तदनन्तर शत्रुओं का संहार करने वाले हनुमानजी ने रावण द्वारा हरी गयी सीता के निवास स्थान का पता लगाने के लिये उस आकाशमार्ग से जाने का विचार किया, जिस पर चारण (देवजाति विशेष) विचरा करते हैं। कपिवर हनुमानजी ऐसा कर्म करना चाहते थे, जो दूसरों के लिये दुष्कर था तथा उस कार्य में उन्हें किसी और की सहायता भी नहीं प्राप्त थी। उन्होंने मस्तक और ग्रीवा ऊँची की। उस समय वे हृष्ट-पुष्ट साँड़ के समान प्रतीत होने लगे।
फिर धीर स्वभाव वाले वे महाबली पवनकुमार वैदूर्यमणि (नीलम) और समुद्र के जल की भाँति हरी-हरी घास पर सुख पूर्वक विचरने लगे। उस समय बुद्धिमान् हनुमानजी पक्षियों को त्रास देते, वृक्षों को वक्षःस्थल के आघात से धराशायी करते तथा बहुत- से मृगों (वन-जन्तुओं) को कुचलते हुए पराक्रम में बढ़े- चढ़े सिंह के समान शोभा पा रहे थे। उस पर्वत का जो तलप्रदेश था, वह पहाड़ों में स्वभाव से ही उत्पन्न होने वाली नीली, लाल, मजीठ और कमल के से रंग वाली श्वेत तथा श्याम वर्ण वाली निर्मल धातुओं से अच्छी तरह अलंकृत था।
उस पर देवोपम यक्ष, किन्नर, गन्धर्व और नाग, जो इच्छानुसार रूप धारण करने वाले थे, निरन्तर परिवार सहित निवास करते थे। बड़े-बड़े गजराजों से भरे हुए उस पर्वत के समतल प्रदेश में खड़े हुए कपिवर हनुमानजी वहाँ जलाशय में स्थित हुए विशालकाय हाथी के समान जान पड़ते थे। उन्होंने सूर्य, इन्द्र, पवन, ब्रह्मा और भूतों (देवयोनि विशेषों) को भी हाथ जोड़कर उस पार जाने का विचार किया। फिर पूर्वाभिमुख होकर अपने पिता पवनदेव को प्रणाम किया। तत्पश्चात् कार्यकुशल हनुमानजी दक्षिण दिशा में जानेके लिये बढ़ने लगे (अपने शरीर को बढ़ाने लगे)।
बड़े-बड़े वानरों ने देखा, जैसे पूर्णिमा के दिन समुद्र में ज्वार आने लगता है, उसी प्रकार समुद्र- लङ्घन के लिये दृढ़ निश्चय करने वाले हनुमानजी श्रीराम की कार्य-सिद्धि के लिये बढ़ने लगे। समुद्र को लाँघने की इच्छा से उन्होंने अपने शरीर को बेहद बढ़ा लिया और अपनी दोनों भुजाओं तथा चरणों से उस पर्वत को दबाया।
कपिवर हनुमानजी के द्वारा दबाये जाने पर तुरंत ही वह पर्वत काँप उठा और दो घड़ी तक डगमगाता रहा। उसके ऊपर जो वृक्ष उगे थे, उनकी डालियों के अग्रभाग फूलों से लदे हुए थे; किंतु उस पर्वत के हिलने से उनके वे सारे फूल झड़ गये। वृक्षों से झड़ी हुई उस सुगन्धित पुष्पराशि के द्वारा सब ओर से आच्छादित हुआ वह पर्वत ऐसा जान पड़ता था, मानो वह फूलों का ही बना हुआ हो। महापराक्रमी हनुमानजी के द्वारा दबाया जाता हुआ महेन्द्र पर्वत जल के स्रोत बहाने लगा, मानो कोई मदमत्त गजराज अपने कुम्भस्थल से मद की धारा बहा रहा हो।
