीं, जैसे हवा और धूप से सूखकर नष्ट हुआ बीज वर्षा के जल से सिंचकर हरा हो गया हो। 

उनका बिम्बफल के समान लाल ओठों, सुन्दर नेत्रों, मनोहर भौंहों, रुचिर केशों, बाँकी बरौनियों तथा श्वेत, उज्वल दाँतों से सुशोभित मुख राहु के ग्रास से मुक्त हुए चन्द्रमा की भाँति प्रकाशित होने लगा। उनका शोक जाता रहा, सारी थकावट दूर हो गयी, मन का ताप शान्त हो गया और हृदय हर्ष से खिल उठा। उस समय आर्या सीता शुक्ल पक्ष में उदित हुए शीतरश्मि चन्द्रमा से सुशोभित रात्रि की भाँति अपने मनोहर मुख से अद्भुत शोभा पाने लगीं। 

इति श्रीमद् राम कथा सुन्दरकाण्ड अध्याय-९ का भाग-२०(20) समाप्त ! 

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