बलवान् पवनकुमार के भार से दबा हुआ महेन्द्रगिरि सुनहरे, रुपहले और काले रंग के जलस्रोत प्रवाहित करने लगा। इतना ही नहीं, जैसे मध्यम ज्वाला से युक्त अग्नि लगातार धुआँ छोड़ रही हो, उसी प्रकार वह पर्वत मैनसिल सहित बड़ी-बड़ी शिलाएँ गिराने लगा। हनुमानजी के उस पर्वत-पीडन से पीड़ित होकर वहाँ के समस्त जीव गुफाओं में घुसे हुए बुरी तरह से चिल्लाने लगे। इस प्रकार पर्वत को दबाने के कारण उत्पन्न हुआ वह जीव-जन्तुओं का महान् कोलाहल पृथ्वी, उपवन और सम्पूर्ण दिशाओं में भर गया। जिनमें स्वस्तिक चिह्न स्पष्ट दिखायी दे रहे थे, उन स्थूल फणों से विष की भयानक आग उगलते हुए बड़े-बड़े सर्प उस पर्वत की शिलाओं को अपने दाँतों से डँसने लगे।
क्रोध से भरे हुए उन विषैले साँपों के काटने पर वे बड़ी बड़ी शिलाएँ इस प्रकार जल उठीं, मानो उनमें आग लग गयी हो। उस समय उन सबके सहस्रों टुकड़े हो गये। उस पर्वत पर जो बहुत-सी ओषधियाँ उगी हुई थीं, वे विष को नष्ट करने वाली होने पर भी उन नागों के विष को शान्त न कर सकीं। उस समय वहाँ रहने वाले तपस्वी और विद्याधरों ने समझा कि इस पर्वत को भूतलोग तोड़ रहे हैं, इससे भयभीत होकर वे अपनी स्त्रियों के साथ वहाँ से ऊपर उठकर अन्तरिक्ष में चले गये।
मधुपान के स्थान में रखे हुए सुवर्णमय आसवपात्र, बहुमूल्य बर्तन, सोने के कलश, भाँति-भाँति के भक्ष्य पदार्थ, चटनी, नाना प्रकार के फलों के गूदे, बैलों की खाल की बनी हुई ढालें और सुवर्णजटित मूठवाली तलवारें छोड़कर कण्ठ में माला धारण किये, लाल रंग के फूल और अनुलेपन ( चन्दन) लगाये, प्रफुल्ल कमल के सदृश सुन्दर एवं लाल नेत्र वाले वे मतवाले विद्याधरगण भयभीत से होकर आकाश में चले गये। उनकी स्त्रियाँ गले में हार, पैरों में नूपुर, भुजाओं में बाजूबंद और कलाइयों में कंगन धारण किये आकाश में अपने पतियों के साथ मन्द-मन्द मुसकराती हुई चकित-सी खड़ी हो गयीं।
विद्याधर और महर्षि अपनी महाविद्या (आकाश में निराधार खड़े होने की शक्ति) का परिचय देते हुए अन्तरिक्ष में एक साथ खड़े हो गये और उस पर्वत की ओर देखने लगे। उन्होंने उस समय निर्मल आकाश में खड़े हुए भावितात्मा ( पवित्र अन्त: करण वाले) महर्षियों, चारणों और सिद्धों की ये बातें सुनीं - अहा! ये पर्वत के समान विशालकाय महान् वेगशाली पवनपुत्र हनुमानजी वरुणालय समुद्र को पार करना चाहते हैं। श्रीरामचन्द्रजी और वानरों के कार्य की सिद्धि के लिये दुष्कर कर्म करने की इच्छा रखने वाले ये पवनकुमार समुद्र के दूसरे तट पर पहुँचना चाहते हैं, जहाँ जाना अत्यन्त कठिन है।
इस प्रकार विद्याधरों ने उन तपस्वी महात्माओं की कही हुई ये बातें सुनकर पर्वत के ऊपर अतुलित बलशाली वानरशिरोमणि हनुमानजी को देखा। उस समय हनुमानजी अग्नि के समान जान पड़ते थे। उन्होंने अपने शरीर को हिलाया और रोएँ झाड़े तथा महान् मेघ के समान बड़े जोर-जोर से गर्जना की। हनुमानजी अब ऊपर को उछलना ही चाहते थे। उन्होंने क्रमशः गोलाकार मुड़ी तथा रोमावलियों से भरी हुई अपनी पूँछ को उसी प्रकार आकाश में फेंका, जैसे पक्षिराज गरुड़ सर्प को फेंकते हैं। अत्यन्त वेगशाली हनुमानजी के पीछे आकाश में फैली हुई उनकी कुछ-कुछ मुड़ी हुई पूँछ गरुड़ के द्वारा ले जाये जाते हुए महान् सर्प के समान दिखायी देती थी।
उन्होंने अपनी विशाल परिघ के समान भुजाओं को पर्वत पर जमाया। फिर ऊपर के सब अंगों को इस तरह सिकोड़ लिया कि वे कटि की सीमा में ही आ गये; साथ ही उन्होंने दोनों पैरों को भी समेट लिया। तत्पश्चात् तेजस्वी और पराक्रमी हनुमानजी ने अपनी दोनों भुजाओं और गर्दन को भी सिकोड़ लिया। इस समय उनमें तेज, बल और पराक्रम – सभी का आवेश हुआ। उन्होंने अपने लम्बे मार्ग पर दृष्टि दौड़ाने के लिये नेत्रों को ऊपर उठाया और आकाश की ओर देखते हुए प्राणों को हृदय में रोका।
इस प्रकार ऊपर को छलाँग मारने की तैयारी करते हुए कपिश्रेष्ठ महाबली हनुमान ने अपने पैरों को अच्छी तरह जमाया और कानों को सिकोड़ कर उन वानरशिरोमणि ने अन्य वानरों से इस प्रकार कहा - जैसे श्रीरामचन्द्रजी का छोड़ा हुआ बाण वायुवेग से चलता है, उसी प्रकार मैं रावण द्वारा पालित लंकापुरी में जाऊँगा। यदि लंका में जनकनन्दिनी सीता माता को नहीं देखूँगा तो इसी वेग से मैं स्वर्गलोक में चला जाऊँगा। इस प्रकार परिश्रम करने पर यदि मुझे स्वर्ग में भी सीता माता का दर्शन नहीं होगा तो राक्षसराज रावण को बाँधकर लाऊँगा। सर्वथा कृतकृत्य होकर मैं सीता माता के साथ लौटूंगा अथवा रावण सहित लंकापुरी को ही उखाड़कर लाऊँगा।
ऐसा कहकर वेगशाली वानरप्रवर श्रीहनुमानजी ने विघ्न-बाधाओं का कोई विचार न करके बड़े वेग से ऊपर की ओर छलाँग मारी। उस समय उन वानरशिरोमणि ने अपने को साक्षात् गरुड़ के समान ही समझा। जिस समय वे कूदे, उस समय उनके वेग से आकृष्ट हो पर्वत पर उगे हुए सब वृक्ष उखड़ गये और अपनी सारी डालियों को समेटकर उनके साथ ही सब ओर से वेगपूर्वक उड़ चले।
वे हनुमानजी मतवाले कोयष्टि आदि पक्षियों से युक्त, बहुसंख्यक पुष्पशोभित वृक्षों को अपने महान् वेग से ऊपर की ओर खींचते हुए निर्मल आकाश में अग्रसर होने लगे। उनकी जाँघों के महान् वेग से ऊपर को उठे हुए वृक्ष एक मुहूर्त तक उनके पीछे-पीछे इस प्रकार गये, जैसे दूर- देश के पथ पर जाने वाले अपने भाई-बन्धु को उसके बन्धु बान्धव पहुँचाने जाते हैं। हनुमानजी की जाँघों के वेग से उखड़े हुए साल तथा दूसरे-दूसरे श्रेष्ठ वृक्ष उनके पीछे-पीछे उसी प्रकार चले, जैसे राजा के पीछे उसके सैनिक चलते हैं।
जिनकी डालियों के अग्रभाग फूलों से सुशोभित थे, उन बहुतेरे वृक्षों से संयुक्त हुए पर्वताकार हनुमानजी अद्भुत शोभा से सम्पन्न दिखायी दिये। उन वृक्षों में से जो भारी थे, वे थोड़ी ही देर में गिरकर क्षारसमुद्र में डूब गये। ठीक उसी तरह, जैसे कितने ही पंखधारी पर्वत देवराज इन्द्र के भय से वरुणालय में निमग्न हो गये थे। मेघ के समान विशालकाय हनुमानजी अपने साथ खींचकर आये हुए वृक्षों के अंकुर और कोर सहित फूलों से आच्छादित हो जुगुनुओं की जगमगाहट से युक्त पर्वत के समान शोभा पाते थे। वे वृक्ष जब हनुमानजी के वेग से मुक्त हो जाते (उनके आकर्षण से छूट जाते), तब अपने फूल बरसाते हुए इस प्रकार समुद्र के जल में डूब जाते थे, जैसे सुहृद्वर्ग के लोग परदेश जाने वाले अपने किसी बन्धु को दूर तक पहुँचाकर लौट आते हैं।
